18 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -040 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ चालीसवाँ अध्याय कलियुग के धर्मों का वर्णन, कलियुग में धर्म आदि का ह्रास तथा स्वल्प भी धर्माचरण का महत्फल एवं कलियुग के अन्त में पुनः सत्ययुग की प्रवृत्ति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चत्वारिंशोऽध्यायः चतुर्युगपरिमाणं इन्द्र बोले — [ हे शिलाद !] कलियुग में तमोगुण से व्याकुल इन्द्रियों वाले मनुष्य माया रचेंगे, दूसरों का दोष देखेंगे तथा तपस्वियों का वध करेंगे ॥ १ ॥ कलियुग में प्रमाद, रोग, निरन्तर क्षुधा का भय, अनावृष्टिरूप घोर भय तथा देशों का विपर्यय (विनाश) -ये सब होंगे ॥ २ ॥ लोग वेदों की प्रामाणिकता स्वीकार नहीं करेंगे तथा अधर्म का आचरण करेंगे। मनुष्य धर्मच्युत होकर अनाचार में रत रहेंगे और महान् क्रोधी तथा मन्द बुद्धि वाले होंगे ॥ ३ ॥ कलियुग में प्रजाएँ मिथ्या भाषण करेंगी, लोभ-परायण होंगी तथा मलिन आचार-विचार वाली होंगी। ब्राह्मणों के दूषित यज्ञ, दूषित पठन, दूषित आचार एवं दूषित शास्त्रों के सेवनरूपी कर्मदोष से प्रजाओं में भय उत्पन्न होगा। द्विजातिगण न तो वेदों का अध्ययन करेंगे और न तो यज्ञ-अनुष्ठान करेंगे ॥ ४-५ ॥ क्षत्रिय, वैश्य आदि सभी मनुष्य क्रमशः विनष्ट हो जायँगे। कलियुग में ब्राह्मण लोग शूद्रों को मन्त्रोपदेश देंगे तथा उनके साथ शयन, आसन, भोजन आदि का व्यवहार करके उनसे सम्बन्ध बनायेंगे। राजा लोग शूद्रवत् आचरण करते हुए ब्राह्मणों को सन्ताप देंगे ॥ ६-७ ॥ प्रजाओं में भ्रूणहत्या तथा वीरों की हत्या की प्रवृत्ति व्याप्त रहेगी। शूद्र लोग ब्राह्मणों का आचरण करेंगे एवं ब्राह्मण शूद्रों का आचरण करेंगे ॥ ८ ॥ चोर लोग राजाओं के तुल्य व्यवहार करेंगे और राजा लोग चोरों जैसा व्यवहार करेंगे। स्त्रियाँ पातिव्रत्य धर्म का पालन नहीं करेंगी और व्यभिचारिणी स्त्रियों का बाहुल्य होगा ॥ ९ ॥ मनुष्यों में वर्ण तथा आश्रम सम्बन्धी समस्त व्यवहार समाप्त हो जायगा । उस समय पृथ्वी कहीं कम और कहीं अधिक फल देने वाली होगी ॥ १० ॥ हे शिलाद ! राजागण प्रजाओं के रक्षक न होकर उनके विनाशक हो जायेंगे। सभी शूद्र ज्ञानी बनकर ब्राह्मणों से वन्दित होंगे ॥ ११ ॥ क्षत्रिय से इतर वर्ण वाले राजा होंगे, ब्राह्मण आजीविका के लिये शूद्रों पर निर्भर रहेंगे और अल्प बुद्धि वाले वे शूद्र ब्राह्मणों को देखकर अपने आसन से नहीं उठेंगे। स्वल्प बुद्धि वाले शूद्र श्रेष्ठ द्विजों को भी दण्डित (अपमानित) करेंगे। द्विज अपने मुख पर हाथ रखकर शूद्र के कान में विनयपूर्वक नीच व्यक्ति के समान वाक्य बोलेंगे ॥ १२-१३१/२ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! कलियुग में काल के वश में होकर राजा ब्राह्मणों के बीच उच्च आसन पर बैठे हुए शूद्र को देखकर उसे दण्डित नहीं करेंगे। वे पुष्पों, सुगन्धित पदार्थों तथा अन्य मंगल द्रव्यों से शूद्रों की पूजा करेंगे । हे द्विज ! अल्प शास्त्र-ज्ञान, खोटे भाग्य एवं बल से युक्त शूद्र लोग गर्वित होकर श्रेष्ठ से श्रेष्ठ द्विजों की ओर देखना तक पसन्द नहीं करेंगे ॥ १४-१६ ॥ अपनी आजीविका के लिये शूद्रों पर आश्रित रहने वाले ब्राह्मण सेवा का अवसर देखकर वाहनों पर स्थित शूद्रों को घेरकर उनके द्वार पर खड़े होकर उनकी सेवा करेंगे। कलियुग में ब्राह्मण अनेकविध स्तुतियों से शूद्रों का स्तवन करेंगे। उस समय उत्तम विप्रगण अपने तपों तथा यज्ञों के फल का विक्रय करेंगे ॥ १७-१८ ॥ उस कलियुग में बहुत लोग संन्यासी का रूप धारण कर लेंगे। उस युगान्त के उपस्थित होने पर पुरुष तो कम होंगे, किंतु स्त्रियाँ अधिक होंगी। कलियुग में ब्राह्मण वेद-विद्या तथा वैदिक कर्मों की निन्दा करेंगे ॥ १९१/२ ॥ तब उस कलियुग में नीललोहित महादेव शिव धर्म की प्रतिष्ठा के लिये अपनी विकृत आकृति अर्थात् उच्छिन्नभिन्न लिङ्गस्वरूप वाले होकर प्रकट होंगे ॥ २०१/२ ॥ उस समय जो विप्रगण जिस किसी भी तरह से उन विकृत वेष वाले शिव की आराधना करेंगे, वे कलियुग के दोषों पर विजय प्राप्तकर परमपद को प्राप्त होंगे ॥ २११/२ ॥ उस कलियुग अन्त में हिंसक पशुओं की प्रबलता तथा गायों का ह्रास होगा और उत्तम साधुओं का अभाव हो जायगा ॥ २२१/२ ॥ उस समय दान के मूल वाला सूक्ष्म ऐश्वर्य का रूप भी दुर्लभ हो जायगा, ब्रह्मचर्य आदि चारों आश्रमों की शिथिलता हो जाने पर धर्म विनष्ट हो जायगा ॥ २३१/२ ॥ उस युगान्त में राजा लोग प्रजाजनों की रक्षा न करके मात्र अपनी रक्षा में तत्पर रहेंगे और बलिभाग [कर]-के हर्ता बन जायँगे ॥ २४१/२ ॥ कलियुग में समस्त प्राणी अन्न तथा कन्याओं का विक्रय करने वाले एवं ब्राह्मण वेद बेचने वाले होंगे और स्त्रियाँ व्यभिचारपरायण हो जायँगी। जब युगक्षय होता है, उस समय वर्षा के देवता इन्द्र कहीं-कहीं पर वृष्टि करने वाले कहे जाते हैं ॥ २५-२६ ॥ उस अधम कलियुग में सभी वणिक् जन भी कुत्सित आचरण वाले, दम्भ करने वाले तथा पाखण्डी अर्थात् अवैदिक मार्गों पर चलने वाले होंगे ॥ २७ ॥ युग में सभी लोग ग्रामयाजक (पात्र-अपात्र का विचार किये बिना सबका यज्ञ आदि कराने वाले) हो जायँगे। कोई भी मृदु वचन बोलने वाला, सरल स्वभाव वाला, ईर्ष्यारहित तथा प्रत्युपकारी अर्थात् अपने लिये किये गये उपकार को मानने वाला नहीं होगा और सभी लोग निन्दक एवं पतित हो जायँगे। यह सब युगान्त कलियुग का लक्षण है ॥ २८-२९ ॥ पृथ्वी राजाओं से शून्य हो जायगी तथा धन-धान्य से परिपूर्ण नहीं रहेगी । देशों और नगरों में बहुत- स्थान जनशून्य हो जायँगे ॥ ३० ॥ पृथ्वी अल्प जल वाली तथा कम फल देने वाली होगी। रक्षक ही भक्षक बन जायँगे एवं लोग स्वेच्छाचारी हो जायँगे ॥ ३१ ॥ युगान्त कलियुग में सभी लोग दूसरों के धन का हरण करने वाले, परस्त्रीगमन करने वाले, कामी, दुरात्मा, अधम, दुस्साहसी, उद्योग रहित, लज्जा रहित, रोगी तथा सोलह वर्ष की परम आयु वाले होंगे ॥ ३२-३३ ॥ कलियुग के उपस्थित होने पर शूद्रगण [निर्लज्जता- पूर्वक] दाँत दिखाते हुए गेरुआ वस्त्र तथा रुद्राक्ष धारणकर एवं मुण्डित सिर वाले होकर यतियों के धर्म का आचरण करेंगे ॥ ३४ ॥ कलियुग में लोग धान्य का हरण करने वाले तथा अत्यन्त दुष्ट लोगों के संग की अभिलाषा करने वाले होंगे। चोर चोरों का धन चुरायेंगे और उनके भी धन को कोई दूसरा हरण कर ले जायगा । मनुष्य के विधिसम्मत कर्म से विरत होकर निष्क्रिय होने पर कीट, मूषक तथा सर्प मनुष्यों को पीड़ित करेंगे ॥ ३५-३६ ॥ उस समय सुभिक्ष, कल्याण, नीरोगता, सामर्थ्य आदि दुर्लभ हो जायँगे। लोग क्षुधापीड़ित होकर अपने देश से आकर कौशिकी नदी के तट पर बसेंगे। लोग दु:खित होकर सौ वर्ष की पूर्ण आयु व्यतीत करेंगे ॥ ३७१/२ ॥ कलियुग में सभी वेदों का प्रचार-प्रसार कहीं दिखायी देगा और कहीं नहीं । समस्त यज्ञ अधर्म से पीड़ित होकर विनष्ट हो जायँगे ॥ ३८१/२ ॥ संन्यासी शास्त्रज्ञान से रहित होंगे तथा कापालिक बहुत से होंगे । कुछ लोग वेद बेचेंगे, तो अन्य लोग तीर्थों का विक्रय करेंगे। अन्य पाखण्डी लोग वर्णाश्रमधर्म के प्रतिकूल आचरण करेंगे । कलियुग के उपस्थित होने पर इस प्रकार के लोग उत्पन्न होंगे ॥ ३९-४०१/२ ॥ धर्म तथा अर्थ के पण्डित बनकर शूद्र लोग वेदों का अध्ययन करेंगे एवं शूद्र जाति के राजा अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करेंगे। उस समय सभी प्राणी स्त्रियों, बालकों तथा गायों का वध करके परस्पर नानाविध उपद्रव उत्पन्न करेंगे ॥ ४१-४२१/२ ॥ उस समय अपार दुःख, अल्प आयु, शारीरिक कष्ट तथा व्याधियों से लोग पीड़ित होंगे। ऐसा कहा गया है कि कलियुग में अधर्म के प्रति अत्यन्त आसक्ति होने के कारण लोगों का आचरण तमोगुणप्रधान होगा। उस समय प्रजाओं में ब्रह्महत्या आदि महापापकर्म करने की विशेष तत्परता होगी ॥ ४३-४४ ॥ अतएव कलियुग को प्राप्तकर प्रजाओं की आयु, बल, रूप आदिका क्षय होगा । उस समय अल्पकाल के धर्माचरण से ही मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होंगे ॥ ४५ ॥ उस कलियुग में जो श्रेष्ठ ब्राह्मण द्वेषरहित होकर वेदों तथा स्मृतियों में प्रतिपादित धर्मों का आचरण करेंगे, धन्य होंगे ॥ ४६ ॥ त्रेता वर्षभर तथा द्वापर में मासभर धर्माचरण करने से जिस फल का प्राप्त होना बताया गया है, ज्ञानवान् व्यक्ति कलियुग में वही फल यथाशक्ति एक दिन धर्माचरण करके प्राप्त कर लेता है ॥ ४७ ॥ यह कलियुग की दशा का वर्णन किया गया है। अब आप उसका सन्ध्यांश मुझसे जान लीजिये । युग-युग में सिद्धियों के तीन पादों का ह्रास होता है ॥ ४८ ॥ युग के स्वभाव वाली सन्ध्याएँ यहाँ पाद से न्यून होकर रहती हैं। इस प्रकार सन्ध्या के स्वभाव अपने अंशों में अर्थात् सन्ध्यांशों में एक चतुर्थांश से न्यून होकर प्रतिष्ठित रहते हैं ॥ ४९ ॥ इस प्रकार युगान्त में सन्ध्यांशकाल के उपस्थित होने पर दुष्ट प्राणियों के संहार के लिये उनका एक महान् शासक आविर्भूत होगा ॥ ५० ॥ पूर्वकाल में स्वायम्भुव मन्वन्तर में जो प्रमिति नाम से विख्यात रहे हैं, वे मनुपुत्र के अंश से इस कलियुग के समाप्तिकाल में चन्द्रमा के गोत्र में सोमशर्मा नामक ब्राह्मण के रूप में उत्पन्न होंगे ॥ ५१ ॥ शस्त्रधारी ब्राह्मणों से निरन्तर परिवृत वे हाथी, घोड़े तथा रथ से युक्त विशाल सेना साथ में लेकर पूरे बीस वर्ष तक पृथ्वी पर घूम-घूमकर सैकड़ों और हजारों बार म्लेच्छों का वध करेंगे ॥ ५२-५३ ॥ परम ऐश्वर्य सम्पन्न वे ब्राह्मणपुत्र शूद्रयोनि में उत्पन्न उन सभी पाखण्डी राजाओं को मारकर पृथ्वी को उनसे पूर्णतः विहीन कर देंगे ॥ ५४ ॥ अधर्म का आचरण करने वाले, वर्णव्यवस्था के प्रतिकूल चलने वाले तथा इनके जो अनुजीवी हैं, उन सभी को वे मार डालेंगे ॥ ५५ ॥ सभी प्राणियों के लिये अजेय, म्लेच्छों के संहारक, अत्यन्त बलशाली तथा प्रवृत्त-आज्ञामण्डल वाले वे समग्र भूमण्डल पर विचरण करेंगे ॥ ५६ ॥ पूर्वजन्म वीर्यवान् प्रमिति नाम वाले वे इस कलि में मनुपुत्र विष्णुदेव के अंश से सोम – गोत्र में कलियुग के पूर्ण होने पर उत्पन्न होंगे। बीस वर्ष तक पराक्रम प्रदर्शित करने वाले वे सैकड़ों-हजारों विधर्मी प्राणियों को नष्ट करते हुए पृथ्वी को क्रूरकर्मा जनों से शून्यप्राय-सा करके आकस्मिक तथा पारस्परिक समुत्पादित कोप के द्वारा उन अधार्मिक वृषलप्राय जनों को मारकर बत्तीसवें वर्ष के उदित होते ही मन्त्रियों, सहचरों तथा सैनिकों सहित गंगा- यमुना के मध्य स्वयं को संस्थापित कर लेंगे ॥ ५७–६१ ॥ धर्मच्युत सभी पार्थिवों तथा हजारों म्लेच्छों को नष्ट करके उस कलियुग में सन्ध्यांश के समुपस्थित होने पर यत्र-तत्र थोड़ी ही प्रजाएँ बची रहेंगी। वे आत्मनियन्त्रण खोकर तथा पूर्ण रूप से लोभ के वशीभूत होकर एक-दूसरे से कृत्रिम नम्रता प्रदर्शित करती हुई उन्हें विश्वास में लेकर उनकी हिंसा कर डालेंगी ॥ ६२-६१/२ ॥ युग के प्रभाव के कारण अराजकता की स्थिति उत्पन्न होने पर वे सभी प्रजाएँ परस्पर भय से ग्रस्त होकर व्याकुल तथा भ्रमित हो जायँगी । लोग अत्यन्त दुःखित एवं करुणाशून्य होकर अपनी पत्नियों तथा घरों को छोड़कर अपने प्राणों की भी परवाह न करने वाले होंगे ॥ ६४-६५१/२ ॥ श्रौत तथा स्मार्तधर्म श्रुतिविहित (वेद) कर्म को ‘श्रौत’ एवं स्मृतिविहित कर्म को ‘स्मार्त’ कहते हैं। श्रौत एवं स्मार्त कर्मों के अनुष्ठान की विधि वेदांग कल्प के द्वारा नियंत्रित है। वेदांग छह हैं और उनमें कल्प प्रमुख है। पाणिनीय शिक्षा उसे ‘वेद का हाथ’ कहती है। कल्प के अंतर्गत श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र और शुल्बसूत्र समाविष्ट हैं। इनमें श्रौतसूत्र श्रौतकर्म के विधान, गृह्यसूत्र स्मार्तकर्म के विधान, धर्मसूत्र सामयिक आचार के विधान तथा शुल्बसूत्र कर्मानुष्ठान के निमित्त कर्म में अपेक्षित यज्ञशाला, वेदि, मंडप और कुंड के निर्माण की प्रक्रिया को कहते हैं।के नष्ट हो जाने पर सभी प्रजाएँ मर्यादाहीन, अत्यन्त क्रूर, स्नेहरहित तथा निर्लज्ज होकर एक-दूसरे की हिंसा कराने में तत्पर रहेंगी ॥ ६६१/२ ॥ धर्म के नष्ट हो जाने पर पतन को प्राप्त हुए लोग लघु आकार वाले तथा पच्चीस वर्ष की आयु वाले होंगे। आपसी कलह से व्याकुल इन्द्रियों वाले लोग अपनी पत्नियों एवं पुत्रों का त्याग तक कर देंगे ॥ ६७१/२ ॥ वृष्टि न होने के कारण दुःखित प्रजाएँ कृषिकर्म का पूर्ण रूप से त्याग करके अपने-अपने देशों को छोड़कर म्लेच्छ देशों, नदी, समुद्र, कुएँ, पर्वत आदि स्थानों पर शरण लेंगी ॥ ६८-६९ ॥ प्रजाएँ अत्यन्त दुःखित होकर मधु, मांस, कन्दमूल तथा फलों पर जीवन-निर्वाह करेंगी। वे परिग्रहरहित एवं निष्क्रिय होकर वृक्षों की छाल तथा उनके पत्ते वस्त्ररूप में धारण करेंगी ॥ ७० ॥ वर्ण तथा आश्रम व्यवस्था से भ्रष्ट हुए लोग घोर कष्ट में पड़ जायँगे और इस प्रकार भीषण दुःख आ जाने के कारण थोड़ी ही प्रजा बच पायेगी ॥ ७१ ॥ बुढ़ापा, रोग तथा क्षुधा से पीड़ित लोगों के मन में उस दुःख से निर्वेद उत्पन्न होगा । पुनः उस निर्वेद से साम्यावस्था वाली विचारणा, विचारणा से साम्यावस्थात्मक बोध और अन्त में उस बोध से धर्माचरण के प्रति प्रवृत्ति जाग्रत् होगी । कलियुग की बची हुई वे प्रजाएँ स्वयं शक्ति-सामर्थ्य के अभाव में शान्तियुक्त हो जायँगी ॥ ७२-७३ ॥ इसके बाद सुप्त तथा मत्त की भाँति उन प्रजाओं का चित्त-सम्मोहन करके एक दिन रात में ही कलियुग परिवर्तित हो जायगा और इस प्रकार कालधर्म के अनुसार कलियुग को दबाकर सत्ययुग प्रवृत्त हो जायगा ॥ ७४१/२ ॥ तदनन्तर उस सत्ययुग के प्रवृत्त होने पर कलियुग की बची हुई प्रजाओं में सत्ययुग के आचार-विचार उत्पन्न होंगे ॥ ७५१/२ ॥ इस लोक में उस समय जो सप्तसिद्ध1 लोग रहते हैं, वे अदृश्य रूप में सप्तर्षियों2 के साथ व्यवस्थित होकर विचरण करते हैं ॥ ७६१/२ ॥ जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र बीज के लिये कहे गये हैं, वे सब कलियुग में उत्पन्न होने वालों के साथ उस समय विशेषता-रहित होकर रहते थे ॥ ७७१/२ ॥ वर्णाश्रम के आचार वाला जो श्रौत तथा स्मार्त दो प्रकार का धर्म होता है; उस धर्म को उन लोगों के लिये सप्तर्षि एवं सप्तसिद्ध लोग उपदेश करते हैं । इस प्रकार उन लोगों के कर्मनिष्ठ हो जाने पर कृतयुग में प्रजाएँ बढ़ने लगती हैं ॥ ७८-७९ ॥ उन सप्तर्षियों के द्वारा श्रौत-स्मार्त सम्बन्धी धर्मों का उपदेश करने से कुछ लोग युग के क्षय के समय इस पृथ्वीलोक में धर्म की व्यवस्था के लिये रह जाते हैं ॥ ८० ॥ वे मुनिगण मन्वन्तरों के अधिकारों में स्थित रहते हैं । जिस प्रकार इस पृथ्वी पर दावानल से वनों के तृण आदि के जल जाने पर बाद में प्रथम वृष्टिसे उनके मूलों में पुनः अंकुरण होता है; उसी प्रकार कलियुग में उत्पन्न हुए लोगों से ही कृतयुग के प्राणियों की उत्पत्ति होती है ॥ ८१-८२ ॥ इस प्रकार अव्यवच्छिन्न रूप से इस लोक में मन्वन्तर के क्षय तक एक युग के कुछ संतान दूसरे युग में विद्यमान रहते हैं ॥ ८३ ॥ प्रत्येक चतुर्युगी में सुख, आयु, बल, रूप, धर्म, अर्थ तथा काम — ये सभी क्रम से तीन-तीन पादों के ह्रास को प्राप्त होते हैं, अर्थात् प्रत्येक युग के अन्त तक इनके एक-एक पाद का ह्रास होता जाता है ॥ ८४ ॥ इसी प्रकार युग के सन्ध्यांश में प्रत्येक युग की धर्म सिद्धियों का भी ह्रास होता है। इस तरह मैंने क्रम से प्रत्येक सिद्धि का वर्णन कर दिया ॥ ८५ ॥ इसी प्रकार सभी चारों युगों की स्थिति बनती है । चारों युगों की एक आवृत्ति का जो एक हजार गुना है; वही ब्रह्माजी का एक दिन कहा गया है और उतनी ही बड़ी उनकी एक रात कही जाती है ॥ ८६१/२ ॥ ज्यों-ज्यों युग का क्षय होता है, प्राणियों में जड़ता-भाव तथा स्वभाव की सरलता का अभाव बढ़ता जाता यही सभी युगों का लक्षण कहा गया है ॥ ८७१/२ ॥ क्रम से एक चतुर्युग का इकहत्तर (७१६/१४) बार आवर्तन एक मन्वन्तर कहा जाता है। जो व्यवहार इस चतुर्युग में घटित होता है, वही क्रमशः दूसरे चतुर्युगों में भी होता है ॥ ८८-८९१/२ ॥ प्रत्येक सर्ग में पचीस प्रकार के भेदों वाले जो तत्त्व होते हैं; वे ही जैसे सदा उत्पन्न होते हैं और इससे कम या अधिक नहीं। उसी प्रकार युगों के साथ-साथ लक्षणों सहित कल्प भी होते हैं। सभी मन्वन्तरों का भी यही लक्षण है ॥ ९०-९२ ॥ युगों के स्वभाव के अनुसार जिस प्रकार चिरकाल से प्रवृत्त होने वाले युगों में परिवर्तन होता है, उसी प्रकार युगों के अनुरूप क्षय तथा उदय से यह जीवलोक भी संस्थित रहता है और इसमें भी युगों के अनुरूप परिवर्तन होता रहता है ॥ ९३ ॥ इस प्रकार सभी मन्वन्तरों में बीते हुए तथा आने वाले युगों के लक्षण संक्षेप में कहे गये हैं ॥ ९४ ॥ इसी तरह एक मन्वन्तर से सभी मन्वन्तरों की व्याख्या की गयी है । एक कल्प के लक्षणों से सभी कल्पों के लक्षण समझ लेना चाहिये । इस विषय में किसी प्रकार का सन्देह नहीं है ॥ ९५ ॥ उसी भाँति ज्ञानी पुरुष को इस लोक में बीते हुए तथा आने वाले सभी मन्वन्तरों के विषय में कल्पना कर लेनी चाहिये ॥ ९६ ॥ जो आठ प्रकार के देवता 3 , मन्वन्तरों के स्वामी, ऋषिगण, मनुगण आदि हैं, वे सब तुल्य अभिमान- नाम-रूप वाले हुआ करते हैं; साथ ही उन सभी का समान प्रकार का प्रयोजन भी होता है ॥ ९७१/२ ॥ इस प्रकार मैंने युग, उनके धर्म, वर्णाश्रमों के विभाग, युगों की सिद्धियाँ, युगों के परिमाण जिन्हें युग-युग में परमात्मा धारण करते हैं — इन सबके विषय में आपसे प्रसंग के अनुसार कह दिया। अब मैं आपसे पद्मयोनि ब्रह्माजी के देवी के पुत्ररूप में उत्पन्न होने के विषय में संक्षेपमें कह रहा हूँ ॥ ९८-१०० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘चतुर्युगपरिमाण’ नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४० ॥ 1. मन्त्रज्ञ, मन्त्रविद्, प्राज्ञ, मन्त्रराट्, सिद्धपूजित, सिद्धवत् और परमसिद्ध-ये सात सप्तसिद्ध कहे गये हैं। (लिङ्गपुराण पू० ८२।५१) 2. कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, वसिष्ठ तथा जमदग्नि — ये सप्तर्षि कहे गये हैं। 3. यहाँ गणदेवताओं का वर्ग आठ प्रकार का बताया गया है, किंतु अमरकोष (१।१।१०) तथा वाचस्पतिकोष में गणदेवताओं के नौ वर्ग कहे गये हैं और एक-एक वर्ग में परिगणित देवताओं की संख्या को इस प्रकार बताया गया है — आदित्या द्वादशप्रोक्ता विश्वेदेवा दशस्मृताः । वसवश्चाष्ट संख्याताः षट्त्रिंशत् तुषिता मताः ॥ आभास्वराश्चतुष्षष्टिर्वाताः पञ्चाशदूनकाः । महाराजिकनामानो द्वे शते विंशतिस्तथा ॥ साध्या द्वादशविख्याता रुद्राश्चैकादशस्मृताः । अर्थात् आदित्य १२, विश्वेदेव १०, वसु ८, तुषित ३६, आभास्वर ६४, मरुत् ४९, महाराजिक २२०, साध्य १२ और रुद्र ११ होते हैं। Content is available only for registered users. 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