वेदों का विभाजन

आधुनिक विचारधारा के अनुसार चारों वेदों की शब्द-राशि के विस्तार में तीन दृष्टियाँ पायी जाती है- (१) याज्ञिक, (२) प्रायोगिक और (३) साहित्यिक दृष्टि।

याज्ञिक दृष्टिः– इसके अनुसार वेदोक्त यज्ञों का अनुष्ठान ही वेद के शब्दों का मुख्य उपयोग माना गया है। सृष्टि के आरम्भ से ही यज्ञ करने में साधारणतया मन्त्रोच्चारण की शैली, मन्त्राक्षर एवं कर्म-विधि में विविधता रही है। इस विविधता के कारण ही वेदों की शाखाओं का विस्तार हुआ है। यथा-ऋग्वेद की २१ शाखा, यजुर्वेद की १०१ शाखा, सामवेद की १००० शाखा और अथर्ववेद की ९ शाखा- इस प्रकार कुल १,१३१ शाखाएँ हैं। इस संख्या का उल्लेख महर्षि पतञ्जलि ने अपने महाभाष्य में भी किया है।
उपर्युक्त १,१३१ शाखाओं में से वर्तमान में केवल १२ शाखाएँ ही मूल ग्रन्थों में उपलब्ध हैः-

१॰ ऋग्वेद की २१ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं-(क) शाकल-शाखा और (ख) शांखायन शाखा।
२॰ (अ) यजुर्वेद में कृष्णयजुर्वेद की ८६ शाखाओं में से केवल ४ शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है-(क) तैत्तिरीय-शाखा, (ख) मैत्रायणीय शाखा, (ग) कठ-शाखा और (घ) कपिष्ठल-शाखा।
२॰ (आ) शुक्लयजुर्वेद की १५ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है- (क) माध्यन्दिनीय-शाखा और (ख) काण्व-शाखा।
३॰ सामवेद की १,००० शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त है- (क) कौथुम-शाखा और (ख) जैमिनीय-शाखा।
४॰ अथर्ववेद की ९ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं- (क) शौनक-शाखा और (ख) पैप्पलाद-शाखा।
उपर्युक्त १२ शाखाओं में से केवल ६ शाखाओं की अध्ययन-शैली प्राप्त है-शाकल, तैत्तरीय, माध्यन्दिनी, काण्व, कौथुम तथा शौनक शाखा। यह कहना भी अनुपयुक्त नहीं होगा कि अन्य शाखाओं के कुछ और भी ग्रन्थ उपलब्ध हैं, किन्तु उनसे शाखा का पूरा परिचय नहीं मिल सकता एवं बहुत-सी शाखाओं के तो नाम भी उपलब्ध नहीं हैं।

प्रायोगिक दृष्टिः– इसके अनुसार प्रत्येक शाखा के दो भाग बताये गये हैं।
(१) मन्त्र भाग- यज्ञ में साक्षात्-रुप से प्रयोग आती है।
(२) ब्राह्मण भाग- जिसमें विधि (आज्ञाबोधक शब्द), कथा, आख्यायिका एवं स्तुति द्वारा यज्ञ कराने की प्रवृत्ति उत्पन्न कराना, यज्ञानुष्ठान करने की पद्धति बताना, उसकी उपपत्ति और विवेचन के साथ उसके रहस्य का निरुपण करना है।

साहित्यिक दृष्टिः– इसके अनुसार प्रत्येक शाखा की वैदिक शब्द-राशि का वर्गीकरण- (१) संहिता, (२) ब्राह्मण, (३) आरण्यक और (४) उपनिषद् इन चार भागों में है।

वेद के अंग, उपांग एवं उपवेद

वेदों के सर्वांगीण अनुशीलन के लिये शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष- इन ६ अंगों के ग्रन्थ हैं। प्रतिपदसूत्र, अनुपद, छन्दोभाषा (प्रातिशाख्य), धर्मशास्त्र, न्याय तथा वैशेषिक- ये ६ उपांग ग्रन्थ भी उपलब्ध है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद तथा स्थापत्यवेद- ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद कात्यायन ने बतलाये हैं।


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    • 17 years ago

    Kalki awatar ka hona awashyak nahi hai duniya me rahne wale har manushya me ek kalki rupi bhagwan virajman hai agar aj bhi ham kisi aanya kalki ki rah me samay wyatit kar rahe hai iskiwajaye hame khud ke under se us kalki ko jagana hoga taki hamare janm lene ka uddeshya safal ho sake

    • 18 years ago

    वेदों की भविष्यवाणियों के आधार पर कल्कि अवतार अथार्त मुहम्मद सल0 आए जिन पर अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन अवतरित हुआ जिसका संदेश सम्पूर्ण मानव जाति हेतु है तथा यह अन्तिम ग्रन्थ है जो कल्कि अवतार पर अवतरित हुआ है तो आखिर हमारे हिन्दू भाई कल्कि अवतार तथा अन्तिम ग्रन्थ की खोज क्यों नहीं करते??????? यह हमारे जीवन का सब से मूल प्रश्न है, मैं सत्य का समर्थक हूं इस लिए मैने आपसे यह बात कह दी है ।।।। हमारा कर्तव्य बनता है कि हम सत्य की खोज करें http://safat.ipcblogger.com/blog/

    • 18 years ago

    इस तरह के गम्भीर विषय पर लिखना तथा पढ़ना निश्चय ही साधारण कार्य नहीं है। मेरी ओर से बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। मेरा विषय भी यही है। इस से सम्बन्धित मेरा ब्लोग भी शीघ्र प्रकाशित होगा।

    • 18 years ago

    पुण्डीर जी,
    आपकी इस पोस्ट के अनुसार वेदों का वर्गीकरण करते हुए अनेक शाखाएँ अस्तित्व में आई, किन्तु इनमें से कुछ शाखाओं के ही ग्रन्थ उपलब्ध हैं। सवाल यह है की ये ग्रन्थ कौनसे हैं, अर्थात् क्या सभी शाखाओं के संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक आदि ग्रन्थ अलग-अलग हैं अथवा इनके अलावा इनको समझाने के लिये व्याख्या-परक ग्रन्थ हैं।

    • 18 years ago

    बहुत अच्छा लिखा है। अब तक इस विषय में अन्य ब्लोगों तथा वेबसाइटों पर सतही जानकारी ही मिली थी। कृपया इससे सम्बन्धित अन्य लेख लिखें तो जानकारी दिजियेगा।

    सोनिया बत्रा

    • 18 years ago

    आपने इस आधुनिकता की दौड़ में ऐसे विषय पर लिख कर स्तुत्य कार्य किया है। इसके लिये आप साधुवाद के पात्र हैं। मेरी रुचि भी ऐसे ही विषयों में है तथा मैं चाहती हूँ की मैं भी इस विषय पर आपके ब्लाग में लिखूँ।

    माया शर्मा

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