2 February 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -099 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ निन्यानबेवाँ अध्याय भगवान् शिव के वामभाग से शिवा का प्रादुर्भाव तथा शिवा का दक्षपुत्री सती के रूप में पुनः मेना की कन्या पार्वती के रूप में प्राकट्य श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नवनवतितमोऽध्यायः देवीसम्भव ऋषिगण बोले — हे सूतजी ! हे महामते ! आपने देवी की उत्पत्ति के विषय में बताया; अब उनके सतीत्व के विषय में ठीक-ठीक विस्तारपूर्वक बताइये और महादेवी का मेना से उत्पन्न होने तथा दक्ष के यज्ञविध्वंस का भी वर्णन कीजिये; विष्णु ने देवदेव शम्भु को उन्हें कैसे प्रदान किया और उन विष्णु का कल्याण किस प्रकार हुआ — यह सब इस समय बताने की कृपा कीजिये ॥ १-२१/२ ॥ उनका यह वचन सुनकर पौराणिकों में श्रेष्ठ सूतजी उन महात्माओं से महादेवी के जन्म के विषय में बताने लगे ॥ ३१/२ ॥ सूतजी बोले — [हे ऋषियो!] आप लोगों ने जो पूछा है, उस विषय में सर्वप्रथम ब्रह्मा ने दण्डी सनत्कुमार को विस्तार से बताया था, पुनः उन सनत्कुमार ने बुद्धिमान् व्यासजी को बताया और हे महाभागो ! उन [ व्यासजी ]- से सुन करके मैं आप लोगों के कहने पर उमा तथा शिव को प्रणाम करके विस्तारपूर्वक आप लोगों को बता रहा हूँ ॥ ४-५१/२ ॥ वे जगन्माता भग नाम वाली और लिङ्गरूप शिव की त्रिगुणवेदिका प्रकृतिरूपा हैं। लिङ्गरूप शिव सदा भगयुक्त रहते हैं । हे उत्तम द्विजो ! इन्हीं दोनों [ लिङ्ग तथा भग] से ही जगत् की सृष्टि होती है। लिङ्गस्वरूप शिव प्रकाशरूप हैं और सदा मायारूपी तम (अन्धकार) – के ऊपर विराजमान हैं। लिङ्ग तथा वेदी के समायोग से शिव अर्धनारीश्वर हो गये। उन्होंने पहले चतुर्मुख देव ब्रह्मा को पुत्ररूप में उत्पन्न किया ॥ ६-८ ॥ ज्ञानमय तथा विश्व में सबसे बढ़कर विभु अर्धनारीश्वर भगवान् हर ने उन [ब्रह्मा] को ज्ञान प्रदान किया। शिवजी ने उत्पन्न हुए ब्रह्मा को देखा और उन ब्रह्मा ने भी रुद्र शंकर महादेव को देखा। वहाँ स्थित अर्धनारीश्वर प्रभु शिव को देखकर ब्रह्मा ने अभीष्ट वचनों से उन वरदाता [शिव] – की स्तुति की। इसके बाद प्रभु अज ने विश्वेश्वर विश्वात्मा [ शिव] – से प्रार्थना की- ‘ अपने को विभक्त कीजिये । ‘ तब उन्होंने अपने बायें अंग से पत्नी के रूप में अपने ही समान देवी का सृजन किया ॥ ९-१२ ॥ इन [आत्मरूप] पुरुष की पुरातन शुभा पत्नी श्रद्धा हैं; शिव की आज्ञा से वे देवी दक्षपुत्री के रूप में उत्पन्न हुईं। उस समय उनका नाम सती पड़ा और उन्होंने रुद्र को पति के रूप में स्वीकार किया। कुछ समय के बाद दक्ष की निन्दा करके वे देवी पुनः मेना की पुत्री हुईं ॥ १३-१४ ॥ नारद के शाप के कारण अवज्ञा से दुर्मद दक्ष ने भी देवदेव उमापति की निन्दा करके यज्ञ किया। तब शिव के प्रति अनादरपूर्ण दक्षकृत्य को जानकर सती ने उसी क्षण अपनी देह को योगमार्ग से भस्म करके पुनः पर्वतराज हिमाचल की तपस्या से [ उनकी पुत्री होकर ] देवी पार्वती के रूप में जन्म लिया । यह जानकर च्यवन के पुत्र के कहने से भगवान् प्रभु भर्ग ने कुपित होकर दक्ष के विस्तृत यज्ञ को जला दिया । च्यवन के बुद्धिमान् पुत्र दधीच नाम से प्रसिद्ध थे। शिव की कृपा से युद्ध में विष्णु को जीतकर उन मुनीश्वर ने विष्णुसहित लोकपालों को यह शाप दे दिया — ‘हे देवताओ! शंकर की माया के कारण रुद्र के क्रोध से उत्पन्न हविष्याग्नि के द्वारा क्षणभर में [ आप लोगों का ] विनाश हो जायगा ‘ ॥ १५-२० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘देवी की उत्पत्ति’ नामक निन्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९९ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -002 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -010 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -018 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -026 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -034 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -042 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -050 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -058 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -066 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -074 Powered by YARPP.