श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -005 श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -005 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ पाँचवाँ अध्याय विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीष का आख्यान, विष्णुमाया द्वारा नारद एवं पर्वत मुनि का वानरमुख होना तथा इसी का रामावतार में हेतु बनना श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पञ्चमोऽध्यायः श्रीमत्याख्यानं ऋषिगण बोले — इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न विष्णुभक्त [राजा] अम्बरीष भगवान् विष्णु की आज्ञा के अनुसार पृथ्वी का पालन करते थे —… Read More Like this:Like Loading…
श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -004 श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -004 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ चौथा अध्याय वासुदेवपरायण विष्णुभक्तों के लक्षण तथा उनकी महिमा श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे चतुर्थोऽध्यायः विष्णुभक्तकथनं ऋषिगण बोले — हे महामते ! जो वासुदेवपरायण वैष्णव कहे गये हैं, उनके क्या लक्षण हैं; उसे हमें बताइये । हे सूत ! हे सर्वतत्त्वज्ञ ! भगवान् भूतभावन उन्हें कौन-सी गति प्रदान करते हैं; यह… Read More Like this:Like Loading…
श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -003 श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -003 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ तीसरा अध्याय भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से श्रीनारदजी को गानबन्धु, जाम्बवती आदि से गानविद्या की प्राप्ति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तृतीयोऽध्यायः वैष्णवगीतकथनं अम्बरीषजी बोले — हे मार्कण्डेय ! हे महाप्राज्ञ ! हे महाभाग! भगवान् नारदमुनि ने किस योग के द्वारा गान-विद्या प्राप्त की और उन्होंने किस समय तुम्बुरु की समानता… Read More Like this:Like Loading…
श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -002 श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -002 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ दूसरा अध्याय भगवद्गुणगान का माहात्म्य श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे द्वितीयोऽध्यायः विष्णुमाहात्म्यं मार्कण्डेयजी बोले — [हे राजन् ! ] तदनन्तर परमात्मा नारायण ने कालयोग से उन्हें सम्पूर्ण ज्ञान प्रदान करके उन मुनिश्रेष्ठ नारद को तुम्बुरु के समान कर दिया। पूर्वकाल में ऐसी घटना हुई थी। नारायण के गीतों का श्रेष्ठ गान… Read More Like this:Like Loading…
श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -001 श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -001 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ पहला अध्याय भगवद्गुणगान की महिमा में कौशिक ब्राह्मण की कथा श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे प्रथमोऽध्यायः कौशिकवृत्तकथनं ऋषि बोले — हे सूतजी ! समस्त देवताओं और ईश्वरों के ईश्वर भगवान् कृष्ण इस लोक में किससे सन्तुष्ट होते हैं ? आप हम लोगों को बतायें; आप सम्पूर्ण तत्त्वों के ज्ञाता हैं ॥… Read More Like this:Like Loading…
श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -108 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -108 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ एक सौ आठवाँ अध्याय भगवान् श्रीकृष्ण का गुरु उपमन्यु के आश्रम में जाना और उनसे पाशुपतज्ञान प्राप्त करना तथा पाशुपतव्रत का माहात्म्य श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अष्टोत्तरशततमोऽध्यायः पाशुपातव्रत माहात्म्य वर्णनं ऋषिगण बोले —अक्लिष्ट कर्म वाले वासुदेव श्रीकृष्ण ने धौम्य के ज्येष्ठ भ्राता [ उपमन्यु ] -का दर्शन किया था और… Read More Like this:Like Loading…
श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -107 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -107 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ एक सौ सातवाँ अध्याय शिवभक्त उपमन्यु की कथा तथा उमामहेश्वर द्वारा उस पर अनुग्रह करना श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सप्ताधिकशततमोऽध्याय उपमन्युचरितं ऋषिगण बोले — हे सूतजी ! पूर्वकाल में उपमन्यु ने महेश्वर से गणाधिप पद प्राप्त करके पुनः क्षीरसागर को कैसे प्राप्त किया; आप इस समय बताने की कृपा कीजिये… Read More Like this:Like Loading…
श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -106 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -106 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ एक सौ छठा अध्याय दारुकासुर के विनाश के लिये भगवान् शिव द्वारा अपने शरीर से काली तथा अष्टभैरवों को प्रकट करना एवं शिवताण्डव नृत्य की कथा श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे षडधिकशततमोऽध्यायः शिवताण्डवकथनं ऋषिगण बोले — [ हे सूतजी!] हम लोगों ने स्कन्द के अग्रज का प्रादुर्भाव तो सुन लिया; अब… Read More Like this:Like Loading…
श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -105 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -105 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ एक सौ पाँचवाँ अध्याय विघ्ननाशक श्रीगणेशजी के प्राकट्य की कथा श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः विनायकोत्पत्ति सूतजी बोले — [ हे ऋषियो ! ] शिवजी को प्रणाम करके जब सुरेश्वर लोग [ यथास्थान] स्थित हो गये, तब अम्बिकापति, पिनाकधारी, भव महेश्वर ने उन श्रेष्ठ देवताओं को क्षणभर में दिव्य दृष्टि… Read More Like this:Like Loading…
श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -104 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -104 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ एक सौ चारवाँ अध्याय गजानन का प्राकट्य कराने के लिये देवताओं द्वारा भगवान् शिव की स्तुति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चतुरधिकशततमोऽध्यायः देवस्तुति ऋषिगण बोले — [ हे सूतजी !] गणों के स्वामी गजानन विनायक कैसे उत्पन्न हुए; उनका प्रभाव कैसा है ? इसे आप बताने की कृपा कीजिये ॥ १… Read More Like this:Like Loading…