8 February 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -012 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ बारहवाँ अध्याय भगवान् शिव की अष्टमूर्तियों का स्वरूप तथा उनकी विश्वरूपता श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे द्वादशोऽध्यायः शिवविश्वरूपवर्णनं सनत्कुमार बोले — हे गणेश्वर ! हे महामते ! विश्वरूप महात्मा भगवान् शंकर की आठ मूर्तियों को आप मुझे बतायें ॥ १ ॥ नन्दिकेश्वर बोले — हे कमलयोनि (ब्रह्मा) – के पुत्र ! मैं उमापति विश्वरूप महादेव की महिमा का वर्णन आपसे अवश्य करूँगा । भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, भास्कर, यजमान तथा चन्द्र — ये परमेष्ठी भगवान् शिव की आठ मूर्तियाँ कही गयी हैं। आकाश, आत्मा (जीव ), चन्द्र, अग्नि, सूर्य, जल, पृथ्वी, पवन — ये भी उन बुद्धिसम्पन्न देवाधिदेव की आठ मूर्तियाँ कही गयी हैं । इसीलिये अग्नि में विधिपूर्वक दी गयी आहुति, सूर्य को प्रदत्त अर्घ्य आदि तथा परमात्मा के प्रति समर्पित पदार्थ से उनकी समस्त विभूतियाँ और सभी देवता सदैव तृप्त होते हैं। जिस प्रकार वृक्ष के मूल को सींचने से उसकी शाखाएँ तथा उपशाखाएँ स्वयं पोषित होती हैं, उसी प्रकार उन शिव की पूजा से देवगण तथा उनकी विभूतियाँ स्वयं सन्तुष्ट हो जाती हैं ॥ २-६ ॥ उन प्रभु शिव बारह प्रकार के भिन्न सूर्यात्मक रूप हैं; श्रेष्ठ मुनिगण उसी सर्वदेवात्मक पूज्य रूप का यजन करते हैं ॥ ७ ॥ उन आदित्यरूप भगवान् शिव की अमृता नामक कला प्राणियों को जीवन प्रदान करती है; इस लोक में सभी के लिये प्रिय इस कला का सदा पान किया जाता है ॥ ८ ॥ सूर्यरूप उन भगवान् शिव की चन्द्र नामक किरणें औषधियों की वृद्धि के लिये हिमवृष्टि का विस्तार करती हैं ॥ ९ ॥ मार्तण्डरूपी उन शिव की शुक्ल नामक किरणें फसलों के पाक आदि की कारणरूप ऊष्मा का लोक में विस्तार करती हैं ॥ १० ॥ उन सूर्यरूप परमेष्ठी शिव की हरिकेश नाम से प्रसिद्ध किरण नक्षत्रों को दीप्ति प्रदान करती है। उन सूर्यस्वरूप सर्वेश्वर प्रभु की विश्वकर्मा नामक किरण बुध का पोषण करती है। उन शूलधारी सूर्यरूप शिव की विश्वव्यच – इस नाम से प्रसिद्ध किरण शुक्र के पोषकभाव से प्रतिष्ठित है। उन सूर्यरूप त्रिशूलधारी शिव की संयद्वसु – इस नाम से प्रसिद्ध किरण मंगल का पोषण करती है। उन सूर्यरूप पिनाकी शिव की अर्वावसु – इस नामवाली किरण सर्वदा बृहस्पति का पोषण करती है। सूर्यरूप उन शिव की स्वराट् – इस नाम से प्रसिद्ध किरण दिन-रात शनैश्चर का पोषण करती है । विश्व की उत्पत्ति करने वाले उमापति सूर्यरूप महादेव की सुषुम्णा नामक किरण सदा चन्द्रमा का पोषण करती है ॥ ११-१७ ॥ उन जगद्गुरु शंकर की सोम (चन्द्र) नामक मूर्ति समस्त शान्त किरणों की प्रकृति को प्राप्त है ॥ १८ ॥ काल पर शासन करने वाले उन शिव का सोमात्मकरूप सभी देहधारियों में शुक्र (वीर्य) – रूप से व्यवस्थित है । समस्त जगत् के जीवों के गुरु उन शिव का चन्द्ररूप शरीर ही सभी मन में प्रतिष्ठित है ॥ १९-२० ॥ चन्द्ररूप शिव की सोम नामक उत्तम मूर्ति सम्पूर्ण प्राणियों के शरीरों में सोलह प्रकार के विभिन्न रूपों में स्थित है ॥ २१ ॥ उन देवाधिदेव प्रभु की ‘चन्द्र’ नामक मूर्ति अपनी अविनाशी सुधा से देवताओं और पितरों को सदा तृप्त करती रहती है ॥ २२ ॥ उन शिव की सोम नामक मूर्ति प्राणियों की देहशुद्धि के लिये समस्त औषधियों को पोषित करती है; उस मूर्ति को भवानीरूप ही समझना चाहिये ॥ २३ ॥ उमापति शिव की यह चन्द्ररूप मूर्ति यज्ञों, जीवों और तपों के स्वामी के रूप में प्रसिद्ध है । उन सर्वशक्तिमान् भगवान् शम्भु का चन्द्ररूप विग्रह जल और औषधियों के स्वामी के रूप में विख्यात है ॥ २४-२५ ॥ आत्मा और अनात्मा-सम्बन्धी विचारसम्पन्न जनों से सुविचारित जो सदाशिव हैं, वे समस्त इन्द्रियों तथा उनके देवताओं से अग्राह्य हैं तथा विशुद्ध अमृतरूप हैं ॥ २६ ॥ उन चन्द्ररूप भगवान् शिव के जीवरूप में आत्मा में निश्चल हो जाने पर समस्त लोकों पर एकमात्र शासन करने वाली माया तिरोहित हो जाती है ॥ २७ ॥ शिव की यजमान नामक मूर्ति हव्य द्रव्यों से सभी देवताओं तथा कव्य द्रव्यों से पितरों को भी निरन्तर सन्तृप्त करती है ॥ २८ ॥ यजमान नामक जो [शिव की] मूर्ति है, वह आहुतिजन्य वृष्टि से सभी परापर पदार्थों को उत्पन्न करती है – यह प्रसिद्ध ही है ॥ २९ ॥ ब्रह्माण्डों के भीतर तथा बाहर व्याप्त जल तथा प्राणियों के शरीर में स्थित जल उन्हीं शिव की श्रेष्ठ मूर्ति है ॥ ३० ॥ नदियों, नदों और समुद्रों के अमृतमय सारे जल के रूप में सर्वत्र उमापति शिव ही सर्वदा व्याप्त हैं । यह मूर्ति समस्त जीवों को जीवन प्रदान करने वाली तथा उन्हें पवित्र करने वाली है । चन्द्ररूपा उमा के हृदय में जो मूर्ति स्थित है, वह भगवान् शिव की जलमयी परामूर्ति ही है ॥ ३१-३२ ॥ ब्रह्माण्डों के भीतर तथा बाहर व्याप्त और यज्ञविग्रह में स्थित अग्नि भगवान् शिव की श्रेष्ठ [अग्निरूप] मूर्ति ही है। जीवों के शरीर में भी जठराग्नि रूप से ईश्वर शिव की कल्याणमयी मूर्ति ही विराजमान है । भगवान् शिव की जो अग्निरूप मूर्ति है, वह अत्यन्त पूजित है । वेदवेत्ताओं ने इसके उनचास भेद बताये हैं । भगवान् शिव का यह अग्निरूप विग्रह द्विजातियों के द्वारा आहुति प्रदान किये जाने पर देवताओं के लिये हव्य तथा पितरों के लिये कव्य का वहन करता है। वेद तथा शास्त्रों को जानने वाले भगवान् शिव की अग्निरूप मूर्ति को सर्वदेवमय तथा श्रेष्ठ कहते हैं और विधिपूर्वक उसकी पूजा करते हैं ॥ ३३–३६१/२ ॥ ब्रह्माण्डों के भीतर तथा बाहर स्थित और जीवों के शरीर में स्थित जो वायु है, वह शिव की महिमामयी मूर्ति ही है। प्राण आदि, नागकूर्म आदि और आहव आदि वायु हैं; वे सब उसी एकमात्र शिव की मूर्ति के भेद कहे गये हैं ॥ ३७-३८१/२ ॥ ब्रह्माण्डों के भीतर तथा बाहर स्थित और प्राणियों के देह में स्थित जो आकाश है, वह सर्वव्यापी शम्भु की ही महिमायुक्त मूर्ति है। भगवान् शिव की धरारूप मूर्ति सभी ब्राह्मणों की मुख्य देवता है तथा समस्त चराचर प्राणियों को धारण करने वाली कही गयी है ॥ ३९-४०१/२ ॥ स्थावर-जंगम प्राणियों के शरीर भगवान् शिव की मूर्तियों के [पृथ्वी, जल आदि ] पंचमहाभूत समुदाय से सम्यक् उत्पन्न किये गये हैं — ऐसा विद्वानों ने कहा है। श्रेष्ठ मुनियों ने बताया है कि पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश), चन्द्र, सूर्य और आत्मा — ये ही देवदेव धीमान् की आठ मूर्तियाँ हैं । उन शिव की जो आठवीं श्रेष्ठ मूर्ति आत्मा है, वह यजमान नाम वाली भी है; यह सभी चराचर प्राणियों के शरीरों में सदा स्थित रहती है। मुनीश्वरों ने दीक्षित ब्राह्मण को भी आत्मा कहा है। इसे ही कल्याणकारी शिव की यजमान नामक मूर्ति कहा गया है। अपने कल्याण की कामना करने वाले मनुष्यों को शिव की इन कल्याण की साधनभूता अष्ट-मूर्तियों की प्रयत्नपूर्वक नित्य वन्दना करनी चाहिये ॥ ४१-४६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत उत्तरभाग में ‘शिवविश्वरूपवर्णन ‘नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -008 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -016 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -024 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -032 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -040 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -048 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -056 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -064 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -072 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -080 Powered by YARPP.