30 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -089 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ नवासीवाँ अध्याय सदाचार तथा शौचाचार का निरूपण, द्रव्यशुद्धि, अशौचप्रवृत्ति एवं स्त्रीधर्म विवेचन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकोननवतितमोऽध्यायः सदाचार कथनं सूतजी बोले — [हे ऋषियो!] अब मैं इसके बाद शौचाचार का लक्षण बताऊँगा, जिसे करके शुद्ध अन्तःकरण वाला [व्यक्ति] परलोक में जाकर [उत्तम ] गति प्राप्त करता है। पूर्वकाल में ब्रह्मा ने सभी प्राणियों के कल्याण के लिये इसे कहा था । यह संक्षिप्त रूप में सभी वेदों का सार है, ब्रह्मवादियों की निधि है, आचरण के उत्थान के लिये उपयोगी है और मुनियों का उत्तम पद है। जो इसे करने में सदा सावधान रहता है, वह मुनि है और वह दुःखित नहीं होता है ॥ १-३ ॥ मान तथा अपमान — ये विष तथा अमृत कहे गये हैं। उनमें अपमान अमृत तथा सम्मान विष कहा जाता है । शिष्य को चाहिये कि गुरु के हित में संलग्न रहकर एक वर्ष तक उनके पास निवास करे, नियमों तथा यमों में सदा सावधान रहे और उनसे उत्तम ज्ञानयोग ग्रहण करके पुनः आज्ञा लेकर धर्म का विरोध न करते हुए इस पृथ्वी पर विचरण करे ॥ ४-६ ॥ भलीभाँति नेत्र से देखकर मार्ग पर चलना चाहिये, वस्त्र से पवित्र किये गये अर्थात् छाने हुए जल को पीना चाहिये, सत्य से पवित्र वचन बोलना चाहिये और मन से पवित्र प्रतीत होने वाले आचरण को करना चाहिये । मत्स्य ग्रहण करने वाले को छः महीनों में जो पाप लगता है, उसे एक दिन अपवित्र जल के पान से होने वाले पाप के बराबर जानना चाहिये। अपवित्र जल का पान कर लेने पर पाँच सौ बार अघोर मन्त्र “ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोर घोर तरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्व सर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥” का जप करना चाहिये; उससे व्यक्ति शुद्धि प्राप्त कर लेता है; अथवा घृतस्नान आदि विस्तृत उपचारों से शिव की पूजा करनी चाहिये, इसके बाद उनकी तीन बार प्रदक्षिणा करके वह शुद्ध हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७-१० ॥ योगवेत्ता को आतिथ्य, श्राद्ध तथा [ सोम आदि ] यज्ञ में कहीं नहीं जाना चाहिये; इस प्रकार योगी अहिंसक हो सकता है — यह भलीभाँति निर्णीत बात है । बुद्धिमान् को चाहिये कि अग्नि के धूमरहित तथा अंगाररहित हो जाने पर अर्थात् अग्नि के शीतल हो जाने पर और सभी लोगों के भोजन कर चुकने पर [ उस घर में ] भिक्षा प्राप्त करे एवं उन घरों में प्रतिदिन भिक्षा ग्रहण न करे, अन्यथा दूसरे लोग अपमान करेंगे तथा निन्दा करेंगे। अतः सज्जनों के धर्म को दूषित न करते हुए उचित भिक्षा प्राप्त करनी चाहिये ॥ ११–१३ ॥ वन में रहने वालों के यहाँ तथा यायावरों के घरों में भिक्षा माँगनी चाहिये। यह योगी की सर्वश्रेष्ठ वृत्ति होती है। हे ब्राह्मणो! इसके बाद श्रेष्ठ आचार वाले, दानशील, श्रद्धालु, श्रोत्रिय तथा महात्मा गृहस्थों के यहाँ भिक्षा प्राप्त करनी चाहिये। इसके बाद दुष्टतारहित तथा अपतित लोगों के यहाँ भी भिक्षा ग्रहण करे, किंतु सभी वर्णों के यहाँ भिक्षा माँगना जघन्य वृत्ति कही जाती है ॥ १४-१६ ॥ यवागू, मट्ठा, दूध, यावक (जौ से बना भोजन), पके हुए फल-मूल, टूटे हुए अनाज, तिल और सत्तू भिक्षा में ग्रहण करना चाहिये । [ हे ऋषियो ! ] मैंने योगियों की सिद्धि की वृद्धि करने वाले उन आहारों को बता दिया; उनके प्राप्त हो जाने पर इसे श्रेष्ठ भिक्षा कहा गया है ॥ १७-१८ ॥ जो [व्यक्ति] प्रत्येक महीने में कुशा के अग्र भाग से जलबिन्दु ग्रहण करता है और न्यायपूर्वक भिक्षाटन करता है; वह पूर्व में कहे गये [ भिक्षार्थी ] से श्रेष्ठ होता है । वृद्धावस्था, मृत्यु, गर्भवास तथा नरक आदि से भयभीत संन्यासी की भिक्षा दायभाग के समान है, इसीलिये इसे भैक्ष्य कहा जाता है ॥ १९-२० ॥ जो दही तथा दूध का सेवन करने वाले हैं और जो अन्य लोग [कृच्छ्र आदि व्रतों के द्वारा ] शरीर को क्षीण करने वाले हैं; वे सब भिक्षावृत्ति वाले की सोलहवीं कला भी बराबर नहीं हैं। जो परम पद चाहता है, उसे नित्य भस्म में शयन करना चाहिये, भिक्षाटन करना चाहिये, इन्द्रियों को वश में रखना चाहिये और पाशुपतव्रत करना चाहिये ॥ २१-२२ ॥ चान्द्रायणव्रत सभी योगियों के लिये उत्तम होता है । [ अपनी ] शक्ति के अनुसार इसे एक, दो, तीन अथवा चार बार करना चाहिये। भिक्षुकों के लिये ये पाँच व्रत हैं — अस्तेय ( चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अलोभ, त्याग और परम अहिंसा। क्रोध न करना, गुरु की सेवा, शुद्धता, आहार की अल्पता और प्रतिदिन स्वाध्याय — ये नियम बताये गये हैं ॥ २३-२५ ॥ माता-पिता से प्राप्त संस्कार, अपने स्वभाव, धन आदि तथा संचितकर्म — इन सबसे देवताओं के द्वारा मनुष्य वन में दुर्ग्रह हाथी की भाँति बन्धनग्रस्त हो जाता है ॥ २६ ॥ सभी यज्ञ-क्रियाएँ देवतुल्य (स्वर्ग प्राप्त कराने वाली) हैं। यज्ञ से श्रेष्ठ जप को तथा जप से श्रेष्ठ ज्ञान को बताया गया है; किंतु आसक्ति तथा राग से रहित ध्यान ज्ञान से भी श्रेष्ठ है; उसके प्राप्त हो जाने से शाश्वत पद की प्राप्ति हो जाती है ॥ २७ ॥ ज्ञान से विशुद्ध बुद्धि वाले लोगों ने इन्द्रियों के दमन, मन पर नियन्त्रण, सत्य, पापहीनता, मौन, समस्त प्राणियों के प्रति सरलता और अतीन्द्रिय ज्ञान को शिवस्वरूप बताया है ॥ २८ ॥ एकाग्रचित्त वाला, ब्रह्मपरायण, प्रमादरहित, शुद्ध, एकान्त का सेवन करने वाला तथा जितेन्द्रिय महात्मा ही इस [ पाशुपत ] योग को प्राप्त कर सकता है — ऐसा निष्कलंक तथा निष्पाप महर्षिगण कहते हैं ॥ २९ ॥ इस शुद्ध योगमार्गरूपी अंकुश से नियन्त्रित व्यक्ति दग्धबीज वाला तथा पापरहित होकर अभीष्ट फलों को प्राप्त करता है ॥ ३० ॥ जो सदाचारपरायण, शान्त (अन्तःकरण की वृत्तियों को निगृहीत कर लेने वाले ) तथा अपने धर्म का पालन करने वाले हैं, वे सभी लोकों को जीतकर ब्रह्मलोक चले जाते हैं ॥ ३१ ॥ साक्षात् पितामह ने सभी लोकों के उपकार के लिये सनातनधर्म का उपदेश किया था; मैं आप लोगों को बता रहा हूँ, उसे सुनिये ॥ ३२ ॥ गुरु के उपदेश से युक्त तथा नियमों का पालन कर वाले वृद्धजनों का स्वागत आदि तथा प्रणाम — यह सब करना चाहिये। हे सुव्रतो! तीन बार प्रदक्षिणा करके आठों अंगों को पृथ्वी से स्पर्श करके तीन बार ब्राह्मण गुरु को प्रणाम करना चाहिये । बुद्धिमान् को चाहिये कि जो अन्य ज्येष्ठ लोग हैं, उन सबको प्रणाम करे। यदि कोई उत्तम सिद्धि की कामना करता है, तो उनकी आज्ञा का उल्लंघन न करे ॥ ३३-३५ ॥ धातुवाद, नास्तिकवाद, ऊसर स्थान में निवास, क्षुद्र-मन्त्रों का उपयोग, सर्पों को पकड़ना आदि निन्दनीय कार्यों का पूर्ण प्रयत्न से परित्याग करना चाहिये । धूर्तता, धन की कृपणता तथा पिशुनता ( परनिन्दा ) — का सदा त्याग करना चाहिये। गुरुजनों के सान्निध्य में अत्यधिक हँसना, अशिष्टता तथा मनमाना कार्य करना — इन सबका पूर्ण प्रयत्न से परित्याग करना चाहिये । गुरु की आज्ञा के प्रतिकूल आचरण नहीं करना चाहिये और पूर्ण प्रयत्नपूर्वक कभी भी उनका अनिष्ट (बुरा) नहीं यतियों (संन्यासियों) के आसन, वस्त्र, दण्ड, सोचना चाहिये ॥ ३६–३८१/२ ॥ खड़ाऊँ, माला, शयनस्थान, पात्र, छाया तथा यज्ञ के उपकरणों को पैर से कभी नहीं छूना चाहिये । हे विप्रो ! देवताओं तथा गुरुजनों से द्रोह न हो, इसका पूर्ण प्रयास करना चाहिये; प्रमादवश द्रोह कर लेने पर प्रणव का दस हजार जप करना चाहिये । [ जानबूझकर ] गुरुद्रोह तथा देवद्रोह करने पर एक करोड़ जप के द्वारा [ व्यक्ति ] शुद्ध होता है। महापातकों से शुद्धि के लिये भी वही विधि है, जो इसके लिये है । पातकी यदि चरित्रवान् है, तो वह उसके आधे जप से शुद्ध हो जाता है । हे सुव्रतो ! सभी उपपातकी उसके भी आधे जप से शुद्ध हो जाते हैं ॥ ३९-४३ ॥ सन्ध्या-वन्दन का लोप करने पर विप्र इसकी तीन आवृत्ति करके शुद्ध हो जाता है और दैनिक कृत्य का उल्लंघन होने पर एक सौ बार जप करना बताया गया है ॥ ४४ ॥ [नियत ] समय का उल्लंघन करने पर, अभक्ष्य [पदार्थ ] का भक्षण करने पर और न बोलने योग्य वचन बोलने पर एक हजार जप से शुद्धि कही जाती है ॥ ४५ ॥ कौआ, उल्लू तथा कबूतर पक्षियों का वध करने पर एक सौ आठ बार जप करने से [पाप से] मुक्ति हो जाती है; इसमें सन्देह नहीं है। जो तत्त्वज्ञानी, ब्रह्मवेत्ता तथा उत्तम ब्राह्मण है, वह तो केवल [ प्रणव के] स्मरण से शुद्धि प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ४६-४७ ॥ आत्मज्ञानियों के लिये प्रायश्चित्त होते ही नहीं हैं; ब्रह्मविद्या को जानने वाले लोग विश्व के कल्याण के प्रेरक होते हैं, अतः वे [स्वतः] शुद्ध हैं। योगध्यान में एकनिष्ठ वे लोग निर्लेप (शुद्ध) होते हैं, जैसे सुवर्ण शुद्ध होता है। शुद्ध लोगों का शोधन नहीं होता है; वे तो ब्रह्मविद्या के द्वारा [पहले ही] शुद्ध होते हैं ॥ ४८-४९ ॥ नदी आदि से ग्रहण किये गये, वस्त्र तथा नेत्र से [ भलीभाँति ] पवित्र, शीतल तथा फेनरहित जल से सभी अनुष्ठान करना चाहिये; अशुद्ध जल का प्रयोग नहीं करना चाहिये। गन्ध-रंग-रस से दूषित जल, अपवित्र स्थान में रखे हुए जल, कीचड़ तथा कंकड़ से दूषित जल, समुद्री जल, तालाब के जल, शैवालयुक्त जल और अन्य दोषों से विकृत जल का सर्वथा त्याग कर देना चाहिये ॥ ५०-५११/२ ॥ हे द्विजो ! वस्त्र की शुद्धि से युक्त होकर नमस्कार आदि तथा गुरुसेवा आदि समस्त कार्य करने चाहिये; वस्त्रशुद्ध रहित व्यक्ति निश्चित रूप से अपवित्र रहता है; इसमें सन्देह नहीं है। देवकार्य में उपयोग किये जाने वाले वस्त्रों की शुद्धि प्रतिदिन आवश्यक है; मैले हो जाने पर अन्य वस्त्रों की शुद्धि करनी चाहिये । हे द्विजो ! दूसरों के द्वारा धारण किये गये वस्त्र का पूर्ण प्रयत्न से त्याग करना चाहिये ॥ ५२–५४१/२ ॥ रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों की शुद्धि [ रीठे आदि ] रुक्ष पदार्थों से, क्षौम (दुकूल) वस्त्रों की शुद्धि श्वेत सरसों से, स्वर्णकिरणयुक्त वस्त्रों की शुद्धि बिल्व फलों से, कुशास्तरणों या छाग-कम्बलों की शुद्धि मट्ठे के सेचन से और चमड़े-शणवस्त्रों-बेंत से बनी वस्तुओं की शुद्धि सामान्य वस्त्रों की भाँति कही गयी है । ब्रह्मवेत्ता मुनीश्वरों ने समस्त वल्कल वस्त्रों की तथा छत्र – चामर की शुद्धि वस्त्रशुद्धि की भाँति बतायी है। हे विप्रो! कांस्यपात्र की शुद्धि भस्म से होती है, लौहपात्र की शुद्धि क्षार से, ताँबा -राँगा -सीसे के पात्र की शुद्धि अम्ल से कही जाती है । है श्रेष्ठ ब्राह्मणो! सोने तथा चाँदी के पवित्र पात्र जल से शुद्ध होते हैं; मणि, पत्थर, शंख तथा मोती की शुद्धि भी सुवर्णपात्र की भाँति कही गयी है । अत्यधिक दूषित पदार्थ की शुद्धि अग्नि तथा जल के संयोग से होती है । सभी रसों की शुद्धि उत्प्लवन-क्रिया द्वारा बतायी गयी है ॥ ५५–६० ॥ तृण, काष्ठ आदि वस्तुओं की शुद्धिहेतु पवित्र जल से अभ्युक्षण ( छिड़काव ) बताया गया है और स्रुक् – स्रुवा की शुद्धि उष्ण जल से होती है । उसी प्रकार यज्ञपात्रों, मूसल, उलूखल (ओखली), सींग – अस्थि- काष्ठ तथा हाथीदाँत की बनी वस्तुओं की शुद्धि तक्षण (छीलने) – से होती है। हे महाभागो ! संहत ( मिली- जुली) वस्तुओं की शुद्धिहेतु प्रोक्षण बताया गया है और असंहत (पृथक्) वस्तुओं को अलग-अलग शुद्ध करना बताया गया है ॥ ६१–६३ ॥ भोजन हेतु अनाज की राशि के एक भाग के दूषित हो जाने पर उतने भाग को निकालकर शेष भाग का कुश के जल से प्रोक्षण करना चाहिये । शाक, मूल, फल आदि की शुद्धि धान्य (अनाज) – की शुद्धि की भाँति कही जाती है । घर की शुद्धि मार्जन (जलसेचन) तथा गोबर से लीपने से होती है। मिट्टी का पात्र अग्नि में गर्म करने से शुद्ध होता है। भूमि की शुद्धि खनन ( खोदने) – से, गाय के गोबर से लीपने से, मलापकरण से, गाय के निवास से तथा जल के द्वारा सेचन से बतायी गयी है । भूमि पर ठहरा हुआ जल जो अपवित्र पदार्थ से युक्त न हो तथा गन्ध, वर्ण, रस से युक्त हो, वह गाय के द्वारा प्यास बुझने तक पी लिये जाने पर शुद्ध हो जाता है। बछड़ा गोदोहन के समय शुद्ध होता है और पक्षी [चोंच द्वारा] फल गिराने के समय शुद्ध होता है। भार्या की आकांक्षा से रति के समय गृहस्थों के लिये पत्नी शुद्ध होती है। धर्मवेत्ता को चाहिये कि धोबी के द्वारा हाथ से धोये गये वस्त्र को विधिपूर्वक कुश के जल से प्रोक्षित करके धारण करे ॥ ६४-६९ ॥ खान से निकालकर विक्रय हेतु फैलायी गयी वस्तुओं में वर्णाश्रम विभाग के अनुसार शुद्धता होती है और [ मृगया में] हरिण आदि पशुओं को पकड़ते समय श्वान शुद्ध होते हैं ॥ ७० ॥ हे द्विजश्रेष्ठो ! अनिषिद्ध छाया, वेदपाठ के समय मुख से निकली बूँदें, विप्र, मक्खियाँ, धूल, भूमि, वायु, अग्नि — ये सब स्पर्श के लिये सदा शुद्ध होते हैं। हे विप्रो ! सोकर उठने पर, भोजन के अनन्तर, छींक आने पर, जल आदि पीने पर, थूकने पर और अध्ययन के आदि में पवित्र होते हुए भी फिर से आचमन करना चाहिये । अन्य लोगों के द्वारा किये गये आचमन की जो बूँदें पैरों पर पड़ जायँ, उन्हें धूल के समान समझना चाहिये; उनसे कोई अशुद्ध नहीं होता है ॥ ७१–७३ ॥ मैथुन के अनन्तर पतित का स्पर्श करके, मुर्गा-सूअर-कौवा-कुत्ता-ऊँट-गधा-यूप, चाण्डाल आदि का स्पर्श करके व्यक्ति स्नान के द्वारा शुद्ध होता है। रजस्वला, प्रसूता तथा शूद्रा स्त्री का स्पर्श नहीं करना चाहिये। जननाशौच तथा मरणाशौच से युक्त व्यक्ति को चाहिये कि अपने सम्बन्धियों की स्त्रियों में रजस्वला स्त्री को न छुए और छू लेने पर वह स्नान करके ही शुद्ध होता है ॥ ७४-७६ ॥ हे सुव्रतो! संन्यासियों, वानप्रस्थियों, नैष्ठिक ब्रह्मचारियों, राजाओं तथा [ उनके] मन्त्रियों को अशौच नहीं लगता है। कार्य में अवरोध न हो, इसलिये राजाओं को, भ्रमणशील संन्यासियों और ब्राह्मणों को तथा पतितजनों के लिये सम्भव न होने के कारण अशौच नहीं होता है। कुछ भी संचय न करने वाले ब्राह्मणों, यज्ञ के लिये दीक्षित यजमान तथा जिन्हें अशौचकाल में उसकी जानकारी न हुई हो — ऐसे लोगों की स्नानमात्र से शुद्धि हो जाती है। यज्ञ में दीक्षित ऋत्विजों तथा उनकी वैदिक शाखा का अध्ययन करने वालों का अशौच ब्रह्माजी ने एक दिन का बताया है। अपने गोत्र से भिन्न जनों की शुद्धि चार दिनों में हो जाती है; क्योंकि उनके लिये जननाशौच तथा मरणाशौच तीन दिनों से अधिक नहीं होता है। [परिवार में] मृत्यु हो जाने पर बान्धवों की दस दिनों में शुद्धि हो जाती है। जन्म के दस दिन के बाद छः मास के भीतर बालक की मृत्यु होने पर एक दिन का अशौच होता है। तत्पश्चात् सात वर्ष से छोटे बालक की मृत्यु होने पर तीन रात का अशौच होता है। सात वर्ष से बड़े उपनीत ब्राह्मण-बालक की मृत्यु पर दस दिन का अशौच होता है, किंतु विकल्प से पिता के लिये एक दिन का भी अशौच बताया गया है, माता के लिये तो दस दिन का अशौच रहता ही है। तीन वर्ष से कम के बालक की मृत्यु पर बान्धवों की शुद्धि स्नानमात्र से हो जाती है, किंतु पिता की शुद्धि सदा ही तीन रात्रि के उपरान्त ही होती है। आठ वर्ष से अधिक के सम्बन्धी की मृत्यु होने पर बान्धवों की शुद्धि एक दिन में हो जाती है। हे सुव्रतो! आठ वर्ष के बाद बारह वर्ष के पहले तक स्त्रियों को तीन रात का अशौच होता है। सातवीं पीढ़ी के बाद सपिण्डता समाप्त हो जाती है। दस दिन बीत जाने पर अशौच का ज्ञान होने पर तीन रात का अशौच होता है । हे विप्रो ! छः मास के पहले मृत्यु की जानकारी होने पर पक्षिणी (दो रात – एक दिन ) – का अशौच होता है और उसके बाद एक वर्ष से पहले एक दिन का अशौच होता है । वर्ष व्यतीत हो जाने पर स्नानमात्र से सपिण्डों की शुद्धि हो जाती है ॥ ७७–८७ ॥ शव का स्पर्श कर लेने पर तीन रात में शुद्धि होती है । धर्म के लिये स्नान ही शुद्धि हेतु कहा जाता है। बान्धव न होने पर शव का दाह करने वाले तथा उसे ले जाने वालों के लिये स्नानमात्र ही विहित है । शव के साथ [यात्रा में] जाने पर स्नान करके तथा घृत का प्राशन करने पर व्यक्ति शुद्ध होता है । हे द्विजो ! आचार्य तथा श्रोत्रिय मरण में तीन रात का अशौच होता है । माता के भाइयों के मरण में पक्षिणी अशौच होता है और उपकारी जनों के मरण में तीन रात का अशौच होता है । राजाओं, सामन्तों तथा शुद्ध देशान्तरवासियों के मरण में स्नानमात्र से हो जाती है। श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! क्षत्रियों का अशौच बारह दिन का होता है। अभिषिक्त राजा के रण में मरने पर बान्धवों को अशौच नहीं होता है। वैश्य पन्द्रह दिनों में और शूद्र एक महीने में शुद्ध होता है । [ हे विप्रो ! ] इस प्रकार मैंने संक्षेप में अत्युत्तम द्रव्यशुद्धि का वर्णन कर दिया ॥ ८८-९२ ॥1 पूर्व की भाँति यतियों का अशौच होता ही नहीं है। द्विजो ! [ अब मैं स्त्रियों के रजोधर्म की प्रवृत्ति का वर्णन करता हूँ] त्रेता आदि युग में प्रत्येक मास में स्त्रियों को रजोधर्म होता है। युग की प्रकृति के अनुसार सत्ययुग में लोग स्त्रियों के साथ एक बार सहवास करते थे और सन्तानें उत्पन्न होती थीं, जिस प्रकार भाग्यशाली कुरुवर्षनिवासी करते थे ॥ ९३-९४ ॥ हे सुव्रतो! दक्षिण में भारतवर्ष में वर्णाश्रम व्यवस्था त्रेतायुग से लेकर है; यह व्यवस्था अन्य आठ किंपुरुष आदि वर्षों में, महावीत में तथा सुवीत में नहीं है। शाकद्वीप आदि द्वीपों में भारत के ही समान धर्म की व्यवस्था बतायी गयी है ॥ ९५-९६ ॥ सत्ययुग में लोगों की वृत्ति सहज आनन्द की थी, त्रेता में गृह, वृक्ष आदि पर आधारित वृत्ति थी । वही वृत्ति बाद में रजोदोष के कारण लोगों के राग-द्वेष पर आधारित हो गयी । हे विप्रो ! कामवश स्त्रीसंग, क्रोध इत्यादि दोषों के कारण जौ आदि हविष्यान्न एवं औषधियाँ चौदह प्रकार के ग्राम्य तथा वन्य पदार्थों के रूप में उत्पन्न होने लगीं; जो अकाल में नष्ट होकर पुनः उत्पन्न होती थीं, इसलिये प्रयत्नपूर्वक रजस्वला स्त्री से सम्भाषण आदि नहीं करना चाहिये ॥ ९७–९९१/२ ॥ पहले दिन रजस्वला स्त्री चाण्डाली की भाँति वर्ज्य होती है। हे विप्रो ! दूसरे दिन वह ब्रह्मघातिनी के समान होती है और तीसरे दिन उसके आधे पाप से युक्त रहती है। हे सुव्रतो! चौथे दिन स्नान करके वह आधे महीने तक देवपूजन आदि के लिये शुद्ध रहती है। पाँचवें दिन से सोलहवें दिन तक रजोदोष रहने के कारण स्त्रीस्पर्श आदि की शुद्धि मूत्रोत्सर्ग की शुद्धि की तरह कही गयी है। इसके बाद ही उसकी पूर्ण शुद्धि होगी ॥ १००-१०२ ॥ यदि स्त्री रजोदोष से युक्त है, तो पाँच रात्रि तक वह अस्पृश्य (अगम्य) होती है। बीस दिन के बाद भी रजोदोष से युक्त है, तो वह पूर्व की भाँति वह यदि अस्पृश्य होती है ॥ १०३ ॥ रजस्वला स्त्री को स्नान, शौच, गायन, रोदन, हास-परिहास, यात्रा करना, अभ्यंग, द्यूत, अनुलेपन, विशेष रूप से दिन में शयन, दन्तधावन, मैथुन, मन तथा वाणी से भी देवपूजन, नमस्कार आदि को पूर्णप्रयत्न से त्याग देना चाहिये। रजस्वला को चाहिये कि अन्य रजस्वला स्त्री के अंगस्पर्श तथा उसके साथ बातचीत का त्याग कर दे; उसे पूर्णप्रयत्न के साथ वस्त्र बदलने का त्याग कर देना चाहिये। रजस्वला स्त्री को चाहिये कि स्नान करके शुद्ध होने पर [पति के अतिरिक्त ] अन्य पुरुष का स्पर्श न करे और सूर्यदेव का दर्शन करे। तदनन्तर आत्मशुद्धि के लिये ब्रह्मकूर्च अथवा केवल पंचगव्य अथवा दुग्ध का पान करे ॥ १०४-१०८ ॥ रजोधर्म के चौथे दिन स्त्री गमन के योग्य नहीं होती है; वह स्त्री नष्ट तथा अल्प आयु वाले [पुत्र]-को जन्म देती है । वह विद्यारहित, व्रत से च्युत, पतित, दूसरों की स्त्रियों के साथ दुराचार करने वाले तथा दरिद्रता के समुद्र में डूबे रहने वाले पुत्र को उत्पन्न करती है । पुत्री की कामना करने वाले को पाँचवें दिन स्त्री के साथ गमन करना चाहिये । रक्त का आधिक्य होने पर कन्या होती है, शुक्र का आधिक्य होने पर पुत्र होता है और दोनों के समान होने पर नपुंसक संतान उत्पन्न होती है । पाँचवें दिन सहवास करने पर कन्या उत्पन्न होती है। छठें दिन यदि स्त्री के साथ गमन किया जाय, तो वह महाभाग्यवती स्त्री उत्तम पुत्र को उत्पन्न करती है, उसके पुत्रत्व को प्रकट करती है और वह पैदा हुआ पुत्र महातेजस्वी होता है । ‘पुम्’ – यह एक नरक का नाम है और नरक को दुःखपूर्ण कहा गया है; वह स्त्री पुम् [ नरक]-से त्राण (रक्षा) करने वाले उस प्रकार के पुत्र को जन्म देती है ॥ १०९-११३ ॥ कन्या की इच्छा वाले को सातवीं रात्रि में गमन करना चाहिये; किंतु वह कन्या वन्ध्या होती है। आठवीं रात्रि में स्त्री सर्वगुणसम्पन्न पुत्र को जन्म देती है। कन्या की इच्छा वाले व्यक्ति को नौवीं रात में सहवास करना चाहिये । दसवीं रात में संभोग करने पर विद्वान् पुत्र उत्पन्न होता है। ग्यारहवीं रात में सहवास करने पर वह स्त्री पूर्व की भाँति कन्या उत्पन्न करती है। बारहवें दिन स्त्री धर्मतत्त्व ज्ञाता तथा श्रुति स्मृति के धर्मों को चलाने वाले पुत्र को उत्पन्न करती है और तेरहवीं रात में गमन करने पर मूर्ख तथा वर्णसंकर [ दोष] फैलाने वाली कन्या उत्पन्न करती है; अतः पूरे प्रयत्न से उस दिन स्त्री-सहवास नहीं करना चाहिये । यदि चौदहवीं रात में गमन किया जाय, तो वह स्त्री पुत्र उत्पन्न करने वाली होती है। पन्द्रहवीं रात में गमन करने पर वह धर्मनिष्ठ कन्या को तथा सोलहवीं रात में गमन करने पर ज्ञान में पारंगत पुत्र को उत्पन्न करती है ॥ ११४-११७१/२ ॥ मैथुन के समय यदि स्त्रियों के बायें पार्श्व में वायु प्रवाहित होता हो, तो कन्या होती है और दक्षिण पार्श्व में प्रवाहित हो, तो पुत्र प्राप्त होता है। पापग्रह से रहित मैथुन-काल में स्त्रियों से सहवास करना चाहिये। ऐसे बताये गये [ शुभ ] समय में पवित्र होकर उत्तम मुसकान वाली भार्या के साथ गमन करना चाहिये ॥ ११८-११९१/२ ॥ [ हे विप्रो ! ] इस प्रकार मैंने यतियों के धर्मसंग्रह में प्रसंगपूर्वक सभी प्राणियों के सदाचार का वर्णन कर दिया । जो मनुष्य पवित्र होकर इस सदाचार को विधिपूर्वक पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा दग्ध पाप वाले ब्राह्मणों को सुनाता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करके ब्रह्मा के साथ आनन्द करता है ॥ १२०-१२२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘सदाचारकथन’ नामक नवासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८९ ॥ 1. See Also:- 1. रणाशौच तथा पिण्डदान एवं दाह-संस्कारकालिक कर्तव्य का कथन 2. गर्भस्त्राव आदि सम्बन्धी अशौच Content is available only for registered users. Please login or register Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -002 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -004 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -010 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -012 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -018 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -020 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -026 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -028 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -034 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -036 Powered by YARPP.