वेद के सूक्तों का तात्त्विक रहस्य

‘सूक्त’ शब्द ‘सु’ उपसर्गपूर्वक ‘वच्’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करने पर व्याकृत होता है। ‘सूक्त’ शब्द का अभिप्राय है- ‘अच्छी रीति से कहा हुआ’। जो वेदमन्त्र समूह एकदैवत्य और एकार्थ-प्रतिपादक हो, उसे ‘सूक्त’ कहा जाता है। बृहद्देवता में सूक्त शब्द का निर्वचन इस प्रकार किया गया है-‘सम्पूर्णं ऋषिवाक्यं तु सूक्तामित्यभिधीयते’ – अर्थात् सम्पूर्ण ऋषि-वचनों को ‘सूक्त’ कहते हैं। 
सामान्यतः सूक्त दो प्रकार के माने जाते हैं – (१) क्षुद्रसूक्त – जिन सूक्तों में कम से कम तीन ऋचाएँ हों। तथा (२) महासूक्त – जिन सूक्तों में तीन से अधिक ऋचाएँ हों। बृहद्देवता (१।१६) में चार प्रकार के सूक्तों का वर्णन प्राप्त होता है। जैसे- (१) देवता सूक्त – किसी एक ही देवता की स्तुति में जितने सूक्त पर्यवसित हों, (२) ऋषि सूक्त – एक ही ऋषि की स्तुति में जितने सूक्त प्रवृत्त हों, (३) अर्थ सूक्त – समस्त प्रयोजनों की पूर्ति जिस सुक्त से होती हो तथा (४) छन्दः सूक्त – एक ही प्रकार के छन्द जिन सूक्तों में प्रयुक्त हों।
सूक्त का विशेष्य वैदिक मन्त्र है। इस प्रकार यह शब्द विविध उद्देश्यों को लेकर वेदों में कहे गये मन्त्रों का उद्बोधक होता है। इन मन्त्रों में तत्तद् देवों के स्वरुप एवं प्रभाव का वर्णन है। इन्हीं मन्त्रों में उन देवी एवं देवों के ध्यान तथा पूजन का सफल विधान भी निहित है। इन सूक्तों के जप एवं पाठ की अत्यधिक महिमा बतायी गयी है। इनके जप-पाठ से सभी प्रकार के आध्यात्मिक, आदिदैविक एवं आधिभौतिक क्लेशों से मुक्ति मिलती है।


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