24 December 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -007 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ सातवाँ अध्याय माहेश्वर योग का प्रतिपादन, अट्ठाईस व्यासों तथा चौदह मनुओं की नामावली, विभिन्न युगों में हुए माहेश्वर योगावतारों का वर्णन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सप्तमोऽध्यायः मनुव्यासयोगेश्वरतच्छिष्यकथनं सूतजी बोले — [ हे मुनीश्वरो ! ] अब मैं संक्षेप में अमित तेजवाले, सर्वतत्त्वदर्शी भगवान् शंकर के रहस्य तथा श्रेष्ठ प्रभाव का वर्णन करूँगा ॥ १ ॥ सभी तत्त्वों को जानने वाले, परम वैराग्य को प्राप्त, प्राणायाम आदि योग के आठ साधनों से युक्त तथा करुणा आदि गुणों से सम्पन्न बड़े-बड़े योगिजन नानाविध कर्म करके भी अपने कर्मानुसार नरक तथा स्वर्ग में जाते हैं ॥ २-३ ॥ भगवान् शंकर की अनुकम्पा से ज्ञान उत्पन्न होता है, ज्ञान से योग में प्रवृत्ति होती है और योग से मुक्ति की प्राप्ति होती है। इस प्रकार उन्हीं शिवजी की कृपा से सब कुछ सिद्ध होता है ॥ ४ ॥ ऋषिगण बोले — हे योगवेत्ताओं में श्रेष्ठ सूतजी ! शिवजी की कृपा से ही यदि विशिष्ट ज्ञान तथा योग होता है, तो उस ज्ञानस्वरूप दिव्य माहेश्वरयोग का आप वर्णन कीजिये ॥ ५ ॥ विभुतासम्पन्न तथा चिन्तारहित भगवान् शिव योगमार्ग के द्वारा किस प्रकार तथा किस काल में प्राणियों के ऊपर अनुग्रह करते हैं ? ॥ ६ ॥ सूतजी बोले — प्राचीनकाल में देवताओं, ऋषियों तथा पितरों की सन्निधि में शिलादपुत्र नन्दी के द्वारा ब्रह्मा-पुत्र सनत्कुमार से जिस योग के विषय में कहा गया था, उसे आपलोग सुनें ॥ ७ ॥ हे सुव्रत ऋषियो ! द्वापर के अन्त में व्यास के अवतार, योगाचार्यों के अवतार तथा कलियुग में शिवजी के अवतार, प्रभु के पवित्र अन्तःकरणवाले चार शिष्य और बहुत से प्रशिष्य हुए — वे सब महेश्वर की कृपा से ही योग में प्रवृत्त हुए ॥ ८-९ ॥ इस प्रकार वह ज्ञान क्रमशः शिष्य- परम्परा के माध्यम से ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों को भगवान् शिव की कृपा से उनके मुख से प्राप्त हुआ ॥ १० ॥ ऋषिगण बोले — प्रत्येक द्वापर में, किन-किन कल्पों में तथा किन मन्वन्तरों में कौन-कौन व्यास हुए हैं? आप उनके विषय में हमलोगों को बताइये ॥ ११ ॥ सूतजी बोले — हे द्विजो ! वर्तमान वाराह कल्प तथा वैवस्वत मन्वन्तर में एवं अन्य मन्वन्तरों में भी जो व्यास तथा रुद्र हुए हैं, उन सभी ज्ञानप्रदर्शक महात्माओं के विषय में वेदों तथा पुराणों के अनुसार मैं यथाक्रम कहता हूँ; आपलोग सुनिये ॥ १२-१३ ॥ द्विजो ! क्रतु, सत्य, भार्गव, अंगिरा, सविता, मृत्यु, बुद्धिसम्पन्न शतक्रतु, मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ, सारस्वत, त्रिधामा, मुनिवर त्रिवृत, शततेजा, साक्षात् धर्मस्वरूप नारायण, तरक्षु, बुद्धियुक्त अरुणि, देव, कृतंजय, ऋतंजय, भरद्वाज, कविश्रेष्ठ गौतम, साक्षात् मुनिस्वरूप वाचः श्रवा, परम पावन शुष्मायणि, मुनि तृणबिन्दु, रुक्ष, शक्ति, शक्तिपुत्र पराशर, जातूकर्ण्य तथा साक्षात् विष्णुस्वरूप मुनि कृष्णद्वैपायन — ये अट्ठाईस व्यास हुए। इसी प्रकार कलियुग में क्रम से जो योगेश्वर हुए, कल्पों में तथा सभी मन्वन्तरों में महेश्वर के जो असंख्य अवतार हुए, कलि में विशेष महिमा के कारण रुद्रों तथा व्यासों के जो अवतार हुए एवं श्वेतवाराह कल्प के वैवस्वत मन्वन्तर में तथा अन्य मन्वन्तरों में जो अवतार हुए — उन सभी के विषय में मैं आप लोगों को बताऊँगा; आप सब सुनें ॥ १४–२० ॥ ऋषिगण बोले — [ हे सूतजी ! ] सर्वप्रथम आप वाराह कल्प तथा अन्य कल्पों के मन्वन्तरों का वर्णन कीजिये । तत्पश्चात् वैवस्वत मन्वन्तर में हो चुके सिद्धों के विषय में बताइये ॥ २१ ॥ सूतजी बोले — हे द्विजो ! आदिमनु स्वायम्भुव मनु हैं, उनके बाद स्वारोचिष मनु हुए। इसी प्रकार क्रम से उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, धर्म, सावर्णिक, पिशंग, अपिशंगाभ, शबल तथा वर्णक — ये अकार से लेकर औकारपर्यन्त चौदह स्वरों के रूपवाले चौदह मनु कहे गये हैं । हे उत्तम ब्राह्मणो ! श्वेत, पाण्डु, रक्त, ताम्र, पीत, कापिल, कृष्ण, श्याम, धूम्र, सुधूम्र, अपिशंग, पिशंग, त्रिवर्ण शबल तथा कालन्धुर — ये चौदह वर्ण (रंग) उन पवित्र मनुओं के कहे गये हैं । इस प्रकार वे चौदह मनु स्वायम्भुव आदि नामों से, अकार आदि वर्णों से तथा श्वेत आदि वर्णों (रंगों ) – से अभिहित किये गये हैं ॥ २२-२६ ॥ सभी मन्वन्तराधिपति संक्षेप में स्वरात्मक कहे गये हैं। ये वर्तमान सुरेश्वर वैवस्वत मनु ऋकाररूप, कृष्णवर्ण तथा क्रम में सातवें हैं । बीते हुए तथा अनागत कल्पों में युग के आवर्तनों पर आने वाले योगिरूप उस वैवस्वत मनु के बारे में मैं बताता हूँ ॥ २७-२८ ॥ वर्तमान कल्प को श्वेतवाराह कल्प जानना चाहिये । अब मैं इस कल्प के सातवें वैवस्वत मन्वन्तर में महेश्वर के योगावतारों तथा शिष्यों-प्रशिष्यों का वर्णन करता हूँ ॥ २९ ॥ सभी कालों में तथा युगावर्तनों में योगावतारों को भलीभाँति समझकर उन्हें बताता हूँ। आदि कलि अर्थात् स्वायम्भुव मनु के प्रथम कलि में रुद्र का ‘श्वेत’ नामक अवतार हुआ; इसके बाद हे श्रेष्ठ मुनियो ! क्रम से सुतार, मदन, सुहोत्र, कंकण, लोगाक्ष, जैगीषव्य, महातेजस्वी भगवान् दधिवाहन, ऋषभ, मुनि, मेधासम्पन्न उग्र, अत्रि, सुबालक, सभी देवोंके वन्दनीय भगवान् गौतम, वेदशीर्ष, गोकर्ण, गुहावासी, शिखण्डभृत्, जटामाली, अट्टहास, दारुक, लांगली, महाकायमुनि, शूली, दण्डधारी मुण्डीश्वर, सहिष्णु, सोमशर्मा तथा जगद्गुरु नकुली — ये अट्ठाईस योगाचार्य अवतरित हुए ॥ ३०–३४ ॥ हे सुव्रतो! सभी युगावर्तों में महेश्वर के जो योगाचार्यावतार हुए हैं, वे वैवस्वत मन्वन्तर में भी भलीभाँति कहे गये हैं । हे श्रेष्ठ मुनियो ! इस प्रकार प्रत्येक द्वापर में ये व्यास भी हुए हैं। उन योगेश्वरों में सभी के चार-चार शिष्य हुए, जो काम-क्रोधादि विकारों से रहित थे ॥ ३५-३६ ॥ श्वेत, श्वेतशिखण्डी, श्वेताश्व, श्वेतलोहित, दुन्दुभि, शतरूप, ऋचीक, केतुमान्, विशोक, विकेश, विपाश, पापनाशन, सुमुख, दुर्मुख, दुर्दम, दुरतिक्रम, सनक, सनन्द, दिव्यशक्तिसम्पन्न सनातन, ऋभु, सनत्कुमार, सुधामा, विरजा, शंखपा, द्वैरज, मेघ, सारस्वत, मुनिवर सुवाहन, महातेजस्वी मेघवाह, कपिल, आसुरि, मुनि पंचशिख तथा महायोगी वाल्कल — ये सभी धर्मात्मा तथा महान् ओजस्वी शिष्य हुए। इसी क्रम में पुनः पराशर, गर्ग, भार्गव, अंगिरा, बलबन्धु निरामित्र, केतुभृंग, तपोधन, लम्बोदर, लम्ब, लम्बाक्ष, लम्बकेशक, सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य, सर्व, सुधामा, काश्यप, वासिष्ठ, विरजा, अत्रि, देवसद, श्रवण, श्रविष्ठक, कुणि, कुणिबाहु, कुशरीर, कुनेत्रक, कश्यप, उशना, च्यवन, बृहस्पति, उतथ्य, वामदेव, महायोग, महाबल, वाचः श्रवा, सुधीक, श्यावाश्व, यतीश्वर, हिरण्यनाभ, कौशल्य, लोगाक्षि, थुम, सुमन्तु, विद्वान् बर्बरी, कबन्ध, कुशिकन्धर, प्लक्ष, दाल्भ्यायणि, केतुमान्, गोपन, भल्लावी, मधुपिंग, श्वेतकेतु, तपोनिधि, उशिक, बृहदश्व, देवल, कवि, शालिहोत्र, अग्निवेश, युवनाश्व, शरद्वसु, छगल, कुण्डकर्ण, कुम्भ, प्रवाहक, उलूक, विद्युत्, मण्डूक, आश्वलायन, अक्षपाद, कुमार, उलूक, वत्स, कुशिक, गर्भ, मित्र तथा कौरुष्य नामवाले शिष्य भी हुए। सभी युगावर्तों में योगाचार्यों के ये महात्मा शिष्य कहे गये हैं । ये सब विमल आत्मा वाले, सिद्ध, ब्रह्मनिष्ठ, ज्ञान तथा योग में निरत रहने वाले भस्म – विभूषित शरीर वाले तथा शैवी दीक्षा से सम्पन्न हैं ॥ ३७-५२ ॥ इनके भी सैकड़ों-हजारों शिष्य तथा प्रशिष्य पाशुपत योग प्राप्तकर शिवलोक के अधिकारी हुए ॥ ५३ ॥ देवता से लेकर पिशाचपर्यन्त सभी प्राणी पशु कहे गये हैं, उनका पति अर्थात् स्वामी होने के कारण सर्वेश्वर शिव को पशुपति कहा जाता ॥ ५४ ॥ हे द्विजो ! सभी को परम ऐश्वर्य की प्राप्ति कराने हेतु उन पशुपति रुद्र के द्वारा प्रवर्तित योग ‘पाशुपतयोग’ के नाम से जाना जाता है ॥ ५५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘मनुव्यासयोगेश्वरतच्छिष्यकथन’ नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥ Content is available only for registered users. 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