महिमा तिलक की महिमा तिलक की स्नान एवं धौत वस्त्र धारण करने के उपरान्त वैष्णव ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र, शैव त्रिपुण्ड, गाणपत्य रोली या सिन्दूर का तिलक शाक्त एवं जैन क्रमशः लाल और केसरिया बिन्दु लगाते हैं। दिगम्बर जैन सम्प्रदाय में केसरिया तिलक तथा बौद्धों में श्वेताम्बर मतावलम्बियों के समान ही बिन्दु मस्तक पर धारण करते हैं। नारद पुराण… Read More Like this:Like Loading…
चन्द्र-ग्रहण चन्द्र-ग्रहण निकट भविष्य में १६/१७ अगस्त २००८ को चन्द्र ग्रहण होना है। यह ग्रहण श्रावण शुक्ल, शनिवार को मध्यवर्त्ती रात्री में पूरे भारत में खण्डग्रास के रुप में दिखाई देगा। इस ग्रहण का प्रारम्भ, मध्य एवं समाप्तिकाल इस प्रकार है- ग्रहण प्रारम्भ १॰०५ घं॰मि॰, ग्रहण मध्य २॰४० घं॰मि॰, ग्रहण समाप्त ४॰१४ घं॰मि॰ पर्व काल ३॰०९… Read More Like this:Like Loading…
स्वस्ति-वाचन स्वस्ति-वाचन आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः । देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे-दिवे ॥ देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम् । देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ॥ तान् पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम् । अर्यमणं वरुणं सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्… Read More Like this:Like Loading…
वेद के सूक्तों का तात्त्विक रहस्य वेद के सूक्तों का तात्त्विक रहस्य ‘सूक्त’ शब्द ‘सु’ उपसर्गपूर्वक ‘वच्’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करने पर व्याकृत होता है। ‘सूक्त’ शब्द का अभिप्राय है- ‘अच्छी रीति से कहा हुआ’। जो वेदमन्त्र समूह एकदैवत्य और एकार्थ-प्रतिपादक हो, उसे ‘सूक्त’ कहा जाता है। बृहद्देवता में सूक्त शब्द का निर्वचन इस प्रकार किया गया है-‘सम्पूर्णं ऋषिवाक्यं तु… Read More Like this:Like Loading…
वेदों का विभाजन वेदों का विभाजन आधुनिक विचारधारा के अनुसार चारों वेदों की शब्द-राशि के विस्तार में तीन दृष्टियाँ पायी जाती है- (१) याज्ञिक, (२) प्रायोगिक और (३) साहित्यिक दृष्टि। याज्ञिक दृष्टिः– इसके अनुसार वेदोक्त यज्ञों का अनुष्ठान ही वेद के शब्दों का मुख्य उपयोग माना गया है। सृष्टि के आरम्भ से ही यज्ञ करने में साधारणतया मन्त्रोच्चारण… Read More Like this:Like Loading…
वैदिक वाङ्मय का शास्त्रीय स्वरुप वैदिक वाङ्मय का शास्त्रीय स्वरुप वर्तमान काल में वेद चार माने जाते हैं। उनके नाम हैं- (१) ऋग्वेद, (२) यजुर्वेद, (३) सामवेद तथा (४) अथर्ववेद। द्वापरयुग की समाप्ति के पूर्व वेदों के उक्त चार विभाग अलग-अलग नहीं थे। उस समय तो ऋक्, यजुः और साम – इन तीन शब्द-शैलियों की संग्रहात्मक एक विशिष्ट अध्ययनीय शब्द-राशि… Read More Like this:Like Loading…
गजेन्द्रमोक्ष-आख्यान के पाठ का माहात्म्य श्री मद्भागवत के अष्टम स्कन्ध में गजेन्द्रमोक्ष की कथा है। द्वितीय अध्याय में ग्राह के साथ गजेन्द्र के युद्ध का वर्णन है, तृतीय अध्याय में गजेन्द्र कृत भगवान् के स्तवन और गजेन्द्रमोक्ष का प्रसंग है और चतुर्थ अध्याय के गज-ग्राह के पूर्वजन्म का इतिहास है। श्रीमद्भागवत में गजेन्द्रमोक्ष-आख्यान के पाठ का माहात्म्य बतलाते हुए इसको… Read More Like this:Like Loading…
Base of Dharm-हिन्दू-धर्म का आधार हिन्दू-धर्म का आधार हिन्दू धर्म व्यक्ति प्रवर्तित धर्म नहीं है। इसका आधार वेदादि धर्मग्रन्थ है, जिनकी संख्या बहुत बड़ी है। ये सब दो विभागों में विभक्त है। 1॰ इस श्रेणी के ग्रन्थ “श्रुति´´ कहलाते हैं। ये अपौरषेय माने जाते हैं। इसमें वेद की चार संहिताओं, ब्राह्मणों, आरण्यकों, उपनिषदों, वेदांग, सूत्र आदि ग्रन्थों की गणना की… Read More Like this:Like Loading…