31 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -091 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ इक्यानबेवाँ अध्याय आसन्नमृत्युसूचक लक्षण एवं योगसाधना में प्रणव का माहात्म्य तथा शिवोपासना निरूपण श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकनवतितमोऽध्यायः अरिष्टकथनं सूतजी बोले — [हे ऋषियो!] इसके बाद मैं अरिष्टों (मृत्यु को सूचित करने वाले चिह्नों)-को बताऊँगा, जिस ज्ञानविशेष से योगी लोग मृत्यु को देखते हैं; आपलोग उन्हें जानिये ॥ १ ॥ जो मनुष्य अरुन्धती, ध्रुव, सोमछाया (छायापुरुष) तथा आकाशगंगामार्ग को नहीं देख पाता है, वह एक वर्ष से अधिक नहीं जीवित रहता है। जो रश्मि रहित सूर्य को तथा रश्मियुक्त अग्नि को देखता है, वह ग्यारह महीने से अधिक नहीं जीता है। जो प्रत्यक्ष अथवा स्वप्न में मूत्र, पुरीष (विष्ठा), सुवर्ण अथवा रजत (चाँदी)-का वमन करता है, वह दस महीने से अधिक नहीं जीता है। जो स्वप्न में सुनहरे वृक्ष को देखता है और गन्धर्व नगरों तथा प्रेत-पिशाचों को देखता है, वह नौ महीने तक जीवित रहता है। जो अकस्मात् स्थूल हो जाता है, अकस्मात् दुर्बल हो जाता है और अपने स्वभाव से दूर हो जाता है, वह आठ महीने तक जीवित रहता है ॥ २-६ ॥ जिसके पैर की आकृति धूल या कीचड़ में सामने या पीछे से खण्डित दिखायी दे, वह सात महीने तक जीता है। जिसके सिर पर कौआ, कबूतर, गीध अथवा मांसभक्षी अन्य पक्षी बैठ जाता है, वह छः महीने से अधिक नहीं जीता है। जो कौओं की पंक्तियों के साथ गमन करता है अथवा धूलवृष्टि (आँधी) – के साथ गमन करता है और अपनी छाया को विकृत देखता है, वह चार-पाँच महीने तक जीता है। जो मेघरहित आकाश में विद्युत् को दक्षिण दिशा में स्थित देखता है अथवा जल में इन्द्रधनुष को देखता है, वह दो अथवा तीन महीने तक जीवित रहता है ॥ ७-१० ॥ जो जल में अथवा दर्पण में अपने प्रतिबिम्ब को नहीं देख पाता है और अपने को सिर विहीन देखता है, वह एक महीने से अधिक नहीं जीता है। यदि किसी का शरीर शव की गन्ध वाला अथवा चर्बी की गन्ध वाला हो जाता है, तो उसकी मृत्यु समीप आयी हुई होती है; वह आधे महीने से अधिक नहीं जीवित रहता है। स्नान करने के तुरंत बाद जिसका हृदय सूख जाता है अथवा मस्तक से धुआँ दिखायी देता है, वह दस दिन से अधिक नहीं जीता है ॥ ११–१३ ॥ प्रवाहमय वायु जिसके मर्मस्थानों को भेद देता है और जो जल से स्पृष्ट होकर प्रसन्न नहीं होता है, उसकी मृत्यु को उपस्थित समझना चाहिये । यदि कोई स्वप्न में ऋक्ष (भालू) तथा बन्दर से जुते हुए रथ से दक्षिण दिशा की ओर गाते तथा नाचते हुए यात्रा करता है, तो उसकी मृत्यु को उपस्थित समझना चाहिये । स्वप्न में काले रंग का वस्त्र धारण किये कृष्ण वर्ण वाली स्त्री गाती हुई जिसे दक्षिण दिशा की ओर ले जाय, वह भी जीवित नहीं रहता है ॥ १४- १६ ॥ जो मनुष्य स्वप्न में अपने कण्ठ का छिद्र देखता है अथवा नग्न श्रमण (भिक्षु) – को देखता है, उसे अपनी मृत्यु को उपस्थित समझना चाहिये। जो मनुष्य [स्वप्न में] अपने को पैर से मस्तक तक कीचड़ के समुद्र में डूबा हुआ पाता है; वह उस प्रकार के स्वप्न को देखने पर जीवित नहीं रहता है और शीघ्र ही मर जाता है। जो भस्म, अंगारों, केशों, सूखी नदी तथा सर्पों को स्वप्न में देखता है; वह दस रात तक जीवित नहीं रह पाता है। जो उठाये हुए शस्त्रों वाले काले तथा विकट (विकराल ) पुरुषों के द्वारा पत्थरों से स्वप्न में मारा जाता है, वह जीवित नहीं रहता है ॥ १७–२० ॥ सूर्योदय के समय प्रातः काल जिसके सामने प्रत्यक्ष आकर सियार रुदन करते हैं, वह मनुष्य समाप्त आयु वाला होता है । स्नान करने के तुरंत बाद जिसके हृदय में तीव्र वेदना होती है और दाँतों में कम्पन होता है, उसे समाप्त आयु वाला समझना चाहिये। जो मनुष्य दिन में अथवा रात में बार- बार भयभीत होता हो और दीपक की गन्ध को न सूँघ पाता हो, उसे अपनी मृत्यु को उपस्थित जानना चाहिये । जो रात में इन्द्रधनुष को तथा दिन में तारामण्डल को देखे और दूसरों के नेत्रों में अपना प्रतिबिम्ब न देख सके; वह जीवित नहीं रहता है ॥ २१–२४ ॥ जिसके एक नेत्र से पानी आता हो, दोनों कान अपने स्थान से खिसके हुए हों और जिसकी नाक टेढ़ी हो गयी हो, उसे समाप्त जीवन वाला समझना चाहिये। जिसकी जीभ काली तथा खुरदुरी हो जाय, मुख पाण्डुरवर्ण वाला हो जाय और दोनों गाल खजूर फल के समान रक्तवर्ण के हो जायँ, उसकी मृत्यु सन्निकट होती है। जो मनुष्य स्वप्न में खुले बालों वाला होकर हँसता हुआ, गाता हुआ तथा नाचता हुआ दक्षिण दिशा की ओर जाता है, उसका जीवन समाप्त हो जाता है ॥ २५–२७ ॥ जिसका शरीर श्वेत मेघों की आभा के समान और श्वेत सरसों के समान गौर वर्ण का हो जाय, उसकी मृत्यु सन्निकट होती है। जिसके स्वप्न में रथ में जुते हुए अशुभ ऊँट अथवा गधे दिखायी पड़ें और वह दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हो, वह [ व्यक्ति ] जीवित नहीं रहता है। जो कान में ध्वनि न सुन सके और नेत्र में प्रकाश न देख सके – यदि ये दो बहुत अनिष्टकारी घटनाएँ स्वप्न में एक साथ घटित हों, तो वह व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त होता है। जो स्वप्न में गड्ढे में गिर पड़े तथा उसका द्वार बन्द हो जाय और वह गड्ढे से निकल न सके, उसका जीवन समाप्त हो जाता है ॥ २८-३१ ॥ जिसके नेत्र ऊपर की ओर उलट जायँ, स्थिर हो जायँ, रक्तवर्ण के हो जायँ, बार-बार घूमते हों, मुख सूखने लगे, नाभि छिद्रयुक्त हो जाय, मूत्र अत्यधिक गर्म हो; वह संकटग्रस्त होता है अर्थात् उसकी मृत्यु आसन्न होती है ॥ ३२ ॥ जो दिन में अथवा रात में किसी के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से मारा जाय, किंतु मारने वाले को देख न सके; वह समाप्त आयु वाला होता है और जीवित नहीं रह पाता है । जो मनुष्य स्वप्न में अग्नि में प्रवेश करे और स्वप्न के अन्त में इसका स्मरण न कर सके; उसका जीवन समाप्त हो जाता । जो मनुष्य स्वप्न में अपने श्वेत प्रावरण (ओढ़ने के वस्त्र ) – को काला तथा लाल देखता है, उसकी मृत्यु सन्निकट होती है ॥ ३३-३५ ॥ उस मृत्युकाल के उपस्थित होने पर और शरीर में अरिष्ट के सूचित होने पर बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि खेद तथा विषाद का परित्यागकर उपेक्षाभाव धारण करे ॥ ३६ ॥ पूरब या उत्तर दिशा में जाकर पवित्र हो करके किसी समतल, अतिस्थावर ( आकाशरहित), एकान्त तथा जन्तुविहीन स्थान में पूरब या उत्तर की ओर मुख करके स्वस्तिक आसन में बैठ जाय और शान्त होकर आचमन करके महेश्वर को प्रणामकर शरीर, सिर तथा गरदन को सीधा करके धारणा करते हुए किसी वस्तु की ओर न देखे, जैसे वायुरहित स्थान में रखे दीपक की लौ विचलित नहीं होती है; इसके लिये यह उपमा बतायी गयी है ॥ ३७-३९ ॥ शास्त्रवेत्ता को चाहिये कि पूर्व अथवा उत्तर की ओर विस्तार वाले स्थान में ध्यानपरायण होवे । उसे कामना, तर्क, आसक्ति तथा सुख-दुःख को मन से नियन्त्रित करके पूर्ण विशुद्ध ध्यान में लीन हो जाना चाहिये। काल तथा कर्मों को सदा लिङ्गशरीरों के अन्तर्गत समझकर नाक, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान, मन, बुद्धि तथा हृदय में धारणा करनी चाहिये । इस प्रकार योगधारण को द्वादशाध्यात्म (बारह अध्यात्म) नाम वाला कहा जाता है। सौ अथवा पचास धारणा को सिर में धारण करना चाहिये। धारणा के अभ्यास से श्रान्त योगी की वायु ऊपर की ओर होने लगती है; तब ओंकार से युक्त होकर शरीर को वायु से पूर्ण करना चाहिये । इस प्रकार ओंकारमय योगी [अपने को] ब्रह्म में लीन करके ब्रह्मसायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ ४०–४४१/२ ॥ [ हे ऋषियो ! ] इसके बाद मैं ओंकार की प्राप्ति का लक्षण बताऊँगा। इसे तीन मात्रा वाला जानना चाहिये । इसमें व्यंजनसहित मकार ईश्वर (शिव) है। इसमें पहली मात्रा विद्युती ( राजसी) एवं दूसरी मात्रा तामसी कही गयी है। तीसरी मकाररूप अक्षरगामिनी मात्रा को सत्त्वगुणरूप वाली जानना चाहिये । इसे गान्धारी नाम से भी जानना चाहिये; क्योंकि यह गान्धारस्वर से उत्पन्न है और पिपीलिका की गति के स्पर्श के समान सूक्ष्म गति वाली है तथा यह मूर्धादेश में लक्षित होती है। जिस प्रकार उच्चारित किया गया ओंकार मूर्धा देश में गमन करता है, वैसे ही ओंकारमय योगी ब्रह्म में लीन होकर ब्रह्मसायुज्य प्राप्त कर लेता है। परमेश्वर का वाचक प्रणव ही धनुष है, यह जीवात्मा ही बाण है और परब्रह्म परमेश्वर ही उसके लक्ष्य हैं। तत्परता से उनकी उपासना करने वाले प्रमादरहित साधक के द्वारा ही वह लक्ष्य वेधा जा सकता है, इसलिये उस लक्ष्य को वेधकर बाण की ही भाँति उसमें तन्मय हो जाना चाहिये ॥ ४५–४९१/२ ॥ ‘ओम्’ – यह एकाक्षर पद गुहा (बुद्धि) – में निहित है। यह ‘ओम्’ तीनों लोकों, [ ऋक् यजुः – साम] तीनों वेदों, तीनों अग्नियों तथा विष्णु के तीनों पदों के स्वरूप वाला है; वस्तुतः अर्धमात्रा सहित इसकी तीन मात्राएँ जाननी चाहिये। जो योगी इस प्रणव से प्रेरित होता है, वह ब्रह्म का सायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ ५०-५२ ॥ अकार को अक्षर जानना चाहिये; इसके साथ उकार का संयोग कहा गया है। पुनः मकार (अनुस्वार)-के योग से बना हुआ ओंकार तीन मात्रा वाला कहा गया है। अकार को भूलोक तथा उकार को भुवर्लोक कहा जाता है। व्यंजनसहित मकार को स्वर्लोक कहा जाता है। ओंकार त्रिलोकस्वरूप है, उसका सिर स्वर्ग है, सभी भुवन अंग हैं। ब्रह्मलोक को उसका पाद कहा जाता है। रुद्रलोक मात्रापादरूप है। शिवपद मात्रा से अतीत है — इस ज्ञानविशेष के द्वारा उस तुरीय पद की उपासना की जाती है। इसलिये सदा ध्यानपरायणता होनी चाहिये। शाश्वत (स्थिर) सुख चाहने वाले को उस मात्रातीत अक्षर उपासना करनी चाहिये ॥ ५३-५७ ॥ [शिवतत्त्व]- की प्रयत्नपूर्वक [ॐकी] पहली मात्रा ह्रस्व है और दूसरी मात्रा दीर्घ है। तीसरी मात्रा प्लुत कही जाती है। इन मात्राओं को क्रमशः यथावत् जानना चाहिये। जितना अपना सामर्थ्य हो सके, उतना मनीषी लोग इन्हें धारण कर सकते हैं। इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि को नियन्त्रित करके यदि जो कोई आत्मा में सदा अर्धमात्रा का ध्यान करता है, तो वह जिस फल को प्राप्त करता है, उसे सुनिये। जो सौ वर्षपर्यन्त प्रत्येक मास में अश्वमेध यज्ञ करता है, वह उसके द्वारा जो पुण्य पाता है, उसे इस मात्रा से प्राप्त कर लेता है। जो फल न तो कठोर तपस्या से और न तो विपुल दक्षिणा वाले यज्ञों से प्राप्त किया जा सकता है, वह फल इस मात्रा के द्वारा सम्यक् प्राप्त हो जाता है ॥ ५८- ६२ ॥ उस प्रणव में जो यह प्लुत नामक मात्रा बतायी गयी है, गृहस्थ योगियों को उसका अभ्यास करना चाहिये । विशेषरूप से आठ लक्षणों वाले अणिमा आदि ऐश्वर्यों (सिद्धियों) के लिये इस मात्रा को जानना चाहिये; अतः हे द्विजो ! उस मात्रा की साधना करनी चाहिये ॥ ६३-६४ ॥ हे द्विजो ! इस प्रकार योगसम्पन्न, विशुद्ध, मन पर नियन्त्रण करने वाला तथा जितेन्द्रिय जो व्यक्ति आत्मा को जान लेता है, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। अतः बुद्धिमान् को पाशुपत योगों के द्वारा आत्मचिन्तन करना चाहिये। जो आत्मा को जान लेते हैं, वे शुद्ध हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ६५-६६ ॥ अध्यात्म का चिन्तन करने वाला ब्राह्मण योगज्ञान के द्वारा ऋक्-यजुः साम की ऋचाओं, सभी वेदों तथा उपनिषदों का ज्ञान प्राप्त कर लेता है । वह सर्वदेवमय होकर लिङ्गशरीर से शून्य हो जाता है और पुनर्जन्म का त्याग करके शाश्वत पद ( शिवपद ) को प्राप्त करता है ॥ ६७-६८ ॥ जिस प्रकार पका हुआ फल वायु द्वारा हिलाये जाने पर वृक्ष से गिर पड़ता है, उसी प्रकार भगवान् सदाशिव के नमस्कार से पाप नष्ट हो जाता है। रुद्र-नमस्कार निश्चितरूप से सभी कर्मों का फल देने वाला है; अन्य देवताओं को नमस्कार करने से उनका फल प्राप्त नहीं होता है, अतः मन, वचन, कर्म – इन तीनों से विनम्र होकर योगी को महेश्वर तथा दसों इन्द्रियों का विस्तार करने वाले ब्रह्म की उपासना दसों इन्द्रियों से करनी चाहिये ॥ ६९-७१ ॥ इस प्रकार ध्यानमग्न होकर जो अपने शरीर का त्याग करता है, वह तीनों कुलों का उद्धार करके शिवसायुज्य प्राप्त करता है । अथवा [ योगोपासना में असमर्थ होने पर ] कुछ अरिष्ट देखने पर और मृत्यु आसन्न होने पर वाराणसी में अविमुक्तेश्वर में जाकर शुद्धि (प्रायश्चित्त) करनी चाहिये; जिस-किसी तरह वहाँ देहत्याग कर देना चाहिये; इससे वह मनुष्य मुक्त हो जाता है । हे विप्रेन्द्रो ! जो मनुष्य श्रीपर्वत पर अपने शरीर को छोड़ता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। बुद्धिमान् [व्यक्ति ] को प्राणियों को सदा मुक्ति देने वाले उत्तम अविमुक्तक्षेत्र (काशी) – में विशेषरूप से मरणकाल में वास करना चाहिये ॥ ७२- ७६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘अरिष्टकथन’ नामक इक्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९१ ॥ Content is available only for registered users. 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