30 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -090 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ नब्बेवाँ अध्याय यतियों के लिये प्रायश्चित्त निरूपण श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नवतितमोऽध्यायः यति प्रायश्चित्तं सूतजी बोले — [हे ऋषियो !] इसके बाद मैं यतियों के लिये निश्चित किये गये प्रायश्चित्त का वर्णन करूँगा; शिव के द्वारा कहा गया यह [प्रायश्चित्त] यतियों के मन, पाप का शोधन करने वाला है ॥ १ ॥ वाणी तथा शरीर से होने वाले पाप को तीन प्रकार का जानना चाहिये, जिसके द्वारा दिन-रात निरन्तर यह जगत् व्याप्त है । यति कर्म के बिना भी स्थित रहता है — यह उपनिषद् का कथन है; प्रत्येक क्षण को योग में प्रयुक्त करना चाहिये; क्योंकि आयु अत्यन्त चलायमान है। प्रमादरहित को ही योग प्राप्त होता है। योग महान् बल है; मनुष्यों के लिये योग से बढ़कर कल्याणकारी कुछ भी नहीं दिखायी देता है। अतः धर्मयुक्त विद्वान् लोग योग की प्रशंसा करते हैं। विद्या के द्वारा अविद्या को जीतकर अत्युत्तम ऐश्वर्य प्राप्त करके पुनः ब्रह्म तथा मायाविलास का भली- भाँति विचार करके धीर लोग [शिव नामक ] उस परम पद को प्राप्त करते हैं ॥ २–५१/२ ॥ यतियों के लिये जो व्रत तथा उपव्रत हैं; उनमें प्रत्येक का अतिक्रम (उल्लंघन ) होने पर उनके लिये प्रायश्चित्त का विधान किया गया है। [गृहस्थ को भी ] कामनापूर्वक स्त्री- गमन करने पर प्रायश्चित्त करना चाहिये; यति को प्राणायामयुक्त सान्तपनव्रत करना चाहिये, इसके बाद एकाग्रचित्त होकर नियमानुसार कृच्छ्रव्रत करना चाहिये, तत्पश्चात् अपने आश्रम में लौटकर आलस्यरहित होकर भिक्षुक (यति ) – को आचारपूर्वक रहना चाहिये ॥ ६-८१/२ ॥ धर्मार्थ असत्य [किसी को ] दूषित नहीं करता है — ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं; फिर भी उसे नहीं करना चाहिये । यह असत्य प्रसंग भयंकर होता है । [ यदि यह हो जाता है, तो ] एक दिन तथा एक रात उपवास और सौ प्राणायाम इसका प्रायश्चित्त है। धर्म के इच्छुक यति को असवाद नहीं करना चाहिये; बड़ी से बड़ी विपत्ति पड़ने पर भी उसे चोरी नहीं करनी चाहिये; क्योंकि चोरी से बढ़कर कोई अधर्म नहीं है — ऐसा श्रुति कहती है । चोरी को प्राणवध के समान होने वाली हिंसा के रूप में कहा गया है। जो यह धन है, वह मनुष्यों का बाहर विचरण करने वाला प्राण ही है । जो जिसके धन का हरण करता है, वह मानो उसका प्राण ही हर लेता है । इस [ चौर] कर्म को करके वह अत्यन्त दुष्ट मन वाला व्यक्ति आचाररहित तथा व्रतच्युत हो जाता है। उसे फिर से वैराग्ययुक्त होकर शास्त्रोक्त विधि से एक वर्ष तक चान्द्रायणव्रत करना चाहिये — ऐसा श्रुति कहती है । वर्ष अन्त में वह पापरहित हो जाता है; इसके बाद यति को वैराग्ययुक्त होकर आलस्यरहित हो सदाचार का पालन करना चाहिये ॥ ९-१५ ॥ सभी प्राणियों के प्रति मन, वचन तथा कर्म से अहिंसा भाव रखना चाहिये। यदि यति अनजान में भी पशुओं तथा कीड़ों तक की हिंसा कर दे, तो उसे कृच्छ्रातिकृच्छ्र अथवा चान्द्रायणव्रत करना चाहिये । स्त्री को देखकर इन्द्रिय- दौर्बल्य के कारण यदि यति स्खलित हो जाता है, तो उसे सोलह बार प्राणायाम करना चाहिये । दिन में वीर्यस्खलन करने वाले विप्र के लिये प्रायश्चित्तस्वरूप तीन रात तक उपवास और सौ प्राणायाम का विधान है। यदि रात में स्खलन होता है, तो स्नान करके बारह धारणा (प्राणायाम) करने के अनन्तर वह शुद्ध हो जाता है। हे द्विजो ! प्राणायाम के द्वारा विप्र शुद्धमन वाला तथा पाप से रहित हो जाता है ॥ १६–१९१/२ ॥ किसी एक व्यक्ति से प्राप्त अन्न, मधु (शहद), मांस, बिना पका हुआ भोजन तथा प्रत्यक्ष लवण — ये सभी पदार्थ यतियों के लिये अभोज्य हैं। इनमें किसी एक का भी उल्लंघन होने पर उनके लिये प्रायश्चित्त का विधान किया गया है; कृच्छ्रप्राजापत्यव्रत के द्वारा उस पाप से यति छूट जाता है। मन, वाणी तथा शरीर से जो कोई भी अन्य व्यतिक्रम हो जाय, तो उनके प्रायश्चित्त के लिये सत्पुरुषों के साथ निर्णय करके वे जो बतायें, उसे करना चाहिये ॥ २०-२३ ॥ शुद्ध मन से मिट्टी ढेले तथा सुवर्ण में समान भाव रखता है और सभी प्राणियों में ब्रह्म का चिन्तन करता है; वह स्थिर, शाश्वत तथा अविनाशी परम धाम को प्राप्त करके पुनः जन्म नहीं ग्रहण करता है ॥ २४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘यतिप्रायश्चित्त’ नामक नब्बेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९० ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -002 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -010 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -018 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -026 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -034 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -042 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -050 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -058 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -066 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -074 Powered by YARPP.