21 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -051 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ इक्यावनवाँ अध्याय दिव्य भूतवन में महादेव के निवास स्थान का वर्णन, कैलास तथा वहाँ की पवित्र नदियों का वर्णन श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः विविधद्वीपशोभावर्णनं सूतजी बोले — बड़ी-बड़ी चोटियों वाले, अत्यन्त सुन्दर, स्वर्ण- वैडूर्य, माणिक्य-नीलम-गोमेद तथा अन्य बहुमूल्य मणियों से निर्मित, स्वच्छ, पवित्र, सौ हजार शाखाओं से युक्त, सभी प्रकार के वृक्षों से मण्डित, चम्पक- अशोक-पुन्नाग- बकुल तथा असन से विभूषित, पारिजात से परिपूर्ण, अनेक प्रकार के पक्षियों से भरे हुए, सैकड़ों प्रकार के धातुओं से चित्रित, अद्भुत पुष्पों से युक्त, नीचे तक लटकती हुई पुष्प-शाखाओं से युक्त नितम्ब वाले, नानाविध पशु-समूहों से भरे हुए, अनेक धाराओं से युक्त, स्वच्छ तथा स्वादिष्ट जल वाले, अनेकविध पुष्पों से भरे हुए निर्झरों से विभूषित और बहती हुई धाराओं तथा उनमें तैरते हुए पुष्पगुच्छों से सुशोभित देवकूट पर्वत पर उसके मध्य में मनोहर वर्ण वाला, गहरी जड़ों तथा अनेक स्कन्धों से युक्त वृक्षों वाला, मनोहर, घनी छाया वाला, दस योजन मण्डल (परिधि )-वाला तथा अनेक भूतगणों के निवासस्थानों से समन्वित भूतवन नामक वन है ॥ १-७ ॥ वहाँ महादेव महात्मा भगवान् शंकर का कान्तिमान् निवासस्थान है। वह महामणियों से विभूषित; स्वर्ण की चहारदीवारी से युक्त; मणिमय तोरणों से मण्डित; स्फटिक के बने ‘हुए विचित्र गोपुरों से युक्त; भूमि पर इधर-उधर शुभ आस्तरणों से ढके हुए, शिवजी के द्वारा अधिष्ठित, सुन्दर तथा मणिमय सिंहासनों से युक्त; कभी न मुरझाने वाले अनेक रंग के फूलों से विभूषित उत्तम भवनों से युक्त; स्फटिक के स्तम्भों वाले अत्यन्त विचित्र मण्डपों से समन्वित; ब्रह्मा, इन्द्र तथा उपेन्द्र के द्वारा पूजित सभी भूतगणों से संयुक्त; वराह-गज-सिंह- ऋक्ष-शार्दूल, करभ, गीध, उल्लू-मृग-उष्ट्र तथा अज के समान मुख वाले, पर्वत के शिखर के समान स्थूल, सुन्दर, भयानक सिंह के समान केशों तथा रोमों वाले, बड़ी भुजाओं वाले, अनेक वर्ण तथा आकार वाले, विभिन्न आसनों से बैठे हुए प्रभामय मुख वाले, भव्य चरित वाले, ब्रह्मा- इन्द्र- विष्णु के तुल्य प्रतीत होने वाले तथा अणिमा आदि गुणों से समन्वित नन्दीश्वर आदि विविध प्रमथों से सुशोभित; देवताओं तथा महापरिषदों से नित्य परिपूर्ण रहता है । वहाँ देवता लोग भूतपति शिव की नित्य पूजा करते हैं ॥ ८-१६ ॥ प्रमथगण झाँझ, शंख, पटह, भेरी, डिण्डिम तथा गोमुख (वाद्ययन्त्रों)-द्वारा, ललित तथा मधुरगानों के द्वारा, नाचने-कूदने तथा गर्जन- ध्वनि के द्वारा प्रमथपति महादेव की पूजा करते हैं। वहाँ सिद्ध, ऋषि, देवता, गन्धर्व, महात्मा ब्रह्मा, उपेन्द्र आदि तथा अन्य लोग शंकर की पूजा करते हैं। जहाँ शंकर की पूजा होती है, वह सुन्दर शिखर दो भागों में बँटा हुआ तथा शंख के समान कान्तिमान् प्रतीत होता है ॥ १७-१९ ॥ कैलास यक्षों के राजा महात्मा कुबेर का, करोड़ों यक्षों का तथा अन्य महात्माओं का निवास स्थान है । वहाँ देवाधिदेव शिव का विशाल भवन है। शिवजी उस भवन में उमा तथा [अपने] गणों के साथ सदा विराजमान रहते हैं। वहाँ कुबेर के सुन्दर शिखर पर बहुत जल से भरी हुई सोने तथा मणियों से निर्मित सीढ़ियों वाली और कुमुद पुष्पों से युक्त मन्दाकिनी नामक नदी है। वह पुण्यदायिनी तथा पवित्र मन्दाकिनी नदी गन्ध-स्पर्शगुणों से युक्त सुवर्णमय कमलों, नील वैदूर्य के पत्तों, गन्धयुक्त विशाल उत्पलों और कुमुदों तथा महापद्मों से अलंकृत; यक्षों तथा गन्धर्वों की स्त्रियों और अप्सराओं से सेवित एवं देवता-दानव-गन्धर्व-यक्ष-राक्षस-किन्नरों के द्वारा उपस्पृष्ट (स्नान-पान के लिये उपयुक्त) जल वाली है ॥ २०-२५ ॥ उसके उत्तरभाग में शिवजी का वैदूर्यमणिनिर्मित सुन्दर भवन है, वहाँ अविनाशी शंकर निवास करते हैं। हे द्विजो ! उसके पूर्व-दक्षिण में कनकनन्दा के तट पर हजारों द्विजों से सेवित और पशुओं तथा पक्षियों से भरा हुआ एक वन है। वहाँ भी कैलासतुल्य भवन में शिवजी उमा तथा गणों के साथ क्रीड़ा करते हैं ॥ २६-२७१/२ ॥ नन्दा पश्चिमी तट पर थोड़ी दूर दक्षिण में अनेक महलों से युक्त रुद्रपुरी नामक नगर है। वहाँ भी शिवजी सैकड़ों रूप धारण करके उमा तथा गणों के साथ क्रीड़ा करते हैं, उसे शिवालय कहा जाता है। इस प्रकार है मुनिश्रेष्ठो! प्रत्येक द्वीप में पर्वतों पर, वनों में, नदी-नद- सरोवरों के तटों पर और समुद्रों के संगमों पर भगवान् शिव के सैकड़ों-हजारों निवासस्थान हैं ॥ २८-३१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘विविधद्वीपशोभावर्णन’ नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५१ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading... Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -006 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -007 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -014 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -015 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -022 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -023 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -030 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -031 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -038 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -046 Powered by YARPP.