16 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -034 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ चौंतीसवाँ अध्याय भगवान् शिव द्वारा भस्म, भस्मस्नान एवं शिवयोगियों की महिमा का प्रतिपादन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः योगिप्रशंसा भगवान् शिव बोले — हे मुनीश्वर ! इन सबके माहात्म्य से ‘युक्त कथा के सारभाग का वर्णन मैं आप लोगों से करूँगा। सोम का कारणस्वरूप अग्नि मैं हूँ तथा अग्निसंयुक्त सोम भी मैं ही हूँ ॥ १ ॥ इस लोक (भारतवर्ष)-में रहने के कारण सबके कर्मों का फल अग्नि के द्वारा ही धारण किया जाता है। अग्नि ने इस स्थावर-जंगम जगत् को अनेक बार दग्ध किया है। अग्नि से भस्मीभूत हो जाने से यह सम्पूर्ण जगत् पवित्र तथा उत्तम हो जाता है । उसी भस्म से ओज प्राप्त करके यह सोम प्राणियों को जीवित करता है ॥ २-३ ॥ जो मनुष्य अग्निहोत्र – कार्य सम्पन्न करके भस्म से त्र्यायुष करता है, वह मेरे ओज से समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ४ ॥ यह भस्म प्रकाशित करता है, कल्याण सम्पादित करता है तथा समस्त पापों का नाश करता है, अतएव इसे भस्म कहा जाता ॥ ५ ॥ ऊष्मपसंज्ञक पितर तथा देवतागण चन्द्रमा से उत्पन्न कहे गये हैं। स्थावर जंगममय यह समस्त जगत् अग्नि- सोमात्मक है ॥ ६ ॥ मैं महान् तेज से युक्त अग्नि हूँ तथा ये महिमामयी अम्बा पार्वती सोमस्वरूपा हैं । प्रकृति के साथ पुरुषरूप मैं अग्नि सोम दोनों ही हूँ ॥ ७ ॥ अतएव हे महाभाग मुनियो ! यह भस्म मेरा वीर्य है – ऐसा कहा जाता है। मैं अपने शरीर में अपने वीर्य ( भस्म ) – को धारण करके अधिष्ठित हूँ और उसी समय से यह भस्म सभी अमंगलों से लोकों की रक्षा करता है तथा इसी भस्म से सूतिकागृहों की भी रक्षा की जाती है ॥ ८-९ ॥ जो मनुष्य क्रोध तथा इन्द्रियों को जीतकर भस्मस्नान करके पवित्र अन्तःकरण वाला हो जाता है, वह मेरा सांनिध्य प्राप्त कर लेता है एवं पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है ॥ १० ॥ पाशुपतव्रत, योगशास्त्र तथा कापिल (सांख्यशास्त्र) – की रचना मैंने ही की। इनमें पाशुपतयोग की रचना पहले हुई है, इसलिये यह उत्तम है ॥ ११ ॥ आश्रम-सम्बन्धी शेष सभी शास्त्र स्वयंभू ब्रह्माजी के द्वारा बाद में रचे गये और लज्जा, मोह तथा भय से युक्त इस सृष्टि की रचना मैंने ही की है ॥ १२ ॥ देवता तथा मुनिगण नग्न ही उत्पन्न होते हैं । लोक में अन्य जो मनुष्य हैं, वे भी वस्त्रविहीन- अवस्था में उत्पन्न होते हैं । इन्द्रियों पर विजय प्राप्त न किये हुए लोग सुन्दर वस्त्र धारण करके भी नग्न हैं और इन्द्रियजित् लोग नग्न रहते हुए भी वस्त्र से ढँके हुए हैं, इसमें वस्त्र हेतु नहीं माना गया है ॥ १३-१४ ॥ क्षमा, धैर्य, अहिंसा, वैराग्य तथा हर तरह से मान-अपमान में समानता उत्तम आवरण कहे गये हैं ॥ १५ ॥ भस्म-स्नान के द्वारा पूरे शरीर में भस्म का अनुलेपनकर मन से शिवजी का ध्यान करना चाहिये। हजारों प्रकार के कुकृत्य करके भी यदि जो कोई मनुष्य भस्म से स्नान करे, तो उसके सभी पापों को भस्म उसी प्रकार जला डालता है, जिस प्रकार अग्नि अपने तेज से वन को दग्ध कर देता है ॥ १६१/२ ॥ अतएव जो मनुष्य प्रयत्नशील होकर त्रिकाल भस्म – स्नान करता है, वह मेरे गणों में श्रेष्ठता को प्राप्त होता है ॥ १७१/२ ॥ जो लोग उत्तम व्रत धारण करके समस्त यज्ञ सम्पन्न करके महादेव के लीला-विग्रह का चिन्तन करते हुए उनकी आराधना करते हैं; वे अमृतत्व (मोक्ष) – को प्राप्त होते हैं। इसे श्रेष्ठ उत्तरमार्ग कहा गया है ॥ १८-१९ ॥ जो लोग दक्षिण-मार्ग द्वारा नाशवान् काम्यकर्मों के लिये परमेश्वर की आराधना करते हैं, वे अणिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, इच्छाकामावसायित्व, प्राकाम्य, ईशित्व तथा वशित्व सिद्धियाँ प्राप्तकर अमर हो जाते हैं ॥ २०-२१ ॥ इन्द्र आदि सभी देवता भी काम्य व्रतका आश्रयणकर परम ऐश्वर्य की प्राप्ति करके अपरिमित तेजस्वी हो गये ॥ २२ ॥ मद-मोह से शून्य, रागों से मुक्त तथा तम-रज आदि विकारों से रहित स्वभाव वाला होकर संसार को परिभूत करने वाले पाशुपतयोग को उत्तम जानकर सदा इस पशुपतियोग में स्थित रहना चाहिये ॥ २३ ॥ सभी इन्द्रियों को जीतकर जो मनुष्य पवित्र मन से सभी पापों का नाश करने वाले इस पाशुपतयोग का ध्यानपूर्वक श्रद्धा- भाव से पाठ करता है, सभी पातकों से रहित विशुद्ध आत्मा वाला वह प्राणी रुद्रलोक को प्राप्त होता है || २४१/२ ॥ महादेवजी का यह वचन सुनकर द्विजों में श्रेष्ठ वसिष्ठ आदि वे सभी मुनि अपने अंगों में पीताभ-श्वेत भस्म लगाने लगे और इच्छारहित वे मुनिगण कल्प के अन्त में शिवजी के तेज के प्रभाव से रुद्रलोक के लिये प्रस्थित हुए ॥ २५-२६ ॥ [ नन्दी कहते हैं — हे सनत्कुमारजी !] अतः मलिन, विकृत, रूपसम्पन्न चाहे जिस रूप में हो, महान् योगी की शंका करके उनकी निन्दा नहीं करनी चाहिये, अपितु उनकी सदा पूजा करनी चाहिये ॥ २७ ॥ अधिक कहने की क्या आवश्यकता; दृढ़ व्रत वाले भगवान् शिव के द्विजश्रेष्ठ भक्त चाहे वे मलिन ही क्यों न हों, पूरे प्रयत्न से शिव की ही भाँति उनकी पूजा ‘करनी चाहिये, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ २८१/२ ॥ इसी भाँति मुनि दधीच शिव की भक्ति से देवदेव नारायण को जीतकर लोक में प्रतिष्ठित हो गये थे; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २९१/२ ॥ अतएव भस्म से लिप्त शरीर वाले, जटाधारी, मुण्डित सिर वाले तथा दिगम्बर वेश वाले अनेक प्रकार के महात्माओं की मन, वचन एवं कर्म से पूर्ण प्रयत्न के साथ महादेव की भाँति विधिवत् पूजा करनी चाहिये ॥ ३०-३१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘योगिप्रशंसा’ नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥ Content is available only for registered users. 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