3 February 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -106 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ एक सौ छठा अध्याय दारुकासुर के विनाश के लिये भगवान् शिव द्वारा अपने शरीर से काली तथा अष्टभैरवों को प्रकट करना एवं शिवताण्डव नृत्य की कथा श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे षडधिकशततमोऽध्यायः शिवताण्डवकथनं ऋषिगण बोले — [ हे सूतजी!] हम लोगों ने स्कन्द के अग्रज का प्रादुर्भाव तो सुन लिया; अब आप हम लोगों को यथार्थरूप से यह बतायें कि शम्भु के नृत्य का आरम्भ कैसे तथा किसलिये हुआ ? ॥ १ ॥ सूतजी बोले — दारुक नामक एक दैत्य असुरों में उत्पन्न हुआ। तपस्या से पराक्रम प्राप्त करके कालाग्नि के समान वह [असुर] देवताओं तथा उत्तम द्विजों को पीड़ित करने लगा ॥ २ ॥ उस समय वह दारुक ब्रह्मा, ईशान, कुमार, विष्णु, यम, इन्द्र आदि के पास पहुँचकर उन देवताओं को सताने लगा, इससे वे देवता बहुत पीड़ित हुए । ‘यह असुर स्त्रीवध्य है’ — ऐसा सोचकर स्त्रीरूपधारी तथा युद्ध के लिये स्थित उन स्तुत्य ब्रह्मा आदि के साथ वह असुर युद्ध करने लगा ॥ ३-४ ॥ हे द्विजो ! तब उसके द्वारा बाधित किये गये वे सभी [देवतागण] ब्रह्मा के पास पहुँचकर उनसे सब कुछ निवेदन करके पुन: उन [ ब्रह्मा के] साथ उमापति के यहाँ जाकर पितामह को आगे करके [ शिव की ] स्तुति करने लगे। इसके बाद देवेश के निकट जाकर अत्यन्त विनम्र होकर प्रणाम करके ब्रह्मा ने कहा — ‘हे भगवन् ! दारुक महाभयंकर है; हम लोग उससे पहले ही पराजित हो चुके हैं। स्त्री के द्वारा वध्य उस दैत्य दारुक का संहार करके आप हम लोगों की रक्षा कीजिये ‘ ॥ ५–७ ॥ ब्रह्माजी की प्रार्थना सुनकर भग के नेत्रों को नष्ट करने वाले भगवान् देवेश ने देवी गिरिजा से हँसते हुए कहा — ‘हे शुभे! हे वरानने! मैं सभी लोकों के हित के लिये इस स्त्रीवध्य दारुक के वध हेतु आज आपसे प्रार्थना करता हूँ’॥ ८-९ ॥ तब उनका वचन सुनकर संसार को उत्पन्न करने वाली उन देवेश्वरी ने जन्म के लिये तत्पर होकर शिव के शरीर में प्रवेश किया। वे [पार्वती ] देवताओं में श्रेष्ठ देवेश्वर में अपने सोलहवें अंश से प्रविष्ट हुईं; उस समय ब्रह्मा, इन्द्र आदि प्रधान देवता भी इसे नहीं जान पाये । मंगलमयी पार्वती को पूर्ववत् शम्भु के समीप स्थित देखकर सब कुछ जानने वाले ब्रह्मा भी उनकी माया से मोहित हो गये थे ॥ १०-१२ ॥ उन देवदेव के शरीर में प्रविष्ट हुईं उन पार्वती ने उनके कण्ठ में स्थित विष से अपने शरीर को बनाया ॥ १३ ॥ इसके बाद उन पार्वती को विषभूता जानकर कामशत्रु [शिव] – ने अपने तीसरे नेत्र से कालकण्ठी (कृष्णवर्ण के कण्ठ वाली) कपर्दिनी काली को उत्पन्न किया ॥ १४ ॥ जब विष के कारण कृष्णवर्ण के कण्ठ वाली काली प्रादुर्भूत हुईं, उस समय विपुल विजयश्री भी उत्पन्न हुईं। अब असिद्धि के कारण दैत्यों की पराजय निश्चित है, इससे भवानी तथा परमेश्वर [ शिव] – को प्रसन्नता हुई ॥ १५ ॥ विष से अलंकृत कृष्णवर्ण के कण्ठ वाली तथा अग्नि के सदृश स्वरूप वाली उस प्रादुर्भूत काली को देखकर सभी देवता, सिद्धगण और विष्णु – ब्रह्मा- इन्द्र आदि प्रधान देवता भी उस समय भय के कारण भागने लगे ॥ १६ ॥ उनके ललाट में शिव की भाँति [ तीसरा ] नेत्र था, मस्तक पर अति तीव्र चन्द्ररेखा थी, कण्ठ में [कालकूट ] विष था, हाथ में विकराल तीक्ष्ण त्रिशूल था और वे [सर्पों के हार-कुण्डल आदि ] आभूषण धारण किये हुए थीं ॥ १७ ॥ काली के साथ दिव्य वस्त्र धारण किये हुईं तथा सभी आभूषणों से विभूषित देवियाँ, सिद्धों के स्वामी, सिद्धगण तथा पिशाच भी उत्पन्न हुए ॥ १८ ॥ तब उन पार्वती की आज्ञा से परमेश्वरी [काली ]- ने सुराधिपों को मारने वाले असुर दारुक का वध कर दिया ॥ १९ ॥ हे श्रेष्ठ विप्रो ! उनके अतिशय वेग तथा क्रोध की अग्नि से यह सम्पूर्ण जगत् व्याकुल हो उठा। तब ईश्वर भव भी माया से बालरूप धारणकर उन काली की क्रोधाग्नि को पीने के लिये [काशी में] श्मशान में [जाकर ] रोने लगे ॥ २०-२१ ॥ हे द्विजो ! उन बालरूप ईशान को देखकर उनकी माया से मोहित उन काली ने उन्हें उठाकर मस्तक सूंघकर अपना वक्षस्थित स्तन ग्रहण कराया ॥ २२ ॥ तब वे बालरूप शिव दूध के साथ उनका क्रोध भी पी गये और इस प्रकार वे इस क्रोध से क्षेत्रों की रक्षा करने वाले हो गये। उन बुद्धिमान् क्षेत्रपाल [भैरव]-की भी आठ मूर्तियाँ हो गयीं। इस प्रकार वे काली उस बालक के द्वारा क्रोधमूर्च्छित (नष्ट संज्ञावाली) कर दी गयीं ॥ २३-२४ ॥ इसके बाद प्रीतियुक्त देवदेव शिव ने इन [काली]- की प्रसन्नता के लिये सन्ध्याकाल में श्रेष्ठ भूतों तथा प्रेतों के साथ ताण्डव [ नृत्य] किया ॥ २५ ॥ शम्भु के नृत्यामृत का कण्ठपर्यन्त पान करके वे परमेश्वरी [उस] श्मशान में सुखपूर्वक नाचने लगीं और योगिनियाँ भी उनके साथ नाचने लगीं ॥ २६ ॥ वहाँ पर ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र सहित सभी देवताओं ने सभी ओर से काली को तथा पुनः देवी पार्वती को प्रणाम किया और उनकी स्तुति की ॥ २७ ॥ [हे ऋषियो!] इस प्रकार मैंने संक्षेप में शूलधारी प्रभु के ताण्डवनृत्य का वर्णन कर दिया; ‘योग के आनन्द के कारण विभु [वि] – का ताण्डव होता है’ – ऐसा अन्य लोग कहते हैं ॥ २८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘शिवताण्डवकथन’ नामक एक सौ छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०६ ॥ See Also:- 1. दारुकावन में राक्षसों के उपद्रव एवं सुप्रिय वैश्य की शिवभक्ति का वर्णन 2. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति एवं उसके माहात्म्य का वर्णन Content is available only for registered users. Please login or register Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -002 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -010 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -018 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -026 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -034 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -042 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -050 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -058 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -066 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -074 Powered by YARPP.