श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -038
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
अड़तीसवाँ अध्याय
विष्णु द्वारा महेश्वर के माहात्म्य का कथन तथा नारायण द्वारा सृष्टि का वर्णन
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अष्टत्रिंशोऽध्यायः
वैष्णवकथनं

नन्दीश्वर बोले — तदनन्तर महेश्वर महादेव के चले जाने पर ब्रह्माजी से उत्पन्न भगवान् विष्णु पद्मयोनि पितामह को उद्देश्य करके प्रणामकर उनसे कहने लगे ॥ १ ॥

श्रीविष्णु बोले —  सर्वत्र गमन का सामर्थ्य रखने वाले ये परमेश्वर ईश्वर जगन्नाथ महेश्वर शिव सम्पूर्ण जगत् के तथा हम दोनों के शरण हैं ॥ २ ॥ हे ब्रह्मन् ! मैं महात्मा शिव के वाम अंग से जायमान हूँ तथा स्वयं आप महादेव रुद्र के दाहिने अंग से उत्पन्न हुए हैं। अतएव इस विषय में सम्यक् विचारकर ऋषियों ने मुझे प्रधान तथा प्रकृति एवं आपको अव्यक्त, अज तथा पुरुष कहा है ॥ ३-४ ॥ इस प्रकार अविनाशी ईश्वर महादेव को हम दोनों का भी कारण तथा सम्पूर्ण जगत् का स्वामी कहा गया है ॥ ५ ॥

उन देवेश विष्णु का वचन सुनकर उन पद्मयोनि ब्रह्मा ने भी वर प्रदान करने वाले पूज्य महादेव को बार-बार प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति की ॥ ६ ॥ इसके अनन्तर वाराहरूप धारण कर जनार्दन विष्णु ने जल से व्याप्त भूमि को लाकर पुनः पूर्व की भाँति स्थापित किया ॥ ७ ॥

तत्पश्चात् भगवान् विष्णु ने नदियों, नदों तथा समुद्रों को पहले की भाँति कर दिया। पुनः पृथ्वी को ऊँचाई एवं निचाई से रहितकर भूधर की आकृति वाले उन भगवान् ने उस समतल धरा पर समस्त पर्वत स्थापित किये, भूलोक आदि चार लोक पूर्व की भाँति रचे ॥ ८-९ ॥ पुनः बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, प्रखर प्रतिभा वाले तथा ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान् विष्णु ने मुख्य सर्ग, तिर्यक् सर्ग (पशुसर्ग), देवसर्ग, मनुष्यसर्ग, अनुग्रहसर्ग एवं कौमारसर्ग रचने का विचार किया ॥ १०१/२

उन विष्णु ने आरम्भ में सनन्द, सनक तथा महात्माओं में श्रेष्ठ सनातन का सृजन किया, जो निष्काम ज्ञानयोग में प्रवृत्त होकर ब्रह्मस्वरूप को प्राप्त हुए ॥ १११/२

इसके बाद सबके स्वामी भगवान् विष्णु ने मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि, वसिष्ठ, संकल्प, धर्म तथा अधर्म को योगविद्या से रचा। अव्यक्तजन्मा ब्रह्मा की ये ही बारह संतानें हैं ॥ १२-१३१/२

शाश्वत विष्णु ने आरम्भ में ऋभु तथा सनत्कुमार का सृजन किया। पूर्व में उत्पन्न वे दोनों कुमार ऊर्ध्वरेता, दिव्य, ब्रह्मवादी, सर्वज्ञ, सभी प्रकार के भावों से सम्पन्न तथा ब्रह्माजी के ही सदृश थे ॥ १४-१५ ॥ हे शिलाद ! इस प्रकार मुख्य आदि सर्गों की सृष्टि करके विश्व की रचना करने वाले पद्मयोनि (विष्णु) – ने समस्त युगधर्मों को प्रतिष्ठित किया ॥ १६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘वैष्णवकथन’ नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥

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