श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -064
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
चौंसठवाँ अध्याय
वसिष्ठपुत्र शक्ति का आख्यान तथा महर्षि पराशर की कथा
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चतुःषष्टितमोऽध्यायः
वासिष्ठकथनं

ऋषिगण बोले —  हे वक्ताओं में श्रेष्ठ सूतजी ! राक्षस [रुधिर]-ने अनुजों सहित वसिष्ठपुत्र शक्ति का भक्षण कैसे कर लिया; इसे आप कृपा करके बताइये ॥ १ ॥

सूतजी बोले —  रुधिर नामक राक्षस पूर्वकाल में [विश्वामित्र द्वारा दिये गये ] शाप के कारण वसिष्ठ के पुत्र शक्ति को उनके छोटे भाइयों सहित खा गया था। हे विप्रो ! उस रुधिर ने विश्वामित्र से प्रेरित होकर वसिष्ठ के यजमान राजा कल्माषपाद के शरीर में प्रवेश करके उसका भक्षण किया था ॥ २-३ ॥ राक्षस ने भाइयों सहित शक्तिशालियों में श्रेष्ठ शक्ति का भक्षण कर लिया — ऐसा सुनकर वसिष्ठजी अरुन्धती के साथ दुःखित होकर ‘हा पुत्र ! पुत्र !’ — बार-बार कहकर विलाप करते हुए पृथ्वी पर गिर पड़े। [मेरा ] कुल नष्ट हो गया — यह सुनकर अपने सौ पुत्रों तथा ज्येष्ठ पुत्र शक्ति का स्मरण करते हुए उन शक्तिमान् वसिष्ठ ने ‘अब मैं उसके बिना जीवित नहीं रहूँगा’ — ऐसा निश्चय करके दुःखित होकर मरने का विचार किया ॥ ४-७ ॥

नेत्रों में आँसू भरे हुए वे आत्मवान्, सर्वज्ञ तथा आत्मवेत्ता ब्रह्मापुत्र वसिष्ठजी पत्नी [ अरुन्धती ]-के साथ पर्वत के शिखर पर चढ़कर पृथ्वी पर गिर पड़े ॥ ८ ॥ तब विचित्र हार पहने हुए तथा हाथी के समान क्रीड़ायुक्त चाल वाली पृथ्वी ने पर्वत से गिरे हुए उन वसिष्ठ को धारण कर लिया और वह कमल के समान [ अपने] हाथों से उन रोते हुए वसिष्ठ को पकड़कर [ स्वयं ] रुदन करने लगी ॥ ९ ॥

तदनन्तर उनकी पुत्रवधू तथा शक्ति की पत्नी भय से व्याकुल होकर रोती हुई वक्ताओं में श्रेष्ठ महामुनि वसिष्ठ से कहने लगी — ‘हे भगवन्! हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! हे विभो! अपने पौत्र तथा मेरे पुत्र की देखभाल करने के लिये आप अपने इस पवित्र देह की रक्षा कीजिये। हे विप्रेन्द्र! आपको अपने इस परम सुन्दर शरीर का त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सभी अर्थों को सिद्ध करने वाला शक्तिपुत्र मेरे गर्भ में स्थित है ‘ ॥ १०-१२ ॥

ऐसा कहकर कमल के समान नेत्रों वाली उस धर्मज्ञा ने अपने हाथों से श्वशुर को उठाकर [उन्हें] प्रणाम करके जल से [ उनके ] नेत्रों को धोकर स्वयं दुःखित होने पर भी दुःखी श्वशुर की रक्षा करने के लिये दुःख से युक्त कल्याणी अरुन्धती से प्रार्थना की ॥ १३-१४ ॥ तदनन्तर पुत्रवधू का वचन सुनकर चैतन्य प्राप्त कर पुत्रवत्सल मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ भूमि से उठकर अरुन्धती का आश्रय ले अश्रुपूरित नेत्रों वाली उस अदृश्यन्ती का हाथों से स्पर्श करके भार्या सहित रो पड़े। वह अदृश्यन्ती भी अत्यन्त दुःखित होकर भूमि पर गिर पड़ी ॥ १५-१६ ॥ तदनन्तर विष्णु के नाभिकमल में विराजमान ब्रह्मा की भाँति उसकी गर्भशय्या में आसीन उस शिशु ने एक ऋचा का उच्चारण किया ॥ १७ ॥ तब उस ऋचा को आदरपूर्वक सुनकर ‘किसने इसका उच्चारण किया’ – ऐसा सोचकर भगवान् वसिष्ठ एकाग्रचित्त होकर बैठ गये ॥ १८ ॥

उसके बाद कमल के समान नेत्र वाले, विश्वात्मा तथा कृपानिधि विष्णु ने आकाश में स्थित होकर कृपापूर्वक वसिष्ठ से कहा — ‘ हे वत्स ! हे वत्स ! हे विप्रेन्द्र ! हे वसिष्ठ ! हे पुत्रवत्सल ! आपके पौत्र के मुखकमल से यह ऋचा निकली है। हे मुने! शक्ति का यह पुत्र तथा आपका पौत्र मेरे समान शक्तिशाली होगा, अतः हे ब्रह्मपुत्रों में श्रेष्ठ ! शोक का त्याग करके उठिये। यह गर्भस्थ शिशु रुद्र का भक्त होगा और रुद्र की पूजा में संलग्न रहेगा; यह रुद्रदेव की कृपा से आपके कुल का उद्धार करेगा’। मुनिश्रेष्ठ विप्र वसिष्ठ से ऐसा कहकर दयालु भगवान् विष्णु वहीं पर अन्तर्धान हो गये ॥ १९-२३ ॥

तत्पश्चात् कमल के समान नेत्र वाले विष्णु को सिर झुकाकर प्रणाम करके महातेजस्वी वसिष्ठ ने आदरपूर्वक अदृश्यन्ती के उदर का स्पर्श किया; और हा पुत्र ! पुत्र ! पुत्र ! – ऐसा कहकर अत्यन्त दुःखित होकर वे गिर पड़े। हे द्विजो ! उस समय वे रोती हुई अरुन्धती की ओर देखकर विलाप करने लगे और अपने पुत्र का स्मरण करते हुए दुःखपूर्वक बोले —  ‘हे पुत्र ! पुन: आ जाओ, आ जाओ। हे शक्ते ! कुल को धारण करने वाले तुम्हारे इस पुत्र को देखकर मैं तुम्हारी माता के साथ तुम्हारे पास आऊँगा; इसमें सन्देह नहीं है’ ॥ २४–२६१/२

सूतजी बोले —  [ हे ऋषियो!] ऐसा कहकर रोते हुए वे विप्र [ वसिष्ठ] अरुन्धती का आलिङ्गन करके गिर पड़े। शुभ अदृश्यन्ती भी [गर्भस्थ] शक्तिपुत्र के आश्रयस्वरूप अपने उदर को पीटने लगी और दुःखित होकर विलाप करने लगी तथा [ पृथ्वी पर] गिर पड़ी । तब डरी हुई अरुन्धती एवं महामति वसिष्ठ बाला पुत्रवधू को उठाकर भय से विह्वल होकर [ उससे ] कहने लगे ॥ २७-३० ॥

हे विचारमुग्धे! हे आर्ये! कमल के समान हाथों से अपने दुर्लभ गर्भमण्डल को पीटकर तुम वसिष्ठ के समस्त वंश को नष्ट करने के लिये क्यों उद्यत हो ? इसे बताओ। तुम्हारे पुत्र तथा शक्तिपुत्र को देखकर और उस आर्यपुत्र के मुखामृत का आस्वादन करके मुझ मुनीन्द्र ने इस अपने शरीर को बचाने का निश्चय किया है, अतः तुम [अपने] शरीर की रक्षा करो ॥ ३१-३२ ॥

सूतजी बोले —  इस प्रकार पुत्रवधू तथा मुनि वसिष्ठ से कहकर अरुन्धती स्थित हो गयी । पुनः दुःखी एवं व्याकुल अरुन्धती ने कहा — हे सुव्रते ! अब इन मुनि वसिष्ठ का तथा मेरा जीवन तुम्हारे ऊपर निर्भर है, अतः तुम धात्री की भाँति अपने देह की रक्षा करो और जो हितकर हो, उसे करो ॥ ३३-३४ ॥

अदृश्यन्ती बोली – यदि मुनिश्रेष्ठ ने अपने जीवन की रक्षा करने का निश्चय किया है, तो मैं भी किसी रूप में अपने शुभ या अशुभ देह की रक्षा करूँगी। मुझ असती को [अपने] पति के वियोग का दुःख प्राप्त हुआ है; इसमें सन्देह नहीं है। हे मुने! मैं दुःख से दग्ध हूँ। हे मुने! मैं आपकी पुत्री हूँ; मैंने अद्भुत बात देखी है। हे विभो! मैं दुःख की पात्र हूँ। अतः हे ब्रह्मन्! हे ब्रह्मपुत्र! हे जगद्गुरो ! इस दुःख से मेरी रक्षा कीजिये । पतिरहित स्त्री इस लोक में दीन तथा असहाय होती है, अतः हे आर्येन्द्र ! मेरी रक्षा कीजिये। पिता, माता, पुत्र, पौत्र, श्वशुर — ये स्त्रियों के बन्धु नहीं होते हैं; अर्थात् ये सब उसका सदा के लिये सम्पूर्ण हितसम्पादन करने में समर्थ नहीं होते, केवल पति ही उनका बन्धु तथा परम गति होता है ॥ ३५–३९ ॥ विद्वानों ने जो कहा है कि पत्नी पति का आधा अंग होती है, वह भी इसमें मिथ्या हो गया; [मेरे पति ] शक्ति तो चले गये, किन्तु मैं [ जीवित] रह गयी । हे मुनिश्रेष्ठ ! मेरे मन की यह कठोरता है, जो प्राणतुल्य [ अपने] पति को छोड़कर मैं क्षणभर के लिये भी जीवित हूँ । हे वसिष्ठ ! जैसे पीपल वृक्ष पर चढ़ी हुई लता जड़ को काट देने पर भी जीवित रहती है, वैसे ही अपने पति से परित्यक्त हुई मैं भी दीन होकर जीवित हूँ ॥ ४०-४२ ॥

तब पुत्रवधू का वचन सुनकर गृहस्थाश्रम वाले बुद्धिमान् वसिष्ठ ने [ अपनी] भार्या के साथ अपने आश्रम को जाने का विचार किया । चिन्ता करते हुए उन भगवान् वसिष्ठ ने बड़े कष्ट से अपनी भार्या तथा [पुत्रवधू] अदृश्यन्ती के साथ क्षणभर में अपने आश्रम में प्रवेश किया ॥ ४३-४४ ॥ श्रेष्ठ मुनियो ! उस पतिव्रता शक्तिभार्या ने [ अपनी ] वंश-परम्परा को सुरक्षित रखने के लिये किसी प्रकार [ अपने] गर्भ की रक्षा की । तदनन्तर दसवें महीने में उस शक्ति-पत्नी ने अत्यन्त तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जैसे अरुन्धती ने शक्तिशाली शक्ति को जन्म दिया था । उस शक्तिपत्नी ने साक्षात् पराशर को उसी तरह जन्म दिया, जैसे अदिति ने विष्णु को, स्वाहा ने गुह को और अरणि ने अग्नि को पुत्ररूप में जन्म दिया था ॥ ४५-४७ ॥

जब शक्ति के पुत्र ने पृथ्वी तल पर अवतार लिया, तब शक्ति ने दुःख त्यागकर पितरों की समता को प्राप्त किया । हे श्रेष्ठ मुनियो ! वे पुण्यात्मा वसिष्ठपुत्र [शक्ति] पितृलोक में स्थित होकर [ अपने] भाइयों के साथ उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे सूर्य आदित्यों के साथ सुशोभित होते हैं ॥ ४८-४९ ॥ हे विप्रेन्द्रो ! पराशर के अवतार लेने पर उस समय सभी पितामह-प्रपितामह आदि पितृगण नाचने तथा गा लगे। जो ब्रह्मवादी लोग थे, वे पृथ्वी पर एवं देवता लोग स्वर्ग में नृत्य करने लगे। पुष्कर आदि मेघों ने जल की तथा अन्य आकाशचारियों ने पुष्पों की वर्षा की। [उस समय] राक्षसों के नगरों में गृध्रादि अमंगल ध्वनि करने लगे और आश्रम में स्थित मुनियों ने अपार हर्ष मनाया ॥ ५०-५२ ॥ जैसे अण्ड से चतुरानन (ब्रह्मा) और मेघसमूहों से सूर्य प्रकट होते हैं, उसी प्रकार वे पराशर भी अदृश्यन्ती से अवतरित हुए । हे द्विजो ! पुत्र को देखकर तथा पति का स्मरण करके अदृश्यन्ती को सुख तथा दुःख दोनों ही हुआ और अरुन्धती तथा मुनि [वसिष्ठ]-को भी सुख-दुःख हुआ। अत्यधिक कान्ति वाले पुत्र पराशर को देखकर विह्वल तथा रुँधे कण्ठ वाली वह बाला विलाप करने लगी और [ भूमि पर] गिर पड़ी ॥ ५३-५५ ॥

पवित्र मुसकान वाली वह [ अदृश्यन्ती] उत्पन्न हुए उस पराशर को महाबुद्धिमान्, देवताओं तथा दानवों से पूजित और निष्पाप जानकर आँखों में आँसू भरकर विलाप करने लगी — ‘हे वसिष्ठसुत [ शक्ति ] ! हे प्रभो ! पुत्र – दर्शन की इच्छा वाली इस दीनवदना को तथा अपने पुत्र को वन के बीच में छोड़कर आप कहाँ चले गये ? अपने निष्पाप पुत्र का दर्शन कीजिये। हे शक्ते ! आप भाइयों के साथ अपने पुत्र को देखिये, जैसे महेश्वर ने प्रसन्नमुख होकर [ अपने] गणों के साथ षण्मुख (कार्तिकेय) – को देखा था ‘ ॥ ५६-५८ ॥

तत्पश्चात् उसके विलाप को सुनकर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ ने दुःखित होकर [ अपनी] पुत्रवधू से यह वचन कहा — ‘मत रोओ ‘ ॥ ५९ ॥ तब बालमृग के समान नेत्रों वाली वह कुलीन बाला वसिष्ठ की आज्ञा से शोक त्याग करके [ उस ] बालक का पालन करने लगी ॥ ६० ॥ तदनन्तर आँसुओं से भरे हुए नेत्रों वाली तथा व्याकुल उस साध्वी अबला को आभूषणों से रहित होकर बैठी देखकर पराशर यह कहने लगे ॥ ६१ ॥

शाक्य ( शक्तिपुत्र पराशर) बोले —  हे अम्ब! हे अनघे! जैसे चन्द्रमण्डल से रहित रात्रि सुशोभित नहीं होती है, वैसे ही आपका यह शरीर मंगल आभूषणों के बिना सुशोभित नहीं हो रहा है; कृपा करके आज इसका कारण बताइये । हे मातः ! हे मातः ! मंगल आभरणों का त्याग करके पतिविहीना की भाँति आप क्यों बैठी हुई हैं ? हे शोभने ! कृपा करके बताइये ॥ ६२-६३ ॥

तब उस पुत्र की बात सुनकर उस अदृश्यन्ती ने पुत्र से अच्छा अथवा बुरा कुछ भी नहीं कहा ॥ ६४ ॥ भगवान् शाक्तेय (पराशर) ने उस अदृश्यन्ती से पुन: कहा — ‘हे मातः ! मेरे महातेजस्वी पिता कहाँ हैं; इसे बताइये, बताइये ‘ ॥ ६५ ॥

तब पुत्र का वचन सुनकर अत्यधिक व्याकुल होकर वह रोने लगी। ‘हे तात! राक्षस ने तुम्हारे पिता का भक्षण कर लिया’ – ऐसा कहकर वह [ भूमि पर] गिर पड़ी ॥ ६६ ॥ तब पौत्र की बात सुनकर दयालु वसिष्ठ भी रोते हुए भूमि पर गिर पड़े। मुनि वसिष्ठ के आश्रम में रहने वाले श्रेष्ठ मुनिगण तथा अरुन्धती — ये सब भी गिर पड़े ॥ ६७ ॥ ‘तुम्हारे पिता को राक्षस खा गया’ – माता के मुख से ऐसा सुनकर अश्रुपूर्ण नेत्र वाले बुद्धिमान् पराशर कहने लगे ॥ ६८ ॥

पराशर बोले —  हे मातः ! देवदेवेश्वर [ शिव]- की पूजा करके तथा चराचरसहित तीनों लोकों को दग्ध करके मैं क्षणभर में पिता का दर्शन कराता हूँ – ऐसा मेरा विचार है ॥ ६९ ॥

तब इस शुभ वचन को सुनकर वह आश्चर्यचकित हो गयी; उसकी ओर देखकर मुसकराकर उसने पुत्र से कहा — हे पुत्र! हे पुत्र! यह सत्य है; तुम शिव की पूजा करो ॥ ७० ॥

तदनन्तर इस शक्तिपुत्र [ पराशर ] -के संकल्प को जानकर दयानिधि, बुद्धिमान् तथा मुनियों में श्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठ ने पौत्र से कहा — हे पौत्र ! हे मुनिश्रेष्ठ ! हे सुव्रत ! सुनो; तुम्हारा संकल्प उचित है, फिर भी तुम [सम्पूर्ण] लोक का विनाश मत करो। तुम राक्षसों के नाश के लिये सर्वेश्वर का अर्चन करो। हे शक्तिपुत्र ! सुनो, त्रैलोक्य ने तुम्हारे प्रति क्या अपराध किया है ? ॥ ७१-७३ ॥

उसके बाद उन वसिष्ठ की आज्ञा से महाबुद्धिमान् शक्तिपुत्र ने राक्षसों के विनाश के लिये निश्चय किया। अदृश्यन्ती, वसिष्ठ तथा अरुन्धती को प्रणाम करने अनन्तर मुनि के समीप मिट्टी का एक ( पार्थिवेश्वर ) क्षणिक लिङ्ग बनाकर शुभ शिवसूक्त तथा त्र्यम्बक मन्त्र ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥से विधिवत् पूजन करके त्वरितरुद्र, शिवसंकल्पसूक्त, नीलरुद्र, उत्तम रुद्र, वामीय, पवमान, पंचब्रह्म (सद्योजातादि पाँच मन्त्र), होतृसूक्त, लिङ्ग सूक्त तथा अथर्वशीर्ष — इन मन्त्रों का जप करके [भगवान्] रुद्र को अष्टांग अर्घ्य अष्टांगार्घ्य (अष्टांगार्घ्य) शिव की पूजा में उपयोग किए जाने वाले आठ प्रसादों को सन्दर्भित करता है। अष्टांगार्घ्य में जल, दूध, कुशाग्र , घी, दही, चावल, तिल और सरसों शामिल हैं।प्रदान करके यथाविधि अभ्यर्चन कर वे शाक्तेय (पराशर) प्रार्थना करने लगे ॥ ७४-७८ ॥

पराशर बोले — ‘हे भगवन्! हे रुद्र ! हे शंकर! राक्षस रुधिर ने भाइयों सहित मेरे महातेजस्वी पिता का भक्षण कर लिया । हे भगवन्! मैं अपने पिता को उनके भाइयों सहित देखना चाहता हूँ।’ इस प्रकार प्रार्थना करते हुए उस लिङ्ग को बार-बार प्रणामकर ‘हा रुद्र ! रुद्र ! रुद्र !’ —यह कहते हुए वे रोने लगे और गिर पड़े ॥ ७९-८०१/२

तब उन्हें देखकर कल्याणकारी भगवान् रुद्र ने देवी [पार्वती] से कहा — हे महाभागे ! अश्रु से भरे हुए नेत्रों वाले, मेरे स्मरण में लगे हुए तथा मेरी आराधना में तत्पर [इस ] बालक को देखो ॥ ८१-८२ ॥ तब निष्कलंक उन महादेवी उमा ने दुःख से दुर्बल अंगों वाले, अश्रुपूरित नेत्रों वाले, लिङ्गार्चन के कर्म में संलग्न तथा ‘हे हर ! हे रुद्र’ – ऐसा उच्चारण करने वाले पराशर को देखकर सम्पूर्ण लोकों के स्वामी अपने पति शंकर से कहा — हे परमेश्वर ! आप प्रसन्न हो जाइये और इसे सम्पूर्ण अभीष्ट वर प्रदान कीजिये ॥ ८३-८४१/२

तदनन्तर उनका वचन सुनकर विषपान करने वाले परमेश्वर शंकर ने [अपनी] भार्या साध्वी उमा से कहा — मैं खिले हुए कमल के समान नेत्र वाले इस ब्राह्मण बालक की रक्षा करूँगा। मैं इसे [दिव्य] दृष्टि दे रहा हूँ; [जिससे] यह मेरे रूप का दर्शन करने में समर्थ होगा ॥ ८५-८६१/२

ऐसा कहकर [अपने] दिव्य गणों तथा ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, रुद्र आदि से घिरे हुए भगवान् नीललोहित परमेश्वर ने उन बुद्धिमान् मुनिपुत्र [ पराशर ] को दर्शन दिया ॥ ८७-८८ ॥ महादेवजी को देखकर आनन्द के अश्रु से भरे हुए नेत्रों वाले वे [पराशर ] भी प्रसन्नचित्त होकर आदरपूर्वक उनके चरणों पर गिर पड़े और पुनः भवानी [पार्वती ] और महात्मा नन्दी के चरणों पर गिर पड़े। तत्पश्चात् उन्होंने उन ब्रह्मा आदि से कहा — ‘मेरा जीवन आज सफल हो गया। बाल चन्द्रमा के आभूषण वाले [साक्षात् शिवजी] मेरी रक्षा के लिये आज उपस्थित हुए हैं; अतः देवता अथवा दानव – दूसरा कौन इस लोक में मेरे समान [ भाग्यशाली ] है ‘ ॥ ८९-९१ ॥

तदनन्तर शक्तिपुत्र पराशर ने उसी क्षण [ अपने] पिता को भाइयों सहित अन्तरिक्ष में खड़े देखा । सूर्यमण्डल के समान [तेजवाले] तथा सभी ओर मुख वाले विमान में [अपने] भाइयों सहित पिता को देखकर उन्होंने प्रणाम किया और वे बहुत हर्षित हुए ॥ ९२-९३ ॥ तब अपनी भार्या तथा गणेश्वरों सहित विराजमान भगवान् वृषभध्वज (शिव) पुत्र को देखने में तत्पर वसिष्ठ-पुत्र [ शक्ति ] – से यह कहने लगे ॥ ९४ ॥

श्रीदेव बोले —  हे शक्ते! हे विप्रेन्द्र ! आनन्द के आँसुओं से सिक्त नेत्रों वाले अपने पुत्र इस बालक को और अदृश्यन्ती, अपने पिता वसिष्ठ, महाभाग्यशालिनी- कल्याणमयी तथा देवतातुल्य [ माता ] अरुन्धती को देखो। हे महामते ! [ अपने] माता तथा पिता – इन दोनों को नमस्कार करो ॥ ९५-९६ ॥

तदनन्तर शंकरजी की आज्ञा से देवदेव हर को, उमा को, श्रेष्ठ वसिष्ठ को तथा अपने पति को देवता मानने वाली महाभाग्यवती कल्याणी माता अरुन्धती को शीघ्र प्रणाम करके शक्तिमान् शक्ति ने [पुनः ] जगन्नाथ [शिव ] -की आज्ञा पाकर कहा ॥ ९७-९८ ॥

वासिष्ठ (शक्ति) बोले —  हे वत्स ! हे वत्स ! हे विप्रेन्द्र! हे पराशर! हे महाद्युते ! हे तात! गर्भ में स्थित रहते हुए तुम महात्मा ने मेरी रक्षा की । हे वत्स ! हे पराशर ! हे बाल ! मैंने अणिमा आदि सिद्धियों तथा ऐश्वर्य को प्राप्त कर लिया, जो कि तुम्हारे मुख का आज मुझे दर्शन हुआ। हे वत्स ! हे महामते ! अब तुम मेरी आज्ञा से महाभाग्यशालिनी अदृश्यन्ती, [माता ] अरुन्धती तथा मेरे पिता वसिष्ठ की सर्वदा रक्षा करते रहो। हे वत्स ! तुमने मेरे समस्त कुल का उद्धार कर दिया: सज्जनों ने सदा यही कहा है कि [मनुष्य अपने] पुत्र के द्वारा [सभी] लोकों को जीत लेता है। अब तुम जगत् को उत्पन्न करने वाले प्रभु महेश्वर से अभीष्ट वर माँगो और मैं अब भगवान् शंकर को प्रणाम करके भाइयों के साथ जाऊँगा ॥ ९९-१०३ ॥

इस प्रकार पुत्र को परामर्श देकर महेश्वर तथा पिता वसिष्ठ को प्रणाम करके सभा में [अपनी] भार्या की ओर देखकर वे जितेन्द्रिय शक्ति चले गये ॥ १०४ ॥ तत्पश्चात् पिता को गया हुआ देखकर वे शक्तिपुत्र [पराशर] चन्द्रभूषण शंकर की पूजा करके प्रिय शब्दों द्वारा [उनकी] स्तुति करने लगे ॥ १०५ ॥ तदनन्तर कामदेव तथा अन्धक का नाश करने वाले महादेव प्रसन्न हो गये और शक्तिपुत्र पराशर पर अनुग्रह करके वहीं पर अन्तर्धान हो गये ॥ १०६ ॥

तब पार्वती सहित महेश्वर के चले जाने पर मन्त्रवेत्ता पराशर महेश्वर को प्रणाम करके मन्त्र के द्वारा राक्षसों के कुल को जलाने लगे ॥ १०७ ॥ उस समय मुनियों से घिरे हुए धर्मज्ञ वसिष्ठ ने पौत्र [पराशर]-से कहा — ‘ हे तात! ऐसा महाकोप मत करो; इस क्रोध का त्याग करो। राक्षसों ने अपराध नहीं किया है; तुम्हारे पिता के लिये वैसा ही विहित था । मूर्खो को ही क्रोध होता है; बुद्धिमानों को नहीं । हे तात! कौन किसे मारता है; मनुष्य तो अपने किये हुए का फल भोगता है। हे वत्स! क्रोध मनुष्यों के द्वारा अत्यधिक कष्ट से अर्जित किये गये यश तथा तप का नाश करने वाला कहा गया है। अत: तुम दीन तथा निरपराध राक्षसों को मत जलाओ और अपने इस यज्ञ को बन्द करो; सज्जन लोग तो क्षमाशील होते हैं’ ॥ १०८–११११/२

इस प्रकार वसिष्ठ की आज्ञा से तथा उनके वचनों की गरिमा के कारण मुनिश्रेष्ठ पराशर ने शीघ्र ही यज्ञ को बन्द कर दिया। तब मुनिश्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठ प्रसन्न हो गये ॥ ११२-११३ ॥ उसी समय ब्रह्मा के पुत्र [ऋषि] पुलस्त्य यज्ञ में आये । वसिष्ठ ने उन्हें अर्घ्य प्रदान किया तथा आसन देकर बैठाया; तत्पश्चात् प्रणाम करके [ सम्मुख ] खड़े पराशर से मुनि [पुलस्त्य]-ने कहा — ‘तुमने गुरु की आज्ञा से आज महान् वैर में क्षमा को आश्रित किया है, अत: तुम सभी शास्त्रों को जान जाओगे और कुपित होने पर भी तुमने मेरे वंश का नाश नहीं किया, अतः हे महाभाग ! मैं तुम्हें अन्य महान् वर भी प्रदान करता हूँ — हे वत्स ! तुम पुराणसंहिता के कर्ता होओगे और देवताओं के परम रहस्य को वास्तविक रूप में जानोगे। हे वत्स ! मेरी कृपा से प्रवृत्ति तथा निवृत्ति के कर्मों से तुम्हारी बुद्धि विशुद्ध एवं सन्देहरहित होगी ‘ ॥ ११४-११८१/२

तदनन्तर वक्ताओं में श्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठ ने कहा — ‘ [हे वत्स!] ऋषि पुलस्त्य ने तुम्हारे लिये जो कुछ कहा है, यह सब होकर रहेगा।’ तब उन पुलस्त्य तथा बुद्धिमान् वसिष्ठ की कृपा से पराशर ने विष्णुपुराण की रचना की। यह छः अंशों वाला, सभी कामनाओं को सिद्ध करने वाला, ज्ञान का भण्डार, छ: हजार श्लोकों से युक्त, वेदार्थ से समन्वित, पुराण-संहिताओं में चतुर्थ तथा परम सुन्दर है ॥ ११९–१२२ ॥ श्रेष्ठ मुनियो ! मैंने आप लोगों से संक्षेप में वसिष्ठ के पुत्रों की उत्पत्ति तथा शक्तिपुत्र [ पराशर ] के सम्पूर्ण प्रभाव का वर्णन कर दिया ॥ १२३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘वासिष्ठकथन’ नामक चौंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६४ ॥

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