16 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -035 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ पैंतीसवाँ अध्याय महर्षि दधीच एवं राजा क्षुप की कथा तथा महामृत्युंजय मन्त्र की स्वरूपमीमांसा श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः क्षुपाभिधनृपपराभववर्णनं सनत्कुमार बोले — हे सुव्रत ! मुनि दधीच ने समर में देवदेव नारायण को जीतकर राजा क्षुप के ऊपर अपने पैर से प्रहार क्यों किया ? और उन महातपस्वी ने महादेवजी से अपनी हड्डियाँ वज्रतुल्य होने का वरदान किस प्रकार प्राप्त किया और हे नन्दीश्वर ! जिस प्रकार आपने मृत्यु पर विजय प्राप्त की, वह भी आप कृपा करके बताइये ॥ १-२ ॥ नन्दी कहते हैं — ब्रह्माजी के पुत्र महान् तेज वाले क्षुप नामक एक राजा हुए हैं। उन लोकपति क्षुप की मुनीश्वर दधीच से मित्रता थी ॥ ३ ॥ कालान्तर में उन क्षुप तथा दधीच के मध्य किसी बात के सन्दर्भ में विवाद हो गया। क्षुप का कथन था कि. क्षत्रिय श्रेष्ठ होता है और दधीच का कथन था कि ब्राह्मण ही श्रेष्ठ होता है ॥ ४ ॥ राजा आठ लोकपालों का विग्रहस्वरूप होता है। इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, चन्द्र, कुबेर तथा ईश्वर मैं ही हूँ; इसमें कोई सन्देह नहीं है, अत: तुम्हें मेरी अवज्ञा नहीं करनी चाहिये ॥ ५-६ ॥ सुव्रत ! वह राजा महान् देवता होता है । अत: है च्यवनपुत्र ! हे महाभाग ! तुम्हें मेरा अपमान कभी नहीं करना चाहिये, अपितु सर्वथा मेरी पूजा करनी चाहिये ॥ ७१/२ ॥ उन क्षुप का वह वचन सुनकर च्यवनपुत्र मुनिश्रेष्ठ द्विज दधीच ने आत्मगौरव से प्रेरित होकर अपने बाँयें हाथ से क्षुप के सिर पर तेज मुष्टिका-प्रहार किया ॥ ८१/२ ॥ बलशाली क्षुप ने भी वज्र से उन दधीच पर प्रहार- किया । पूर्वकाल में राजा क्षुप ब्रह्मलोक में ब्रह्माजी की छींक से उत्पन्न हुए थे। भगवान् की प्रेरणा से असुरों के पराजयरूप कार्य के निमित्त इन्द्र से उन्होंने वज्र प्राप्त किया था ॥ ९-१० ॥ अपनी इच्छा से ही नर होकर वे राजा बने थे । श्रीयुक्त, बलवान् तथा तमोगुणयुक्त इन्द्र की भाँति राजा क्षुप भी बलशाली थे, इसीलिये वे विप्रेन्द्र दधीच को जीतने में समर्थ हो गये ॥ १११/२ ॥ राजा क्षुप के वज्र-प्रहार से निहत द्विजश्रेष्ठ दधीच भूमि पर गिर पड़े। फिर अत्यन्त दुःखी होकर उन्होंने भृगु-पुत्र मुनि शुक्राचार्य का स्मरण किया ॥ १२१/२ ॥ देहधारियों में श्रेष्ठ शुक्राचार्य ने भी वहाँ पहुँचकर दधीचमुनि के वज्र-ताड़ित शरीर को अपने योगबल से यथावत् जोड़ दिया ॥ १३१/२ ॥ दधीच के शरीर को पूर्व की भाँति ठीककर भार्गव शुक्राचार्य ने कहा — हे महाभाग दधीच! हे विप्रवर ! ब्रह्मा आदि देवताओं से पूजित निरंजन देवाधिदेव उमापति शिव की सम्यक् पूजा करके उन त्र्यम्बक महादेव के अनुग्रह से अवध्य हो जाओ ॥ १४-१५१/२ ॥ हे द्विज! उन्हीं महादेवजी से मैंने भी मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की है। शिवजी के भक्तों को मृत्यु से किसी प्रकार का भय नहीं होता है। उसी शैवी मृतसंजीवनी विद्या को अब मैं तुम्हें बता रहा हूँ ॥ १६-१७ ॥ तीनों लोकों के पिता सोम-चन्द्र- अग्नि- इन तीनों मण्डलों के जनक; सत-रज-तम- तीनों गुणों के महेश्वर; तीन तत्त्वों (बुद्धि-अहंकार – मन), तीन अग्नियों (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि), तीन देवों (ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र ) तथा जगत् के सभी तीन प्रकार के पदार्थों के स्वामी, सुगन्धिरूप पुष्टिवर्धन परमेश्वर महादेव का यजन करना चाहिये ॥ १८-१९ ॥ सुगन्धिरूप वह सूक्ष्म परमेश्वर सभी जगह, समस्त जीवधारियों में, त्रिगुणात्मिका प्रकृति में, इन्द्रियों में, अन्य देवताओं तथा गणों में उसी प्रकार अधिष्ठित है, जैसे पुष्पों में गन्ध विद्यमान रहती है ॥ २०१/२ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! चूँकि पुरुषरूप परमेश्वर की पुष्टि प्रकृतिरूप है । हे सुव्रत! हे महामुने! अतएव वही परमेश्वर महत् आदि से लेकर विशेषपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच, विष्णु, ब्रह्मा, मुनियों तथा इन्द्र आदि सभी देवताओं का पुष्टिवर्धन करता ॥ २१-२२१/२ ॥ कर्म, तपस्या, स्वाध्याय, योग तथा ध्यान के द्वारा उन अमृतरूप महादेव का यजन करना चाहिये ॥ २३१/२ ॥ जन्म-मरणरूप बन्धन से मुक्ति प्रदान करने वाले प्रभु शिव इस सत्य के द्वारा जीव को मृत्यु के पाश से छुटकारा प्रदान करते हैं। सूर्य की किरणों से पककर अपने मूलबन्ध से स्वयं मुक्त हुए उर्वारुक (ककड़ी) – की भाँति वह जीव शिवाराधन के द्वारा सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाता है ॥ २४१/२ ॥ मैंने भी शिवजी से ही मृतसंजीवनी मन्त्र प्राप्त किया है। हे द्विज ! जप करने, हवन करने, अभिमन्त्रित जल का पान करने तथा दिन-रात शिवलिङ्ग के सांनिध्य में बैठकर उनका ध्यान करने से मृत्यु का भय नहीं रह जाता ॥ २५-२६ ॥ उन शुक्राचार्य का वह वचन सुनकर मुनि दधीच ने घोर तपस्या करके शिव की आराधना की, जिसके परिणामस्वरूप उनकी हड्डियाँ वज्र-तुल्य हो गयीं, वे. अवध्य हो गये तथा उनकी सारी दीनता दूर हो गयी ॥ २७ ॥ इस प्रकार देवेश्वर शिव की आराधना करके मुनिश्रेष्ठ दधीच ने वज्र के समान हड्डियाँ हो जाने तथा दूसरों से मारे न जा सकने का वरदान प्राप्तकर चेष्टापूर्वक राजा क्षुप के सिर पर अपने चरण – मूल से प्रहार किया। इसपर राजा क्षुप ने भी अपने वज्र से उनकी छाती पर आघात किया ॥ २८-२९ ॥ किंतु भगवान् शिव के अनुग्रह से वज्र-तुल्य शरीर वाले महात्मा दधीच को वह वज्र विनष्ट करने में समर्थ नहीं हो सका ॥ ३० ॥ दधीच का अवध्यत्व, उनकी अदीनता तथा उनके तपोबल का प्रभाव देखकर राजा क्षुप कमल के सदृश नेत्र वाले उपेन्द्र मुकुन्द श्रीविष्णु की आराधना करने लगे ॥ ३१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘क्षुपाभिधनृपपराभववर्णन’ नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥ Content is available only for registered users. 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