22 July 2009 | aspundir | 3 Comments सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् शिव उवाच शृणु देवि प्रवक्षयामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्। येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजाप: शुभो भवेत्॥1॥ न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्। न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥2॥ कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्। अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥3॥ गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति। मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्। पाठमात्रेण संसिद्धयेत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥4॥ अथ मन्त्र: ॐ ऐं ह्री कीं चामुण्डायै विच्चे॥ ॐ ग्लौं हुं क्रीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्री क्रीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥ इतिमन्त्र:॥ नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि। नम: कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषर्दिनि॥1॥ नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि॥2॥ जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे। ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका॥3॥ क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते। चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी॥4॥ विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥5॥ धां धीं धूं धूर्जटे: पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी। क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥6॥ हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी। भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नम:॥7॥ अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥ पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा॥8॥ सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥ इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे। अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥ यस्तु कुञ्जिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्। न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥ भावार्थ :- शिवजी बोले- देवी! सुनो। मैं उत्तम कुञ्जिकास्तोत्र का उपदेश करूँगा, जिस मन्त्र के प्रभाव से देवी का जप (पाठ) सफल होता है॥1॥कवच, अर्गला, कीलक, रहस्य, सूक्त , ध्यान, न्यास यहाँ तक कि अर्चन भी (आवश्यक) नहीं है॥2॥केवल कुञ्जिका के पाठ से दुर्गा-पाठ का फल प्राप्त हो जाता है। (यह कुञ्जिका) अत्यन्त गुप्त और देवों के लिये भी दुर्लभ है॥3॥हे पार्वती! इसे स्वयोनि की भाँति प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये। यह उत्तम कुञ्जिकास्तोत्र केवल पाठ के द्वारा मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन आदि (आभिचारिक) उद्देश्यों को सिद्ध करता है॥4॥ मन्त्रः- ॐ ऐं ह्रीं क्रीं चामुण्डायै विच्चे॥ ॐ ग्लौं हुं क्रीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्रीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा। (मन्त्र में आये बीजों का अर्थ जानना न सम्भव है, न आवश्यक और न वाञ्छनीय। केवल जप पर्याप्त है।) हे रुद्रस्वरूपिणी! तुम्हें नमस्कार। हे मधु दैत्य को मारने वाली! तुम्हें नमस्कार है। कैटभविनाशिनी को नमस्कार। महिषासुर को मारने वाली देवी! तुम्हें नमस्कार है॥1॥शुम्भ का हनन करने वाली और निशुम्भ को मारने वाली! तुम्हें नमस्कार है॥2॥हे महादेवि! मेरे जप को जाग्रत् और सिद्ध करो। ऐंकार के रूप में सृष्टिस्वरूपिणी, ह्रीं के रूप में सृष्टि-पालन करने वाली॥3॥ कीं रूप में कामरूपिणी तथा (निखिल ब्रह्माण्ड) की बीजरूपिणी देवी! तुम्हें नमस्कार है। चामुण्डा के रूप में चण्डविनाशिनी और यैकार के रूप में तुम वर देने वाली हो॥4॥ विच्चे रूप में तुम नित्य ही अभय देती हो। (इस प्रकार ऐं ह्रीं क्रीं चामुण्डायै विच्चे) तुम इस मन्त्र का स्वरूप हो॥5॥ धां धीं धूं के रूप में धूर्जटी (शिव) की तुम पत्नी हो। वां वीं वूं के रूप में तुम वाणी की अधीश्वरी हो। क्रां क्रीं क्रुं क्रे रूप में कालिका देवी, शां शीं शूं के रूप में मेरा कल्याण करो॥6॥ हुं हुं हुंकार स्वरूपिणी, जं जं जं जम्भनाशिनी, भ्रां भ्रीं भ्रूं के रूप में हे कल्याणकारिणी भैरवी भवानी! तुम्हें बार-बार प्रणाम॥7॥ अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं धिजाग्रं धिजाग्रं इन सबको तोडो और दीप्त करो करो स्वाहा। पां पीं पूं के रूप में तुम पार्वती पूर्णा हो। खां खीं खूं के रूप में तुम खेचरी (आकाशचारिणी) अथवा खेचरी मुद्रा हो॥8॥ सां सीं सूं स्वरूपिणी सप्तशती देवी के मन्त्र को मेरे लिये सिद्ध करो। यह कुञ्जिकास्तोत्र मन्त्र को जगाने के लिये है। इसे भक्ति हीन पुरुष को नहीं देना चाहिय। हे पार्वती! इसे गुप्त रखो। हे देवी! जो बिना कुञ्जिका के सप्तशती का पाठ करता है उसे उसी प्रकार सिद्धि नहीं मिलती जिस प्रकार वन में रोना निरर्थक होता है। ।।इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिव-पार्वती संवादे कुञ्जिकास्तोत्रं।। ।।ॐ तत्सत्।। यह स्तोत्र परम कल्याणकारी है। प्रतिदिन प्रात:काल इस स्तोत्र का पाठ करने से सब प्रकार के बाधा-विघ्न नष्ट हो जाते हैं। इस कुञ्जिकास्तोत्र तथा देवीसूक्त के सहित सप्तशती पाठ से परम सिद्धि प्राप्त होती है। Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्री-बृहत्-महा-सिद्ध-कुञ्जिका-स्तोत्रम् हनुमत्सहस्त्र नामावली गजाननस्तोत्रम् स्वामिकार्तिकेय द्वारा श्रीगणेश का स्तवन Base of Dharm-हिन्दू-धर्म का आधार गजेन्द्रमोक्ष-आख्यान के पाठ का माहात्म्य सर्वप्रथम गणेश का ही पूजन क्यों ? गणेशजी को दूर्वा, शमीपत्र तथा मोदक चढ़ाने का रहस्य ग्रह, आर्थिक, विवाह-बाधा-निवारण प्रयोग सर्वैश्वर्यप्रद-लक्ष्मी-कवच Powered by YARPP.