20 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -047 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ सैंतालीसवाँ अध्याय जम्बूद्वीप के अधिपति प्रियव्रत के पुत्र महाराज आग्नीध्र का वंश वर्णन तथा आग्नीध्र के शिवभक्त नौ पुत्रों का अजनाभ वर्ष ( भारतवर्ष), किम्पुरुष वर्ष आदि नौ वर्षों (देशों ) – का स्वामी बनना श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः भरतवर्षकथनं सूतजी बोले — राजा प्रियव्रत ने अपने ज्येष्ठ उत्तराधिकारी महाबली प्रिय पुत्र आग्नीध्र को जम्बूद्वीप के राजा के रूप में अभिषिक्त किया ॥ १ ॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! वह महान् शिवभक्त, तपस्वी, तरुण, सदा शिवपूजन में रत रहने वाला, ऐश्वर्यसम्पन्न, अनेक गायों का स्वामी तथा बुद्धिमान् था ॥ २ ॥ उसके प्रजापति के समान नौ पुत्र हुए। वे सभी शिवभक्त तथा शिवपरायण थे ॥ ३ ॥ उनमें ज्येष्ठ पुत्र नाभि नाम से प्रसिद्ध था । उसके छोटे भाई का नाम किम्पुरुष था । तीसरा पुत्र हरिवर्ष तथा चौथा पुत्र इलावृत था। रम्य पाँचवाँ पुत्र था। हिरण्मान् छठा पुत्र कहा जाता है । कुरु उनमें सातवाँ था और भद्राश्व आठवाँ पुत्र कहा गया है। नौवाँ केतुमाल था । अब उनके देशों के विषय में सुनिये ॥ ४-५१/२ ॥ पिता ने [ज्येष्ठ पुत्र] नाभि को दक्षिण में स्थित हेम नामक वर्ष (देश) प्रदान किया। उन्होंने हेमकूट नामक जो वर्ष था, उसे किम्पुरुष को दिया । नैषध नामक जो वर्ष कहा गया है, उसे पिता ने हरि को दे दिया ॥ ६-७ ॥ पिता ने मेरु पर्वत से आवृत मध्य देश इलावृत को दिया और नीलाचल नामक वर्ष रम्य को दिया। पिता ने हिरण्मान् को उत्तर में स्थित श्वेत नामक वर्ष दिया और उत्तर में जो श्रृंगवर्ष है, उसे उन्होंने कुरु नामक पुत्र को दिया। इसी प्रकार उन्होंने भद्राश्व को माल्यवानुवर्ष दिया और केतुमाल को गन्धमादनवर्ष दिया ॥ ८-१० ॥ विभाग के अनुसार ये नौ महान् वर्ष हैं। धर्मात्मा राजा आग्नीध्र उन वर्षों में अपने उन पुत्रों को [राजपद पर ] क्रमानुसार अभिषिक्त करके तपस्या में रत हो गये । तप से अपने को शुद्ध करने के अनन्तर वे स्वाध्याय में संलग्न हो गये और स्वाध्याय में रत रहने वाले वे बाद में शिव के ध्यान में निमग्न हो गये ॥ ११-१२१/२ ॥ किम्पुरुष आदि जो आठ शुभ वर्ष थे, उनमें स्वभावतः बिना प्रयत्न के ही सुखमय सिद्धि थी। उनमें [ किसी प्रकार का] विपरीत भाव नहीं था और [ प्रजाओं में] बुढ़ापे तथा मृत्यु का भय नहीं था। उनमें न धर्म था न अधर्म और उत्तम, मध्यम तथा अधम – ये भाव नहीं थे । उन आठों क्षेत्रों में हर प्रकार से युग की अवस्था नहीं थी ॥ १३–१५ ॥ रुद्रक्षेत्र में जो भी स्थावर, जंगम, भक्त अथवा अस्थायी आगन्तुक प्राणी मृत होते हैं, वे उन्हीं क्षेत्रों में जाते हैं। रुद्र ने उनके कल्याण के लिये ही आठों क्षेत्रों का निर्माण किया है। वहाँ पर महादेव सदा उनका सान्निध्य करते हैं ॥ १६-१७ ॥ आठों क्षेत्रों के निवासी [अपने] हृदय में महादेव को देखकर सदा सुखी रहते हैं । वे [ महादेव ] ही उनकी परम गति हैं ॥ १८ ॥ अब मैं हिम से चिह्नित इस [हिमालय]-में विद्यमान नाभि के वंश का वर्णन करूँगा, आपलोग सुनें।: । महाबुद्धिमान् नाभि ने मेरुदेवी से राजाओं में श्रेष्ठ तथा सभी राजाओं से पूजित ऋषभ नामक पुत्र को उत्पन्न किया। ऋषभ से पराक्रमी भरत उत्पन्न हुए, जो उनके सौ पुत्रों में सबसे बड़े थे ॥ १९-२० ॥ उन पुत्रवत्सल ॠषभ ने भरत का राज्याभिषेक करके ज्ञान-वैराग्य का आश्रय लेकर सर्परूप इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके परमात्मा ईश्वर को पूर्णरूप से अपने में स्थापितकर [ स्वयं ] दिगम्बर, जटाधारी, वल्कलधारी तथा निराहार होकर वन में प्रवेश किया। उन्होंने [समस्त ] आशाओं से रहित तथा सन्देहमुक्त होकर शिव का परम पद प्राप्त किया ॥ २१-२२१/२ ॥ उन्होंने हिमालय पर्वत के दक्षिण में स्थित वर्ष भरत को प्रदान किया था, इसीलिये विद्वान् लोग उनके नाम से उसे भारतवर्ष कहते हैं ॥ २३१/२ ॥ भरत के सुमति नामक विद्वान् तथा धार्मिक पुत्र हुए। भरत ने वह राज्य उन्हें सौंप दिया । पुत्र को राज्य प्रदान करके वे राजा [भरत] वन में प्रविष्ट हुए ॥ २४-२५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘भरतवर्षकथन’ नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४७ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -001 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -008 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -009 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -016 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -017 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -024 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -025 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -032 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -033 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -040 Powered by YARPP.