6 July 2008 | aspundir | 6 Comments वेदों का विभाजन आधुनिक विचारधारा के अनुसार चारों वेदों की शब्द-राशि के विस्तार में तीन दृष्टियाँ पायी जाती है- (१) याज्ञिक, (२) प्रायोगिक और (३) साहित्यिक दृष्टि। याज्ञिक दृष्टिः– इसके अनुसार वेदोक्त यज्ञों का अनुष्ठान ही वेद के शब्दों का मुख्य उपयोग माना गया है। सृष्टि के आरम्भ से ही यज्ञ करने में साधारणतया मन्त्रोच्चारण की शैली, मन्त्राक्षर एवं कर्म-विधि में विविधता रही है। इस विविधता के कारण ही वेदों की शाखाओं का विस्तार हुआ है। यथा-ऋग्वेद की २१ शाखा, यजुर्वेद की १०१ शाखा, सामवेद की १००० शाखा और अथर्ववेद की ९ शाखा- इस प्रकार कुल १,१३१ शाखाएँ हैं। इस संख्या का उल्लेख महर्षि पतञ्जलि ने अपने महाभाष्य में भी किया है। उपर्युक्त १,१३१ शाखाओं में से वर्तमान में केवल १२ शाखाएँ ही मूल ग्रन्थों में उपलब्ध हैः- १॰ ऋग्वेद की २१ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं-(क) शाकल-शाखा और (ख) शांखायन शाखा। २॰ (अ) यजुर्वेद में कृष्णयजुर्वेद की ८६ शाखाओं में से केवल ४ शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है-(क) तैत्तिरीय-शाखा, (ख) मैत्रायणीय शाखा, (ग) कठ-शाखा और (घ) कपिष्ठल-शाखा। २॰ (आ) शुक्लयजुर्वेद की १५ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है- (क) माध्यन्दिनीय-शाखा और (ख) काण्व-शाखा। ३॰ सामवेद की १,००० शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त है- (क) कौथुम-शाखा और (ख) जैमिनीय-शाखा। ४॰ अथर्ववेद की ९ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं- (क) शौनक-शाखा और (ख) पैप्पलाद-शाखा। उपर्युक्त १२ शाखाओं में से केवल ६ शाखाओं की अध्ययन-शैली प्राप्त है-शाकल, तैत्तरीय, माध्यन्दिनी, काण्व, कौथुम तथा शौनक शाखा। यह कहना भी अनुपयुक्त नहीं होगा कि अन्य शाखाओं के कुछ और भी ग्रन्थ उपलब्ध हैं, किन्तु उनसे शाखा का पूरा परिचय नहीं मिल सकता एवं बहुत-सी शाखाओं के तो नाम भी उपलब्ध नहीं हैं। प्रायोगिक दृष्टिः– इसके अनुसार प्रत्येक शाखा के दो भाग बताये गये हैं। (१) मन्त्र भाग- यज्ञ में साक्षात्-रुप से प्रयोग आती है। (२) ब्राह्मण भाग- जिसमें विधि (आज्ञाबोधक शब्द), कथा, आख्यायिका एवं स्तुति द्वारा यज्ञ कराने की प्रवृत्ति उत्पन्न कराना, यज्ञानुष्ठान करने की पद्धति बताना, उसकी उपपत्ति और विवेचन के साथ उसके रहस्य का निरुपण करना है। साहित्यिक दृष्टिः– इसके अनुसार प्रत्येक शाखा की वैदिक शब्द-राशि का वर्गीकरण- (१) संहिता, (२) ब्राह्मण, (३) आरण्यक और (४) उपनिषद् इन चार भागों में है। वेद के अंग, उपांग एवं उपवेद वेदों के सर्वांगीण अनुशीलन के लिये शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष- इन ६ अंगों के ग्रन्थ हैं। प्रतिपदसूत्र, अनुपद, छन्दोभाषा (प्रातिशाख्य), धर्मशास्त्र, न्याय तथा वैशेषिक- ये ६ उपांग ग्रन्थ भी उपलब्ध है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद तथा स्थापत्यवेद- ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद कात्यायन ने बतलाये हैं। Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: वैदिक वाङ्मय का शास्त्रीय स्वरुप Base of Dharm-हिन्दू-धर्म का आधार स्वस्ति-वाचन वेद के सूक्तों का तात्त्विक रहस्य महिमा तिलक की सर्वप्रथम गणेश का ही पूजन क्यों ? गणेशजी को दूर्वा, शमीपत्र तथा मोदक चढ़ाने का रहस्य श्री हनुमद्ष्टोत्तर-शत-नामावली श्री गणेश अष्टोतर नामावलि कवच के प्रयोग Powered by YARPP.