3 February 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -101 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ एक सौ एकवाँ अध्याय सती का हिमवान् की पुत्री पार्वती के रूप में प्राकट्य, शिव की प्राप्ति के लिये उनका कठोर तप, तारकासुर द्वारा देवताओं को पराजित करना, शिव द्वारा कामदेव का दहन तथा पुनः जीवित करना श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकाधिकशततमोऽध्यायः मदनदाह ऋषिगण बोले — कल्याणमयी अम्बा सती हिमवान् की पुत्री कैसे हुईं और उन्होंने देवदेवेश महेश्वर को पति के रूप में कैसे प्राप्त किया ? ॥ १ ॥ सूतजी बोले — हे श्रेष्ठ द्विजो ! उस श्रेष्ठ अंगना ने तपस्या के द्वारा अपनी इच्छा से मेना के शरीर का आश्रय लेकर हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। पर्वतराज ने उसके जातकर्म आदि समस्त संस्कार सम्पन्न किये। तब बारहवाँ वर्ष पूर्ण होने पर हिमवान् की वह सुन्दर पुत्री तपस्या करने लगी; उसके साथ सुन्दर मुखवाली उसकी छोटी बहन और सर्वलोकनमस्कृत एक दूसरी छोटी बहन भी थी ॥ २-४ ॥ तब सभी ऋषि सभी लोकों की महेश्वरी उस देवी को चारों ओर से घेरकर तप के लिये उसकी स्तुति करने लगे ॥ ५ ॥ उनमें सबसे बड़ी अपर्णा थी, उससे छोटी सुन्दर मुखवाली एकपर्णा थी और तीसरी परम सुन्दरी एकपाटला [नाम वाली] थी। महादेवी पार्वती की तपस्या से सभी प्राणियों के स्वामी परमेश्वर महादेव शिव [ उनके ] वश में हो गये ॥ ६-७ ॥ इसी समय तारक नाम वाला एक दानव हुआ; दिति को आनन्दित करने वाला वह तारपुत्र (तारक) महातेजस्वी था। उसके तीन पुत्र थे — महान् असुर तारकाक्ष, भाग्यशाली विद्युन्माली और पराक्रमी कमलाक्ष । तार नामक इनके महाबली पितामह ने प्रभु ब्रह्मा की कृपा से [अपनी] तपस्या के द्वारा [ अतुलनीय] पराक्रम प्राप्त कर लिया था । उस महातेजस्वी तार ने चराचरसहित तीनों लोकों को जीतकर संग्राम में विष्णु को भी जीत लिया था ॥ ८-११ ॥ उन दोनों में दिन-रात बिना विश्राम के ( निरन्तर ) एक हजार दिव्य वर्षों तक अत्यन्त भयानक तथा रोमांचकारी युद्ध हुआ । उसने रथ सहित विष्णु को पकड़कर सौ योजन दूर फेंक दिया। तार के द्वारा युद्ध में पराजित होकर विष्णु भाग गये । ब्रह्मा से एक सौवर तथा सैकड़ों गुना बल प्राप्त करके दितिनन्दन तार ने सम्पूर्ण जगत् पर अधिकार कर लिया। देवेन्द्र आदि देवताओं को जीतकर देवेश्वरेश्वर के रूप में होकर उसने अपनी माया से देवताओं को सभी लोकों में उनके कार्यों से वंचित कर दिया ॥ १२-१५ ॥ इन्द्रसहित देवतागण तारकासुर के भय से पीड़ित हो गये; वीर होते हुए भी वे भयग्रस्त होने के कारण [ कहीं भी ] शान्ति अथवा शरण प्राप्त नहीं कर सके । तब देवताओं के स्वामी श्रीमान् प्रभु इन्द्र बृहस्पति की शरण में जाकर देवताओं की उपस्थिति में उनसे कहने लगे ॥ १६-१७ ॥ हे भगवन् ! तार से उत्पन्न तारक नामक एक महादानव है; उसने युद्ध में हम लोगों को उसी तरह आहत किया है, जैसे बैल बछड़ों को आहत कर देता है। अतः हे महाभाग ! हे बृहस्पते ! भय के कारण इस विशाल युद्ध में देवता लोग आश्रयविहीन होकर उसी प्रकार भ्रमण कर रहे हैं, जैसे पिँजरे में पक्षी । हे अंगिरोवर ! हम लोगों के जो अस्त्र पहले अमोघ थे, वे उस देवशत्रु के प्रभाव के कारण निष्फल हो गये हैं । हे बृहस्पते ! विष्णु ने बीस हजार वर्षों तक उसके साथ युद्ध किया; किंतु वह उनके भी द्वारा युद्ध में नहीं मारा गया। महाशक्तिसम्पन्न विष्णु के द्वारा भी युद्ध में जो जीता नहीं जा सका, तब हम जैसे लोग युद्ध में उसके समक्ष कैसे टिक सकते हैं? ॥ १८-२२ ॥ इन्द्र के ऐसा कहने पर श्रेष्ठ देवताओं तथा इन्द्र को साथ लेकर बृहस्पति ने विभु ब्रह्मा के पास पहुँचकर [ सब कुछ ] बताया ॥ २३ ॥ उनके मुख से [सारा वृत्तान्त ] सुनकर शरणागतों का कष्ट दूर करने वाले उन पितामह ने इन्द्रसहित सभी देवताओं के साथ आये हुए बृहस्पति से प्रेमपूर्वक कहा — मैं आप सब देवताओं की विपत्ति को जानता हूँ; फिर भी इस समय सुनिये। रुद्र के अंग से उत्पन्न जो देवी सती हैं, वे दक्ष की निन्दा करके समस्त लोकों द्वारा नमस्कृत उमा के रूप में हिमवान् की पुत्री होकर उत्पन्न हुई हैं । हे उत्तम देवताओं ! आप देवतागण उन्हीं के रूप के द्वारा इन विभु रुद्र के महान् मन को आकृष्ट कराने का प्रयत्न कीजिये। उन दोनों के संयोग से शक्तिधर प्रभु स्कन्द उत्पन्न होंगे; वे षडास्य (छः मुख वाले), द्वादशभुज (बारह भुजाओं वाले), सेनानी, पावक, प्रभु, स्वाहेय, कार्तिकेय, गांगेय, शरधामज, देव, शाख, विशाख, नैगमेश, वीर्यवान्, सेनापति और कुमार नाम वाले होकर सभी लोकों से नमस्कृत होंगे। वे महासेन बालक होते हुए भी बिना प्रयास के अकेले ही [उस] महाबली तारकासुर का वध करके देवताओं का उद्धार करेंगे ॥ २४-३० ॥ तब उन परमेष्ठी ब्रह्मा के इस प्रकार कहने पर इन्द्र सहित सभी देवताओं के साथ सुव्रत बृहस्पति ने देवदेव उन ब्रह्मा को प्रणाम करके मेरु के शिखर पर पहुँचकर कामदेव का स्मरण किया । हे श्रेष्ठ द्विजो ! देवगुरु ब्रह्मा के स्मरण करने से जगत् का जीवस्वरूप कामदेव भी [अपनी] भार्या रति के साथ वहाँ आकर हाथ जोड़कर नमस्कार करके इन्द्रसहित उन बृहस्पति से बोला — ‘हे बृहस्पते ! आपने मेरा स्मरण किया है, अतः मैं आपके पास आया हूँ; मुझे जो करना हो, उसे बताइये ।’ ॥ ३१–३४ ॥ तब देवपूजित बृहस्पति उससे कुछ बोलने ही वाले थे कि उत्सुकतावश भगवान् इन्द्र ने कामदेव की प्रशंसा करके उससे कहा — ‘ अब आप सुखपूर्वक शंकर के साथ अम्बिका का संयोग कराइये। वे भगवान् वृषभध्वज जिस भी उपाय से उनके साथ रमण करें; अपनी पत्नी रति के साथ आप उस उपाय को खोजिये । पहले से ही उन [अम्बिका ] – से वियुक्त हुए वे महादेव भी उन पार्वती उमा को [पुनः ] प्राप्त करके प्रसन्न होकर आपको शुभ गति प्रदान करेंगे ‘ ॥ ३५–३७ ॥ उनके ऐसा कहने पर देवदेव इन्द्र को नमस्कार करके कामदेव ने उस [रति] के साथ शंकरजी के आश्रम में जाने का निश्चय किया। तब रति तथा अपने सहायक वसन्त के साथ शिवजी के आश्रम में जाकर महाबली कामदे वने पार्वती के साथ महादेव का संयोग कराने का मन बनाया ॥ ३८-३९ ॥ तत्पश्चात् कामदेव को देखकर हँसते हुए त्रिनेत्र शिव ने अवज्ञापूर्वक उसे [ अपने] तीसरे नेत्र से देखा । इसके बाद उनके नेत्र से उत्पन्न अग्नि ने पास में ही खड़े कामदेव को उसी क्षण जला दिया। तब रति करुण विलाप करने लगी । रति के विलाप को सुनकर देवदेव वृषध्वज ने परम कृपा से कामदेव की पत्नी की ओर देखकर उससे कहा — ‘हे भद्रे ! तुम्हारा पति देहरहित होते हुए भी रतिकाल में निश्चित रूप से सम्पूर्ण कार्य करेगा; हे भद्रे ! इसमें सन्देह नहीं । जब [ भगवान् ] विष्णु भृगु के शाप से सभी लोकों के हित के लिये महायशस्वी तथा महातेजस्वी वासुदेव (वसुदेवपुत्र)-के रूप में अवतीर्ण होंगे, तब उनका [प्रद्युम्न नामक] जो पुत्र उत्पन्न होगा. वही तुम्हारा पति होगा’ ॥ ४०-४४१/२ ॥ इसके बाद रुद्र को प्रणाम करके पवित्र मुसकान वाली वह कामपत्नी अनंग को प्राप्त करके वसन्त के साथ चली गयी ॥ ४५-४६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘मदनदाह’ नामक एक सौ एकवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०१ ॥ Content is available only for registered users. 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