22 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -056 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ छप्पनवाँ अध्याय सोम (चन्द्रमा)-की स्थिति एवं गति का निरूपण, चन्द्रकलाओं के ह्रास तथा वृद्धि का वर्णन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः सोमवर्णनं सूतजी बोले — चन्द्रमा वीथियों में स्थित नक्षत्रों में चलता है। उसके रथ को तीन पहियों वाला तथा दोनों ओर घोड़ों से युक्त जानना चाहिये। यह सौ अरों (तीलियों)-वाले तीन पहियों से युक्त है एवं श्वेतवर्ण वाले, उत्तम, पुष्ट, दिव्य जुए से बिना नथे हुए और मन के समान वेग वाले दस घोड़ों से समन्वित है। श्वेत किरणों वाले चन्द्रमा श्वेत रंग के अम्बुमय दस घोड़ों सहित देवताओं तथा पितरों के साथ इस रथ से चलते हैं ॥ १-३ ॥ सूर्य से दूरस्थित यह शुक्लपक्ष के आदि से क्रमशः बढ़ता है । दिन के क्रम से यह निरन्तर शुक्लपक्ष से अन्त तक वृद्धि को प्राप्त होता है। सूर्य इस चन्द्रमा को विकसित करता है। देवतागण [कृष्णपक्ष में] इसको पीते हैं। देवताओं के द्वारा यह पन्द्रह दिन तक पीया जाता है। सूर्य [अपनी ] सुषुम्ना नामक एक किरण के द्वारा क्रमशः इसके एक-एक भाग को पूर्ण करते हैं इन सूर्य के तेज से चन्द्रमा का शरीर विकसित होता है । ये पूर्णिमा तिथि को पूर्णमण्डल वाले होकर श्वेतवर्ण के दिखायी पड़ते हैं। इस शुक्लपक्ष में दिन के क्रम से चन्द्रमा बढ़ते रहते हैं ॥ ४-७ ॥ तत्पश्चात् कृष्णपक्ष की द्वितीया से प्रारम्भ करके चतुर्दशी तिथि तक देवता लोग चन्द्रमा के जलमय मधुर सुधामृत का पान करते हैं। वह अमृत सूर्य के तेज से आधे महीने तक चन्द्रमा में भरा रहता है। उस अमृत को पीने के लिये पूर्णिमा तिथि को पूरी रात सभी देवता पितरों तथा ऋषियों के साथ चन्द्रमा के पास स्थित रहते हैं। कृष्णपक्ष आदि से सूर्याभिमुख चन्द्रमा की पी जाती हुई कलाएँ क्रमशः क्षीण होती जाती हैं। वसु (८), रुद्र (११), आदित्य (१२) तथा अश्विनीद्वय ( २ ) — ये तैंतीस देवता एवं इनके पुत्र पौत्ररूप तैंतीस सौ तथा तैंतीस हजार देवता चन्द्रमा का पान करते हैं। इस प्रकार दिन के क्रम से देवताओं के द्वारा चन्द्रमा का पान किये जाने पर आधे महीने तक पान करके वे श्रेष्ठ देवता अमावास्या तिथि को चले जाते हैं, उसके बाद उसी अमावास्या तिथि को पितृगण चन्द्रमा के पास स्थित होते हैं और शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तक बचे हुए अमृत का पान करते हैं । अन्तिम कला के रूप में पन्द्रहवें भाग के शेष रहने पर अपराह्न में पितृगण चन्द्रमा के पास आ जाते हैं और उसकी जो कला बची रहती है, उसका पान दो कला वाले समय (दो घड़ी)-तक करते हैं । अमावास्या तिथि को किरणों से निकले हुए स्वधामृत को पीते हैं । इस प्रकार अमृत पीकर महीनेभर की तृप्ति प्राप्त करके वे चले जाते हैं। प्रत्येक पक्ष के आरम्भ में सोलहवें दिन चन्द्रमा की वृद्धि तथा क्षय का होना बताया गया है। इस प्रकार पक्ष में चन्द्रमा में होने वाली यह वृद्धि सूर्य के कारण होती है ॥ ८-१८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘सोमवर्णन’ नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५६ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -001 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -008 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -009 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -016 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -017 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -024 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -025 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -032 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -040 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -048 Powered by YARPP.