श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -005
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
पाँचवाँ अध्याय
ब्रह्माजी द्वारा पंचपर्वा अविद्या की सृष्टि, नौ प्रकार की सृष्टि ( नवविध सर्ग ) – की संरचना, मरीचि आदि ऋषियों की उत्पत्ति, मनु – शतरूपा का प्रादुर्भाव तथा दक्षप्रजापति की कन्याओं का वंश वर्णन
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चमोऽध्यायः
प्रजासृष्टिवर्णनं

सूतजी बोले — हे ब्राह्मणो ! जब ब्रह्माजी ने बुद्धिपूर्वक अर्थात् सम्यक् विचार किये बिना सृष्टि रचना का विचार किया, तब उन अव्यक्तजन्मा महात्मा ब्रह्मा को मोह ने व्याप्त कर लिया ॥ १ ॥ स्वयम्भू से प्रथम तम (अज्ञान), मोह, महामोह (भोगेच्छा), तामिस्र (क्रोध) तथा अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) नामवाली — ये पाँच प्रकार की [पंचपर्वा ] अविद्याएँ उत्पन्न हो गयीं ॥ २ ॥ ब्रह्माजी का वह मुख्य [ प्रथम ] सर्ग (सृष्टि) अविद्या से ग्रस्त कहा गया है, तब उन्होंने इस प्रथम सर्ग को सृष्टि-विस्तार का असाधक मानकर वृक्षादिरूप (वृक्ष, गुल्म, लता, वीरुध्, तृणरूप — पाँच प्रकार का सर्ग) मुख्यसर्ग का सृजन किया, तदनन्तर ध्यानपूर्वक मनन करते हुए उन ब्रह्माजी का कण्ठ (चिन्तन) त्रिगुणात्मक (सत्त्व, रज तथा तमोगुण से युक्त) हो गया ॥ ३-४ ॥

पहले उन महात्मा ब्रह्मा ने तिर्यक् स्रोत पशु आदि उत्पन्न किये, तत्पश्चात् उन्होंने ऊर्ध्व स्रोत की रचना की, जो सात्त्विकरूप कहा गया। इसके अनन्तर अर्वाक् स्रोत (मनुष्य आदि), पुनः सत्त्व, तमप्रधान अनुग्रह – सर्ग, तदुपरान्त भूतादिकों का सर्ग रचा गया ॥ ५१/२

ब्रह्माजी द्वारा रचित पहला सर्ग महत्तत्त्वादिका है, दूसरा भौतिक सर्ग है, जो भूत तन्मात्राओं का है, तीसरा ऐन्द्रियसर्ग है [ ये बुद्धिपूर्वक उत्पन्न हुए तीन सर्ग प्राकृत सर्ग हैं] और चौथा मुख्य सर्ग वृक्ष आदि का कहा जाता है। तिर्यक् योनिवाले पशु-पक्षियों वाला सर्ग पाँचवाँ सर्ग है तथा छठा देवताओं की सृष्टिवाला [ऊर्ध्व स्रोताओं का ] देवसर्ग कहा जाता है ॥ ६-७ ॥ सातवाँ [अर्वाक् स्रोताओं का] सर्ग मनुष्यों का, आठवाँ अनुग्रहसर्ग है, [ये पाँच वैकृतसर्ग हैं ] नौवाँ कौमार सर्ग कहा जाता है। हे विप्रो ! प्राकृत तथा वैकृत ये ही नौ सर्ग हैं; जिनमें प्रारम्भ के तीन सर्ग प्राकृत हैं तथा पाँच सर्ग वैकृत हैं तथा नौवाँ कौमारसर्ग प्राकृत तथा वैकृत दोनों है ॥ ८ ॥

तदुपरान्त भगवान् ब्रह्मा ने सनक, सनन्दन तथा सनातन [एवं सनत्कुमार] मुनि उत्पन्न किये। ये श्रेष्ठ मुनिगण निष्काम कर्मयोग से परमपद को प्राप्त हुए ॥ ९ ॥ तत्पश्चात् उन्होंने अपनी योग विद्या से मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ — इन ऋषियों को उत्पन्न किया । हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! ब्रह्माजी के ये नौ [मानस] पुत्र ब्रह्म को जानने वाले थे। ये ब्रह्मवादी ऋषि ब्रह्मा के ही तुल्य कहे गये हैं। संकल्प, धर्म तथा अधर्म भी उत्पन्न हुए । इस प्रकार उन अव्यक्तजन्मा ब्रह्मा की ये बारह सन्तानें कहलायीं ॥ १०–१२ ॥

उन सनातन ब्रह्मा ने आदि में ऋभु तथा सनत्कुमार को उत्पन्न किया था। अग्रजन्मा वे दोनों दिव्य पुत्र नैष्ठिक ब्रह्मचारी, ब्रह्मवादी, सर्वज्ञ, सर्वत्र व्याप्त रहने वाले तथा ब्रह्मा के ही समान थे ॥ १३१/२

हे श्रेष्ठ मुनियो ! अब मैं उन अग्रजन्मा मुनियों की भार्याओं का कुल तथा प्रजाओं की उत्पत्ति का संक्षेप में वर्णन करूँगा ॥ १४१/२

भगवान् ब्रह्मा ने स्वायम्भुव मनु तथा रानी शतरूपा का सृजन किया। उस अयोनिजा तथा पुण्यशालिनी रानी शतरूपा ने स्वायम्भुव मनु से दो पुत्र एवं दो कन्याएँ 1  उत्पन्न कीं ॥ १५-१६ ॥ उनमें बुद्धिसम्पन्न प्रियव्रत ज्येष्ठ तथा उत्तानपाद कनिष्ठ पुत्र थे । श्रेष्ठ गुणों वाली आकूति ज्येष्ठ तथा प्रसूति छोटी कन्या थी ॥ १७ ॥ रुचि नामक प्रजापति ने आकूति को तथा दक्षप्रजापति ने जगद्धात्री योगमयी प्रसूति को भार्या के रूप में ग्रहण किया ॥ १८ ॥ आकूति ने दक्षिणासहित यज्ञ नामक पुत्र को जन्म दिया और दक्षिणा ने दिव्य बारह कन्याओं को उत्पन्न किया ॥ १९ ॥

प्रसूति ने दक्षप्रजापति से श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, पुष्टि, तुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि, कीर्ति, ख्याति, शान्ति, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति, अनसूया, ऊर्जा, देवताओं के लिये अरणिरूपा स्वाहा तथा स्वधा – इन तपोमयी चौबीस कन्याओं को उत्पन्न किया तथा इन महाभाग्यवती कन्याओं को आगे बताये गये क्रम के अनुसार महात्माजनों को समर्पित कर दिया ॥ २०-२२ ॥ श्रद्धा से लेकर कीर्तिपर्यन्त तेरह परम दुर्लभ सुन्दर कन्याओं ने प्रजापति धर्म को पतिरूप में प्राप्त किया । बुद्धिसम्पन्न भृगु ने ख्याति को, भार्गव शुक्राचार्य ने अरणि [शान्ति]-को, मरीचि ने सम्भूति को तथा मुनि अंगिरा ने स्मृति को पत्नीरूप में ग्रहण किया ॥ २३-२४ ॥ पुण्यात्मा पुलस्त्य ने प्रीति को, मुनि पुलह ने क्षमा को, बुद्धिसम्पन्न क्रतु ने सन्नति को अत्रि ने उस अनसूया को, श्रेष्ठ वसिष्ठ ने कमल के समान नेत्रोंवाली ऊर्जा को, भगवान् अग्नि ने स्वाहादेवी को तथा पितरों ने स्वधादेवी को पत्नीरूप में स्वीकार किया ॥ २५-२६ ॥

दक्षप्रजापति की शिवसम्भवा ( शिवांगसम्भूता) मानसी पुत्री सती, जो सम्पूर्ण जगत्‌ को धारण करने वाली हैं, ने भगवान् रुद्र को पतिरूप में प्राप्त किया ॥ २७ ॥ सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्माजी ने शिवजी को अर्धनारीश्वर देखकर कहा कि आप स्त्री-पुरुष का विभाग कीजिये, तब शिवजी की देह से सतीजी अलग हो गयीं ॥ २८ ॥ उन्हीं सती के अंश से तीनों लोक में सभी स्त्रियों की उत्पत्ति हुई है तथा ग्यारह प्रकार के रुद्र भी उन शिव के अंश से उत्पन्न हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण स्त्रीजाति के रूप में वे सतीजी तथा पुरुषजाति के रूप में नीललोहित शिवजी अधिष्ठित हैं ॥ २९१/२

भगवान् ब्रह्मा ने सुव्रता सती को देखकर पुनः दक्षप्रजापति की ओर देखकर उनसे कहा कि ये सती हमारी आपकी तथा सम्पूर्ण जगत् की धात्री हैं, अतएव इनकी सेवा करो । पुन्नामक नरक से पुत्री ही रक्षा करती है, यहाँ पर ऐसी ही उक्ति है ॥ ३०-३१ ॥ यह परम सुन्दरी एवं प्रशस्त तथा विश्व की जननी आपकी ही पुत्री है। अतएव अबसे यह सती नाम से तुम्हारी पुत्री होगी ॥ ३२ ॥

तत्पश्चात् ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर दक्षप्रजापति ने उनके आदेश से पुत्रीरूप में प्राप्त उन साक्षात् सती को आदरपूर्वक भगवान् रुद्र को सौंप दिया ॥ ३३ ॥ प्रजापति धर्म की श्रद्धा आदि जिन तेरह पत्नियों का वर्णन किया जा चुका है, उनसे तथा धर्म से उत्पन्न उत्तम सन्तानों के विषय में अब मैं यथाक्रम कह रहा हूँ ॥ ३४ ॥

हे उत्तम ब्राह्मणो! काम, दर्प, नियम, सन्तोष, लोभ, श्रुत, दण्ड, समय, महान् द्युतिसम्पन्न बोध, अप्रमाद, विनय, व्यवसाय, क्षेम, सुख और यश — इन पुत्रों को उन तेरह पत्नियों ने प्रजापति धर्म से उत्पन्न किया था। धर्म के दो पुत्र दण्ड तथा समय उनकी क्रिया नामक पत्नी से उत्पन्न हुए और अप्रमाद तथा बोध नामक ये दो पुत्र धर्म की बुद्धि नामक पत्नी से उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन तेरह पत्नियों से धर्म के ये पन्द्रह पुत्र उत्पन्न हुए। भृगु की पत्नी ख्याति ने ‘श्री’ (लक्ष्मी) को जन्म दिया, जो भगवान् विष्णु की परम प्रिया हुईं तथा धाता एवं विधाता नामक दो पुत्र भी उत्पन्न हुए, जो पर्वत जामाता बने । मरीचि की प्रभूति नामक पत्नी ने पूर्णमास तथा मारीच नामक दो पुत्रों तथा तुष्टि, दृष्टि, कृषि एवं अपचिति नामक चार पुत्रियों को जन्म दिया; इनमें तुष्टि ज्येष्ठ थी ॥ ३५-४० ॥

हे श्रेष्ठ मुनियो ! क्षमा ने पुलहमुनि से कर्दम, वरीयांस तथा सहिष्णु नामक तीन पुत्र तथा स्वर्णसदृश कान्ति वाली और पृथ्वी के समान क्षमाशील पीवरी नाम की एक पुत्री को उत्पन्न किया था ॥ ४१ ॥ पुलस्त्य ऋषि ने अपनी प्रीति नामक पत्नी से दत्तोर्ण तथा वेदबाहु नामक पुत्रों तथा एक अन्य दृषद्वती नामक पुत्री को उत्पन्न किया । क्रतु की प्रिय पत्नी सन्नति ने साठ हजार पुत्रों को उत्पन्न किया; वे सभी बालखिल्य नाम से प्रसिद्ध हुए। हे सुव्रतो! अंगिरामुनि की पत्नी स्मृति से सिनीवाली, कुहू, राका तथा अनुमति — इन चार कन्याओं तथा प्रिय स्वभाववाले कीर्तिमान् पुत्र अग्नि की उत्पत्ति हुई ॥ ४२-४५ ॥

अत्रि की भार्या अनसूया ने छः सन्ततियों को जन्म दिया था। उनमें श्रुति नामधारिणी एक कन्या थी। सत्यनेत्र, मुनिर्भव्य, मूर्तिराप, शनैश्चर एवं सोम — ये पाँच पुत्र हुए, जो आत्रेय कहलाये । सभी सन्तानों में श्रुति छठी थी ॥ ४६-४७ ॥ सुन्दर नेत्रोंवाली तथा पुत्रों के प्रति स्नेहभाव रखने वाली महिमामयी वसिष्ठपत्नी ऊर्जा ने कमल के समान नेत्र वाले सात पुत्र उत्पन्न किये। रज, सुहोत्र, बाहु, सवन, अनघ, सुतपा और शुक्र — ये सात पुत्र मुनि वसिष्ठ से हुए ॥ ४८-४९ ॥ परम अभिमानी, रुद्ररूप, ब्रह्मा के पुत्र तथा प्रजाओं के प्राणस्वरूप जो भगवान् अग्नि हैं, उनसे स्वाहा ने तीनों लोकों के कल्याणार्थ तीन पुत्र उत्पन्न किये ॥ ५० ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘प्रजासृष्टिवर्णन’ नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥

1. यहाँ मनु की दो पुत्रियाँ कही हैं, जबकि भागवत आदि में ‘तिस्रः कन्याश्च जज्ञिरे’ मनु की तीन पुत्रियाँ प्रसिद्ध हैं। लिङ्गपुराण का वर्णन ईशानकल्प का आख्यान है और भागवत का वर्णन श्वेतवाराहकल्प का है। पुराणपठित ( पुराणोक्त) सभी आख्यान सत्य हैं, कल्पभेद से ही भिन्नता की प्रतीति है ।

Content is available only for registered users. Please login or register

Source:- All © Copy rights subject to their publisher

  1. archive.org – श्रीलिंगमहापुराण (संस्कृत एवं हिन्दी अनुवाद) – Linga MahaPurana – Gita Press
  2. archive.org – 1.  2008 -Ling Mahapuran – Vol 1 Of 2 2. 2008 -Ling Mahapuran Vol 2 Of 2
  3. archive.org – Linga Purana (with the Shiva-toshini Sanskrit Commentary)

Buy Now:-

  1. श्रीलिंगमहापुराण (संस्कृत एवं हिन्दी अनुवाद): Linga Purana
  2. लिङ्ग महापुराणम् (संस्कृत एवं हिन्दी अनुवाद) The Linga Purana

Discover more from Vaidicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply