चन्द्र-ग्रहण

निकट भविष्य में १६‍/१७ अगस्त २००८ को चन्द्र ग्रहण होना है। यह ग्रहण श्रावण शुक्ल, शनिवार को मध्यवर्त्ती रात्री में पूरे भारत में खण्डग्रास के रुप में दिखाई देगा। इस ग्रहण का प्रारम्भ, मध्य एवं समाप्तिकाल इस प्रकार है-
ग्रहण प्रारम्भ १॰०५ घं॰मि॰, ग्रहण मध्य २॰४० घं॰मि॰, ग्रहण समाप्त ४॰१४ घं॰मि॰ पर्व काल ३॰०९ घं॰मि॰ परमग्रास ८१ प्रतिशत (सभी समय भारतीय स्टैण्डर्ड समय है)। यह ग्रहण धनिष्ठा नक्षत्र और मकर व कुम्भ राशि में घटित हो रहा है।
सूर्य तथा चन्द्र ग्रहण के विषय में लगभग सभी जानते हैं, फिर भी याद ताजा करने के लिये कुछ तथ्यात्मक जानकारी के साथ उपस्थित हुआ हूँ।

ग्रहण के कारण
ग्रहण चन्द्रमा के जन्म के साथ ही आरम्भ हो गये। पृथ्वी पर प्रति शताब्दी औसतन 154 चन्द्र ग्रहण तथा 237 सूर्य ग्रहण होतें हैं। ये ग्रहण हर पूर्णिमा अथवा अमावस्या को नहीं होते। इसका कारण चन्द्रमा का परिक्रमण तल (Plane of Orbit) पृथ्वी के परिक्रमण तल की सीध में नहीं है, बल्कि कुछ झुका हुआ है। यह औसत झुकाव 5 अंश 8 कला 45 विकला है। यह झुकाव कभी बढ़कर 5 अंश 20 कला हो जाता है तथा कभी 4 अंश 57 कला का ही रह जाता है। 
जब पृथ्वी और चन्द्रमा के परिक्रमण तल एक दूसरे को एक सीधी रेखा में काटते हैं तो इस रेखा के सिरों के मिलन बिन्दुओं को ‘संपात’ (Nodes) कहतें हैं। जब चन्द्रमा पृथ्वी के समतल को काटकर ऊपर चढ़ता है, तो उसे ‘आरोही संपात या राहु’ (Ascending Node) और जब नीचे उतरता है, तो उसे ‘अवरोही संपात या केतु’ (Descending Node) कहते हैं। ग्रहण होने के लिये ‘राहु’ या ‘केतु’ की उपस्थिति अनिवार्य है।
अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्रमा एक ही राशि में होते हैं, उस दिन यदि ‘केतु’ भी उपस्थित हो तो, सूर्य ग्रहण होगा तथा पूर्णिमा के दिन सूर्य और चन्द्रमा एक दूसरे को सप्तम राशि में देखते हों अर्थात् विपरीत स्थिति में हों। उस दिन चन्द्रमा की राशि में ‘राहु’ उपस्थित होने पर ही चन्द्र ग्रहण होगा।
सूर्य ग्रहण में सूर्य के अंशों में से राहु के अंशों को घटा कर भुजांश 14 अंश से कम हो तो ग्रहण होता है। चन्द्र ग्रहण चन्द्र स्पष्ट में से राहु स्पष्ट घटाकर भुजांश 8 अंश से कम हो तो ग्रहण होता है। सूर्य ग्रहण की परम अवधि 18 अंश है, चन्द्र ग्रहण की 9अंश.30कला से 14अंश.15कला है। सूर्य स्पष्ट में से राहु स्पष्ट घटाकर, जो शेष रहे, वह विराह्वर्क के भुज करो, भुज के अंश बनाओ और यदि वे अंश 14 से कम हो तो ग्रहण सम्भव होगा, यदि 14 अंश से अधिक हो तो ग्रहण नहीं होगा अथवा व्यगु के भुजो के अंश 14 अंशों से कम हो तो, ग्रहण होगा। 
अमावस्या तिथि ग्रहण शुद्धिपर्यन्त हो तो दिन में सूर्यग्रहण होता है। पूर्णिमा रात्रि में हो तो चन्द्रग्रहण होता है। यदि दिन में अमावस्या या पूर्णिमा थोड़ी-थोड़ी हो तो ग्रस्तोदित अथवा ग्रस्तास्त होता है।
‘केतु’ को चन्द्रमा की छाया तथा ‘राहु’ को पृथ्वी की छाया भी माना जाता है, जिसमें प्रविष्ट होने पर ही ग्रहण होता है। इन सम्पातों के आधार पर वर्ष में 2 ग्रहण अनिवार्य है तथा इनकी अधिकतम संख्या 7 है, जिनमें 4 या 5 सूर्य ग्रहण तथा बाकी चन्द्र ग्रहण होते हैं।
जब चन्द्रमा एक ‘सम्पात’ से चलकर पुनः उसी संपात में लौट आता है उस अवधि को ‘सम्पात मास’ कहते हैं। यह अवधि 27 दिन, 5 घंटे, 5 मिनट और 35.8 सेकण्ड के बराबर होती है। इस हिसाब से ‘सम्पात वर्ष’ सौर वर्ष की तुलना में 18.62 दिन छोटा होता है। अतः सौर वर्ष के हिसाब से ग्रहण पीछे की ओर खिसकते जाते हैं जिससे सभी ऋतुओं में ग्रहण लगता है। इन ग्रहणों का एक चक्र 18 सौर वर्ष और 11 दिन 8 घण्टे में पूरा होता है। इस अवधि के बाद पुनः वैसा ही क्रम दिखाई देता है। यदि 18.5 वर्ष (6585 दिन) की अवधि के सब ग्रहण ज्ञात हो तो आगे के ग्रहण ज्ञात किये जा सकते हैं।
ग्रहण के कुछ मुख्य ज्योतिषीय नियम इस प्रकार हैं –
१॰ यदि सूर्य के नक्षत्र से 14 वें नक्षत्र पर चन्द्रमा हो तो पूर्णिमा को रात्रिशेष में चन्द्रग्रहण होता है।
२॰ ग्रस्त नक्षत्र से 11 घटाकर यदि 16 वाँ नक्षत्र सूर्य नक्षत्र हो तो अमावस्या के दिन दिनशेष में सूर्यग्रहण होता है।
३॰ जब राहु दूसरे, बारहवें, छठे, आठवें अथवा समराशि में हो तो सूर्यग्रहण अथवा चन्द्रग्रहण होता है। सूर्य से सप्तम स्थान में चन्द्रमा हो अथवा चन्द्रमा से सप्तम स्थान में सूर्य हो और सूर्य चन्द्रमा दोनों में से एक के साथ राहु बैठा हो तो ग्रहण सम्भव है। चन्द्रमा 12 अंश के भीतर तथा सूर्य 18 अंश के अन्दर होने से पात होता है।
३॰ यदि कृष्ण पक्ष की तृतीया के दिन मास नक्षत्र (मासनक्षत्र उसे कहते हैं, जिस नक्षत्र के नाम से उस मास का नाम रखा गया है। जैसे कृत्तिका से कार्तिक, विशाखा से वैशाख आदि) हो उससे 13 वें नक्षत्र में सूर्य हो तो सूर्यग्रहण होता है।
ऽ यदि राहु अथवा केतु से अधिष्ठित नक्षत्र के 3 चरणों के भीतर सूर्य स्थित हो, 4 चरणों के भीतर चन्द्रमा स्थित हो तो ग्रहण सम्भव है।

चन्द्र ग्रहण
चन्द्रमा जब आकाश में घूमते हुए पृथ्वी की छाया वाले मार्ग से गुजरता है तब चन्द्र ग्रहण होता है। ऐसा तभी होगा जब सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा तीनों लगभग एक सीधी रेखा में आ जाएगें। चन्द्रमा की कक्षा (Orbit), क्रांति तल (Plane of ecliptic) पर लगभग 50 का कोण बनाती है। इसीलिये जब-जब तीनों एक सीध में आ जाते हैं तो चन्द्रमा, क्रांति तल के बिल्कुल पास हो भी सकता है और नहीं भी। 
पृथ्वी, सूर्य और चन्द्रमा के बीच में प्रत्येक पूर्णिमा को आती है। जब भी पृथ्वी, सूर्य और चन्द्रमा के बीच में एक सीध में होगी (अर्थात् पूर्णिमा को) चन्द्रमा ठीक या लगभग राहु या केतु (पात बिन्दु) पर होगा तभी चन्द्र ग्रहण होगा।
सूर्य का व्यास 14 लाख किलोमीटर (8 लाख 66 हजार मील) है तथा पृथ्वी का व्यास 12,800 किलोमीटर (8000 मील) व दोनों के बीच की औसत दूरी 15 करोड़ किलोमीटर (9 करोड़ 30 लाख मील) है जिससे गणितीय नियमों के हिसाब से पृथ्वी की छाया लगभग 13 लाख 76 हजार किलोमीटर (8 लाख 60 हजार मील) पड़ती है, जबकि चन्द्रमा की पृथ्वी से औसत दूरी 3 लाख 802 हजार किलोमीटर (2 लाख् 38 हजार मील)। अतः सम्पूर्ण चन्द्रमा इस छाया में प्रविष्ट कर सकता है।
जब चन्द्रमा का पूरा बिम्ब पृथ्वी की छाया में आ जाता है तो पूर्ण चन्द्र ग्रहण होता है। जब बिम्ब का कुछ ही भाग, छाया में आता है तो आंशिक चन्द्र ग्रहण होता है।
ऊपर चित्र में शंकु (Cone) FGK में सूर्य की किरणें बिल्कुल नहीं आ रही है क्योंकि सूर्य की परिधि के दोनों छोर A एवं B से आने वाली किरणें भी पृथ्वी द्वारा रोक ली गई है तथा शंकु HFK और JGK (हल्के रंग से दिखाया गया भाग) में सूर्य के बिम्ब के कुछ भाग से प्रकाश पहुंच रहा है, किन्तु पूर्ण बिम्ब से आने वाली किरणें नहीं पड़ रही। गहरे रंग वाला भाग, शंकु FGK को प्रच्छाया (Umbra) तथा हल्के रंग वाले क्षेत्र HFK और JGK को उपच्छाया (Penumbra) कहते हैं। जब चन्द्रमा उपच्छाया वाले क्षेत्र से प्रच्छाया वाले क्षेत्र में आता है तो उसकी चमक कम होती जाती है और जब वह पूर्णतः प्रच्छाया के भीतर आ जाता है तो इसकी चमक (प्रकाश) बिल्कुल समाप्त हो जाती है। इस स्थिति को पूर्ण चन्द्र ग्रहण कहतें हैं।
जब तक चन्द्रमा का कुछ भाग प्रच्छाया के भीतर नहीं आता, चन्द्र ग्रहण नहीं हो सकता। कारण यह है कि उपच्छाया में चन्द्रमा तक सूर्य की आने वाली किरणें कम तो हो जाती है, पूर्णतः समाप्त नहीं होती। जबकि प्रच्छाया में सूर्य से आने वाली सीधी किरणें बिल्कुल नहीं पहुंचती। अतएव चन्द्रमा जब चन्द्रमा च1 या च2 की स्थिति में होता है तो उस पर सूर्य के कुछ भाग से आने वाली किरणें पड़ती है, इसलिए उसकी चमक थोड़ी कम होती है। इसकी चमक सबसे कम मद्धिम तब होती है जब यह प्रच्छाया से निकल रहा होता है। चमक सबसे अधिक मद्धिम तब होती जब चन्द्रमा प्रच्छाया की सीमा के पास होता है अर्थात् प्रच्छाया में प्रवेश कर रहा होता है या प्रच्छाया के शंकु के अधिक निकट होता है। 
चन्द्रमा की गति 3360 किलोमीटर (2100 मील) प्रति घंटा है। छाया के वृत्त की परिधि प्रायः 7040 किलोमीटर (4400 मील) होती है जिससे चन्द्र ग्रहण की पूरी अवधि कभी भी 1 घण्टा 45 मिनट से अधिक नहीं होती। इस पूरी अवधि के दौरान चन्द्रमा प्रच्छाया के क्षेत्र से गुजर रहा होता है। पृथ्वी की अपनी गति के कारण यह शंकु (प्रच्छाया) भी धीमी गति से खिसकता रहता है। सूर्य (दूसरे अर्थ में पृथ्वी) एक घण्टे में लगभग 2)’ चलता है।
पूर्ण चन्द्र ग्रहण में भी चन्द्रमा पर बिल्कुल अंधेरा नहीं हो जाता। इसका कारण भूमि का वायुमण्डल सूर्य के प्रकाश को इस प्रकार परावर्तित कर देता है कि ग्रसित होने पर भी चन्द्रमा हल्के लाल रंग का दिखाई देता है।
चन्द्र ग्रहण से सम्बन्धित Internet  पर जानकारी के लिये कुछ उपयोगी स्थलः-
http://curious.astro.cornell.edu/question.php?number=328
http://www.mreclipse.com/Special/LEprimer.html
http://www.hermit.org/Eclipse/2008-08-16/
http://www.mreclipse.com/Special/LEprimer.html
http://unmukt-hindi.blogspot.com/2008/07/stories-based-on-eclipse.html
http://www.pratahkal.com/index.php?option=com_content&task=view&id=29149


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