31 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -093 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ तिरानबेवाँ अध्याय हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुर का आख्यान तथा शिवानुग्रह से उसे गाणपत्यपद की प्राप्ति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे त्रिनवतितमोऽध्यायः अन्धकगाणपत्यात्मक ऋषिगण बोले — [ हे सूतजी!] अन्धक नामक दैत्यराज ने मन्दरपर्वत की सुन्दर गुफा में दमित होकर किस प्रकार महेश्वर से गाणपत्य (गणपतिपद ) प्राप्त किया; जिस प्रकार यह घटित हुआ और जैसा आपने सुना है, वह कृपापूर्वक हम लोगों को बताइये ॥ १-२ ॥ सूतजी बोले — [ हे ऋषियो!] मैं अन्धक पर [शिवजी के] अनुग्रह, मन्दर पर उसके दमन तथा वरप्राप्ति — यह सब संक्षेप में बता रहा हूँ। प्राचीनकाल में हिरण्याक्ष का एक पुत्र था; हिरण्याक्ष के समान शक्तिशाली वह अन्धक — इस नाम से प्रसिद्ध हुआ और उसने तपस्या से महान् पराक्रम प्राप्त कर लिया। वह साक्षात् ब्रह्मा की कृपा से [किसी से] न मारे जाने का वर प्राप्त करके सम्पूर्ण त्रिलोकों का उपभोग करके इन्द्रलोक को लीलापूर्वक बिना प्रयास के ही जीतकर इन्द्र को पीड़ित करने लगा ॥ २-५ ॥ उसके द्वारा कष्ट पहुँचाये गये, पीटे गये, बाँधे गये, गिराये गये नारायण आदि वे देवता डरकर मन्दरपर्वत की गुफा में प्रविष्ट हो गये ॥ ६ ॥ इस प्रकार देवताओं को बहुत पीड़ित करके महादैत्य अन्धक भी अपनी इच्छा से सुन्दर गुफा वाले मन्दरपर्वत पर पहुँच गया ॥ ७ ॥ तब साध्यों सहित वे सभी देवगण शीघ्र ही सुरेश्वर महेश के सामने पहुँचकर इस प्रकार बोले — ‘दैत्यराज [अन्धक] – के शस्त्रों से काटे गये हमलोग छिन्न-भिन्न अंगों वाले हो गये हैं और अल्प पराक्रम वाले हो गये हैं’ ॥ ८ ॥ तब दैत्य का अद्भुत आगमन – सम्बन्धी यह सब वृत्तान्त सुनकर भगवान् शिव अपने गणेश्वरों के साथ अन्धक के समक्ष पहुँचे ॥ ९ ॥ उस समय इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु आदि प्रधान सुरेश्वर तथा श्रेष्ठ विप्र – ये सब बद्ध अंजलियों को सिर से लगाकर चारों ओर से भगवान् शिव की जय बोलने लगे ॥ १० ॥ तब महादेव ने सैकड़ों-करोड़ों सैनिकों के साथ उस अन्धक के समस्त राक्षसों को भस्म करके अन्धक को [ अपने त्रिशूल से] बींध डाला ॥ ११ ॥ शिव के द्वारा त्रिशूल से बींधे गये उस दग्धपापरूपी कंचुक वाले अन्धक को देखकर ब्रह्माजी ईश्वर (शिव) – को प्रणाम करके [प्रसन्नता से] निनाद करने लगे ॥ १२ ॥ उस ध्वनि को सुनकर सभी देवता, मुनि तथा श्रेष्ठ गण भी उन्हें प्रणाम करके हर्षध्वनि करने लगे, नाचने लगे और आनन्द मनाने लगे। देवताओं ने उस समय शिवजी के ऊपर पुष्पों की वर्षा की और सम्पूर्ण त्रैलोक्य हर्ष के कारण आनन्दित हो उठा तथा ध्वनि करने लगा ॥ १३-१४ ॥ प्रज्वलित अग्नि वाले त्रिशूल से बींधा हुआ प्रेततुल्य वह अन्धक सात्त्विक भाव में स्थित होकर मन में सोचने लगा — ‘ पूर्वजन्म में भी शिव ने मुझे दग्ध किया था, मैंने पहले साक्षात् महेश्वर शिव की आराधना की थी, इसीलिये मैंने ऐसी गति प्राप्त की, अन्यथा ऐसा कभी न होता । जो [ व्यक्ति ] मृत्युकाल के समय एक बार भी मन से शिव का स्मरण करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है, तो फिर जो बहुत बार स्मरण करे, उसका कहना ही क्या ! ब्रह्मा, भगवान् विष्णु और इन्द्रसहित सभी देवता उन्हीं की शरण ग्रहण करके स्थित हैं, अतः उन्हीं [शिव] – की शरण में जाना चाहिये’ ॥ १५–१८१/२ ॥ इस प्रकार विचार करके वह अन्धक अपने पुण्यगौरव के कारण गणों सहित अन्धक का संहार करने वाले उन ईशान शिव की स्तुति करने लगा। तब उसके द्वारा प्रार्थित होकर बड़े-से-बड़े दुःख का हरण करने वाले नीललोहित सुरेश्वर भगवान् हर [अपने] त्रिशूल के अग्रभाग पर स्थित हिरण्याक्षपुत्र [ अन्धक] – की ओर दयापूर्वक देखकर उससे बोले — ‘हे वत्स! मैं [तुम पर] प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; मैं तुम्हारी कौन-सी कामना पूर्ण करूँ? हे दैत्येन्द्र ! वर माँगो । हे अन्धक! मैं तुम्हें वर देने वाला हूँ’ ॥ १९-२२ ॥ तब शम्भु का वचन सुनकर हिरण्याक्षपुत्र ने हर्ष के कारण गद्गद वाणी में महेश्वर से यह कहा — ‘हे भगवन्! हे देवदेवेश ! भक्तों का कष्ट हरने वाले हे शंकर! मुझ पर प्रसन्न होइये । हे ईश ! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो यही वर प्रदान करें कि आपमें [सदा] मेरी भक्ति हो’ ॥ २३-२४ ॥ महान् आत्मा वाले अन्धक का वचन सुनकर परम कान्ति वाले शिव ने [उस ] दैत्येन्द्र को [ अपनी] दुर्लभ भक्ति प्रदान की और उस दैत्य को त्रिशूल पर से उतारकर उसे गणाधिप पद प्रदान किया। तब इन्द्र आदि देवताओं ने गाणपत्य पद पर प्रतिष्ठित उस अन्धक को प्रणाम किया ॥ २५-२६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘अन्धकगाणपत्यात्मक’ नामक तिरानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९३ ॥ See Also:– अन्धकासुर की उत्पत्ति की कथा, शिव के वरदान से हिरण्याक्ष द्वारा अन्धक को पुत्ररूप में प्राप्त करना Content is available only for registered users. Please login or register Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -002 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -010 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -018 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -026 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -034 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -042 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -050 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -058 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -066 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -074 Powered by YARPP.