16 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -031 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ इकतीसवाँ अध्याय देवदारुवन निवासी मुनिगणों द्वारा शिवाराधना श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकत्रिंशोऽध्यायः मुनिकृतं शिवस्तोत्रवर्णनं सनत्कुमार बोले — हे प्रभो ! देवदारुवन के निवासी [ तपस्वीगण] भगवान् शिव के अनुग्रह से किस प्रकार उन महादेव के शरण को प्राप्त हुए ? कृपा करके मुझे बतायें ॥ १ ॥ शैलादि बोले — स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा ने देवदारुवन में निवास करने वाले तथा अपनी तपस्या से अग्नितुल्य प्रभा वाले उन महाभाग मुनियों से कहा ॥ २ ॥ पितामह बोले — इन भगवान् महादेव महेश्वर को अवश्य जानना चाहिये; क्योंकि उनसे बढ़कर कोई भी ऐसा पद नहीं है, जो प्राप्त करने योग्य हो ॥ ३ ॥ वे ही समस्त देवताओं, ऋषियों तथा पितरों के प्रभु हैं। हजार युगों के अन्त में प्रलयकाल आने पर वे ही भगवान् शिव काल बनकर सभी देहधारियों का संहार करते हैं और एकमात्र ये भगवान् शिव ही अपने तेज से सभी प्रजाओं का सृजन करते हैं ॥ ४-५ ॥ अपने वक्ष:स्थल पर ‘श्री’ चिह्न धारण करने वाले चक्रधारी विष्णु तथा व्रजधारी इन्द्र आदि के रूप में ये शिव ही विराजमान हैं। ये सत्ययुग में योगी, त्रेता यज्ञस्वरूप, द्वापर में कालाग्नि एवं कलियुग में धर्मकेतु नाम से कहे जाते हैं। भगवान् रुद्र की ये ही मूर्तियाँ हैं, जिनका पण्डितजन ध्यान करते हैं ॥ ६-७ ॥ बाहर से चौकोर एवं भीतर से अष्टकोण वाले पिण्डिका-स्थान में वृत्ताकार, दर्शनीय तथा श्रेष्ठ लिङ्ग की विधिवत् तमोगुणरूप अग्नि, रजोगुणरूप ब्रह्मा तथा प्रकाश पूजा करनी चाहिये ॥ ८ ॥ सत्त्वगुणरूप विष्णु आदि की मूर्तियाँ एकमात्र इन्हीं शिव की मूर्ति में स्थित कही जाती हैं ॥ ९ ॥ जीव के भीतर समाधियोग से स्थित जो शिवरूप है, वही ब्रह्म है। अतएव क्रोध को जीत लेने वाले तथा इन्द्रियों को वश में रखने वाले उत्तम विप्रगण विधान के अनुसार सभी लक्षणों से युक्त लिङ्ग बनाकर अविनाशी, देवाधिदेव, ईशान एवं सबके स्वामी शिव की आराधना करते हैं ॥ १०-११ ॥ वह लिङ्ग अंगुष्ठ परिमाण के बराबर, अत्यन्त सुन्दर, वर्तुलाकार तथा शास्त्रसम्मत हो । उसका मण्डल समान नाभि वाला, अष्ट अथवा षोडश कोणों वाला पूर्णतः गोलाकार तथा दिव्य होना चाहिये; वह सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाला होता है ॥ १२१/२ ॥ लिङ्ग की वेदिका उसकी दुगुनी, समान तथा शास्त्रसम्मत हो। गोमुखी को उसकी एक तिहाई एवं समस्त लक्षणों से युक्त जानना चाहिये । हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उसके चारों ओर जौ के परिमाण के बराबर पट्टिका होनी चाहिये। वेदिका का विस्तार चारों ओर तिगुना, वर्तुलाकार, त्रिकोण, चौकोर अथवा षट्कोण होना चाहिये। सोने का, चाँदी का, ताँबे का अथवा पाषाण का लिङ्ग बनाना चाहिये । हे द्विजो ! इस प्रकार सभी ओर से छिद्र आदि से रहित, सुन्दर तथा सभी लक्षणों से युक्त लिङ्ग को विधिपूर्वक प्रतिष्ठित करके उसकी वेदी के मध्य में पूजा लक्षणों से समन्वित, स्वर्ण सहित, पंचाक्षरमन्त्र एवं सद्योजात आदि पाँच मन्त्रों से अभिमन्त्रित कलश की स्थापना करनी चाहिये। तत्पश्चात् उन्हीं पाँच शुभ तथा पवित्र मन्त्रों से लिङ्ग का अभिषेक करना चाहिये एवं यथोपलब्ध उपचारों से पूजन करना चाहिये। ऐसा करने से तुम लोग सिद्धि प्राप्त कर लोगे । [ हे मुनियो !] तुम लोग अपने पुत्रों तथा बन्धु-बान्धवों सहित एकाग्रचित्त होकर महादेवजी का पूजन करो और हाथ जोड़कर शूलपाणि की शरण में जाओ। तत्पश्चात् तुम लोग असंयत आत्मा वाले लोगों के लिये दुर्लभ दर्शन वाले देवेश शिव का दर्शन प्राप्त कर सकोगे; जिन्हें देखते ही समस्त अज्ञान तथा अधर्म नष्ट हो जाता है ॥ १३-२०१/२ ॥ तत्पश्चात् अमित तेज वाले ब्रह्माजी की प्रदक्षिणा करके वे वनवासी मुनि देवदारु वन के लिये प्रस्थित हुए और जैसा ब्रह्माजी ने कहा था, तदनुसार वे महादेव की आराधना करने लगे ॥ २१-२२ ॥ कुछ मुनि विचित्र प्रकार के स्थण्डिलों पर, पर्वतों की गुफाओं में, नदियों के पवित्र तथा एकान्त तटों पर, कुछ मुनि शैवाल पर विराजमान होकर, कुछ मुनि जल के भीतर बैठकर, कोई दर्भ-शय्या बिछाकर, कोई अपने, पैर के अँगूठे के अग्रभाग पर स्थित होकर, कोई दाँतों को ही उलूखल बनाकर उनसे पिसे अन्न को खाकर, कुछ पाषाण पर पिसे अन्न को ही खाकर, कुछ वीरासन में बैठकर, कुछ मृगचर्यापरायण होकर — इस प्रकार तपस्या तथा पूजन के द्वारा उन महाबुद्धिमान् मुनियों ने समय व्यतीत किया ॥ २३–२५१/२ ॥ इस प्रकार उन मुनियों को तप करते हुए एक वर्ष पूर्ण होने पर वसन्त ऋतु आने पर परमेश्वर शिव अपनी दया से उन भक्तों पर अनुग्रह करने के निमित्त कृतयुग में हिमालय के उस पर्वत पर स्थित देवदारुवन में प्रसन्नतापूर्वक आये ॥ २६-२७१/२ ॥ उस समय वे भस्म-धूलि से भूषित शरीर वाले, दिगम्बर वेश वाले, विकृत स्वरूप वाले, उल्मुक (जलता हुआ काष्ठ) धारण किये हुए, व्यग्रहस्त वाले तथा रक्त-पिंगल नेत्रों वाले थे। वे कभी रौद्ररूप में हँसते थे, कभी विस्मित होकर गाते थे, कभी शृङ्गार नृत्य करते थे तथा कभी रोते थे — इस रूप में वे आश्रमों में बार-बार भिक्षा माँगते हुए इधर-उधर घूमने-फिरने लगे। इस प्रकार की माया रचकर महादेवजी उस वन में आये हुए थे ॥ २८-३०१/२ ॥ तदनन्तर वे सभी महाभाग मुनिगण अपनी स्त्रियों, पुत्रों तथा बन्धु-बान्धवों सहित शुद्ध जल, विविध पुष्प-मालाओं, धूप, गन्ध आदि उपचारों से महादेवजी का एकाग्रचित्त होकर पूजन करके उनकी स्तुति करने लगे ॥ ३१-३२ ॥ पुनः वे सभी मुनि मधुर वाणी में भगवान् शिव से बोले — हे देवदेवेश ! हम लोगों ने मन, वचन तथा कर्म से जो भी आपके प्रति किया है, वह सब अज्ञानतावश किया है; अतएव आप सभी अपराधों को क्षमा कीजिये ॥ ३३१/२ ॥ हे हर ! आपके चरित्र अत्यन्त अद्भुत, गूढ़ तथा कठिन हैं । वे चरित्र ब्रह्मा आदि देवताओं के लिये भी दुर्ज्ञेय हैं ॥ ३४१/२ ॥ ब्रह्मादीनां च देवानां दुर्विज्ञेयानि ते हर । अगतिं ते न जानीमो गतिं नैव च नैव च ॥ ३५ ॥ विश्वेश्वर महादेव योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते । स्तुवन्ति त्वां महात्मानो देवदेवं महेश्वरम् ॥ ३६ ॥ नमो भवाय भव्याय भावनायोद्भवाय च । अनन्तबलवीर्याय भूतानां पतये नमः ॥ ३७ ॥ संहर्त्रे च पिशङ्गाय अव्ययाय व्ययाय च । गङ्गासलिलधाराय आधाराय गुणात्मने ॥ ३८ ॥ त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय त्रिशूलवरधारिणे । कन्दर्पाय हुताशाय नमोऽस्तु परमात्मने ॥ ३९ ॥ शङ्कराय वृषाङ्काय गणानां पतये नमः । दण्डहस्ताय कालाय पाशहस्ताय वै नमः ॥ ४० ॥ वेदमन्त्रप्रधानाय शतजिह्वाय वै नमः । भूतं भव्यं भविष्यं च स्थावरं जङ्गमं च यत् ॥ ४१ ॥ तव देहात्समुत्पन्नं देव सर्वमिदं जगत् । पासि हंसि च भद्रं ते प्रसीद भगवंस्ततः ॥ ४२ ॥ अज्ञानाद्यदि विज्ञानाद्यत्किञ्चित् कुरुते नरः । तत्सर्वं भगवानेव कुरुते योगमायया ॥ ४३ ॥ हम आपकी अगति तथा गति कुछ भी नहीं जानते हैं और जान पाना सम्भव भी नहीं है। हे विश्वेश्वर! हे महादेव! आप जो कोई भी हों, आपको नमस्कार है। हम मुनिगण आप देवदेव महेश्वर की स्तुति करते हैं ॥ ३५-३६ ॥ भव, भव्य, भावन तथा उद्भव को नमस्कार है। अनन्त बल एवं वीर्य वाले और भूतों के पति को नमस्कार है ॥ ३७ ॥ जगत् के संहारकर्ता, पिशंग वर्ण वाले, अव्यय, व्यय, गंगाजल की धारा धारण करने वाले, जगत् के आधार, गुणात्मा, त्र्यम्बक, त्रिनेत्र, उत्तम त्रिशूल धारण करने वाले, कन्दर्पस्वरूप तथा अग्निरूप परमात्मा शिव को नमस्कार है ॥ ३८-३९ ॥ हाथ में दण्ड तथा पाश धारण करने वाले, कालरूप, गणों के पति एवं वृषभध्वज शंकर को नमस्कार है ॥ ४० ॥ वेदमन्त्रों में प्रधान रूप से निरूपित तथा शत जिह्वा वाले आप शिव को नमस्कार है । हे देव ! भूत, भविष्य तथा वर्तमान जो कुछ भी है एवं स्थावर जंगममय यह सम्पूर्ण जगत् आपकी ही देह से उत्पन्न हुआ है । आप ही जगत् का पालन तथा संहार करते हैं । अतएव हे भगवन्! आपका मंगल हो और आप हम पर प्रसन्न हों । ज्ञान अथवा अज्ञान में मनुष्य जो कुछ भी करता है, वह सब स्वयं आप परमेश्वर ही अपनी योगमाया से सम्पन्न करते हैं ॥ ४१-४३ ॥ इस प्रकार तपस्या से युक्त वे मुनिगण पुलकित अन्तरात्मा से शिवजी का स्तवन करके उनसे याचना करने लगे कि हे भगवन्! हम लोगों ने आपको पहले जिस रूप में देखा था, उसी रूप में आपका दर्शन करना चाहते हैं ॥ ४४ ॥ तब उनकी स्तुति से प्रसन्न मन वाले प्रभु शिव ने अपना त्रिनेत्र – रूप दिखाने के लिये उन्हें दिव्य-दृष्टि प्रदान की ॥ ४५ ॥ देवदारुवन में निवास करने वाले उन मुनियों ने उस प्राप्त दिव्य दृष्टि से तीन नेत्र वाले देवाधिदेव शिव का दर्शन करके पुनः उनकी स्तुति की ॥ ४६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘मुनिकृतशिवस्तोत्रवर्णन’ नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥ Content is available only for registered users. 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