20 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -050 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ पचासवाँ अध्याय भुवनविन्यास में विभिन्न कुलाचल पर्वतों पर रहने वाली देवयोनियों आदि का वर्णन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः भुवनविन्यासोद्देशस्थानवर्णनं सूतजी बोले — इन्द्र शितान्त के शिखर पर विद्यमान सुन्दर पारिजातवन में रहते हैं। उसके पूर्व में कुमुदपर्वत की चोटी है, वह बहुत विस्तृत है । हे श्रेष्ठ द्विजो ! वहाँ दानवों के आठ पुर कहे गये हैं । हे श्रेष्ठ द्विजो ! पवित्र सुवर्णकोटर में नीलक नामक महान् राक्षसों के अड़सठ पुर बताये गये हैं ॥ १-२१/२ ॥ हे सुव्रतो! पर्वतश्रेष्ठ महानील पर भी घोड़े के समान मुख वाले प्रधान किन्नरों के पन्द्रह पुर हैं और महान् पर्वत वेणुसौध पर विद्याधरों के तीन पुर हैं ॥ ३-४ ॥ श्रीमान् गरुड़ वैकुण्ठ पर्वत पर और नीललोहित रुद्र करंज पर्वत पर निवास करते हैं। वसुओं का निवास वसुधार में बताया गया है। गिरिश्रेष्ठ रत्नधार पर महात्मा सप्तर्षियों के सात पवित्र स्थान हैं, जो सिद्धों के वास से युक्त हैं ॥ ५-६ ॥ पर्वतों में उत्तम एकशृंग पर्वत पर प्रजापति का महान् आवास है। गजशैल पर दुर्गा आदि तथा सुमेध पर वसुगण रहते हैं। पर्वतों में उत्तम हेमकक्ष पर्वत पर अस्सी देवपुरियाँ हैं, वहाँ आदित्यगण, रुद्रगण तथा दोनों अश्विनीकुमार निवास करते हैं ॥ ७-८ ॥ सुनील पर्वत पर राक्षसों के पाँच सौ करोड़ निवासस्थान हैं। पंचकूट पर पाँच करोड़ पुर हैं। शतश्रृंग पर अमित तेजस्वी यक्षों के सौ पुर हैं। ताम्राभ पर्वत पर काद्रवेयों का और विशाख पर्वत पर गुह का निवासस्थान है ॥ ९-१० ॥ हे श्रेष्ठ मुनियो ! श्वेतोदर पर्वत पर महात्मा सुपर्ण का, पिशाचक पर कुबेर का और हरिकूट पर विष्णु का आवास है ॥ ११ ॥ कुमुद पर्वत पर किन्नरों का आवास है। अंजन पर्वत पर चारणों का निवास स्थान है। कृष्णपर्वत पर गन्धर्वों का निवासस्थान है। हे श्रेष्ठ विप्रो ! पाण्डुर पर्वत पर विद्याधरों के सात पुर हैं, जो सभी प्रकार के भोगों से युक्त हैं । हे द्विजो ! सहस्रशिखर पर्वत पर भयानक कर्म वाले इन्द्रशत्रु दैत्यों के सात हजार पुर हैं । हे मुनीश्वरो ! पुष्पकेतु मुकुट पर्वत पर पन्नगों का आवास है। वैवस्वत, सोम, वायु और नागाधिपति के चार निवासस्थान शैलराज तक्षक पर हैं ॥ १२-१५ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, महात्मा गुह, कुबेर, सोम तथा अन्य महात्माओं के मुख्य निवासस्थान मर्यादा- पर्वतों पर हैं। सर्वव्यापी शिव [ भगवती ] उमा के साथ श्रीकण्ठपर्वत की गुफा में निवास करते हैं। सभी देवताओं के ईश्वर शिव का आधिपत्य श्रीकण्ठ पर्वत पर है । इस ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति श्रीकण्ठ से ही हुई है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १६-१८ ॥ अनन्त, ईश आदि इनमेंसे प्रत्येक देवता ब्रह्माण्ड रक्षक हैं, अतः वे चक्रवर्ती तथा विद्येश्वर कहे गये हैं । अब मैं मर्यादापर्वतों पर श्रीकण्ठ से अधिष्ठित स्थानों का संक्षेप में वर्णन करता हूँ, आप लोग सुनिये। मैं श्रीकण्ठ से अधिष्ठित कालाग्निशिवपर्यन्त इस सम्पूर्ण चराचर जगत् का विस्तारपूर्वक वर्णन कैसे कर सकता हूँ ? ॥ १९-२१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘भुवनविन्यासोद्देशस्थानवर्णन’ नामक पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५० ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -006 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -007 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -014 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -015 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -022 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -023 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -030 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -031 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -038 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -046 Powered by YARPP.