श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -083
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
तिरासीवाँ अध्याय
विभिन्न मासों में किये जाने वाले शिवव्रतों का विधान
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे त्र्यशीतितमोऽध्यायः
शिवव्रतकथनं

ऋषिगण बोले — [ हे सूतजी !] हम लोगों ने आदरपूर्वक पवित्र व्यपोहनस्तव को सुन लिया; अब आप प्रसंग से लिङ्गदान के व्रतों को भी हम लोगों को बताइये ॥ १ ॥

सूतजी बोले — हे श्रेष्ठ मुनियो ! मैं आप लोगों को शुभ व्रत बताऊँगा; नन्दी ने बुद्धिमान् ब्रह्मापुत्र सनत्कुमार को उन्हें बताया था, उन्हीं [ व्रतों] को व्यासजी से सुनकर मैं आप लोगों को बता रहा हूँ ॥ २१/२

एक वर्ष तक दोनों पक्षों की अष्टमी तथा चतुर्दशी को केवल रात्रि में आहार ग्रहण करता हुआ जो [ मनुष्य ] शिव की पूजा करता है, वह समस्त यज्ञों का फल प्राप्त करके परमगति प्राप्त करता है। पर्वों पर एक दिन- रात इस व्रत को करके और पृथ्वी को पात्र बनाकर भोजन करने से मनुष्य तीन रात्रियों का फल प्राप्त करता है ॥ ३–५ ॥ जो मनुष्य महीने की दोनों पंचमी तथा प्रतिपदा तिथियों में क्षीरधारा व्रत करता है अर्थात् केवल दुग्ध के आहार पर रहता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है। कृष्णपक्ष की अष्टमी से कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तक [ केवल ] रात में भोजन करने वाला भोगों को प्राप्त करता है और [अन्त में] ब्रह्मलोक जाता है ॥ ६-७ ॥

जो [मनुष्य] ब्रह्मचर्य में स्थित रहकर, क्रोध को वश में करके तथा शिवध्यानपरायण होकर एक वर्ष तक सभी पर्वों में नक्तव्रत करता है और वर्ष के अन्त में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को विधिपूर्वक भोजन कराता है, वह शिवलोक जाता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ८-९ ॥ उपवास की अपेक्षा भिक्षा श्रेष्ठ है, भिक्षा की अपेक्षा बिना माँगे प्राप्त भोजन श्रेष्ठ है और बिना माँगे प्राप्त भोजन की अपेक्षा नक्तव्रत श्रेष्ठ है; अतः नक्तव्रत करना चाहिये ॥ १० ॥ पूर्वाह्न में किया गया भोजन देवताओं का, मध्याह्न में ऋषियों का, अपराह्न में पितरों का और सन्ध्या में गुह्यकों का होता है, किन्तु सभी कालों का अतिक्रमण करके रात में किया गया भोजन उत्तम होता है। रात में भोजन करने वाले को हविष्यान्न ग्रहण करना चाहिये, स्नान करना चाहिये, सत्य का पालन करना चाहिये, कम खाना चाहिये, अग्निहोत्र करना चाहिये और भूमि पर शयन करना चाहिये ॥ ११-१२१/२

अब मैं प्रत्येक महीने में किये जाने वाले उत्तम शिवव्रत का वर्णन करूँगा, जो धर्म-काम-अर्थ-मोक्ष के लिये और सभी पापों की शुद्धि के लिये होता है। जो [ मनुष्य ] सत्यवादी तथा जितक्रोध ( क्रोध को वश में किया हुआ) होकर पुष्य (पौष) मास में [ शिव का] विधिवत् पूजन करके चावल, गेहूँ और गोदुग्ध से बने हुए भोजन को केवल रात में ग्रहण करता है; दोनों पक्षों की अष्टमी तिथि में यत्नपूर्वक उपवास करता है तथा भूमि पर शयन करता है और हे द्विजो ! मास के अन्त में पूर्णिमा के दिन घृत आदि से महादेव को स्नान कराकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करके श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दुग्ध तथा घृतमिश्रित पके हुए यव तथा चावल का भोजन कराता है एवं विशेषरूप से शान्ति मन्त्रों का जप करता है और देवदेव परमेश्वर भव शिवजी को कपिल वर्ण का गोमिथुन (गाय तथा वृषभ) समर्पित करता है — हे श्रेष्ठ मुनियो ! वह [ मनुष्य ] उत्तम अग्निलोक को जाता है और अनेक लोकों के सुखों का भोग करके वहीं पर मुक्त हो जाता है ॥ १३-१९ ॥

माघ मास में जो [मनुष्य] पूजन करके केवल नक्त भोजन करता है, घृतयुक्त कृशर का आहार ग्रहण करता है, इन्द्रियों को वश में किये रहता है, दोनों पक्षों की चतुर्दशी में उपवास करता है, पूर्णिमा के दिन रुद्र को घृत- कम्बल अर्पित करता है, कृष्ण वर्ण का गोमिथुन प्रदान करता है, शिव की पूजा करता है, [अपने] सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराता है, वह यमलोक पहुँचकर यम के साथ आनन्द मनाता है ॥ २०-२२१/२

फाल्गुन मास आने पर जो घी तथा दूध में पकाये हुए साँवाँ के अन्न का नक्त भोजन करता है, इन्द्रियों को तथा क्रोध को वश में किये रहता है, अष्टमी तथा चतुर्दशीके दिन उपवास करता है, पूर्णिमा के दिन महादेव शंकर को स्नान कराकर उनकी पूजा करके उन शूलपाणि [शिव] – को ताम्रवर्ण का गोमिथुन प्रदान करता है और ब्राह्मणों को भोजन कराकर परमेश्वर से प्रार्थना करता है, वह चन्द्रमा का सायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ २३-२६ ॥ श्रेष्ठ मुनियो ! जो चैत्र महीने में रुद्र की पूजा करके घी और दूध से युक्त तथा पके हुए शालि-चावल को अपनी रुचि के अनुसार रात्रि में ग्रहण करता है, रात में गोशाला में भूमि पर शयन करता है, शिवजी का स्मरण करता है, पूर्णमासी के दिन शिव को स्नान कराकर श्वेतवर्ण का गोमिथुन प्रदान करता है और ब्राह्मणों को भोजन कराता है, वह निर्ऋतिलोक को प्राप्त करता है ॥ २७-२८१/२

वैशाख महीने में नक्तभोजन करके पूर्णमासी तिथि में पंचगव्य, घृत आदि से शिवजी को स्नान कराकर श्वेतवर्ण का गोमिथुन अर्पित करके वह [ मनुष्य ] अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥ २९-३० ॥ ज्येष्ठ मास में देवेश, भव, शर्व, उमापति की श्रद्धापूर्वक पूजा करके मधु-जल-घृतमिश्रित पवित्र शालिचावल का केवल रात में आहार ग्रहण करके वीर आसन में स्थित होकर आधी रात में गायों की सेवा में तत्पर रहकर पूर्णिमा के दिन देवदेव उमापति को स्नान कराकर उनकी पूजा करके विधानपूर्वक शिवजी को चरु अर्पित करके पुनः अपने सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर धूम्रवर्ण का गोमिथुन [शिवजीको] अर्पित करने से वह वायुलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ३१–३४ ॥ इसी प्रकार आषाढ़ महीने में भी चीनी, घृत तथा गोदुग्धमिश्रित सत्तू के नक्त- भोजन में तत्पर रहते हुए पूर्णिमा के दिन घृत आदि से [ शिवजी को] स्नान कराकर विधिपूर्वक पूजन करके वेद में पारंगत श्रोत्रिय ब्राह्मणों को भोजन कराकर जो गौरवर्ण का गोमिथुन अर्पित करता है, वह वरुणलोक प्राप्त करता है ॥ ३५-३६१/२

हे द्विजो ! सावन महीने में दूधमिश्रित षष्टिक (साठ दिन में उत्पन्न होने वाले शालिचावल ) – के भात का नक्तभोजन करके वृषभध्वज की पूजा करके [ अन्त में] पूर्णिमा के दिन घृत आदि से स्नान कराकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करके वेद में पारंगत श्रोत्रिय ब्राह्मणों को भोजन कराकर जो [मनुष्य] सफेद खुरवाला तथा चितकबरा गोमिथुन शिवजी को अर्पित करता है, वह वायुदेव का सायुज्य प्राप्त करता है और वायु के समान सर्वगामी हो जाता है ॥ ३७–३९१/२

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! इसी प्रकार भाद्रपद महीना आने पर हवन से बची हुई सामग्री का नक्तभोजन करके दिन में वृक्ष के मूल का आश्रय लेकर विश्राम करते हुए [अन्त में] पूर्णिमा के दिन देवेश शंकर को स्नान कराकर [उनकी] पूजा करके भक्तिपूर्वक विधि के अनुसार नीलवर्ण के स्कन्ध वाला वृषभ तथा एक गाय शिवजी को अर्पित करके वेद-वेदांग में पारंगत ब्राह्मणों को भोजन कराकर मनुष्य यक्षलोक प्राप्त करके यक्षों का राजा हो जाता है ॥ ४०–४२१/२

इसके बाद इसी तरह आश्विन (क्वार) मास में केवल रात में घी से बना हुआ भोजन करके पूर्णिमा तिथि में पूर्व की भाँति शंकर की पूजा करके ब्राह्मणों तथा सर्वदा पवित्र रहने वाले शिवभक्तों को भोजन कराकर नीलवर्ण की आभा वाले तथा उन्नत उरुदेश वाले एक वृषभ और एक गाय का विधिपूर्वक दान करके मनुष्य ईशानलोक प्राप्त करता है ॥ ४३-४५ ॥ हे द्विजो! कार्तिक मास में रात्रि में घृतयुक्त दुग्धोदन का भोजन करके भगवान् शिव का पूजनकर [ अन्त में ] पूर्णिमा तिथि में विधिपूर्वक [शिवजी को ] स्नान कराकर पुनः उन्हें चरु का नैवेद्य अर्पित करके अपने सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर पूर्व की भाँति कपिल वर्ण का गोमिथुन शिवजी को समर्पित करके मनुष्य सूर्यसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ४६–४८ ॥ मार्गशीर्ष (अगहन) महीने में भी विधिपूर्वक दूध तथा घी में पकाये हुए जौ का रात्रि में भोजन करके [अन्त में] पूर्णिमा के दिन पूर्व की भाँति शर्व शम्भु को स्नान कराकर उनकी पूजा करके वेद में पारंगत निर्धन ब्राह्मणों को भोजन कराकर तथा विधिपूर्वक पाण्डुरवर्ण का गोमिथुन [शिवजी को] समर्पित करके मनुष्य सोमलोक प्राप्त करके [ वहाँपर ] सोम के साथ आनन्द प्राप्त करता है ॥ ४९–५१ ॥

अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य, क्षमा, दया, तीनों काल में स्नान, अग्निहोत्र, पृथ्वी पर शयन, रात्रिभोजन और दोनों पक्षों की अष्टमी तथा चतुर्दशी को उपवास – इन सबको तथा प्रत्येक महीने के शिवव्रत को मैंने कह दिया; हे द्विजो ! जो [मनुष्य ] क्रम से अथवा विपरीत क्रम से वर्षभर इसे करता है, वह शिवसायुज्य तथा ज्ञानयोग प्राप्त करता है ॥ ५२-५४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘शिवव्रतकथन’ नामक तिरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८३ ॥

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