21 October 2008 | aspundir | 5 Comments अहोई अष्टमी यह व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष अष्टमी को मनाया जाता है। यह व्रत छोटे बच्चों के कल्याण के लिये किया जाता है। इस दिन बच्चों की माता पूरे दिन व्रत रखती है। अहोई अष्टमी इस दिन सांयकाल तारे निकलने के बाद दीवार पर अहोई बनाकर उसकी पूजा करें। व्रत रखने वाली माताऐं कहानी सुनें। कहानी सुनने के समय एक पट्टे पर एक जल से भरा लोटा रख लें। एक चांदी की अहोई बनवायें और उसमें दो चाँदी के मोती (दाने) डलवायेँ (जिस प्रकार हार में पैंडिल लगा होता है, उसके स्थान पर चाँदी की अहोई लगवाएं और डोरे में चाँदी के दाने लगाएं) फिर अहोई की रोली, चावल, दूध-भात से पूजा करें। जल के कलश पर स्वस्तिक बना कर एक कटोरी (प्याली) में सीरा (हलुआ) और रूपये का बायना निकाल कर तथा हाथ में सात दाने गेहूँ के लेकर कहानी सुनें। फिर अहोई को गले में पहिन लें। बायना सासु जी को पैर लगकर देवें। दिपावली के बाद किसी अच्छे दिन अहोई गले में से उतार कर, जितने पुत्र हों, उतनी बार और जितने पुत्रों की शादी हो चुकी हो उतनी बार दो चाँदी के दाने उस अहोई में डालती जायें। जब अहोई उतारें, उसका गुड़ से भोग लगाकर और जल के छींटे देकर रख देवें। चन्द्रमा को अर्घ्य देकर भोजन करें। इस दिन ब्राह्मणों को पेठा दान में अवश्य देना चाहिये। अहोई देवी के चित्र के साथ-साथ सेही और सेही के बच्चे के चित्र भी बनावें और पूजा करें। यदि किसी स्त्री को पुत्र हुआ हो या पुत्र का विवाह हुआ हो तो अहोई का उद्यापन का उत्सव करे। एक थाली में सात जगह ४-४ पूड़ी और थोड़ा-थोड़ा हलुआ रखें। इसके अलावा एक साड़ी और एक ब्लाउज एक रुपया के साथ थाली में रखकर और थाली के चारों ओर हाथ फेरकर अपनी सासु जी के पैर लगकर उन्हें दें। सासु साड़ी और ब्लाउज अपने पास रखकर शेष बायना बाँट देवें। कथाः- ननद-भाभी एक दिन मिट्टी खोदने गई। मिट्टी खोदते-खोदते ननद ने गलती से स्याऊ माता का घर खोद दिया। इससे स्याऊ माता के अण्डे टूट गये व बच्चे कुचले गये। स्याऊ माता ने जब अपने घर व बच्चों की दुर्दशा देखी तो क्रोधित होकर ननद से बोली कि तुमने मेरे बच्चों को कुचला है। मैं तुम्हारे पति व बच्चों को खा जाउंगी। स्याऊ माता को क्रोधित देख ननद तो डर गई। पर भाभी स्याऊ माता के आगे हाथ जोड़कर विनती करने लगी तथा ननद की सजा स्वयं सहने को तैयार हो गई। स्याऊ माता बोलीं कि मैं तेरी कोख व मांग दोनों हरूंगी। इस पर भाभी बोली कि मां तेरा इतना कहना मानो कोख चाहे हर लो पर मेरी मांग न हरना। स्याऊ माता मान गईं। समय बीतता गया। भाभी के बच्चा पैदा हुआ और शर्त के अनुसार भाभी ने अपनी पहली संतान स्याऊ माता को दे दी। वह छह पुत्रों की मां बनकर भी निपूती ही रही। जब सातवीं संतान होने का समय आया तो एक पड़ोसन ने उसे सलाह दी कि अब स्याऊ मां के पैर छू लेना, फिर बातों के दौरान बच्चे को रुला देना। जब स्याऊ मां पूछे कि यह क्यों रो रहा है तो कहना कि तुम्हारे कान की बाली मांगता है। बाली देकर ले जाने लगे तो फिर पांव छू लेना। यदि वे पुत्रवती होने का आर्शीवाद दें तो बच्चे को मत ले जाने देना। सातवीं संतान हुई। स्याऊ माता उसे लेने आईं। पड़ोसन की बताई विधि से उसने स्याऊ के आंचल में डाल दिया। बातें करते-करते बच्चे को चुटकी भी काट ली। बालक रोने लगा तो स्याऊ ने उसके रोने का कारण पूछा तो भाभी बोलीं कि तुम्हारे कान की बाली मांगता है। स्याऊ माता ने कान की बाली दे दी। जब चलने लगी तो भाभी ने पुन: पैर छुए, तो स्याऊ माता ने पुत्रवती होने का आर्शीवाद दिया तो भाभी ने स्याऊ माता से अपना बच्चा मांगा और कहने लगीं कि पुत्र के बिना पुत्रवती कैसे? स्याऊ माता ने अपनी हार मान ली। तथा कहने लगीं कि मुझे तुम्हारे पुत्र नहीं चाहिएं मैं तो तुम्हारी परीक्षा ले रही थी। यह कहकर स्याऊ माता ने अपनी लट फटकारी तो छह पुत्र पृथ्वी पर आ पड़े। माता ने अपने पुत्र पाए तथा स्याऊ भी प्रसन्न मन से घर गईं। Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: वेद के सूक्तों का तात्त्विक रहस्य हनुमत्सहस्त्र नामावली New version of sholey शंकराचार्य परम्परा गजाननस्तोत्रम् Powered by YARPP.