3 February 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -105 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ एक सौ पाँचवाँ अध्याय विघ्ननाशक श्रीगणेशजी के प्राकट्य की कथा श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः विनायकोत्पत्ति सूतजी बोले — [ हे ऋषियो ! ] शिवजी को प्रणाम करके जब सुरेश्वर लोग [ यथास्थान] स्थित हो गये, तब अम्बिकापति, पिनाकधारी, भव महेश्वर ने उन श्रेष्ठ देवताओं को क्षणभर में दिव्य दृष्टि प्रदान की। तब अश्रु से भीगे नेत्र वाले देवताओं ने प्रसन्नता से युक्त होकर आदरपूर्वक शिव को प्रणाम किया ॥ १-२ ॥ इसके बाद महेश्वर भव ने सुधामृततुल्य दृष्टि से देखकर सुरेश्वरों से कहा — ‘ आप लोगों का कल्याण हो ‘ ॥ ३ ॥ तदनन्तर स्वामी शिव को देखकर निर्भय होकर बृहस्पति ने उन्हें प्रणाम करके कहा — ‘हे ईश ! ये देवता आपका दर्शन करके वरप्राप्ति के लिये आपके घर आये हुए हैं। देवताओं का अपकार करने वाले दैत्यों आदि के द्वारा निर्विघ्नतापूर्वक समस्त कर्मों की सिद्धि के लिये आप सदा प्रार्थित हैं। अतः आप देवताओं के अपकारी दैत्यों के विघ्नयुक्त कर्म का कारण बनिये और प्रसन्न होइये; यही हम लोगों का वर है’ ॥ ४–६ ॥ तब यह सुनकर उन पिनाकधारी सुरेश्वर शिव ने देवताओं के स्वामी गणेश्वर का शरीर धारण किया । तदनन्तर गणेश्वरों तथा [ ब्रह्मा आदि] सुरेश्वरों ने समस्त लोकों को उत्पन्न करने वाले तथा संसार का कष्ट दूर करने वाले शुभ [गजाननरूपी] महेश्वर की स्तुति की ॥ ७-८ ॥ इसके बाद अम्बिका [पार्वती ] ने हाथी के समान मुख धारण किये हुए और [ हाथों में] त्रिशूल तथा पाश लिये हुए समस्त लोकों के उत्पादक कल्याणकारी गजानन को जन्म दिया ॥ ९ ॥ उस समय सिद्धों, मुनियों, आकाशचारियों तथा देवताओं ने पुष्पवृष्टि की; तब सुरेश्वरों ने आलस्यरहित होकर एकदन्त महेश्वर गणेश को प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति की ॥ १० ॥ उस समय उन शिवा-शिव से उत्पन्न, विचित्र वस्त्र – आभूषणों से अलंकृत तथा सभी मंगलों का आलय महेश्वर-पुत्र वह बालक गजानन मूर्तिमान् सुन्दर भैरव की भाँति स्थित होकर पिता [शिव] तथा माता की वन्दना करके नृत्य करने लगा ॥ ११-१२ ॥ उत्पन्न हुए पुत्र को देखकर भगवान् सर्वेश्वर भव ने गजानन के लिये सभी [जातकर्म आदि] संस्कारों को स्वयं किया ॥ १३ ॥ इसके बाद जगद्गुरु महादेव भव ने स्वयं [अपने] परम सुखदायक हाथों से उसे उठाकर, आलिंगन करके तथा उसके सिर को सूँघकर कहा — ॥ १४ ॥ ‘हे मेरे पुत्र ! तुम्हारा अवतार दैत्यों के विनाश के लिये और देवताओं तथा ब्रह्मवादी द्विजों के उपकार के लिये हुआ है। जिसने पृथ्वीतल पर दक्षिणा-विहीन यज्ञ किया है, तुम स्वर्गपथ में स्थित रहते हुए उसके धर्म में विघ्न डालो। इस पृथ्वीतल पर जो अन्यायपूर्वक अध्ययन, अध्यापन, व्याख्यान तथा [अन्य] कर्म करता हो; उसके प्राणों को तुम सदा हरते रहो। हे नरश्रेष्ठ! हे प्रभो ! वर्ण से च्युत तथा अपने धर्म से रहित पुरुषों एवं स्त्रियों के प्राणों को हर लो ॥ १५-१८ ॥ हे विनायक ! जो स्त्रियाँ तथा पुरुष सदा कालरूप तुम्हारी पूजा करें, तुम उन्हें अपना साम्य प्रदान करो। हे बालगणेश्वर ! तुम इस लोक तथा परलोक में पूजित होकर युवा और वृद्ध भक्तों की रक्षा सम्पूर्ण रूप में प्रयत्न करो। तुम तीनों लोकों में सर्वत्र विघ्नगणेश्वर के पूजनीय तथा वन्दनीय होओगे; इसमें संशय नहीं है । हे पुत्र ! जो [विप्र ] मेरी, विष्णु की तथा ब्रह्मा की पूजा करते हैं अथवा [अग्निष्टोम आदि ] यज्ञों के द्वारा यजन करते हैं, उन ब्राह्मणों के द्वारा भी सबसे पहले तुम पूज्य होओगे ॥ १९-२२ ॥ तुम्हारी पूजा न करके जो कल्याण के लिये श्रौत-स्मार्त-लौकिक कर्म करेगा, उसका मंगल अमंगल के रूप में परिवर्तित हो जायेगा। हे गजानन ! तुम समस्त कार्यों की सिद्धि के लिये ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों के द्वारा शुभ भक्ष्यभोज्य आदि से भली-भाँति पूजा के योग्य होओगे। गन्ध, पुष्प, धूप आदि से तुम्हारी पूजा किये बिना तीनों लोकों में कहीं भी देवताओं तथा अन्य लोगों से भी कुछ नहीं प्राप्त हो सकता है। जो मानव विनायक की पूजा करेंगे, वे इन्द्र आदि के द्वारा भी पूजनीय होंगे; इसमें सन्देह नहीं है। यदि फल की इच्छा रखने वाले तुम्हारी पूजा नहीं करते हों, तो वे चाहे ब्रह्मा, विष्णु, स्वयं मैं, इन्द्र अथवा अन्य देवता ही क्यों न हों, उन्हें तुम विघ्नों से बाधित करो’ ॥ २३–२७ ॥ तब प्रभु गणपति ने विघ्नगणों को उत्पन्न किया और वे गणों के साथ शिवजी को नमस्कार करके उनके आगे खड़े हो गये ॥ २८ ॥ उसी समय से लोग इस लोक में गणपति की पूजा करने लगे और वे गणेश्वर दैत्यों के धर्म में विघ्न डालने लगे। [हे ऋषियो ! ] मैंने आप लोगों को स्कन्द (कार्तिकेय) – के अग्रज की उत्पत्ति का सम्पूर्ण आख्यान बता दिया। जो इसे पढ़ता है, सुनता है अथवा सुनाता है, वह सुखी हो जाता है ॥ २९-३० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘विनायकोत्पत्ति’ नामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०५ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -008 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -016 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -024 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -032 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -040 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -048 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -056 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -064 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -072 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -080 Powered by YARPP.