बदल जाये आसमां ग़र ज़मीं से तो अच्छा है। गुल ख़िले फ़लक में, सितारे ज़मीं पे तो अच्छा है। बदलता हूँ जाने क्युं मैं ख़ुद को ज़माने के वास्ते। जमाना भी बदल जाये गर अभी से तो अच्छा है। ……………………………………………… जाने क्यों यारों हंसने की आदत नहीं रही। अब तो वो पहली सी तबीयत नहीं रही।। मासुमिय़त खो गई, शरारत नहीं रही। सुना है इन्सान की इन्सानिय़त नहीं रही।। नशेमन गुम हुआ, सर पे छत नहीं रही। इस क़दर अब बर्क की दहशत नहीं रही।। बेदरो-दिवार-दरीच़ों की ताबीर क्या हुई। कहां है वो खंडहर जिसकी इमारत नहीं रही।। मुस्कुराता हूँ तो क्युं उठाते हो ऊंगलियां। रो-रो कर जान देने की आदत नहीं रही।। खुद का कत्ल करके मुझे युं मिलेगा क्या। व़क्त-ए-रवानी में दिल से अदावत नहीं रही।। क्यों बंदिशों की हद बढाते हो उफ़ुक तक। ज़ज़ीर तोड़ पाने की भी हिम्मत नहीं रही।। सज़दे में उनके सर झुकाने पे कहते हैं। ‘अजय’ में पहले सी शराफत नहीं रही।। Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related posts: परिचय Gajendra moksha – गजेन्द्र मोक्ष hindi jokes-हिन्दी जोक्स महालक्ष्मी स्तुति देवी कवच-devi kavach Surya Ashtotarshatnam-सूर्य अष्टोत्तरशत नामावली श्रीमहागणपति सहस्त्रनामावलि history of pundir- पुण्डीर लोमश संहिता-Lomash Samhita Powered by YARPP.