श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -009
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
नौवाँ अध्याय
पशु, पाश एवं पशुपति की व्याख्या, पाशुपतयोग का माहात्म्य तथा पशुपाशमोक्ष विवरण
श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे नवमोऽध्यायः
पाशुपतव्रतवर्णनं

ऋषिगण बोले —  हे सूतजी ! देवताओं ने, ब्रह्माजी ने तथा उत्कृष्ट कर्मों वाले स्वयं विष्णु ने पूर्वकाल में इस दिव्य एवं मंगलकारी व्रत को किया था । पतित विप्र धौन्धुमूक ने भी इसे करके तथा मन्त्र का जप करके सद्गति प्राप्त की। यह पाशुपतव्रत कैसा है और वे परमेश्वर भगवान् शंकर पशुपति क्यों [ कहे जाते ] हैं? हम लोगों को [ इस विषय के प्रति] बड़ी जिज्ञासा है; आप हमें बतायें ॥ १-३ ॥

सूतजी बोले —  पूर्वकाल में ब्रह्माजी के पुत्र महायशस्वी सनत्कुमार देवदेव रुद्र के शाप से मुक्त हुए थे। उन भगवान् रुद्र के ही अनुग्रह से उष्ट्रदेह का त्याग करके वे मरुदेश से यहाँ (भारतवर्ष) आ गये। पुनः ब्रह्माजी की आज्ञा से शिलादपुत्र नन्दी के पास मेरु के शिखर पर पहुँचकर उन्हें विधानपूर्वक नमस्कार करके मुनिवर ने उनसे सर्वश्रेष्ठ मोक्षधर्म का श्रवण कर पाशुपतव्रत के विषय में पूछा । हे मुनिश्रेष्ठो ! इन नन्दी को बार-बार प्रणाम करके सनत्कुमार ने पूछा — प्रभु शिव पशुपति कैसे हुए – यह आप हमसे बतायें। तब उन नन्दी ने उन्हें सब कुछ बता दिया। कृष्णद्वैपायन प्रभु व्यास ने [सनत्कुमार से] वह सब सुना और उन [ व्यासजी ] -से सुन करके अब मैं आप लोगों से वही प्रसंग कह रहा हूँ, महेश्वर को नमस्कार करके सभी लोग उस वचन को सुनें ॥ ४–८१/२ ॥

सनत्कुमार बोले —  भगवान् शिव पशुपति कैसे हुए, कौन लोग पशु कहे गये हैं, वे किन पाशों से बाँधे जाते हैं और पुनः वे कैसे मुक्त होते हैं ?॥ ९१/२ ॥

शैलादि बोले —  हे सनत्कुमार! मैं रुद्रभक्त, शान्तस्वभाव तथा कल्याण-भावना से युक्त चित्त वाले आपको यह सब यथार्थ रूप में बताऊँगा । ब्रह्मा से लेकर स्थावर-जंगम पर्यन्त सभी मायावशवर्ती हैं और धीमान् देवदेव शिव के पशु कहे जाते हैं। उनका स्वामी होने के कारण भगवान् रुद्र पशुपति कहे गये हैं ॥ १०–१२ ॥ आदि तथा अन्त से रहित, धारण करने वाले, अव्यय, षडैश्वर्यसम्पन्न, सर्वव्यापक, परमेश्वर महेश्वर ही इन जीवों को मोहाभिभूत पशु के समान मायापाश में बाँधते हैं तथा वे ही ज्ञानयोग से आराधित होने पर उन्हें मुक्ति देने वाले भी हैं; क्योंकि अविद्यापाश में बँधे जीवों को मुक्ति देने वाला परमात्मा परमेश्वर शंकर के अतिरिक्त कोई अन्य है ही नहीं ॥ १३-१४१/२ ॥

चौबीस तत्त्व ही भगवान् परमेष्ठी के पाश हैं, वे एकमात्र शिव ही जीवों के द्वारा आराधित होने पर उन पाशों से मुक्त करते हैं। वे भगवान् रुद्र चौबीस पाशों से पशुओं (जीवों) – को बाँधते हैं और वे ही सेवित होने पर बन्धनमुक्त भी करते हैं। दस इन्द्रियों (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय), अन्तःकरणजन्य भावों [ मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त], शब्द आदि पाँच तन्मात्राओं तथा पृथ्वी आदि पाँच महाभूतों — इन समस्त विषयरूप पाशों से भगवान् शिव पशुओं को छुड़ाते हैं। इन इन्द्रियों के विषयरूप पाशों से बँधे हुए विषयग्रस्त लोग परमेश्वर शिव की सेवा से शीघ्र ही उनके भक्त हो जाते हैं ॥ १५–१८१/२ ॥

भज — यह धातु सेवा अर्थ में कही गयी है, अतः विद्वज्जनों ने सेवा को भक्ति शब्द से सम्बन्धित बताया है। ब्रह्मा आदि से लेकर तृणपर्यन्त सभी पशुओं को [ सत्त्व आदि] तीनों गुणरूपी पाशों से बाँधकर महेश्वर स्वयं कार्य कराते हैं। पशुओं के द्वारा दृढ़ भक्तियोग से सम्यक् आराधित होने पर वे परमेश्वर शंकर उन्हें शीघ्र ही [बन्धन से ] छुड़ा देते हैं ॥ १९–२११/२ ॥

मन, वचन तथा कर्म से [प्रभु का ] भजन ही भक्ति कही गयी है। समस्त प्रपंचों के पति विष्णु का भी हेतु होने के कारण वह भक्ति बन्धन को काटने में समर्थ है। वे सत्य हैं तथा सर्वव्यापी हैं – शिव के इन गुणों को जानने तथा उनके रूप और उपादानों के चिन्तन को विद्वानों ने मानस भजन कहा है और प्रणव ( ॐकार) – के जप आदि को उन्होंने वाचिक भजन कहा है, इसी प्रकार सत्पुरुषों के द्वारा प्राणायाम आदि को कायिक भजन कहा जाता ॥ २२–२४१/२ ॥

धर्माधर्ममय पाशों से जीवों का यह बन्धन होता है और एकमात्र वे भगवान् परमेश्वर शिव ही [उन पाशों से जीवों को] मुक्त करने वाले हैं। चौबीस तत्त्व, माया के गुण और शब्द आदि विषय — ये जीव को बाँधने के कारण पाश कहे जाते हैं। उन पाशों से बँधे हुए सभी प्राणी शिवभक्ति के द्वारा ही मुक्त होते हैं । [ अविद्या आदि ] पाँच क्लेशरूप पाशों से भी वे शिव जीवों को बाँधते हैं और वे ही भक्ति के द्वारा भलीभाँति उपासित किये जाने पर पाशों से उन्हें मुक्त कर देते हैं ॥ २५-२८ ॥

मनुष्यों में श्रेष्ठ लोग अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश को जीवों को बाँधने वाले [पाँच] क्लेश कहते हैं। पण्डितजन तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र — इन पाँच प्रकार से अविद्या आदि को स्थित कहते हैं । हे मुनिश्रेष्ठो ! केवल शिव ही उन समस्त जीवों को अविद्या से मुक्त कर सकते हैं, उन्हें मुक्त करने वाला कोई दूसरा नहीं है। योगपरायण महाज्ञानियों ने अविद्या को तम, अस्मिता को मोह और राग को महामोह कहा है, इसी प्रकार विवेकयुक्त जन ने द्वेष को तामिस्र और मिथ्या ज्ञानरूपी अभिनिवेश को अन्धतामिस्र बताया है ॥ २९–३३१/२ ॥

तम के आठ भेद हैं। मोह आठ प्रकार का कहा गया है । विद्वानों ने महामोह के दस भेद बताये हैं । बुद्धिमान् लोगों ने तामिस्र को अठारह भेदों वाला कहा है। अन्धतामिस्र के अठारह प्रकार के भेद बताये गये हैं ॥ ३४-३५ ॥ सर्वान्तर्यामी देवदेव शिव का सम्बन्ध अविद्या तथा राग से न तो वर्तमान में है, न पूर्वकाल में रहा है और न तो भविष्य में होगा। माया से परे, देवताओं के भी देव, स्थाणु, पशुपति तथा सर्वैश्वर्यसम्पन्न उन शिव का सम्बन्ध द्वेष से तीनों कालों में नहीं हो सकता । उसी प्रकार शरणदाता तथा कल्याणकारक परमात्मा शिव का सम्बन्ध अभिनिवेश से भी कभी नहीं सम्भव है। पुण्य तथा पापकर्मों से भी अविद्या का अतिवर्तन करने वाले उन शिव का सम्बन्ध तीनों कालों में नहीं है । कल्याण प्रदान करने वाले सर्वरूप शिव का सम्बन्ध [ शुभाशुभ ] कर्मों के फल से भी तीनों कालों में नहीं है ॥ ३६–४० ॥

वे बोधानन्दस्वरूप परम शिव तीनों कालों में विद्यमान रहने वाले उन विनाशशील सुख-दुःखों से स्पर्श होने योग्य नहीं हैं । बुद्धि के स्वामी तथा स्वयं प्रकट होने वाले वे महादेव महेश्वर तीनों कालों में अनुभूत होने वाली कामनाओं से भी अस्पृश्य हैं। इसी प्रकार काल का विनाश करने वाले भगवान् शिव तीनों कालों में वर्तमान कर्म-संस्कारों तथा भोग-संस्कारों से अस्पृश्य हैं ॥ ४१-४३ ॥ वे परमेश्वर भगवान् महादेव सम्पूर्ण जीवों से श्रेष्ठ हैं और जड़-चेतनरूप सम्पूर्ण सृष्टि-प्रपंच से परे हैं । जैसे संसार में ज्ञान और ऐश्वर्य को अत्यन्त श्रेष्ठ रूप में देखा जाता है, वैसे ही अतिशय कल्याणरूप होने से ही मनीषियों ने महादेव को शिव कहा है ॥ ४४-४५ ॥ प्रत्येक सर्ग में उत्पन्न होने वाले तथा कालसीमा में बँधे सभी ब्रह्माओं को सम्पूर्ण शास्त्रों का आरम्भ में उपदेश करने वाले वे शिव ही हैं। कालसीमा से रहित वे सर्वेश्वर शिव कालावच्छेद से युक्त सभी गुरुओं के भी गुरु हैं ॥ ४६-४७ ॥

देह में विद्यमान जीव तथा ईश्वर का यह सेवक तथा सेव्य का सम्बन्ध अनादि है । स्वभाव से अत्यन्त निर्मल तथा विश्वरूप वे शिव माया-सम्बन्ध से रहित हैं । [ नित्यानन्दस्वरूप होने के कारण ] अपने प्रयोजन के अभाव में भी वे परमेश्वर शिव जीव के प्रति समस्त कार्यों का प्रयोजनरूप अनुग्रह हैं ॥ ४८-४९ ॥ प्रणव उन परमात्मा शिव का वाचक है। यह प्रणव शिव – रुद्र आदि शब्दों में श्रेष्ठ कहा गया है। शिव के वाचक प्रणव के जप से तथा उसकी भावना से जो सिद्धि होती है, वह अन्य मन्त्रों के जप से प्राप्त नहीं होती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५०-५१ ॥ देवदेव आदित्यरूपी शिव ने [ याज्ञवल्क्य की तपस्या से प्रसन्न होकर ] सभी की अनुकम्पा से ज्ञानतत्त्वरूप श्रेष्ठ पाशुपत योग का उपदेश उन्हें दिया था। तत्पश्चात् याज्ञवल्क्य ने गार्गी से कहा — ॥ ५२१/२ ॥

हे गार्गि ! अयोगी लोग नाशशून्य जो शिवतत्त्व है, उसे विराट्-रुप, अनन्त तथा अत्यन्त आश्चर्यजनक बताते हैं, किंतु योगीलोग उसे अदीर्घ अलोहित, मस्तक- विहीन, कभी अस्त न होने वाला, अतएव नित्यानन्दरस- स्वरूप, स्पर्शशून्य, अगन्ध, अरस ( रसविहीन), अचक्षुष्क (नेत्रविहीन), अश्रोत्र ( कर्णरहित), मन तथा वाणी से परे, अतेजस्क (अदाहक), अप्रमाण, सुखकारी, नाम तथा गोत्र से विहीन, मृत्युरहित, जराशून्य, अनामय (रोगरहित), अमृत (मोक्षरूप) ॐ-कार शब्द से प्रतिपाद्य, सुधारूप, अनाच्छादित, पूर्वभाग से शून्य, अपरभागशून्य तथा अन्तरहित भी नहीं कहते हैं। वह ब्रह्म सब कुछ खाता है और वह ब्रह्म कुछ भी नहीं खाता है ॥ ५३ ॥ इस उत्तम पाशुपतयोग में जिस मनुष्य की अभिरुचि होती है, वह इस श्रेष्ठ पाशुपत योग को जानकर अन्तकाल में परमेश्वर में विलीन हो जाता है । ॐकाररूप दीपक को प्रज्वलित करके वायु से भी अधिक वेग से गति करने वाले तथा इन्द्रियों के स्वामी मन को भलीभाँति नियन्त्रित करके अन्तर्यामी, सूक्ष्म तथा सबके आदिस्वरूप उस परमात्मा का अन्वेषण करो। तुम वाग्जालों में पड़कर किसलिये वृथा विवाद कर रहे हो । भय तो कुछ भी नहीं दिखायी दे रहा अतः तुम अपनी ही देह में विद्यमान शम्भु को देखो; अन्धकारमय शास्त्रजाल में क्यों भटक रहे हो ? इस प्रकार मुमुक्षु को चाहिये कि वह शिवजी के द्वारा मुनियों के प्रति कहे गये उपदेश पर विद्वानों के साथ भलीभाँति विचार करके आनन्दरूप आत्मस्वरूप को पंचकोश से परे करके अभयरूपी मोक्ष प्राप्त करे ॥ ५४–५६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत उत्तरभाग में ‘पाशुपतव्रतवर्णन’ नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥

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