28 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -078 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ अठहत्तरवाँ अध्याय शिवाचार के परिपालन में अहिंसाधर्म की महिमा एवं शिवभक्ति का माहात्म्य श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अष्टसप्ततितमोऽध्यायः भक्तिमहिमवर्णनं सूतजी बोले — हे श्रेष्ठ मुनियो ! शिवक्षेत्र में वस्त्र के द्वारा छाने हुए पवित्र जल से ही उपलेपन-कार्य करना चाहिये; अन्यथा सिद्धि नहीं मिलती है। हे श्रेष्ठ मुनियो ! विशेषकर नदी से ग्रहण किया गया फेनरहित जल, जो पुनः वस्त्र से छाना गया हो — ऐसा जल पवित्र होता है ॥ १-२ ॥ अतः हे उत्तम द्विजो! समस्त कार्यों की सिद्धि के लिये सभी देवकार्यों को पवित्र जल से करना चाहिये । जल सूक्ष्म कीटाणुओं से युक्त रहता है, अतः निश्चय ही अपवित्र जल से देवकार्य करने पर वही सारा पाप होता है, जो उन्हें मारने से होता है। झाडू लगाने, सफाई करने, विशेष करके अग्निकर्म में, कूटने- पीसने में तथा जल संग्रह में गृहस्थ मनुष्यों से हिंसा हो जाती है, अतः हिंसा से बचना चाहिये। हे द्विजो ! सभी प्राणियों के प्रति यह अहिंसा [भाव] सबसे बड़ा धर्म है, अतः पूर्ण प्रयत्न से वस्त्र से पवित्र किया हुआ (छाना हुआ) जल प्रयोग करना चाहिये ॥ ३–६१/२ ॥ वह दान पुण्यप्रद तथा सभी दानों में उत्तमोत्तम है, जो अभय देने वाला होता है, अतः सभी जगह सर्वदा हिंसा का त्याग करना चाहिये । मन-वाणी तथा कर्म से जो किसी की हिंसा नहीं करता अर्थात् उन्हें दुःख नहीं पहुँचाता, ऐसे अहिंसक व्यक्ति की सभी प्राणी सदा रक्षा करते हैं और हिंसक को कष्ट पहुँचाते हैं। वेद के पारगामी विद्वान् को सम्पूर्ण त्रिलोक का दान देकर मनुष्य जो फल पाता है, उसका करोड़ों गुना फल अहिंसक मनुष्य प्राप्त करता है ॥ ७–९१/२ ॥ मन, वचन तथा कर्म से सभी प्राणियों के हित में संलग्न और दयादृष्टि के मार्ग पर चलने वाले रुद्रलोक को जाते हैं। जो लोग स्वामी के समान विभिन्न प्राणियों को अपने पुत्र-पौत्र के समान समझकर स्नेहपूर्वक उनकी रक्षा करते हैं, वे रुद्रलोक को जाते हैं। अतः पूरे प्रयत्न से वस्त्र से पवित्र किये गये जल के द्वारा सदा अभ्युक्षण तथा विशेषरूप से स्नान कराना चाहिये । सम्पूर्ण त्रिलोक का संहार करने पर जो [पाप का] फल कहा गया है, उस सम्पूर्ण पाप को मनुष्य शिवालय में मात्र एक प्राणी की हत्या करके प्राप्त करता है ॥ १०-१३१/२ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो ! शिव के निमित्त सदा पुष्प हिंसा की जानी चाहिये । यज्ञ के लिये पशु हिंसा दुष्ट शासन है; यह क्षत्रियों के द्वारा की जा सकती है। ब्रह्मवादी योगियों के लिये [कोई ] विधि निषेध नहीं है । अतः निषिद्ध का सेवन करने पर भी वे वध्य नहीं हैं। सभी कर्मों का त्याग करके संन्यास लिये हुए ब्रह्मवादी लोगों का वध नहीं करना चाहिये; व पापकर्म में लगे रहने पर भी सदा पूज्य हैं ॥ १४–१६१/२ ॥ अत्रि के कुल में उत्पन्न सभी स्त्रियाँ पवित्र होती हैं। अत्रिवंश की स्त्री की हत्या करने पर ब्रह्महत्या के समान पा लगता है, अतः पापकर्म में रत होने पर भी उन स्त्रियों की हत्या नहीं करनी चाहिये। सभी लोगों को चाहिये कि यज्ञ हेतु सर्वत्र सर्वदा स्त्रियों को ग्रहण न करें; हे विप्रेन्द्रौ ! सभी वर्णों की स्त्रियाँ चाहे वे पापकर्म में रत हों, मलिन हों. रूपवती हों, कुरूप हों अथवा मलिन वस्त्रों वाली हों, मनुष्यों के द्वारा वध्य नहीं हैं; उनमें शिवभाव रखना चाहिये ॥ १७–२० ॥ वेद विरुद्ध व्रत तथा आचार वाले और श्रुति तथा स्मृति से विमुख लोग पाखण्डी कहे गये हैं । द्विजातियों को उनके साथ बातचीत नहीं करनी चाहिये, उनका स्पर्श नहीं करना चाहिये और उन्हें देखना नहीं चाहिये; उन्हें देखने पर सूर्य का दर्शन करना चाहिये; फिर भी राजाओं तथा अन्य प्राणियों को चाहिये कि उनका वध न करें ॥ २१-२२ ॥ द्विजो ! मनुष्य सज्जनों के संसर्गवश एक बार भी महेश्वर का पूजन करके रुद्रलोक प्राप्त कर लेता है । हे श्रेष्ठ द्विजो ! सभी दयारहित लोग तथा परमकारण शिव में भक्ति से हीन सभी मनुष्य दुःख भोगते हैं। जो लोग देवदेव परमेष्ठी शिव के भक्त हैं, वे भाग्यशाली हैं और इस लोक में सुखों को भोगकर मुक्त हो जाते हैं ॥ २३–२५ ॥ जैसे [गृहस्थ] मनुष्यों का चित्त पुत्रों, स्त्रियों तथा घरों में आसक्त रहता है, उसी प्रकार उनका चित्त यदि यतियों तथा तपस्वियों के सान्निध्य से एक बार भी आदिदेव में लग जाय तो परमेश्वर का लोक उनके लिये दूर नहीं है ॥ २६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘भक्तिमहिमावर्णन’ नामक अठहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७८ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -002 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -010 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -018 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -026 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -034 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -042 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -050 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -058 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -066 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -074 Powered by YARPP.