23 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -061 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ इकसठवाँ अध्याय ज्योतिः सन्निवेश में ग्रहों के स्वरूप तथा नक्षत्रों और ग्रहों की पारस्परिक स्थिति का वर्णन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकषष्टितमोऽध्यायः ग्रहसंख्यावर्णनं सूतजी बोले — [हे ऋषियो!] रात्रि में सूर्यकिरणों से प्रकाशित होने वाले ये सभी क्षेत्र भारतवर्ष में अनुष्ठित पुण्यों द्वारा पुण्यात्माओं के होते हैं, तदनन्तर सूर्य सुकृतों के पूर्ण होने पर ग्रहों के आश्रय में रहने वाले [ ग्रहाश्रित ] नक्षत्र – तारों को [अपने प्रभामण्डल में] ले लेते हैं। शुक्ल होने से तथा तारक होने से ये तारे कहलाते हैं ॥ १-२ ॥ दिव्य, पार्थिव तथा रात्रि में होने वाले अन्धकारों को अपने तेज से ग्रहण कर लेने के कारण वह आदित्य [नाम वाला] है। फैलाने तथा बहाने अर्थ में यह [सु] धातु पढ़ी जाती है । अतः तेज को फैलाने तथा जल को बहाने के कारण इसे ‘सविता’ कहा गया है। यह [ चदि ] धातु आह्लाद करने के अर्थ में कही जाती है, आह्लाद करने के कारण चन्द्रमा का नाम बहुल भी है। [इसके अतिरिक्त] यह शुक्लत्व, अमृतत्व तथा शीतत्व को भी प्रकट करता है ॥ ३–५ ॥ सूर्य तथा चन्द्रमा के मण्डल दिव्य, प्रकाशमान्, आकाशगामी, जल-तेज से युक्त, शुक्लवर्ण वाले, गो घड़े के समान तथा शुभ हैं। उनमें चन्द्रमा का मण्डल घने जल के स्वरूप वाला तथा सूर्य का मण्डल घने तेज के स्वरूप वाला शुक्लवर्ण का कहा गया है ॥ ६-७ ॥ सभी देवता इन स्थानों में भलीभाँति निवास करते हैं। वे सभी मन्वन्तरों में नक्षत्रों, सूर्य तथा ग्रहों का आश्रय ग्रहण करते हैं। इसलिये ग्रह [ एक तरह से] गृह ही हैं, और वे उन्हीं के नाम वाले होते हैं। सूर्य ने सौर स्थान में प्रवेश किया एवं सोम (चन्द्रमा) – ने सौम्य स्थान में प्रवेश किया। सोलह किरणों वाला प्रतापी शुक्र शौक्र स्थान में प्रविष्ट हुआ। बृहस्पति बृहत् स्थान में तथा लोहित (भौम) लोहित स्थान में स्थित हुए। शनैश्चरदेव शनैश्चर स्थान में, बुध बौध स्थान में तथा स्वर्भानु ( राहु ) स्वर्भानु स्थान में स्थित हुए। सभी नक्षत्र ( अपने-अपने ) नक्षत्र – स्थानों में प्रवेश करते हैं। ये सब ज्योतिस्थान पुण्यात्माओं के गृह हैं। ब्रह्मा ने इन स्थानों को निर्मित किया है। ये कल्प के आदि में प्रवृत्त हुए और प्रलयपर्यन्त बने रहते हैं । वे सभी मन्वन्तरों में देवताओं के निवास स्थान हुआ करते हैं। अभिमानी देवता लोग उनमें बार-बार निवास करते हैं । ये स्थान अतीत, भाव्य तथा अभाव्य देवताओं के साथ और वर्तमान स्थानी देवताओं के साथ विद्यमान रहते हैं ॥ ८-१५ ॥ इस मन्वन्तर में ग्रहों को वैमानिक कहा गया है। वैवस्वत मन्वन्तर में अदिति का पुत्र विवस्वान् सूर्य है। ऋषिपुत्र द्युतिमान् देवता वसु को सोम (चन्द्र) कहा गया है। असुरों के याजक शुक्रदेव को भृगु का पुत्र जानना चाहिये। महातेजस्वी देवाचार्य बृहस्पति को अंगिरा ऋषि का पुत्र कहा गया है। जो सुन्दर बुध है, उसे ऋषिपुत्र कहा गया है। विकृतरूप वाला शनैश्चर संज्ञा का पुत्र है; वह विवस्वान् से उत्पन्न हुआ है। लोहित आभा वाला यह युवा भौम अग्निरूप रुद्र के द्वारा उनकी पत्नी विकेशी से उत्पन्न हुआ है । नक्षत्र – ऋक्ष नाम वाली जो भी हैं, वे दक्ष की पुत्रियाँ कही गयी हैं । प्राणियों के लिये कष्टकारी असुर राहु सिंहिका पुत्र है । इस प्रकार सोम, ऋक्ष, ग्रह तथा सूर्य में उनके निवासस्थान हैं। इन स्थानों का वर्णन मैंने कर दिया और अपने-अपने स्थान का अभिमान करने वाले स्थानी देवताओं का भी वर्णन कर दिया ॥ १६–२१ ॥ हजार किरणों वाले सूर्य का अग्निमय सौरस्थान है । चन्द्रमा का स्थान जलमय तथा शुक्लवर्ण का कहा गया है। बुधग्रह का निवासस्थान जलमय, श्याम तथा मनोहर बताया गया है। शुक्र का निवासस्थान भी जलमय, शुक्लवर्ण वाला तथा सोलह किरणों से युक्त है। भौम (मंगल) – का स्थान उत्तम, लोहितवर्ण वाला तथा नौ रश्मियों से युक्त है । बृहस्पति का स्थान हरिद्रा (हल्दी) – की आभा वाला, विशाल तथा सोलह रश्मियों से युक्त है । शनैश्चर का स्थान आठ रश्मियों से युक्त तथा कृष्ण वर्ण वाला कहा गया है। राहु का स्थान अन्धकारमय है; यह प्राणियों के लिये कष्टकारी स्थान है। सभी तारागणों को ऋषिरूप तथा एक रश्मि वाला जानना चाहिये, ये पुण्यकीर्ति वालों के आश्रय हैं तथा अपने वर्ण से शुक्ल हैं। इन्हें घने जल के स्वरूप वाला जानना चाहिये। ये कल्प के प्रारम्भ में ही निर्मित किये गये थे; ये सूर्य की रश्मियों के संयोग के कारण उत्तम प्रकाश से युक्त कहे गये हैं ॥ २२-२७ ॥ सूर्य का विष्कम्भ (व्यास) नौ हजार योजन बताया गया है और मण्डल के प्रमाण से उसका विस्तार तीन गुना है । चन्द्रमा का विस्तार सूर्य के विस्तार से दुगुना कहा गया है। उन दोनों के समान [विस्तार वाला] होकर राहु उनके नीचे गमन करता है। मण्डल के आकार की बनी हुई पृथ्वी – छाया को लेकर राहु का तीसरा बड़ा स्थान है, जो अन्धकारमय है। वह राहु [ चन्द्र ] पर्वों में सूर्य से निकलकर चन्द्रमा की ओर जाता है और सौर पर्वों में चन्द्रमा से [निकलकर] सूर्य की ओर जाता है। चूँकि राहु भानु (सूर्य) – को प्रेरित करता है, अतः इसे स्वर्भानु कहा जाता है ॥ २८-३११/२ ॥ शुक्र का विस्तार योजन के प्रमाण से विष्कम्भ तथा मण्डल (घेरा) में चन्द्रमा का सोलहवाँ भाग कहा गया है । बहस्पति को शुक्र से एक चौथाई कम जानना चाहिये । बृहस्पति से एक चौथाई कम मंगल तथा शनि – ये दोनों बताये गये हैं। बुध विस्तार तथा मण्डल में उन दोनों से एक चौथाई कम है। तारा-नक्षत्ररूप वाले जो पिण्ड हैं, वे विस्तार तथा मण्डल में बुध के बराबर हैं ॥ ३२-३५ ॥ तत्त्ववेत्ता को प्रायः सभी नक्षत्रों को चन्द्रमा से सम्बद्ध जानना चाहिये। तारा-नक्षत्ररूप वाले वे परस्पर बहुत छोटे हैं। वे [छोटे तारे] पाँच, चार, तीन तथा दो योजन विस्तार वाले हैं। इन सबके ऊपर अत्यन्त छोटे तारा- मण्डल हैं, जो केवल आधे योजन के हैं, उनसे छोटा कोई तारा नहीं है। उनके ऊपर तीन ग्रह हैं, वे दूर-दूर भ्रमण करने वाले हैं। वे सौर, अंगिरा (बृहस्पति) तथा वक्र (भौम) हैं, इन्हें मन्दगति से भ्रमण करने वाला जानना चाहिये। उनकी गति के विषय में पहले ही क्रम से बता दिया गया है ॥ ३६-३९ ॥ सभी ग्रह इन्हीं नक्षत्रों में उत्पन्न हुए हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो ! अदिति का पुत्र विवस्वान् सूर्य, जो ग्रहों में प्रथम है, विशाखा नक्षत्र में उत्पन्न हुआ है । धर्म का पुत्र ओजस्वी सोम वसु देवता है, वह शीत रश्मि वाला चन्द्रमा कृत्तिका नक्षत्र में उत्पन्न हुआ है। सोलह रश्मियों वाला भृगुपुत्र शुक्र जो ताराग्रहों में श्रेष्ठ है, सूर्य के बाद तिष्य नक्षत्र में उत्पन्न हुआ है। बारह किरणों वाला अंगिरापुत्र जगद्गुरु बृहस्पति ग्रह पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में उत्पन्न हुआ है। नौ किरणों से युक्त तथा लोहित अंग वाला प्रजापतिपुत्र भौमग्रह पूर्वाषाढ नक्षत्र में उत्पन्न होने वाला कहा गया है। सात किरणों से युक्त सूर्यपुत्र शनैश्चर रेवती नक्षत्र में उत्पन्न हुआ है। पाँच किरणों वाला चन्द्रपुत्र बुध ग्रह धनिष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न हुआ है। अन्धकारमय, प्रजा का क्षय करने वाला तथा सबका विनाशक महाग्रह मृत्युपुत्र शिखी (केतु) आश्लेषा नक्षत्र में उत्पन्न हुआ है। दक्ष की पुत्रियाँ अपने-अपने नाम वाले नक्षत्रों में उत्पन्न हुई हैं । अन्धकार तथा ओज से परिपूर्ण, प्रकृति से काले मण्डल वाला और सूर्य-चन्द्र का मर्दन करने वाला ग्रह राहु भरणी नक्षत्र में उत्पन्न हुआ है ॥ ४०–४८ ॥ इन शुक्र आदि ग्रहों को तारा के नाम से भी जानना चाहिये। ये अपने-अपने जन्म-नक्षत्रों में उत्पन्न पीड़ाओं में वैगुण्यता को प्राप्त होते हैं, तब उस ग्रह की पूजा करने से मनुष्य उस दोष से मुक्त हो जाता है। इन सभी ग्रहों में आदित्य (सूर्य) आदि (प्रधान) ग्रह कहा जाता है । ताराग्रहों में शुक्र, केतुओं में धूमवान् तथा चारों दिशाओं में विभक्त ग्रहों में ध्रुव प्रधान है। नक्षत्रों में धनिष्ठा और अयनों में उत्तरायण प्रधान है । पाँचों वर्षों में संवत्सर को प्रधान कहा गया है। ऋतुओं में शिशिर तथा मासों में माघ को आदि मास कहा जाता है। पक्षों में शुक्लपक्ष और तिथियों में प्रतिपदा प्रधान है। दिन तथा रात के विभागों में दिन को आदि कहा गया है। मुहूर्तों में रुद्रदैवत आदि मुहूर्त है ॥ ४९-५४ ॥ हे कालवेत्ताओं में श्रेष्ठ! क्षणों में निमेष आदि काल है। धनिष्ठा से श्रवण पर्यन्त पाँच वर्षों का युग होता है । भानु की विशेष गति के कारण जगत् चक्र की भाँति परिवर्तित होता रहता है, इसलिये सूर्य को काल की रचना करने वाला, व्यापक तथा ईश्वर कहा गया है। सूर्य चारों प्रकार के प्राणियों का प्रवर्तक एवं निवर्तक है और साक्षात् भगवान् रुद्रदेव उस (सूर्य)-के भी प्रवर्तक हैं। इस प्रकार महादेव ने लोकव्यवहार के लिये नक्षत्रों का अर्थ निश्चय वाला यह सन्निवेश निर्मित किया है। उन भगवान् ने ही कल्प के आरम्भ में बुद्धिपूर्वक इनका प्रवर्तन किया है। वे सबके आश्रय, अभिमानी तथा ज्योतिस्वरूप हैं ॥ ५५-५९ ॥ एक रूप वाले उन प्रधान का यह अद्भुत परिणाम है । यथार्थरूप से इसका वर्णन किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता है। भौतिक दृष्टि वाले विद्वान् मनुष्य को इन ज्योतिर्गणों के प्रमाण तथा गति के विषय में आगम (वेद, शास्त्र), अनुमान, प्रत्यक्ष और उपपत्ति के द्वारा सावधानीपूर्वक बुद्धि से परीक्षण करके इन पर श्रद्धा करनी चाहिये। हे श्रेष्ठ मुनियो ! चक्षु, शास्त्र, जल, लेख्य तथा गणित – इन पाँचों को नक्षत्रों के प्रमाण के निर्णय में साधन समझना चाहिये ॥ ६०-६३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘ग्रहसंख्यावर्णन’ नामक इकसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६१ ॥ Content is available only for registered users. 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