3 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -013 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ तेरहवाँ अध्याय पीतवासाकल्प में शिवस्वरूप भगवान् तत्पुरुष का प्रादुर्भाव तथा उनका माहात्म्य श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे त्रयोदशोऽध्यायः तत्पुरुषमाहात्म्यं सूतजी बोले — इकतीसवाँ कल्प ‘पीतवासा’ कल्प नाम वाला कहा गया है, जिसमें महाभाग ब्रह्मा ने पीला वस्त्र धारण किया था ॥ १ ॥ पुत्र प्राप्ति की कामना से परमेश्वर के ध्यान में रत परमेष्ठी ब्रह्माजी के समक्ष पीतवस्त्रधारी एक महातेजस्वी कुमार प्रकट हुआ। वह कुमार पीतवर्ण की माला तथा पीत परिधान धारण किये हुए था। उस महान् भुजाओं वाले कुमा रके अंगों में पीत वर्ण का गन्ध लिप्त था तथा वह पीले वर्ण की और हेमवर्ण के यज्ञोपवीत से सुशोभित था ॥ २-३ ॥ ध्यानयुक्त होकर ब्रह्माजी ने जब यह जान लिया कि ये जगत् के परमेश्वर हैं, तब वे हृदय से लोक के आधाररूप प्रभु महेश्वर के शरणागत हो गये ॥ ४ ॥ उसी समय ध्यानगत ब्रह्माजी ने महेश्वर के मुख से निकली हुई, चार पैरों वाली, चार वक्त्रों वाली, चार हाथों वाली, चार स्तनों वाली, चार नेत्रों वाली, चार सींगों वाली, चार दाढ़ोंवाली, चार मुखोंवाली, बत्तीस गुणों से युक्त, सभी दिशाओं में मुखवाली, ईश्वररूपिणी विश्वरूपा श्रेष्ठ महेश्वरस्वरूपिणी गाय देखी ॥ ५-६१/२ ॥ तब उस महादेवी महेश्वरी गाय को देखकर सभी देवताओं के वन्दनीय महातेजस्वी महादेव ने ‘तुम मति हो, बुद्धि हो तथा स्मृति हो’ — इस रूप में उस धेनु की महिमा का बार-बार गान करते हुए कहा — हे महादेवि ! आओ, आओ और सम्पूर्ण जगत् को योग के द्वारा आवृत करके अपने वश में करो। इस प्रकार कहने पर वह धेनु हाथ जोड़कर सर्वसमर्थ महादेव के सम्मुख खड़ी हो गयी ॥ ७-९ ॥ इसके अनन्तर देवेश्वर महादेव ने उससे कहा — तुम रुद्राणी होओगी और ब्राह्मणों के कल्याण के लिये परमार्थ साधिका बनोगी ॥ १० ॥ ऐसा कहकर देवाधिदेव जगद्गुरु महादेव ने पुत्र की कामना से ध्यानरत ब्रह्माजी को वह चतुष्पाद गाय दे दी। तदनन्तर ध्यानयोग से उस धेनु को परमेश्वरी जानकर ब्रह्माजी ने जगद्गुरु महादेव से वह माहेश्वर धेनु प्राप्त कर ली ॥ ११-१२ ॥ ब्रह्माजी एकाग्रचित्त होकर रौद्री गायत्री का ध्यान करके और रौद्री गायत्री के रूप में कथित इस वेदप्रतिपादित, ज्ञानदायिनी, विद्यास्वरूपिणी तथा लोकवन्द्या महादेवी ( धेनु) – का ध्यानयुक्त मन से जप करके महादेव के शरणागत हुए ॥ १३-१४ ॥ तत्पश्चात् परमेश्वर महादेव ने उन ब्रह्माजी को दिव्य योग, महान् कीर्ति, ऐश्वर्य, ज्ञानसम्पदा तथा वैराग्य प्रदान किया ॥ १५ ॥ इसके बाद तत्पुरुषसंज्ञक उन महादेव के समीप दिव्य कुमार प्रकट हुए, जो पीले रंग की माला तथा वस्त्र धारण किये हुए थे और पीले रंग के गन्ध का अनुलेपन किये हुए थे। उनके सिर पर पीले रंग की पगड़ी थी। उनके मुख तथा बाल भी पीतवर्ण के थे ॥ १६१/२ ॥ तदनन्तर विमल ओज से युक्त, योगात्मा, तपस्या में ही आह्लादित रहने वाले, ब्राह्मणों के हितैषी तथा धर्म एवं योगबल से सम्पन्न वे कुमार एक हजार वर्ष तक उन तत्पुरुष महादेव के समीप निवास करके यज्ञ करने वाले मुनियों को महायोग का उपदेश प्रदानकर महेश्वर में समाविष्ट हो गये ॥ १७-१८१/२ ॥ इसी विधि से अन्य जो भी लोग नियतात्मा, ध्यानपरायण तथा जितेन्द्रिय होकर महेश्वर के शरणागत होते हैं, वे समस्त पापों से मुक्त होकर शुद्धात्मा तथा ब्रह्मतेजसम्पन्न हो जाते हैं और अन्त में महादेव में प्रविष्ट हो जाते हैं तथा पुनर्भव के बन्धन से छूट जाते हैं ॥ १९–२१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘तत्पुरुषमाहात्म्य’ नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -004 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -005 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -012 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -014 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -021 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -022 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -029 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -030 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -037 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -045 Powered by YARPP.