28 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -076 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ छिहत्तरवाँ अध्याय विविध शिवस्वरूपों की प्रतिष्ठा एवं उपासना का फल श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे षट्सप्ततितमोऽध्यायः शिवमूर्तिप्रतिष्ठाफलकथनं सूतजी बोले — [ हे विप्रो ! ] इसके आगे मैं सभी लोकों के कल्याण के लिये अपनी इच्छा से उनके विग्रह की उत्पत्ति तथा [मूर्ति ] प्रतिष्ठा के सम्पूर्ण फल का वर्णन करूँगा ॥ १ ॥ स्कन्द (कार्तिकेय) तथा उमासहित महादेव की मूर्ति बनाकर उन्हें उत्तम आसन पर विराजमान करके भक्तिपूर्वक [ उस मूर्ति की ] प्रतिष्ठाकर सभी कामनाओं को प्राप्त करना चाहिये ॥ २ ॥ कार्तिकेय तथा उमासहित शिव की विधिपूर्वक एक बार भी पूजा करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, उसे जैसा मैंने सुना है; वैसा बताता हूँ ॥ ३ ॥ वह योगी करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले, सभी अभीष्ट वस्तुओं से सम्पन्न, रुद्रकन्याओं से युक्त, गान- नृत्य आदि से परिपूर्ण विमानों में [भगवान् ] शिव की भाँति प्रलयपर्यन्त विहार करता है। वहाँ महान् सुखों का उपभोग करके वह महातेजस्वी [ योगी] सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले विमानों से [क्रमशः] उमालोक, कुमारलोक, ईशानलोक, विष्णुलोक, ब्रह्मलोक, प्रजापतिलोक, जनलोक तथा महर्लोक पहुँच जाता है; पुनः इन्द्रलोक में पहुँचकर वहाँ दस हजार वर्षों तक इन्द्रपद का भोग करने के अनन्तर भुवर्लोक में दिव्य तथा परम सुन्दर सुखों को भोगकर मेरु पर्वत पर पहुँचकर देवताओं के भवनों में आनन्द प्राप्त करता है ॥ ४–७१/२ ॥ जो एक पैर, चार भुजाओं, तीन नेत्रों तथा त्रिशूल से युक्त हैं; जो अपने वाम भाग से विष्णु त दक्षिण भाग से ब्रह्मा को उत्पन्न करके विराजमान हैं; जिनसे अट्ठाईस करोड़ रुद्र उत्पन्न हुए हैं; जो सभी अंगों से अत्यन्त प्रभा वाले तथा पचीस तत्त्वों वाले जीवात्मा साक्षात् पुरुष को हृदय से, अपने बायें भाग से प्रकृति को, बुद्धिदेश से बुद्धि को, अपने अहंकार से अहंकार को, तन्मात्राओं से तन्मात्राओं को, अपनी इन्द्रियों से लीलापूर्वक इन्द्रियों को, पैर के मूलभाग से पृथ्वी को, गुह्यदेश से जल को, नाभिस्थल से अग्नि को, हृदयदेश से सूर्य को, कण्ठ से चन्द्रमा को, भौहों के मध्यभाग से आत्मा (रुद्र) -को, मस्तक से स्वर्ग को — इस प्रकार सम्पूर्ण चराचर जगत् को उत्पन्न करके साक्षात् विराजमान हैं, उन सर्वज्ञ तथा सर्वव्यापी परमेश्वर की मूर्ति को विद्याविधान के अनुसार बनाकर विधिपूर्वक उनकी प्रतिष्ठा करके मनुष्य शिवसायुज्य प्राप्त करता है ॥ ८-१४ ॥ तीन पैरों वाले, सात हाथों वाले, चार शृंगों वाले तथा दो सिरों वाले यज्ञेश्वर अग्निस्वरूप ईशान को स्थापित करके मनुष्य विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। वहाँ एक लाख कल्प तक महान् भोगों को भोगकर मनुष्य सुखी रहता है और [पुनः] क्रम से इस लोक में आकर समस्त यज्ञों को सम्पन्न करता है ॥ १५-१६ ॥ जो मनुष्य उमासहित वृष पर आरूढ़ अर्धचन्द्रधारी शिव की मूर्ति को स्थापित करता है, वह दस हजार अश्वमेध यज्ञों को करने से जो पुण्य होता है, उसे प्राप्तकर किंकिणीजालों से युक्त स्वर्ण-विमान से दिव्य शिवलोक में जाकर वहीं पर मुक्त हो जाता है ॥ १७-१८ ॥ नन्दी तथा उमासहित और सभी गणों से घिरे हुए महादेव की प्रतिष्ठा करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, जैसा मैंने सुना है, उसे बता रहा हूँ। वह सूर्यमण्डल के समान देदीप्यमान वृषभों से जुते हुए, अप्सराओं से भरे हुए. देव-दानवों के लिये दुर्लभ और नृत्य करती हुई अप्सराओं से चारों ओर से पूर्णतः सुशोभित विमानों से दिव्य शिवलोक में जाकर गणाधिपति पद को प्राप्त करता है ॥ १९–२१ ॥ पार्वती सहित नृत्य करते हुए, हजार भुजाओं वाले अथवा चार भुजाओं वाले, भृगु आदि तथा भूतसमूहों से घिरे हुए, पार्वती के साथ, ब्रह्मा-विष्णु- इन्द्र – चन्द्र आदि सभी देवताओं से सदा नमस्कृत और मातृकाओं तथा मुनियों से घिरे हुए देवदेवेश्वर – प्रभु – सर्वज्ञ – परमेश्वर – वृषभध्वज शिव की मूर्ति बनाकर भक्तिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करके [मनुष्य] जो फल प्राप्त करता है, उसे मैं बताता हूँ- सभी यज्ञ, तप, दान, तीर्थ तथा देवदर्शन करने में जो फल होता है, उसका करोड़ों गुना फल प्राप्त करके वह शिवलोक को जाता और वहाँ प्रलयपर्यन्त महान् सुखों को भोगकर पुनः दूसरी सृष्टि का प्रारम्भ होने पर मनु-पद प्राप्त करता है ॥ २२–२६१/२ ॥ दिगम्बर, चार भुजाओं वाले, श्वेतवर्ण वाले, तीन नेत्रों वाले, सर्प की मेखला वाले, हाथ में कपाल धारण किये हुए और काले तथा घुँघराले केश वाले देवेश्वर को [मूर्तिरूप में] बनाकर भक्तिपूर्वक प्रतिष्ठा करके मनुष्य शिव – सायुज्य प्राप्त करता है ॥ २७-२८ ॥ गजासुर को विदीर्ण करने वाले, उमासहित, सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले, कृष्ण वर्ण वाले, लाल नेत्रों वाले, तीन नेत्रों वाले, चन्द्र को आभूषण के रूप में धारण करने वाले, सिर पर काकपक्ष धारण करने वाले, नागटंक धारण करने वाले, व्याघ्रचर्म को उत्तरीय के रूप में लपेटे हुए, मृगचर्म को वस्त्ररूप में धारण किये हुए, तीक्ष्ण दाँतों वाले, हाथ में गदा लिये हुए, हाथ में कपाल लिये हुए, हुं-फट् महाशब्द से सभी दिशाओं को गुंजित करते हुए, दोनों हाथों में व्याघ्रचर्म तथा कमण्डलु धारण किये हुए, हँसते हुए, गरजते हुए, काले समुद्र को पीते हुए, भूतसमूहों के साथ नृत्य करते हुए और गणसमुदायों से सुशोभित होते हुए देवेश्वर प्रभु शिव को [ मूर्तिरूप में ] अपने सामर्थ्य के अनुसार बनाकर तथा प्रतिष्ठा करके [मनुष्य] सभी विघ्नों से रहित होकर शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है और वहाँ प्रलयपर्यन्त महान् सुखों को भोगकर रुद्रों से विचारपूर्वक ज्ञान प्राप्त करके मुक्त हो जाता है ॥ २९–३४१/२ ॥ अर्धनारीश्वर, चार भुजाओं वाले, वर तथा अभय मुद्रायुक्त हाथ वाले, त्रिशूल तथा पद्म धारण किये हुए, स्त्री तथा पुरुष भाव में स्थित और समस्त आभूषणों से सुशोभित अत्युत्तम प्रभु महादेव को [ मूर्तिरूप में] बनाकर भक्तिपूर्वक प्रतिष्ठा करके वह शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है और वहाँ चन्द्रमा तथा तारों की स्थितिपर्यन्त महान् सुखों को भोगकर अणिमा आदि गुणों से युक्त होकर ज्ञान प्राप्त करके वह मुक्त हो जाता है ॥ ३५-३७१/२ ॥ जो [मनुष्य ] शिष्य-प्रशिष्यों से घिरे हुए, उपदेश की मुद्रा में उठे हुए हाथ वाले, देवदेवेश तथा सर्वज्ञ लकुलीश्वर को [मूर्तिरूप में] बनाकर और पुनः भक्तिपूर्वक उन्हें स्थापित करके शिवलोक को जाता है। वह मनुष्य सौ युगों तक वहाँ महान् सुखों को भोगकर [ पुनः ] ज्ञानयोग प्राप्त करके वहीं पर मुक्त हो जाता है, जो पूर्वदेवों तथा अमरों का सर्वाभीष्ट स्थान है ॥ ३८-४०१/२ ॥ ध्यानमुद्रा में स्थित, चिता की भस्म लगाये हुए, त्रिपुण्ड्र धारण किये हुए, मुण्डमाला धारण किये हुए, ब्रह्मा के केश से निर्मित एक यज्ञोपवीत धारण किये हुए, बाएँ हाथ में ब्रह्मा का श्रेष्ठ कपाल धारण किये हुए और भगवान् विष्णु का शरीर धारण किये हुए महादेव शिव की मूर्ति बनाकर तथा भक्तिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करके मनुष्य भवसागर से पार हो जाता है। जो एक बार भी ‘ॐ नमो नीलकण्ठाय’ – इस पुण्यदायक अष्टाक्षर मन्त्र का उच्चारण करता है, वह पापों से छूट जाता है; और अपने सामर्थ्य के अनुसार गन्ध आदि [ उपचारों ] से इस मन्त्र के द्वारा भक्तिपूर्वक देवदेवेश्वर की विधिवत् पूजा करके शिवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ४१-४५१/२ ॥ सुदर्शन चक्र धारण किये हुए तथा जलन्धर को दो टुकड़ों में किये हुए स्वरूप में जलन्धर – विनाशक प्रभु महादेव को [मूर्तिरूप में] बनाकर भक्तिपूर्वक [ उनकी] प्रतिष्ठा करके मनुष्य शिवसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । पूर्वकथित लक्षणों वाले, सुदर्शन चक्र के दाता तथा पूज्यमान विष्णु के द्वारा नेत्रदानरूपी पूजा से अर्चित देवेश्वर को [ मूर्तिरूप में ] बनाकर तथा भक्तिपूर्वक उन्हें स्थापित करके मनुष्य शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है ॥ ४६–४८१/२ ॥ निकुम्भ की पीठ पर स्थित, [ अपना ] दाहिना चरणकमल उसकी पीठ पर टिकाये हुए, वामभाग में पार्वती को बैठाये हुए, सर्परूपी किंकिणी से वेष्टित कुहनी को [अपने] त्रिशूल के अग्रभाग पर टिकाये हुए और पास में हाथ जोड़कर खड़े अन्धक की ओर देखते हुए स्वरूप ( मूर्ति ) – को विधि के अनुसार बनाकर उसकी प्रतिष्ठा करने से मनुष्य शिवसायुज्य प्राप्त करता है ॥ ४९–५१ ॥ जो [भक्त] त्रिपुर का विनाश करने वाले देवदेवेश ईश्वर को इस स्वरूप में स्थापित करता है – जिसमें वे धनुषबाण लिये हुए हों, अर्धचन्द्र को आभूषण के रूप में धारण किये हुए हों, उमा के साथ रथ पर बैठे हुए हों, ब्रह्माजी [ उनके ] सारथि हों; वह भी उसी स्वरूप से शिवलोक में जाकर आनन्दपूर्वक दूसरे शिव की भाँति क्रीड़ा करता है; इसमें सन्देह नहीं है । हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! वहाँ अपनी इच्छा के अनुसार महान् सुखों को भोगकर उत्तम ज्ञान प्राप्त करके वह वहीं पर मुक्त हो जाता है ॥ ५२–५४१/२ ॥ गंगा को धारण किये हुए; सुख से बैठे हुए; चन्द्रमा को सिर पर धारण किये हुए; गंगासहित; बाएँ गोद में पार्वती को बैठाये हुए और विनायक, ज्येष्ठ कार्तिकेय, सुन्दरी दुर्गा, सूर्य, चन्द्रमा, ब्रह्माणी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवीदेवी, वरदायिनी वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा, वीरभद्र तथा विघ्नेशसहित शिव को [ मूर्तिरूप में] जो बुद्धिमान् स्थापित करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है ॥ ५५-५८ ॥ ऐसी मूर्ति जिसमें अव्यय शिवजी लिङ्ग के रूप में हों, बड़ी-बड़ी ज्वालाओं के समूहों से घिरे हुए हों, लिङ्ग के मध्य में चन्द्रमा को धारण किये हुए स्थित हों, हंसरूपधारी ब्रह्मा उनके दाहिने भाग में हाथ जोड़े हुए विराजमान हों, वाराहरूपधारी विष्णु नीचे की ओर मुख किये हुए लिङ्ग के अधोभाग में स्थित हों, अघोर महान् लिङ्ग अत्यधिक जल के मध्य में स्थित हो – उसे बनाकर तथा भक्तिपूर्वक स्थापित करके भक्त शिवसायुज्य प्राप्त करता है। क्षेत्र की रक्षा करने वाले क्षेत्रपाल तथा प्रभु पशुपति शिव को [मूर्तिरूप में] बनाकर भक्तिपूर्वक विधान के अनुसार उनको स्थापित करके भक्त शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है ॥ ५९-६३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘शिवमूर्तिप्रतिष्ठाफलकथन’ नामक छिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७६ ॥ Content is available only for registered users. 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