अथ देव्याः कवचम

ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्त मातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्‍‌वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।

।। ॐ नमश्चण्डिकायै ।।

मार्कण्डेय उवाच

ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् ।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ।।१।।

।। ब्रह्मोवाच ।।

अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् ।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छ्रणुष्व महामुने ।।२।।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।३।।

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।४।।

नवं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।।५।।

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे ।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ।।६।।

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे ।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ।।७।।

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते ।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः ।।८।।

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना ।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना ।।९।।

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना ।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया ।।१०।।

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना ।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ॥११॥

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः ।
नानाभरणशोभाढया नानारत्‍‌नोपशोभिताः ॥१२॥

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः ।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ।।१३।।

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च ।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शा‌र्ङ्गमायुधमुत्तमम् ।।१४।।

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च ।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ।।१५।।

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे ।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ।।१६।।

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि ।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ।।१७।।

दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी ।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी ।।१८।।

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी ।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा ।।१९।।

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना ।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः ।।२०।।

अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता ।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मू‌र्ध्नि व्यवस्थिता ।।२१।।

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी ।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके ।।२२।।

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी ।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी ।।२३।।

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ।।२४।।

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका ।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ।।२५।।

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला ।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ।।२६।।

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी ।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी ।।२७।।

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च ।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ।।२८।।

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी ।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ।।२९।।

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ।।३०।।

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी ।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ।।३१।।

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी ।
पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ।।३२।।

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवो‌र्ध्वकेशिनी ।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा ।।३३।।

रक्त मज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती ।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी ।।३४।।

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा ।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु ।।३५।।

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा ।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी ।।३६।।

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना ।।३७।।

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
सत्त्‍‌वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा ।।३८।।

आयू रक्षतु वाराही धर्म रक्षतु वैष्णवी ।
यशः कीर्ति च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी ।।३९।।

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके ।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्या रक्षतु भैरवी ।।४०।।

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्ग क्षेमकरी तथा ।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता ।।४१।।

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्व रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ।।४२।।

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः ।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति ।।४३।।

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः ।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्रापनेति निश्चितम् ।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ।।४४।।

निर्भयो जायते म‌र्त्यः संग्रामेष्वपराजितः ।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ।।४५।।

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्धयं श्रद्धयान्वितः ।।४६।।

दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः ।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ।।४७।।

नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम् ।।४८।।

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः ।।४९।।

सहजा कुलजा माला डाकिनी शकिनी तथा ।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः ।।५०।।

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ।।५१।।

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ।।५२।।

यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले ।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ।।५३।।

यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी ।।५४।।

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः ।।५५।।

लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ।।ॐ।।56।।

अर्थ ः- ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार है।

मार्कण्डेयजी ने कहा- पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये ॥1॥
ब्रह्माजी बोले- ब्रह्मन् ! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है, जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उपकार करने वाला है। महामुने! उसे श्रवण करो ॥2॥
देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। उनके पृथक्-पृथक नाम बतलाये जाते हैं। प्रथम नाम शैलपुत्री है। दूसरी मूर्ति का नाम ब्रह्मचारिणी है। तीसरा स्वरूप चन्द्रघण्टा के नाम से प्रसिद्ध है। चौथी मूर्ति को कूष्माण्डा कहते हैं। पाँचवीं दुर्गा का नाम स्कन्दमाता है। देवी के छठे रूप को कात्यायनी कहते हैं। सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरूप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है। नवीं दुर्गा का नाम सिद्धिदात्री है। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं ॥3-5॥
जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, विषम संकट में फँस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती दुर्गा की शरण में प्राप्त हुए हों, उनका कभी कोई अमङ्गल नहीं होता। युद्ध के समय संकट में पडने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखायी देती। उन्हें शोक, दुःख और भय की प्राप्ति नहीं होती ॥6-7॥
जिन्होंने भक्ति पूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है। देवेश्वरि ! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं, उनकी तुम निःसंदेह रक्षा करती हो ॥8॥
चामुण्डा देवी प्रेत पर आरूढ होती हैं। वाराही भैंसे पर सवारी करती हैं। ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है। वैष्णवी देवी गरुड पर ही आसन जमाती हैं॥9॥
माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ होती हैं। कौमारी का वाहन मयूर है। भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी देवी कमल के आसन पर विराजमान हैं और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं॥10॥ वृषभ पर आरूढ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है। ब्राह्मी देवी हंस पर बैठी हुई हैं और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित हैं॥ ११॥
इस प्रकार ये सभी माताएँ सब प्रकार की योगशक्तियों से सम्पन्न हैं। इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं, जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्‍‌नों से सुशोभित हैं ॥12॥
ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुई हैं और भक्तों की रक्षा के लिये रथपर बैठी दिखायी देती हैं। ये शङ्ख, चक्र, गदा, शक्ति , हल और मुसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम शा‌र्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं। दैत्यों के शरीर का नाश करना, भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना- यही उनके शस्त्र-धारण का उद्देश्य है ॥१३-१५॥
[कवच आरम्भ करने के पहले इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये] महान् रौद्ररूप, अत्यन्त घोर पराक्रम, महान् बल और महान् उत्साहवाली देवि ! तुम महान् भय का नाश करने वाली हो, तुम्हें नमस्कार है ॥16॥
तुम्हारी ओरदेखना भी कठिन है। शत्रुओं का भय बढाने वाली जगदम्बिके ! मेरी रक्षा करो।

पूर्व दिशा में ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति ) मेरी रक्षा करे। अग्निकोण में अग्निशक्ति , दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैर्ऋत्यकोण में खड्गधारिणी मेरी रक्षा करे। पश्चिम दिशा में वारुणी और वायव्यकोण में मृग पर सवारी करने वाली देवी मेरी रक्षा करे ॥17-18॥
उत्तर दिशा में कौमारी और ईशान- कोण में शूलधारिणी देवी रक्षा करे। ब्रह्माणि! तुम ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करो और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करे ॥19॥
इसी प्रकार शव को अपना वाहन बनाने वाली चामुण्डादेवी दसो दिशाओं में मेरी रक्षा करे।
जया आगे से और विजया पीछे की ओर से मेरी रक्षा करे ॥20॥
वामभाग में अजिता और दक्षिण भाग में अपराजिता रक्षा करे। उद्योतिनी शिखा की रक्षा करे। उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करे ॥21॥
ललाट में मालाधरी रक्षा करे और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करे। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टादेवी रक्षा करे ॥22॥
दोनों नेत्रों के मध्य भाग में शङ्खिनी और कानों में द्वारवासिनी रक्षा करे। कालिका देवी कपोलों की तथा भगवती शांकरी कानों के मूलभाग की रक्षा करे ॥23॥
नासिका में सुगन्धा और ऊपर के ओठ में चर्चिका देवी रक्षा करे। नीचे के ओठ में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती देवी रक्षा करे॥ 24॥
कौमारी दाँतों की और चण्डिका कण्ठप्रदेश की रक्षा करे। चित्रघण्टा गले की घाँटी की और महामाया तालु में रहकर रक्षा करे ॥25॥
कामाक्षी ठोढी की और सर्वमङ्गला मेरी वाणी की रक्षा करे। भद्रकाली ग्रीवा में और धनुर्धरी पृष्ठवंश (मेरुदण्ड) में रहकर रक्षा करे ॥26॥
कण्ठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कण्ठ की नली में नलकूबरी रक्षा करे। दोनों कंधों में खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करे ॥27॥
दोनों हाथों में दण्डिनी और अंगुलियों में अम्बिका रक्षा करे। शूलेश्वरी नखों की रक्षा करे। कुलेश्वरी कुक्षि (पेट) में रहकर रक्षा करे॥28॥
महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनाशिनी देवी मन की रक्षा करे। ललिता देवी हृदय में और शूलधारिणी उदर में रहकर रक्षा करे ॥29॥
नाभि में कामिनी और गुह्यभाग की गुह्येश्वरी रक्षा करे। पूतना और कामिका लिङ्ग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करे॥30॥
भगवती कटिभाग में और विन्ध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करे। सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाली महाबला देवी दोनों पिण्डलियों की रक्षा करे ॥31॥
नारसिंही दोनों घुट्ठियों की और तैजसी देवी दोनों चरणों के पृष्ठभाग की रक्षा करे। श्रीदेवी पैरों की अंगुलियों में और तलवासिनी पैरों के तलुओं में रहकर रक्षा करे ॥32॥
अपनी दाढों के कारण भयंकर दिखायी देने वाली दंष्ट्राकराली देवी नखों की और ऊ‌र्ध्वकेशिनी देवी केशों की रक्षा करे। रोमावलियों के छिद्रों में कैबेरी और त्वचा की वागीश्वरी देवी रक्षा करो ॥33॥
पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और मेद की रक्षा करे। आँतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करे ॥34॥
मूलाधार आदि कमल-कोशों में पद्मावती देवी और कफ में चूडामणि देवी स्थित होकर रक्षा करे। नख के तेज की ज्वालामुखी रक्षा करे। जिसका किसी भी अस्त्र से भेदन नहीं हो सकता, वह अभेद्या देवी शरीर की समस्त संधियों में रहकर रक्षा करो॥35॥
ब्रह्माणि ! आप मेरे वीर्य की रक्षा करें। छत्रेश्वरी छाया की तथा धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करे ॥36॥
हाथ में वज्र धारण करने वाली वज्रहस्ता देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करे। कल्याण से शोभित होने वाली भगवती कल्याणशोभना मेरे प्राण की रक्षा करे ॥37॥
रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श- इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करे तथा सत्त्‍‌वगुण, रजोगुण और तमोगुण की रक्षा सदा नारायणी देवी करे ॥38॥
वाराही आयु की रक्षा करे। वैष्णवी धर्म की रक्षा करे तथा चक्रिणी (चक्र धारण करने वाली) देवी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा विद्या की रक्षा करे ॥39॥
इन्द्राणि ! आप मेरे गोत्र की रक्षा करें। चण्डिके! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करो। महालक्ष्मी पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी पत्‍‌नी की रक्षा करे ॥40॥
मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षेमकरी रक्षा करे। राजा के दरबार में महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी सम्पूर्ण भयों से मेरी रक्षा करे॥41॥
देवि ! जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है, अतएव रक्षा से रहित है, वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो; क्योंकि तुम विजयशालिनी और पापनाशिनी हो॥42॥
यदि अपने शरीर का भला चाहे तो मनुष्य बिना कवच के कहीं एक पग भी न जाय- कवच का पाठ करके ही यात्रा करे। कवच के द्वारा सब ओर से सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता है, वहाँ-वहाँ उसे धन-लाभ होता है तथा सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह जिस-जिस अभीष्ट वस्तु का चिन्तन करता है, उस-उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। वह पुरुष इस पृथ्वी पर तुलनारहित महान् ऐश्वर्य का भागी होता है ॥43-44॥
कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है। युद्ध में उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोगों में पूजनीय होता है ॥45॥
देवी का यह कवच देवताओं के लिये भी दुर्लभ है । जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है, उसे दैवी कला प्राप्त होती है तथा वह तीनों लोगों में कभी भी पराजित नहीं होता। इतना ही नहीं, वह अपमृत्यु से1 रहित हो सौसे भी अधिक वर्षो तक जीवित रहता है ॥46-47॥
मकरी, चेचक और कोढ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं। कनेर, भाँग, अफीम, धतूरे आदि का स्थावर विष, साँप और बिच्छू आदि के काटने से चढा हुआ जङ्गम विष तथा अहिफेन और तेल के संयोग आदि से बनने वाला कृत्रिम विष- ये सभी प्रकार के विष दूर हो जाते हैं, उनका कोई असर नहीं होता ॥48॥
इस पृथ्वी पर मारण-मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकार के जितने मन्त्र, यन्त्र होते हैं, वे सब इस कवच को हृदय में धारण कर लेने पर उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं। ये ही नहीं, पृथ्वी पर विचरने वाले ग्रामदेवता, आकाशचारी देवविशेष, जल से सम्बन्ध में प्रकट होने वाले गण, उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाले निमन्कोटि के देवता, अपने जन्म के साथ प्रकट होने वाले देवता, कुलदेवता, माला (कण्ठमाला आदि), डाकिनी, शाकिनी, अन्तरिक्ष में विचरने वाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनियाँ, ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी हृदय में कवच धारण किये रहने पर उस मनुष्य को देखते ही भाग जाते हैं। कवचधारी पुरुष को राजा से सम्मान-वृद्धि प्राप्त होती है। यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला और उत्तम है ॥49-52॥
कवच का पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है। जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डीका पाठ करता है, उसकी जब तक वन, पर्वत और काननों सहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तब तक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा बनी रहती है ॥53-54॥
फिर देह का अन्त होने पर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से उस नित्य परमपद को प्राप्त होता है, जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है
॥55॥
वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और कल्याणमय शिव के साथ आनन्द का भागी होता है॥56॥

“अनुराधा-पौढ़वाल” की आवाज में (संस्कृत में) देवी कवच डाउनलोड निम्न लिंक से करें-
http://rapidshare.com/files/366144389/Devi_Kavach.mp3

    • 15 years ago

    Is there any hindi version for this as this is very hard to pronounce and even read properly as i can’t read Sanskrit . any one Please tell how and when it is good to read is there any proper days to chant those mantra or we can chant those mantra any day .. please explain the proper method of reciting these mantras

    many regards

    • 15 years ago

    its owesome and it is welfare of each and every human being

    • 15 years ago

    Hi, I want to some of heppens of godess of durga kavach .
    I want to any event of mahisha sur wadh and event of the Bhagvat Geeta ( Bhagwan Krishan and Arujan Sanwad )

    • 15 years ago

    I more want to know about Shri Mata ji

    • 15 years ago

    Excellent !!!

    • 15 years ago

    devi kavach

    • 16 years ago

    ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार है।

    मार्कण्डेयजी ने कहा- पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये॥1॥

    ब्रह्माजी बोले- ब्रह्मन्! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है, जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उपकार करने वाला है। महामुने! उसे श्रवण करो॥2॥ देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। उनके पृथक्-पृथक नाम बतलाये जाते हैं। प्रथम नाम शैलपुत्री है। दूसरी मूर्ति का नाम ब्रह्मचारिणी है। तीसरा स्वरूप चन्द्रघण्टा के नाम से प्रसिद्ध है। चौथी मूर्ति को कूष्माण्डा कहते हैं। पाँचवीं दुर्गा कानाम स्कन्दमाता है। देवी के छठे रूप को कात्यायनी कहते हैं। सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरूप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है। नवीं दुर्गा का नाम सिद्धिदात्री है। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं॥3-5॥ जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, विषम संकट में फँस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती दुर्गा की शरण में प्राप्त हुए हों, उनका कभी कोई अमङ्गल नहीं होता। युद्ध के समय संकट में पडने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखायी देती। उन्हें शोक, दु:ख और भय की प्राप्ति नहीं होती॥6-7॥

    जिन्होंने भक्ति पूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है। देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं, उनकी तुम नि:संदेह रक्षा करती हो॥8॥ चामुण्डा देवी प्रेत पर आरूढ होती हैं। वाराही भैंसे पर सवारी करती हैं। ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है। वैष्णवी देवी गरुड पर ही आसन जमाती हैं॥9॥ माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ होती हैं। कौमारी का वाहन मयूर है। भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी देवी कमल के आसन पर विराजमान हैं और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं॥10॥ वृषभ पर आरूढ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है। ब्राह्मी देवी हंस पर बैठी हुई हैं और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित हैं॥ ॥ इस प्रकार ये सभी माताएँ सब प्रकार की योगशक्तियों से सम्पन्न हैं। इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं, जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्‍‌नों से सुशोभित हैं॥12॥ ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुई हैं और भक्तों की रक्षा के लिये रथपर बैठी दिखायी देती हैं। ये शङ्ख, चक्र, गदा, शक्ति , हल और मुसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम शा‌र्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं। दैत्यों के शरीर का नाश करना, भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना- यही उनके शस्त्र-धारण का उद्देश्य है॥13-14॥ [कवच आरम्भ करने के पहले इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये] महान् रौद्ररूप, अत्यन्त घोर पराक्रम, महान् बल और महान् उत्साहवाली देवि! तुम महान् भय का नाश करने वाली हो, तुम्हें नमस्कार है॥16॥ तुम्हारी ओरदेखना भी कठिन है। शत्रुओं का भय बढाने वाली जगदम्बिके! मेरी रक्षा करो।

    पूर्व दिशा में ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति ) मेरी रक्षा करे। अग्निकोण में अग्निशक्ति , दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैर्ऋत्यकोण में खड्गधारिणी मेरी रक्षा करे। पश्चिम दिशा में वारुणी और वायव्यकोण में मृग पर सवारी करने वाली देवी मेरी रक्षा करे॥17-18॥

    उत्तर दिशा में कौमारी और ईशान- कोण में शूलधारिणी देवी रक्षा करे। ब्रह्माणि! तुम ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करो और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करे॥19॥ इसी प्रकार शव को अपना वाहन बनाने वाली चामुण्डादेवी दसो दिशाओं में मेरी रक्षा करे।

    जया आगे से और विजया पीछे की ओर से मेरी रक्षा करे॥20॥ वामभाग में अजिता और दक्षिण भाग में अपराजिता रक्षा करे। उद्योतिनी शिखा की रक्षा करे। उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करे॥21॥ ललाट में मालाधरी रक्षा करे और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करे। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टादेवी रक्षा करे॥22॥ दोनों नेत्रों के मध्य भाग में शङ्खिनी और कानों में द्वारवासिनी रक्षा करे। कालिका देवी कपोलों की तथा भगवती शांकरी कानों के मूलभाग की रक्षा करे॥23॥ नासिका में सुगन्धा और ऊपर के ओठ में चर्चिका देवी रक्षा करे। नीचे के ओठ में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती देवी रक्षा करे॥ 24॥
    कौमारी दाँतों की और चण्डिका कण्ठप्रदेश की रक्षा करे। चित्रघण्टा गले की घाँटी की और महामाया तालु में रहकर रक्षा करे॥25॥ कामाक्षी ठोढी की और सर्वमङ्गला मेरी वाणी की रक्षा करे। भद्रकाली ग्रीवा में और धनुर्धरी पृष्ठवंश (मेरुदण्ड) में रहकर रक्षा करे॥26॥ कण्ठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कण्ठ की नली में नलकूबरी रक्षा करे। दोनों कंधों में खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करे॥27॥ दोनों हाथों में दण्डिनी और अंगुलियों में अम्बिका रक्षा करे। शूलेश्वरी नखों की रक्षा करे। कुलेश्वरी कुक्षि (पेट) में रहकर रक्षा करे॥28॥

    महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनाशिनी देवी मन की रक्षा करे। ललिता देवी हृदय में और शूलधारिणी उदर में रहकर रक्षा करे॥29॥ नाभि में कामिनी और गुह्यभाग की गुह्येश्वरी रक्षा करे। पूतना और कामिका लिङ्ग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करे॥30॥

    भगवती कटिभाग में और विन्ध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करे। सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाली महाबला देवी दोनों पिण्डलियों की रक्षा करे॥31॥ नारसिंही दोनों घुट्ठियों की और तैजसी देवी दोनों चरणों के पृष्ठभाग की रक्षा करे। श्रीदेवी पैरों की अंगुलियों में और तलवासिनी पैरों के तलुओं में रहकर रक्षा करे॥32॥ अपनी दाढों के कारण भयंकर दिखायी देने वाली दंष्ट्राकराली देवी नखों की और ऊ‌र्ध्वकेशिनी देवी केशों की रक्षा करे। रोमावलियों के छिद्रों में कैबेरी और त्वचा की वागीश्वरी देवी रक्षा करो॥33॥ पार्वती देवी रक्त , मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और मेद की रक्षा करे। आँतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करे॥34॥ मूलाधार आदि कमल-कोशों में पद्मावती देवी और कफ में चूडामणि देवी स्थित होकर रक्षा करे। नख के तेज की ज्वालामुखी रक्षा करे। जिसका किसी भी अस्त्र से भेदन नहीं हो सकता, वह अभेद्या देवी शरीर की समस्त संधियों में रहकर रक्षा करो॥35॥

    ब्रह्माणि! आप मेरे वीर्य की रक्षा करें। छत्रेश्वरी छाया की तथा धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करे॥36॥ हाथ में वज्र धारण करने वाली वज्रहस्ता देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करे। कल्याण से शोभित होने वाली भगवती कल्याणशोभना मेरे प्राण की रक्षा करे॥37॥ रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श- इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करे तथा सत्त्‍‌वगुण, रजोगुण और तमोगुण की रक्षा सदा नारायणी देवी करे॥38॥ वाराही आयु की रक्षा करे। वैष्णवी धर्म की रक्षा करे तथा चक्रिणी (चक्र धारण करने वाली) देवी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा विद्या की रक्षा करे॥39॥ इन्द्राणि! आप मेरे गोत्र की रक्षा करें। चण्डिके! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करो। महालक्ष्मी पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी पत्‍‌नी की रक्षा करे॥40॥ मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षेमकरी रक्षा करे। राजा के दरबार में महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी सम्पूर्ण भयों से मेरी रक्षा करे॥41॥

    देवि! जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है, अतएव रक्षा से रहित है, वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो; क्योंकि तुम विजयशालिनी और पापनाशिनी हो॥42॥ यदि अपने शरीर का भला चाहे तो मनुष्य बिना कवच के कहीं एक पग भी न जाय- कवच का पाठ करके ही यात्रा करे। कवच के द्वारा सब ओर से सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता है, वहाँ-वहाँ उसे धन-लाभ होता है तथा सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह जिस-जिस अभीष्ट वस्तु का चिन्तन करता है, उस-उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। वह पुरुष इस पृथ्वी पर तुलनारहित महान् ऐश्वर्य का भागी होता है॥43-44॥ कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है। युद्ध में उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोगों में पूजनीय होता है॥45॥ देवी का यह कवच देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है, उसे दैवी कला प्राप्त होती है तथा वह तीनों लोगों में कभी भी पराजित नहीं होता। इतना ही नहीं, वह अपमृत्यु से1 रहित हो सौसे भी अधिक वर्षो तक जीवित रहता है॥46-47॥ मकरी, चेचक और कोढ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं। कनेर, भाँग, अफीम, धतूरे आदि का स्थावर विष, साँप और बिच्छू आदि के काटने से चढा हुआ जङ्गम विष तथा अहिफेन और तेल के संयोग आदि से बनने वाला कृत्रिम विष- ये सभी प्रकार के विष दूर हो जाते हैं, उनका कोई असर नहीं होता॥48॥ इस पृथ्वी पर मारण-मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकार के जितने मन्त्र, यन्त्र होते हैं, वे सब इस कवच को हृदय में धारण कर लेने पर उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं। ये ही नहीं, पृथ्वी पर विचरने वाले ग्रामदेवता, आकाशचारी देवविशेष, जल से सम्बन्ध में प्रकट होने वाले गण, उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाले निमन्कोटि के देवता, अपने जन्म के साथ प्रकट होने वाले देवता, कुलदेवता, माला (कण्ठमाला आदि), डाकिनी, शाकिनी, अन्तरिक्ष में विचरने वाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनियाँ, ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी हृदय में कवच धारण किये रहने पर उस मनुष्य को देखते ही भाग जाते हैं। कवचधारी पुरुष को राजा से सम्मान-वृद्धि प्राप्त होती है। यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला और उत्तम है॥49-52॥ कवच का पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है। जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डीका पाठ करता है, उसकी जब तक वन, पर्वत और काननों सहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तब तक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा बनी रहती है॥53-54॥ फिर देह का अन्त होने पर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से उस नित्य परमपद को प्राप्त होता है, जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है॥55॥ वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और कल्याणमय शिव के साथ आनन्द का भागी होता है॥56॥

    • 16 years ago

    ok

    • 16 years ago

    we say that akshar is brahma,so proper prounounciation is the key for getting success in chanting divya mantras or kavach.
    devi kavach is armour of divine mother,chant it with proper pronounciation your life will definitly change.
    jai mata di.

    • 16 years ago

    Thanks Thanks Thanks…Thanks a lot…
    Really very excellent job by giving 1. Written Stotra 2. Hindi Meaning of Stotra 3. Audio in voice of Anuradha ..

    Simply Excellent Job !!!

    Maa Devi bless all of us with best Health Wealth Happiness and Best Bhakti..

    Tushar

    • 16 years ago

    Dear sir,
    please tell me how i can perform Devi puja on a daily basis.

    • 16 years ago

    the best

    this is the most important kawach in our life
    ya mata di

    • 16 years ago

    Reet Hai Jane Kaisi Ye Zamane Ki,
    Q Saza Milti Hai Yahan Dil Lagane Ki,
    Na Basana kisi ko Dil Me Itna Ki,
    Fir Duwa Mangni Pade Bhulane Ki..

    • 16 years ago

    this very uniqe efforts which you have done for all the hindu people
    god bless you this my firt time i go through this blog its really amazing

    this is my personal request to all the readers please communicate this devi kavach
    to all your hindu frinds and relatives and also tell them the importance of this kavach

      • 16 years ago

      Very True..
      We should pass this to all others..
      This is an excellent & powerfull stotra to share with all..

      Jai Maa Durga, Renuka Mata..,Mahalakshmi Mata..

      Reg
      Tushar

    • 16 years ago

    ok…………………………

    • 16 years ago

    Jay maa Durga!!!!!!!!!!!

    • 16 years ago

    Jay maa Durga

    • 16 years ago

    ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार है।

    मार्कण्डेयजी ने कहा- पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये॥1॥
    ब्रह्माजी बोले- ब्रह्मन्! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है, जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उपकार करने वाला है। महामुने! उसे श्रवण करो॥2॥ देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। उनके पृथक्-पृथक नाम बतलाये जाते हैं। प्रथम नाम शैलपुत्री है। दूसरी मूर्ति का नाम ब्रह्मचारिणी है। तीसरा स्वरूप चन्द्रघण्टा के नाम से प्रसिद्ध है। चौथी मूर्ति को कूष्माण्डा कहते हैं। पाँचवीं दुर्गा कानाम स्कन्दमाता है। देवी के छठे रूप को कात्यायनी कहते हैं। सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरूप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है। नवीं दुर्गा का नाम सिद्धिदात्री है। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं॥3-5॥ जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, विषम संकट में फँस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती दुर्गा की शरण में प्राप्त हुए हों, उनका कभी कोई अमङ्गल नहीं होता। युद्ध के समय संकट में पडने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखायी देती। उन्हें शोक, दु:ख और भय की प्राप्ति नहीं होती॥6-7॥
    जिन्होंने भक्ति पूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है। देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं, उनकी तुम नि:संदेह रक्षा करती हो॥8॥ चामुण्डा देवी प्रेत पर आरूढ होती हैं। वाराही भैंसे पर सवारी करती हैं। ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है। वैष्णवी देवी गरुड पर ही आसन जमाती हैं॥9॥ माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ होती हैं। कौमारी का वाहन मयूर है। भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी देवी कमल के आसन पर विराजमान हैं और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं॥10॥ वृषभ पर आरूढ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है। ब्राह्मी देवी हंस पर बैठी हुई हैं और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित हैं॥ ॥ इस प्रकार ये सभी माताएँ सब प्रकार की योगशक्तियों से सम्पन्न हैं। इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं, जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्‍‌नों से सुशोभित हैं॥12॥ ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुई हैं और भक्तों की रक्षा के लिये रथपर बैठी दिखायी देती हैं। ये शङ्ख, चक्र, गदा, शक्ति , हल और मुसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम शा‌र्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं। दैत्यों के शरीर का नाश करना, भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना- यही उनके शस्त्र-धारण का उद्देश्य है॥13-14॥ [कवच आरम्भ करने के पहले इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये] महान् रौद्ररूप, अत्यन्त घोर पराक्रम, महान् बल और महान् उत्साहवाली देवि! तुम महान् भय का नाश करने वाली हो, तुम्हें नमस्कार है॥16॥ तुम्हारी ओरदेखना भी कठिन है। शत्रुओं का भय बढाने वाली जगदम्बिके! मेरी रक्षा करो।
    पूर्व दिशा में ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति ) मेरी रक्षा करे। अग्निकोण में अग्निशक्ति , दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैर्ऋत्यकोण में खड्गधारिणी मेरी रक्षा करे। पश्चिम दिशा में वारुणी और वायव्यकोण में मृग पर सवारी करने वाली देवी मेरी रक्षा करे॥17-18॥
    उत्तर दिशा में कौमारी और ईशान- कोण में शूलधारिणी देवी रक्षा करे। ब्रह्माणि! तुम ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करो और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करे॥19॥ इसी प्रकार शव को अपना वाहन बनाने वाली चामुण्डादेवी दसो दिशाओं में मेरी रक्षा करे।
    जया आगे से और विजया पीछे की ओर से मेरी रक्षा करे॥20॥ वामभाग में अजिता और दक्षिण भाग में अपराजिता रक्षा करे। उद्योतिनी शिखा की रक्षा करे। उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करे॥21॥ ललाट में मालाधरी रक्षा करे और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करे। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टादेवी रक्षा करे॥22॥ दोनों नेत्रों के मध्य भाग में शङ्खिनी और कानों में द्वारवासिनी रक्षा करे। कालिका देवी कपोलों की तथा भगवती शांकरी कानों के मूलभाग की रक्षा करे॥23॥ नासिका में सुगन्धा और ऊपर के ओठ में चर्चिका देवी रक्षा करे। नीचे के ओठ में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती देवी रक्षा करे॥ 24॥
    कौमारी दाँतों की और चण्डिका कण्ठप्रदेश की रक्षा करे। चित्रघण्टा गले की घाँटी की और महामाया तालु में रहकर रक्षा करे॥25॥ कामाक्षी ठोढी की और सर्वमङ्गला मेरी वाणी की रक्षा करे। भद्रकाली ग्रीवा में और धनुर्धरी पृष्ठवंश (मेरुदण्ड) में रहकर रक्षा करे॥26॥ कण्ठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कण्ठ की नली में नलकूबरी रक्षा करे। दोनों कंधों में खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करे॥27॥ दोनों हाथों में दण्डिनी और अंगुलियों में अम्बिका रक्षा करे। शूलेश्वरी नखों की रक्षा करे। कुलेश्वरी कुक्षि (पेट) में रहकर रक्षा करे॥28॥
    महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनाशिनी देवी मन की रक्षा करे। ललिता देवी हृदय में और शूलधारिणी उदर में रहकर रक्षा करे॥29॥ नाभि में कामिनी और गुह्यभाग की गुह्येश्वरी रक्षा करे। पूतना और कामिका लिङ्ग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करे॥30॥
    भगवती कटिभाग में और विन्ध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करे। सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाली महाबला देवी दोनों पिण्डलियों की रक्षा करे॥31॥ नारसिंही दोनों घुट्ठियों की और तैजसी देवी दोनों चरणों के पृष्ठभाग की रक्षा करे। श्रीदेवी पैरों की अंगुलियों में और तलवासिनी पैरों के तलुओं में रहकर रक्षा करे॥32॥ अपनी दाढों के कारण भयंकर दिखायी देने वाली दंष्ट्राकराली देवी नखों की और ऊ‌र्ध्वकेशिनी देवी केशों की रक्षा करे। रोमावलियों के छिद्रों में कैबेरी और त्वचा की वागीश्वरी देवी रक्षा करो॥33॥ पार्वती देवी रक्त , मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और मेद की रक्षा करे। आँतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करे॥34॥ मूलाधार आदि कमल-कोशों में पद्मावती देवी और कफ में चूडामणि देवी स्थित होकर रक्षा करे। नख के तेज की ज्वालामुखी रक्षा करे। जिसका किसी भी अस्त्र से भेदन नहीं हो सकता, वह अभेद्या देवी शरीर की समस्त संधियों में रहकर रक्षा करो॥35॥
    ब्रह्माणि! आप मेरे वीर्य की रक्षा करें। छत्रेश्वरी छाया की तथा धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करे॥36॥ हाथ में वज्र धारण करने वाली वज्रहस्ता देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करे। कल्याण से शोभित होने वाली भगवती कल्याणशोभना मेरे प्राण की रक्षा करे॥37॥ रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श- इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करे तथा सत्त्‍‌वगुण, रजोगुण और तमोगुण की रक्षा सदा नारायणी देवी करे॥38॥ वाराही आयु की रक्षा करे। वैष्णवी धर्म की रक्षा करे तथा चक्रिणी (चक्र धारण करने वाली) देवी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा विद्या की रक्षा करे॥39॥ इन्द्राणि! आप मेरे गोत्र की रक्षा करें। चण्डिके! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करो। महालक्ष्मी पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी पत्‍‌नी की रक्षा करे॥40॥ मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षेमकरी रक्षा करे। राजा के दरबार में महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी सम्पूर्ण भयों से मेरी रक्षा करे॥41॥
    देवि! जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है, अतएव रक्षा से रहित है, वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो; क्योंकि तुम विजयशालिनी और पापनाशिनी हो॥42॥ यदि अपने शरीर का भला चाहे तो मनुष्य बिना कवच के कहीं एक पग भी न जाय- कवच का पाठ करके ही यात्रा करे। कवच के द्वारा सब ओर से सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता है, वहाँ-वहाँ उसे धन-लाभ होता है तथा सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह जिस-जिस अभीष्ट वस्तु का चिन्तन करता है, उस-उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। वह पुरुष इस पृथ्वी पर तुलनारहित महान् ऐश्वर्य का भागी होता है॥43-44॥ कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है। युद्ध में उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोगों में पूजनीय होता है॥45॥ देवी का यह कवच देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है, उसे दैवी कला प्राप्त होती है तथा वह तीनों लोगों में कभी भी पराजित नहीं होता। इतना ही नहीं, वह अपमृत्यु से रहित हो सौ से भी अधिक वर्षो तक जीवित रहता है॥46-47॥ मकरी, चेचक और कोढ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं। कनेर, भाँग, अफीम, धतूरे आदि का स्थावर विष, साँप और बिच्छू आदि के काटने से चढा हुआ जङ्गम विष तथा अहिफेन और तेल के संयोग आदि से बनने वाला कृत्रिम विष- ये सभी प्रकार के विष दूर हो जाते हैं, उनका कोई असर नहीं होता॥48॥ इस पृथ्वी पर मारण-मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकार के जितने मन्त्र, यन्त्र होते हैं, वे सब इस कवच को हृदय में धारण कर लेने पर उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं। ये ही नहीं, पृथ्वी पर विचरने वाले ग्रामदेवता, आकाशचारी देवविशेष, जल से सम्बन्ध में प्रकट होने वाले गण, उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाले निमन्कोटि के देवता, अपने जन्म के साथ प्रकट होने वाले देवता, कुलदेवता, माला (कण्ठमाला आदि), डाकिनी, शाकिनी, अन्तरिक्ष में विचरने वाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनियाँ, ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी हृदय में कवच धारण किये रहने पर उस मनुष्य को देखते ही भाग जाते हैं। कवचधारी पुरुष को राजा से सम्मान-वृद्धि प्राप्त होती है। यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला और उत्तम है॥49-52॥ कवच का पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है। जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डीका पाठ करता है, उसकी जब तक वन, पर्वत और काननों सहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तब तक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा बनी रहती है॥53-54॥ फिर देह का अन्त होने पर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से उस नित्य परमपद को प्राप्त होता है, जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है॥55॥ वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और कल्याणमय शिव के साथ आनन्द का भागी होता है॥56॥

    • 16 years ago

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    • 16 years ago

    DEVI KAVAC

    • 16 years ago

    ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार है।

    मार्कण्डेयजी ने कहा- पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये॥1॥

    ब्रह्माजी बोले- ब्रह्मन्! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है, जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उपकार करने वाला है। महामुने! उसे श्रवण करो॥2॥ देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। उनके पृथक्-पृथक नाम बतलाये जाते हैं। प्रथम नाम शैलपुत्री है। दूसरी मूर्ति का नाम ब्रह्मचारिणी है। तीसरा स्वरूप चन्द्रघण्टा के नाम से प्रसिद्ध है। चौथी मूर्ति को कूष्माण्डा कहते हैं। पाँचवीं दुर्गा कानाम स्कन्दमाता है। देवी के छठे रूप को कात्यायनी कहते हैं। सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरूप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है। नवीं दुर्गा का नाम सिद्धिदात्री है। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं॥3-5॥ जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, विषम संकट में फँस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती दुर्गा की शरण में प्राप्त हुए हों, उनका कभी कोई अमङ्गल नहीं होता। युद्ध के समय संकट में पडने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखायी देती। उन्हें शोक, दु:ख और भय की प्राप्ति नहीं होती॥6-7॥

    जिन्होंने भक्ति पूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है। देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं, उनकी तुम नि:संदेह रक्षा करती हो॥8॥ चामुण्डा देवी प्रेत पर आरूढ होती हैं। वाराही भैंसे पर सवारी करती हैं। ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है। वैष्णवी देवी गरुड पर ही आसन जमाती हैं॥9॥ माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ होती हैं। कौमारी का वाहन मयूर है। भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी देवी कमल के आसन पर विराजमान हैं और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं॥10॥ वृषभ पर आरूढ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है। ब्राह्मी देवी हंस पर बैठी हुई हैं और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित हैं॥ ॥ इस प्रकार ये सभी माताएँ सब प्रकार की योगशक्तियों से सम्पन्न हैं। इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं, जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्‍‌नों से सुशोभित हैं॥12॥ ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुई हैं और भक्तों की रक्षा के लिये रथपर बैठी दिखायी देती हैं। ये शङ्ख, चक्र, गदा, शक्ति , हल और मुसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम शा‌र्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं। दैत्यों के शरीर का नाश करना, भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना- यही उनके शस्त्र-धारण का उद्देश्य है॥13-14॥ [कवच आरम्भ करने के पहले इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये] महान् रौद्ररूप, अत्यन्त घोर पराक्रम, महान् बल और महान् उत्साहवाली देवि! तुम महान् भय का नाश करने वाली हो, तुम्हें नमस्कार है॥16॥ तुम्हारी ओरदेखना भी कठिन है। शत्रुओं का भय बढाने वाली जगदम्बिके! मेरी रक्षा करो।

    पूर्व दिशा में ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति ) मेरी रक्षा करे। अग्निकोण में अग्निशक्ति , दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैर्ऋत्यकोण में खड्गधारिणी मेरी रक्षा करे। पश्चिम दिशा में वारुणी और वायव्यकोण में मृग पर सवारी करने वाली देवी मेरी रक्षा करे॥17-18॥

    उत्तर दिशा में कौमारी और ईशान- कोण में शूलधारिणी देवी रक्षा करे। ब्रह्माणि! तुम ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करो और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करे॥19॥ इसी प्रकार शव को अपना वाहन बनाने वाली चामुण्डादेवी दसो दिशाओं में मेरी रक्षा करे।

    जया आगे से और विजया पीछे की ओर से मेरी रक्षा करे॥20॥ वामभाग में अजिता और दक्षिण भाग में अपराजिता रक्षा करे। उद्योतिनी शिखा की रक्षा करे। उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करे॥21॥ ललाट में मालाधरी रक्षा करे और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करे। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टादेवी रक्षा करे॥22॥ दोनों नेत्रों के मध्य भाग में शङ्खिनी और कानों में द्वारवासिनी रक्षा करे। कालिका देवी कपोलों की तथा भगवती शांकरी कानों के मूलभाग की रक्षा करे॥23॥ नासिका में सुगन्धा और ऊपर के ओठ में चर्चिका देवी रक्षा करे। नीचे के ओठ में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती देवी रक्षा करे॥ 24॥
    कौमारी दाँतों की और चण्डिका कण्ठप्रदेश की रक्षा करे। चित्रघण्टा गले की घाँटी की और महामाया तालु में रहकर रक्षा करे॥25॥ कामाक्षी ठोढी की और सर्वमङ्गला मेरी वाणी की रक्षा करे। भद्रकाली ग्रीवा में और धनुर्धरी पृष्ठवंश (मेरुदण्ड) में रहकर रक्षा करे॥26॥ कण्ठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कण्ठ की नली में नलकूबरी रक्षा करे। दोनों कंधों में खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करे॥27॥ दोनों हाथों में दण्डिनी और अंगुलियों में अम्बिका रक्षा करे। शूलेश्वरी नखों की रक्षा करे। कुलेश्वरी कुक्षि (पेट) में रहकर रक्षा करे॥28॥

    महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनाशिनी देवी मन की रक्षा करे। ललिता देवी हृदय में और शूलधारिणी उदर में रहकर रक्षा करे॥29॥ नाभि में कामिनी और गुह्यभाग की गुह्येश्वरी रक्षा करे। पूतना और कामिका लिङ्ग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करे॥30॥

    भगवती कटिभाग में और विन्ध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करे। सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाली महाबला देवी दोनों पिण्डलियों की रक्षा करे॥31॥ नारसिंही दोनों घुट्ठियों की और तैजसी देवी दोनों चरणों के पृष्ठभाग की रक्षा करे। श्रीदेवी पैरों की अंगुलियों में और तलवासिनी पैरों के तलुओं में रहकर रक्षा करे॥32॥ अपनी दाढों के कारण भयंकर दिखायी देने वाली दंष्ट्राकराली देवी नखों की और ऊ‌र्ध्वकेशिनी देवी केशों की रक्षा करे। रोमावलियों के छिद्रों में कैबेरी और त्वचा की वागीश्वरी देवी रक्षा करो॥33॥ पार्वती देवी रक्त , मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और मेद की रक्षा करे। आँतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करे॥34॥ मूलाधार आदि कमल-कोशों में पद्मावती देवी और कफ में चूडामणि देवी स्थित होकर रक्षा करे। नख के तेज की ज्वालामुखी रक्षा करे। जिसका किसी भी अस्त्र से भेदन नहीं हो सकता, वह अभेद्या देवी शरीर की समस्त संधियों में रहकर रक्षा करो॥35॥

    ब्रह्माणि! आप मेरे वीर्य की रक्षा करें। छत्रेश्वरी छाया की तथा धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करे॥36॥ हाथ में वज्र धारण करने वाली वज्रहस्ता देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करे। कल्याण से शोभित होने वाली भगवती कल्याणशोभना मेरे प्राण की रक्षा करे॥37॥ रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श- इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करे तथा सत्त्‍‌वगुण, रजोगुण और तमोगुण की रक्षा सदा नारायणी देवी करे॥38॥ वाराही आयु की रक्षा करे। वैष्णवी धर्म की रक्षा करे तथा चक्रिणी (चक्र धारण करने वाली) देवी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा विद्या की रक्षा करे॥39॥ इन्द्राणि! आप मेरे गोत्र की रक्षा करें। चण्डिके! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करो। महालक्ष्मी पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी पत्‍‌नी की रक्षा करे॥40॥ मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षेमकरी रक्षा करे। राजा के दरबार में महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी सम्पूर्ण भयों से मेरी रक्षा करे॥41॥

    देवि! जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है, अतएव रक्षा से रहित है, वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो; क्योंकि तुम विजयशालिनी और पापनाशिनी हो॥42॥ यदि अपने शरीर का भला चाहे तो मनुष्य बिना कवच के कहीं एक पग भी न जाय- कवच का पाठ करके ही यात्रा करे। कवच के द्वारा सब ओर से सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता है, वहाँ-वहाँ उसे धन-लाभ होता है तथा सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह जिस-जिस अभीष्ट वस्तु का चिन्तन करता है, उस-उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। वह पुरुष इस पृथ्वी पर तुलनारहित महान् ऐश्वर्य का भागी होता है॥43-44॥ कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है। युद्ध में उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोगों में पूजनीय होता है॥45॥ देवी का यह कवच देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है, उसे दैवी कला प्राप्त होती है तथा वह तीनों लोगों में कभी भी पराजित नहीं होता। इतना ही नहीं, वह अपमृत्यु से1 रहित हो सौसे भी अधिक वर्षो तक जीवित रहता है॥46-47॥ मकरी, चेचक और कोढ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं। कनेर, भाँग, अफीम, धतूरे आदि का स्थावर विष, साँप और बिच्छू आदि के काटने से चढा हुआ जङ्गम विष तथा अहिफेन और तेल के संयोग आदि से बनने वाला कृत्रिम विष- ये सभी प्रकार के विष दूर हो जाते हैं, उनका कोई असर नहीं होता॥48॥ इस पृथ्वी पर मारण-मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकार के जितने मन्त्र, यन्त्र होते हैं, वे सब इस कवच को हृदय में धारण कर लेने पर उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं। ये ही नहीं, पृथ्वी पर विचरने वाले ग्रामदेवता, आकाशचारी देवविशेष, जल से सम्बन्ध में प्रकट होने वाले गण, उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाले निमन्कोटि के देवता, अपने जन्म के साथ प्रकट होने वाले देवता, कुलदेवता, माला (कण्ठमाला आदि), डाकिनी, शाकिनी, अन्तरिक्ष में विचरने वाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनियाँ, ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी हृदय में कवच धारण किये रहने पर उस मनुष्य को देखते ही भाग जाते हैं। कवचधारी पुरुष को राजा से सम्मान-वृद्धि प्राप्त होती है। यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला और उत्तम है॥49-52॥ कवच का पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है। जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डीका पाठ करता है, उसकी जब तक वन, पर्वत और काननों सहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तब तक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा बनी रहती है॥53-54॥ फिर देह का अन्त होने पर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से उस नित्य परमपद को प्राप्त होता है, जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है॥55॥ वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और कल्याणमय शिव के साथ आनन्द का भागी होता है॥56॥

    • 16 years ago

    अर्थ :- ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार है।

    मार्कण्डेयजी ने कहा- पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये॥1॥

    ब्रह्माजी बोले- ब्रह्मन्! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है, जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उपकार करने वाला है। महामुने! उसे श्रवण करो॥2॥ देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। उनके पृथक्-पृथक नाम बतलाये जाते हैं। प्रथम नाम शैलपुत्री है। दूसरी मूर्ति का नाम ब्रह्मचारिणी है। तीसरा स्वरूप चन्द्रघण्टा के नाम से प्रसिद्ध है। चौथी मूर्ति को कूष्माण्डा कहते हैं। पाँचवीं दुर्गा कानाम स्कन्दमाता है। देवी के छठे रूप को कात्यायनी कहते हैं। सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरूप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है। नवीं दुर्गा का नाम सिद्धिदात्री है। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं॥3-5॥ जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, विषम संकट में फँस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती दुर्गा की शरण में प्राप्त हुए हों, उनका कभी कोई अमङ्गल नहीं होता। युद्ध के समय संकट में पडने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखायी देती। उन्हें शोक, दु:ख और भय की प्राप्ति नहीं होती॥6-7॥

    जिन्होंने भक्ति पूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है। देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं, उनकी तुम नि:संदेह रक्षा करती हो॥8॥ चामुण्डा देवी प्रेत पर आरूढ होती हैं। वाराही भैंसे पर सवारी करती हैं। ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है। वैष्णवी देवी गरुड पर ही आसन जमाती हैं॥9॥ माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ होती हैं। कौमारी का वाहन मयूर है। भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी देवी कमल के आसन पर विराजमान हैं और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं॥10॥ वृषभ पर आरूढ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है। ब्राह्मी देवी हंस पर बैठी हुई हैं और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित हैं॥ ॥ इस प्रकार ये सभी माताएँ सब प्रकार की योगशक्तियों से सम्पन्न हैं। इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं, जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्‍‌नों से सुशोभित हैं॥12॥ ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुई हैं और भक्तों की रक्षा के लिये रथपर बैठी दिखायी देती हैं। ये शङ्ख, चक्र, गदा, शक्ति , हल और मुसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम शा‌र्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं। दैत्यों के शरीर का नाश करना, भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना- यही उनके शस्त्र-धारण का उद्देश्य है॥13-14॥ [कवच आरम्भ करने के पहले इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये] महान् रौद्ररूप, अत्यन्त घोर पराक्रम, महान् बल और महान् उत्साहवाली देवि! तुम महान् भय का नाश करने वाली हो, तुम्हें नमस्कार है॥16॥ तुम्हारी ओरदेखना भी कठिन है। शत्रुओं का भय बढाने वाली जगदम्बिके! मेरी रक्षा करो।

    पूर्व दिशा में ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति ) मेरी रक्षा करे। अग्निकोण में अग्निशक्ति , दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैर्ऋत्यकोण में खड्गधारिणी मेरी रक्षा करे। पश्चिम दिशा में वारुणी और वायव्यकोण में मृग पर सवारी करने वाली देवी मेरी रक्षा करे॥17-18॥

    उत्तर दिशा में कौमारी और ईशान- कोण में शूलधारिणी देवी रक्षा करे। ब्रह्माणि! तुम ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करो और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करे॥19॥ इसी प्रकार शव को अपना वाहन बनाने वाली चामुण्डादेवी दसो दिशाओं में मेरी रक्षा करे।

    जया आगे से और विजया पीछे की ओर से मेरी रक्षा करे॥20॥ वामभाग में अजिता और दक्षिण भाग में अपराजिता रक्षा करे। उद्योतिनी शिखा की रक्षा करे। उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करे॥21॥ ललाट में मालाधरी रक्षा करे और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करे। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टादेवी रक्षा करे॥22॥ दोनों नेत्रों के मध्य भाग में शङ्खिनी और कानों में द्वारवासिनी रक्षा करे। कालिका देवी कपोलों की तथा भगवती शांकरी कानों के मूलभाग की रक्षा करे॥23॥ नासिका में सुगन्धा और ऊपर के ओठ में चर्चिका देवी रक्षा करे। नीचे के ओठ में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती देवी रक्षा करे॥ 24॥
    कौमारी दाँतों की और चण्डिका कण्ठप्रदेश की रक्षा करे। चित्रघण्टा गले की घाँटी की और महामाया तालु में रहकर रक्षा करे॥25॥ कामाक्षी ठोढी की और सर्वमङ्गला मेरी वाणी की रक्षा करे। भद्रकाली ग्रीवा में और धनुर्धरी पृष्ठवंश (मेरुदण्ड) में रहकर रक्षा करे॥26॥ कण्ठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कण्ठ की नली में नलकूबरी रक्षा करे। दोनों कंधों में खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करे॥27॥ दोनों हाथों में दण्डिनी और अंगुलियों में अम्बिका रक्षा करे। शूलेश्वरी नखों की रक्षा करे। कुलेश्वरी कुक्षि (पेट) में रहकर रक्षा करे॥28॥

    महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनाशिनी देवी मन की रक्षा करे। ललिता देवी हृदय में और शूलधारिणी उदर में रहकर रक्षा करे॥29॥ नाभि में कामिनी और गुह्यभाग की गुह्येश्वरी रक्षा करे। पूतना और कामिका लिङ्ग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करे॥30॥

    भगवती कटिभाग में और विन्ध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करे। सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाली महाबला देवी दोनों पिण्डलियों की रक्षा करे॥31॥ नारसिंही दोनों घुट्ठियों की और तैजसी देवी दोनों चरणों के पृष्ठभाग की रक्षा करे। श्रीदेवी पैरों की अंगुलियों में और तलवासिनी पैरों के तलुओं में रहकर रक्षा करे॥32॥ अपनी दाढों के कारण भयंकर दिखायी देने वाली दंष्ट्राकराली देवी नखों की और ऊ‌र्ध्वकेशिनी देवी केशों की रक्षा करे। रोमावलियों के छिद्रों में कैबेरी और त्वचा की वागीश्वरी देवी रक्षा करो॥33॥ पार्वती देवी रक्त , मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और मेद की रक्षा करे। आँतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करे॥34॥ मूलाधार आदि कमल-कोशों में पद्मावती देवी और कफ में चूडामणि देवी स्थित होकर रक्षा करे। नख के तेज की ज्वालामुखी रक्षा करे। जिसका किसी भी अस्त्र से भेदन नहीं हो सकता, वह अभेद्या देवी शरीर की समस्त संधियों में रहकर रक्षा करो॥35॥

    ब्रह्माणि! आप मेरे वीर्य की रक्षा करें। छत्रेश्वरी छाया की तथा धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करे॥36॥ हाथ में वज्र धारण करने वाली वज्रहस्ता देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करे। कल्याण से शोभित होने वाली भगवती कल्याणशोभना मेरे प्राण की रक्षा करे॥37॥ रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श- इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करे तथा सत्त्‍‌वगुण, रजोगुण और तमोगुण की रक्षा सदा नारायणी देवी करे॥38॥ वाराही आयु की रक्षा करे। वैष्णवी धर्म की रक्षा करे तथा चक्रिणी (चक्र धारण करने वाली) देवी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा विद्या की रक्षा करे॥39॥ इन्द्राणि! आप मेरे गोत्र की रक्षा करें। चण्डिके! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करो। महालक्ष्मी पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी पत्‍‌नी की रक्षा करे॥40॥ मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षेमकरी रक्षा करे। राजा के दरबार में महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी सम्पूर्ण भयों से मेरी रक्षा करे॥41॥

    देवि! जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है, अतएव रक्षा से रहित है, वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो; क्योंकि तुम विजयशालिनी और पापनाशिनी हो॥42॥ यदि अपने शरीर का भला चाहे तो मनुष्य बिना कवच के कहीं एक पग भी न जाय- कवच का पाठ करके ही यात्रा करे। कवच के द्वारा सब ओर से सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता है, वहाँ-वहाँ उसे धन-लाभ होता है तथा सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह जिस-जिस अभीष्ट वस्तु का चिन्तन करता है, उस-उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। वह पुरुष इस पृथ्वी पर तुलनारहित महान् ऐश्वर्य का भागी होता है॥43-44॥ कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है। युद्ध में उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोगों में पूजनीय होता है॥45॥ देवी का यह कवच देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है, उसे दैवी कला प्राप्त होती है तथा वह तीनों लोगों में कभी भी पराजित नहीं होता। इतना ही नहीं, वह अपमृत्यु से1 रहित हो सौसे भी अधिक वर्षो तक जीवित रहता है॥46-47॥ मकरी, चेचक और कोढ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं। कनेर, भाँग, अफीम, धतूरे आदि का स्थावर विष, साँप और बिच्छू आदि के काटने से चढा हुआ जङ्गम विष तथा अहिफेन और तेल के संयोग आदि से बनने वाला कृत्रिम विष- ये सभी प्रकार के विष दूर हो जाते हैं, उनका कोई असर नहीं होता॥48॥ इस पृथ्वी पर मारण-मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकार के जितने मन्त्र, यन्त्र होते हैं, वे सब इस कवच को हृदय में धारण कर लेने पर उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं। ये ही नहीं, पृथ्वी पर विचरने वाले ग्रामदेवता, आकाशचारी देवविशेष, जल से सम्बन्ध में प्रकट होने वाले गण, उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाले निमन्कोटि के देवता, अपने जन्म के साथ प्रकट होने वाले देवता, कुलदेवता, माला (कण्ठमाला आदि), डाकिनी, शाकिनी, अन्तरिक्ष में विचरने वाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनियाँ, ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी हृदय में कवच धारण किये रहने पर उस मनुष्य को देखते ही भाग जाते हैं। कवचधारी पुरुष को राजा से सम्मान-वृद्धि प्राप्त होती है। यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला और उत्तम है॥49-52॥ कवच का पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है। जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डीका पाठ करता है, उसकी जब तक वन, पर्वत और काननों सहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तब तक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा बनी रहती है॥53-54॥ फिर देह का अन्त होने पर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से उस नित्य परमपद को प्राप्त होता है, जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है॥55॥ वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और कल्याणमय शिव के साथ आनन्द का भागी होता है॥56॥

    • 17 years ago

    i am really greatfull to you that you are providing amazing things to us.thanx once again.i want tp know about my future.pls tell me how can i get ?have a nice day.

    • 17 years ago

    woooooow

    • 17 years ago

    I DONT KNOW HOW READ PROPERLY DURGA KAVACH TELL ME
    SIMPLE PRONOUSIATION OF DURGA KAVACH IN CD OR VCD
    THE NAME OF CASSTE ALSO.I WANT THAT MY KIDS ALSO
    KANTHASTH “DURGA KAVACH” HELP AND GUIDE ME FOR
    THE PURCHASING OF DURGA KAVACH RELATED MATERIAL
    BOOK,CD,VCD,OR ANY TYPE OF RALATED MATERIAL
    LOT OF THANKS FOR YOUR CO-OPERATION

      • 16 years ago

      Hi There,
      You can use Audio of this Stotra provided on this link.
      The Audio is in voice of Anuradha Paudval and it is excellent.

      Link is http://rapidshare.com/files/366144389/Devi_Kavach.mp3

      Hope this will help you.

      I Pathan this Stotra almost everyday. This is very powerfull Stotra..Its really good you passing to your kids..
      We should cherish this and pass it to others.. 🙂

      Reg
      Tushar

        • 15 years ago

        Thanks you so much for this mp3.

    • 17 years ago

    so greatful. please add the argala strotra and devi kavach.
    thank you

    • 17 years ago

    “रक्त-रसना रक्त-दन्तिका”

    Thank you very much for sharing this. I’m very much benefited from it.

    • 18 years ago

    it is one of the best mantra…it has made my lots of w jai ma works. jai maa durga..

    • 18 years ago

    Respected Sir,

    Give some details and ucharan and Vidhi about “SID KUNJOKA STOTAR”

    Is this is suprime stotar of Shri Durga Saptashti,pls give comment.

    MAHESH

    • 18 years ago

    bahoot acha hei magar sir ye mere pas hei
    lekin ise web side par dalane se bahoot achha hoga
    kyunki ise dusare log bhi paddh sakate hein
    ye kavach bahoot hi achha hein

    akash

    • 18 years ago

    देवी कवच का एक रुप यह भी देखेंः-
    देवी कवच
    विनियोग – ॐ अस्य श्रीदेव्या: कवचस्य ब्रह्मा ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, ख्फ्रें चामुण्डाख्या महा-लक्ष्मी: देवता, ह्रीं ह्रसौं ह्स्क्लीं ह्रीं ह्रसौं अंग-न्यस्ता देव्य: शक्तय:, ऐं ह्स्रीं ह्रक्लीं श्रीं ह्वर्युं क्ष्म्रौं स्फ्रें बीजानि, श्रीमहालक्ष्मी-प्रीतये सर्व रक्षाथेZ च पाठे विनियोग:।
    ऋष्यादि-न्यास – ब्रह्मर्षये नम: शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नम: मुखे, ख्फ्रें चामुण्डाख्या महा-लक्ष्मी: देवतायै नम: हृदि, ह्रीं ह्रसौं ह्स्क्लीं ह्रीं ह्रसौं अंग-न्यस्ता देव्य: शक्तिभ्यो नम: नाभौ, ऐं ह्स्रीं ह्रक्लीं श्रीं ह्वर्युं क्ष्म्रौं स्फ्रें बीजेभ्यो नम: लिंगे, श्रीमहालक्ष्मी-प्रीतये सर्व रक्षार्थे च पाठे विनियोगाय नम: सर्वांगे।
    ध्यान-
    ॐ रक्ताम्बरा रक्तवर्णा, रक्त-सर्वांग-भूषणा।
    रक्तायुधा रक्त-नेत्रा, रक्त-केशाऽति-भीषणा।।1
    रक्त-तीक्ष्ण-नखा रक्त-रसना रक्त-दन्तिका।
    पतिं नारीवानुरक्ता, देवी भक्तं भजेज्जनम्।।2
    वसुधेव विशाला सा, सुमेरू-युगल-स्तनी।
    दीर्घौ लम्बावति-स्थूलौ, तावतीव मनोहरौ।।3
    कर्कशावति-कान्तौ तौ, सर्वानन्द-पयोनिधी।
    भक्तान् सम्पाययेद् देवी, सर्वकामदुघौ स्तनौ।।4
    खड्गं पात्रं च मुसलं, लांगलं च बिभर्ति सा।
    आख्याता रक्त-चामुण्डा, देवी योगेश्वरीति च।।5
    अनया व्याप्तमखिलं, जगत् स्थावर-जंगमम्।
    इमां य: पूजयेद् भक्तो, स व्याप्नोति चराचरम्।।6
    ।।मार्कण्डेय उवाच।।
    ॐॐॐ यद् गुह्यं परमं लोके, सर्व-रक्षा-करं नृणाम्।
    यन्न कस्यचिदाख्यातं, तन्मे ब्रूहि पितामह।।1
    ।।ब्रह्मोवाच।।
    ॐ अस्ति गुह्य-तमं विप्र सर्व-भूतोपकारकम्।
    देव्यास्तु कवचं पुण्यं, तच्छृणुष्व महामुने।।2
    प्रथमं शैल-पुत्रीति, द्वितीयं ब्रह्म-चारिणी।
    तृतीयं चण्ड-घण्टेति, कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।3
    पंचमं स्कन्द-मातेति, षष्ठं कात्यायनी तथा।
    सप्तमं काल-रात्रीति, महागौरीति चाष्टमम्।।4
    नवमं सिद्धि-दात्रीति, नवदुर्गा: प्रकीर्त्तिता:।
    उक्तान्येतानि नामानि, ब्रह्मणैव महात्मना।।5
    अग्निना दह्य-मानास्तु, शत्रु-मध्य-गता रणे।
    विषमे दुर्गमे वाऽपि, भयार्ता: शरणं गता।।6
    न तेषां जायते किंचिदशुभं रण-संकटे।
    आपदं न च पश्यन्ति, शोक-दु:ख-भयं नहि।।7
    यैस्तु भक्त्या स्मृता नित्यं, तेषां वृद्धि: प्रजायते।
    प्रेत संस्था तु चामुण्डा, वाराही महिषासना।।8
    ऐन्द्री गज-समारूढ़ा, वैष्णवी गरूड़ासना।
    नारसिंही महा-वीर्या, शिव-दूती महाबला।।9
    माहेश्वरी वृषारूढ़ा, कौमारी शिखि-वाहना।
    ब्राह्मी हंस-समारूढ़ा, सर्वाभरण-भूषिता।।10
    लक्ष्मी: पद्मासना देवी, पद्म-हस्ता हरिप्रिया।
    श्वेत-रूप-धरा देवी, ईश्वरी वृष वाहना।।11
    इत्येता मातर: सर्वा:, सर्व-योग-समन्विता।
    नानाभरण-षोभाढया, नाना-रत्नोप-शोभिता:।।12
    श्रेष्ठैष्च मौक्तिकै: सर्वा, दिव्य-हार-प्रलम्बिभि:।
    इन्द्र-नीलैर्महा-नीलै, पद्म-रागै: सुशोभने:।।13
    दृष्यन्ते रथमारूढा, देव्य: क्रोध-समाकुला:।
    शंखं चक्रं गदां शक्तिं, हलं च मूषलायुधम्।।14
    खेटकं तोमरं चैव, परशुं पाशमेव च।
    कुन्तायुधं च खड्गं च, शार्गांयुधमनुत्तमम्।।15
    दैत्यानां देह नाशाय, भक्तानामभयाय च।
    धारयन्त्यायुधानीत्थं, देवानां च हिताय वै।।16
    नमस्तेऽस्तु महारौद्रे ! महाघोर पराक्रमे !
    महाबले ! महोत्साहे ! महाभय विनाशिनि।।17
    त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये ! शत्रूणां भयविर्द्धनि !
    प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री, आग्नेय्यामग्नि देवता।।18
    दक्षिणे चैव वाराही, नैऋत्यां खड्गधारिणी।
    प्रतीच्यां वारूणी रक्षेद्, वायव्यां वायुदेवता।।19
    उदीच्यां दिशि कौबेरी, ऐशान्यां शूल-धारिणी।
    ऊर्ध्वं ब्राह्मी च मां रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा।।20
    एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शव-वाहना।
    जया मामग्रत: पातु, विजया पातु पृष्ठत:।।21
    अजिता वाम पार्श्वे तु, दक्षिणे चापराजिता।
    शिखां मे द्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता।।22
    मालाधरी ललाटे च, भ्रुवोर्मध्ये यशस्विनी।
    नेत्रायोश्चित्र-नेत्रा च, यमघण्टा तु पार्श्वके।।23
    शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये, श्रोत्रयोर्द्वार-वासिनी।
    कपोलौ कालिका रक्षेत्, कर्ण-मूले च शंकरी।।24
    नासिकायां सुगन्धा च, उत्तरौष्ठे च चर्चिका।
    अधरे चामृत-कला, जिह्वायां च सरस्वती।।25
    दन्तान् रक्षतु कौमारी, कण्ठ-मध्ये तु चण्डिका।
    घण्टिकां चित्र-घण्टा च, महामाया च तालुके।।26
    कामाख्यां चिबुकं रक्षेद्, वाचं मे सर्व-मंगला।
    ग्रीवायां भद्रकाली च, पृष्ठ-वंशे धनुर्द्धरी।।27
    नील-ग्रीवा बहि:-कण्ठे, नलिकां नल-कूबरी।
    स्कन्धयो: खडि्गनी रक्षेद्, बाहू मे वज्र-धारिणी।।28
    हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदिम्बका चांगुलीषु च।
    नखान् सुरेश्वरी रक्षेत्, कुक्षौ रक्षेन्नरेश्वरी।।29
    स्तनौ रक्षेन्महादेवी, मन:-शोक-विनाशिनी।
    हृदये ललिता देवी, उदरे शूल-धारिणी।।30
    नाभौ च कामिनी रक्षेद्, गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
    मेढ्रं रक्षतु दुर्गन्धा, पायुं मे गुह्य-वासिनी।।31
    कट्यां भगवती रक्षेदूरू मे घन-वासिनी।
    जंगे महाबला रक्षेज्जानू माधव नायिका।।32
    गुल्फयोर्नारसिंही च, पाद-पृष्ठे च कौशिकी।
    पादांगुली: श्रीधरी च, तलं पाताल-वासिनी।।33
    नखान् दंष्ट्रा कराली च, केशांश्वोर्ध्व-केशिनी।
    रोम-कूपानि कौमारी, त्वचं योगेश्वरी तथा।।34
    रक्तं मांसं वसां मज्जामस्थि मेदश्च पार्वती।
    अन्त्राणि काल-रात्रि च, पितं च मुकुटेश्वरी।।35
    पद्मावती पद्म-कोषे, कक्षे चूडा-मणिस्तथा।
    ज्वाला-मुखी नख-ज्वालामभेद्या सर्व-सन्धिषु।।36
    शुक्रं ब्रह्माणी मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
    अहंकारं मनो बुद्धिं, रक्षेन्मे धर्म-धारिणी।।37
    प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।
    वज्र-हस्ता तु मे रक्षेत्, प्राणान् कल्याण-शोभना।।38
    रसे रूपे च गन्धे च, शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
    सत्वं रजस्तमश्चैव, रक्षेन्नारायणी सदा।।39
    आयू रक्षतु वाराही, धर्मं रक्षन्तु मातर:।
    यश: कीर्तिं च लक्ष्मीं च, सदा रक्षतु वैष्णवी।।40
    गोत्रमिन्द्राणी मे रक्षेत्, पशून् रक्षेच्च चण्डिका।
    पुत्रान् रक्षेन्महा-लक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी।।41
    धनं धनेश्वरी रक्षेत्, कौमारी कन्यकां तथा।
    पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमंकरी तथा।।42
    राजद्वारे महा-लक्ष्मी, विजया सर्वत: स्थिता।
    रक्षेन्मे सर्व-गात्राणि, दुर्गा दुर्गाप-हारिणी।।43
    रक्षा-हीनं तु यत् स्थानं, वर्जितं कवचेन च।
    सर्वं रक्षतु मे देवी, जयन्ती पाप-नाशिनी।।44
    ।।फल-श्रुति।।
    सर्वरक्षाकरं पुण्यं, कवचं सर्वदा जपेत्।
    इदं रहस्यं विप्रर्षे ! भक्त्या तव मयोदितम्।।45
    देव्यास्तु कवचेनैवमरक्षित-तनु: सुधी:।
    पदमेकं न गच्छेत् तु, यदीच्छेच्छुभमात्मन:।।46
    कवचेनावृतो नित्यं, यत्र यत्रैव गच्छति।
    तत्र तत्रार्थ-लाभ: स्याद्, विजय: सार्व-कालिक:।।47
    यं यं चिन्तयते कामं, तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।
    परमैश्वर्यमतुलं प्राप्नोत्यविकल: पुमान्।।48
    निर्भयो जायते मर्त्य:, संग्रामेष्वपराजित:।
    त्रैलोक्ये च भवेत् पूज्य:, कवचेनावृत: पुमान्।।49
    इदं तु देव्या: कवचं, देवानामपि दुर्लभम्।
    य: पठेत् प्रयतो नित्यं, त्रि-सन्ध्यं श्रद्धयान्वित:।।50
    देवी वश्या भवेत् तस्य, त्रैलोक्ये चापराजित:।
    जीवेद् वर्ष-शतं साग्रमप-मृत्यु-विवर्जित:।।51
    नश्यन्ति व्याधय: सर्वे, लूता-विस्फोटकादय:।
    स्थावरं जंगमं वापि, कृत्रिमं वापि यद् विषम्।।52
    अभिचाराणि सर्वाणि, मन्त्र-यन्त्राणि भू-तले।
    भूचरा: खेचराश्चैव, कुलजाश्चोपदेशजा:।।53
    सहजा: कुलिका नागा, डाकिनी शाकिनी तथा।
    अन्तरीक्ष-चरा घोरा, डाकिन्यश्च महा-रवा:।।54
    ग्रह-भूत-पिशाचाश्च, यक्ष-गन्धर्व-राक्षसा:।
    ब्रह्म-राक्षस-वेताला:, कूष्माण्डा भैरवादय:।।55
    नष्यन्ति दर्शनात् तस्य, कवचेनावृता हि य:।
    मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजो-वृद्धि: परा भवेत्।।56
    यशो-वृद्धिर्भवेद् पुंसां, कीर्ति-वृद्धिश्च जायते।
    तस्माज्जपेत् सदा भक्तया, कवचं कामदं मुने।।57
    जपेत् सप्तशतीं चण्डीं, कृत्वा तु कवचं पुर:।
    निर्विघ्नेन भवेत् सिद्धिश्चण्डी-जप-समुद्भवा।।58
    यावद् भू-मण्डलं धत्ते ! स-शैल-वन-काननम्।
    तावत् तिष्ठति मेदिन्यां, जप-कर्तुर्हि सन्तति:।।59
    देहान्ते परमं स्थानं, यत् सुरैरपि दुर्लभम्।
    सम्प्राप्नोति मनुष्योऽसौ, महा-माया-प्रसादत:।।60
    तत्र गच्छति भक्तोऽसौ, पुनरागमनं न हि।
    लभते परमं स्थानं, शिवेन सह मोदते ॐॐॐ।।61
    ।।वाराह-पुराणे श्रीहरिहरब्रह्म विरचितं देव्या: कवचम्।।

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