31 October 2008 | aspundir | Leave a comment देवोत्थान, प्रबोधिनी या देव उठनी एकादशी यह तो प्रसिद्ध ही है कि आषाढ़ शुक्ल से कार्तिक शुक्ल एकादशी पर्यन्त ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अग्नि, वरुण, कुबेर, सूर्य और सोमादि देवों से वन्दित जगन्निवास, योगेश्वर क्षीरसागर में शेषशय्या पर चार मास शयन करते हैं और भगवद्भक्त उनके शयनपरिवर्तन और प्रबोध के यथोचित कृत्य दत्तचित होकर यथासमय करते हैं। यद्यपि भगवान् क्षणभर भी सोते नहीं हैं, तथापि ‘यथा देहे तथा देवे’ माननेवाले उपासकों को शास्त्रीय विधान अवश्य करना चाहिये। यह कृत्य कार्तिक शुक्ल एकादशी को रात्रि के समय किया जाता है। Please see more at मंगलाचरण Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: वैदिक वाङ्मय का शास्त्रीय स्वरुप वेदों का विभाजन त्रैलोक्य मंगल सूर्य कवच प्राणेश्वर श्रीकृष्ण चक्षुष्मती विद्या Ahoi ashtami-अहोई अष्टमी पञ्च-दशी यन्त्र से भगवती लक्ष्मी की कृपा-प्राप्ति ग्रह पीड़ा निवारक टोटके सीता स्वयंवर में अयोध्या नरेश को आमंत्रण क्यों नहीं? सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् Powered by YARPP.