20 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -049 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ उनचासवाँ अध्याय जम्बूद्वीप का विस्तृत वर्णन, वहाँ के कुलपर्वतों, नदियों, वनों तथा वहाँ रहने वाले लोगों का वर्णन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः जम्बूद्वीपवर्णनं सूतजी बोले — यह द्वीप एक लाख योजन विस्तृत कहा गया है। इसके समीप में स्थित प्लक्ष नामक द्वीप उसका दुगुना है और बाद वाले द्वीप क्रमशः दुगुने विस्तार वाले हैं ॥ १ ॥ समुद्रों सहित यह पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तृत है। यह सात द्वीपों से युक्त, लोकालोक पर्वत से घिरी हुई तथा [ अत्यन्त ] सुन्दर है ॥ २ ॥ हे विप्रो ! मेरु के उत्तर में नील पर्वत, उसके उत्तर में श्वेत पर्वत और पुनः उसके उत्तर में श्रृंगी पर्वत है; वे तीन वर्ष पर्वत हैं ॥ ३ ॥ इसके पूर्व में जठर तथा देवकूट पर्वत हैं। मेरु के दक्षिण में निषध पर्वत है। उसके दक्षिण में हेमकूट पर्वत कहा गया है और उसके दक्षिण में हिमवान् पर्वत है। मेरु के पश्चिम में माल्यवान् एवं गन्धमादन नामक दो पर्वत हैं; ये दोनों पर्वत उत्तर की ओर फैले हुए हैं ॥ ४-५ ॥ ये पर्वतराज सिद्धों तथा चारणों से सेवित हैं और उनके बीच में नौ हजार योजन का अन्तर है। हिमवान् का वर्ष भारतवर्ष नाम वाला कहा गया है; उसके बाद हेमकूट और उसके परे किम्पुरुष वर्ष कहा गया है। हेमकूट से परे नैषध है, उसके परे हरिवर्ष कहा गया। । हरिवर्ष और मेरु से परे शुभ इलावृत है। इलावृत से परे नील एवं रम्यक् कहे गये हैं । रम्यक् से परे श्वेत है, उसके परे हिरण्मय नामक वर्ष कहा गया है। हिरण्मय से परे श्रृंगी पर्वत है और उसके परे कुरुवर्ष कहा गया है। धनुष के आकार वाले इन दोनों वर्षों को दक्षिण तथा उत्तर में स्थित जानना चाहिये ॥ ६-१० ॥ अन्य चार बड़े वर्ष हैं। मध्य में इलावृत है । मेरु के पश्चिम-पूर्व में दो वर्ष हैं, जो छोटे कहे गये हैं । निषध के बाद वेदी का अर्धभाग उत्तर माना गया है, वेदी के अर्ध भाग में दक्षिण में तीन वर्ष और उत्तर भाग में भी तीन वर्ष माने गये हैं ॥ ११-१२ ॥ नील के दक्षिण तथा निषध के उत्तर में उन दोनों के बीच मेरु के मध्य इलावृतवर्ष को जानना चाहिये। माल्यवान् नामक महापर्वत उत्तर की ओर फैला हुआ है। यह ऊपर की ओर दो हजार योजन फैला है। इसका आयाम चौंतीस हजार योजन बताया गया है ॥ १३-१४१/२ ॥ उसके पश्चिम में गन्धमादन पर्वत को जानना चाहिये । उसे आयाम में माल्यवान् के समान विस्तृत समझना चाहिये। जम्बूद्वीप के विस्तार से चारों ओर यह पर्वत बराबर फैला है। अच्छे पर्वों वाले ये छ: वर्ष पर्वत पूर्व की ओर फैले हुए हैं और पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्रों से दोनों ओर से बँधे हुए हैं ॥ १५–१७ ॥ हिमवान् सदा बर्फ से आच्छादित रहता है। हेमकूट स्वर्णयुक्त है। निषध पर्वत मध्याह्नकालीन सूर्य के समान स्वर्णमय कहा गया है। चार वर्णों वाला वह सुवर्णमय मेरु पर्वत ऊपर की ओर फैला हुआ बताया गया है। यह परिधि में वृत्ताकार है और चौकोर ऊँचा उठा हुआ है I नील पर्वत वैडूर्यमय है। श्वेत पर्वत शुक्लवर्ण वाला है एवं स्वर्ण से पूर्ण रहता है। तीन चोटियों वाला शृंगी पर्वत सुवर्णमय तथा मोर के पंख के रंग का है ॥ १८-२० ॥ इस प्रकार पर्वतों का वर्णन कर दिया गया, अब श्रेष्ठ पर्वतों के विषय में सुनिये। मन्दर तथा देवकूट पर्वत पूर्व दिशा में है । कैलास एवं स्वर्णमय गन्धमादन – ये दोनों पर्वत पूर्व की ओर फैले हुए हैं और उनका अन्त समुद्र के भीतर होता है । निषध तथा पारियात्र – ये दोनों श्रेष्ठ पर्वत पश्चिम से पूर्व तथा दक्षिण में स्थित हैं। त्रिभृंग एवं जारुचि – ये दोनों महापर्वत उत्तर में हैं तथा पूर्व की ओर फैले हैं और समुद्र के भीतर व्यवस्थित हैं। विद्वान् लोग इन आठों पर्वतों को मर्यादापर्वत कहते हैं ॥ २१–२४१/२ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो ! मेरु नामक जो पर्वत है, वह ऊँचा स्वर्णमय पर्वत है। उसके चार चरणों के रूप में उसके चारों दिशाओं में बड़े-बड़े चार उत्तम पर्वत हैं, जिनसे सहारा प्राप्त की हुई सात द्वीप वाली पृथ्वी हिलती नहीं है। उनका आयाम दस हजार योजन कहा गया है ॥ २५-२६१/२ ॥ पूर्व में मन्दर, दक्षिण में गन्धमादन, पश्चिम भाग में विपुल और उत्तर में सुपार्श्व नामक पर्वत कहा गया । इन पर चार विशाल वृक्ष उगे हुए हैं, जो द्वीप के पताका तुल्य प्रतीत होते हैं । मन्दर पर्वत की चोटी पर कदम्ब का विशाल वृक्ष है। वह पताकाओं का राजा है और वह लम्बी लटकती हुई शाखाओं वाला है। यह कदम्बवृक्ष चैत्यपादप ( पवित्र स्थान में लगे वृक्ष)-के रूप में प्रतिष्ठित है ॥ २७–२९ ॥ दक्षिण में स्थित [गन्धमादन] पर्वत के शिखर पर सदा देवताओं से सेवित पवित्र फलों से सम्पन्न तथा पुष्पों से सुशोभित जम्बूवृक्ष है । यह जम्बूवृक्ष दक्षिण द्वीप में पताका के रूप में है और सभी लोकों में प्रसिद्ध है ॥ ३०१/२ ॥ पश्चिम में महात्मा विपुल पर्वत की चोटी पर पीपल का महान् वृक्ष उगा हुआ है, वह भी चैत्यपादप (पवित्र वृक्ष) – के रूप में प्रतिष्ठित है । उत्तर में सुपार्श्व पर्वत के शिखर पर विशाल बरगद का वृक्ष उगा हुआ है, जो मोटे स्कन्ध वाला तथा अनेक योजन परिधि वाला है ॥ ३१-३२१/२ ॥ अब मैं चारों महापर्वतों के चार देवक्रीड़ा-स्थानों का वर्णन करूँगा; जो मनुष्यों से रहित, रम्य, सभी काल तथा ऋतुओं में रहने वाले एवं मनोहर हैं। वहाँ चारों दिशाओं में वन हैं। उनके नाम सुनिये। पूर्व में चैत्ररथ नामक वन, दक्षिण में गन्धमादन, पश्चिम में वैभ्राज और उत्तर में सविता (शिव) के [ नन्दन नामक ] वन को जानना चाहिये। पूर्व में मित्रेश्वर, उसके बाद [दक्षिण में] षष्ठेश्वर, पश्चिम में वर्येश्वर और उत्तर में आम्रकेश्वर [शिवक्षेत्र] हैं ॥ ३३–३६१/२ ॥ हे मुनिवरो ! वहाँ चार बड़े सरोवर हैं, जहाँ पर्वतों तथा वनों में मुनिगण क्रीड़ा करते हैं । पूर्व में अरुणोदसर, दक्षिण में मानससर, पश्चिम में सितोदसर और उत्तर में महाभद्रसर बताया गया है। दक्षिण में शाख का क्षेत्र, पश्चिम में विशाख का क्षेत्र, उत्तर में नैगमेय का क्षेत्र और पूर्व में कुमार का क्षेत्र है ॥ ३७–३९१/२ ॥ अरुणोदसर के पूर्व में महापर्वत बताये गये हैं। मैं संक्षेप में नामों से उनका वर्णन करूँगा; विस्तारपूर्वक उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। सितान्त, कुरण्ड, पर्वतश्रेष्ठ कुरर, विकर, मणिशैल पर्वतश्रेष्ठ वृक्षवान्, महानील, रुचक, सबिन्दु, दर्दुर, वेणुमान्, समेघ, निषध, देवपर्वत — ये महापर्वत हैं; इसी प्रकार अन्य भी पर्वत हैं। मन्दर के पूर्व में ये पर्वत सिद्धों के निवासस्थान कहे गये हैं। उन-उन पर्वतों पर, गुफाओं में तथा वनों में रुद्र एवं नारायण विष्णु के दिव्य क्षेत्र हैं ॥ ४०-४४१/२ ॥ यहाँ मानससर के दक्षिण में जो महान् पर्वत कहे जाते हैं, अब मैं संक्षेप में उन सबका वर्णन करता हूँ । शैल, विशिर, पर्वतों में उत्तम शिखर, एकशृंग, महाशूल, गजशैल, पिशाचक, पंचशैल, कैलास, पर्वतश्रेष्ठ हिमवान् ये सब देवताओं के द्वारा सेवित, उत्कट तथा उत्तम पर्वत हैं। उन उन सभी पर्वतों पर और वनों में श्रेष्ठ देवताओं के द्वारा दिव्य रुद्रक्षेत्र स्थापित किये गये हैं। इस प्रकार दक्षिण दिशा में स्थित पर्वतों को बता दिया गया, अब मैं आप लोगों को पश्चिम में विद्यमान पर्वतों को बताता हूँ ॥ ४५–४९ ॥ सितोद के पश्चिम में सुरप, महाबल, कुमुद, मधुमान्, अंजन, मुकुट, कृष्ण, पाण्डुर, सहस्रशिखर, शैलेन्द्र, पारिजात और पर्वतों में उत्तम श्रीश्रृंग हैं। ये सभी उत्कट तथा उत्तम पर्वत पश्चिम दिशा में हैं, जो देवताओं के द्वारा सेवित हैं और रुद्रक्षेत्रों से युक्त हैं ॥ ५०-५२ ॥ महाभद्रसर के उत्तर में जो शक्तिशाली पर्वत स्थित हैं, मैं उनका संक्षेप में वर्णन करता हूँ, आपलोग सुनिये । शंखकूट, महाशैल, वृषभ, हंसपर्वत, नाग, कपिल, इन्द्रशैल, सानुमान्, नील, कण्टकशृंग, पर्वत शतश्रृंग, पुष्पकोश, प्रशैल, पर्वतश्रेष्ठ विरज, वराहपर्वत, पर्वतश्रेष्ठ मयूर तथा शैलराज जारुधि – ये सब उत्तर में स्थित हैं । उन दिव्य पर्वतों पर देवदेव शिव के असंख्य दिव्य विमान हैं ॥ ५३-५७ ॥ इन प्रमुख पर्वतों के भीतर झरने, सरोवर तथा उपवन यथाक्रम स्थित हैं । यहाँ परमेष्ठी शिव की कृपा से देवता, मुनि एवं सिद्ध शिवभक्ति से युक्त होकर अपने निवासस्थान बनाकर पत्नियों के साथ रहते हैं । लक्ष्मी आदि का निवास बिल्ववन में है। कश्यप आदि ककुभ वन में रहते हैं । इन्द्र, उपेन्द्र तथा श्रेष्ठ सर्पों का निवास तालवन में कहा गया है। कर्दम और अन्य महात्माओं का निवास उदुम्बरवन में, विद्याधरों तथा सिद्धों का निवास पवित्र एवं सुन्दर आम्रवन में और नागों तथा सिद्धगणों का निवास निम्बवन में है। सूर्य तथा रुद्रगणों का निवास किंशुकवन में है। देवताओं के आचार्य पुण्यमय बीजपूरवन (बिजौरा नीबू का वन) में निवास करते हैं। विष्णु आदि महात्माओं का वास कौमुद वन में है ॥ ५८-६३ ॥ सर्पगण स्थलपद्मवन के अन्दर स्थित न्यग्रोधवन में रहते हैं और जो सम्पूर्ण जगत् के पति गर्वित शेषनाग हैं, वे पातालमें रहते हैं; वे ही समस्त लोकों के काल हैं। वे विश्वगुरु विष्णु की दिव्य मूर्ति हैं, साक्षात् हलायुध हैं, देवदेव विष्णु की शय्या हैं और प्रभु शिव के कंकण (कंगन)-स्वरूप हैं ॥ ६४-६५१/२ ॥ दानव आदि शुक्राचार्य के साथ कटहल के वृक्षों के वन में और सभी उरग किन्नरों के साथ विशाखवन (नारिकेलवन) – में रहते हैं । विविध प्रकार की जातियों वाले वृक्ष उस मनोहर वन में हैं । नन्दीश्वर भी श्रेष्ठ गणों के द्वारा स्तुत होते हुए वहाँ विराजमान हैं। सन्तानक (कल्पवृक्ष) क्षेत्र के मध्य में साक्षात् सरस्वती देवी रहती हैं ॥ ६६-६८ ॥ [हे विप्रो ! ] इस प्रकार मैंने इन वनों में निवास करने वाले लोगों का संक्षेप में वर्णन किया; ये असंख्य हैं, विस्तारपूर्वक इनका वर्णन करने में मैं समर्थ नहीं हूँ ॥ ६९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘जम्बूद्वीपवर्णन’ नामक उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४९ ॥ Content is available only for registered users. 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