26 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -073 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ तिहत्तरवाँ अध्याय लिङ्गार्चन की विधि तथा उसकी महिमा श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ब्रह्मप्रोक्तलिङ्गार्चनविधि सूतजी बोले — [ हे ऋषियो ! ] क्षणभर में त्रिपुर को जलाकर देव महेश्वर के चले जाने पर भगवान् पद्मयोनि (ब्रह्मा) – ने श्रेष्ठ देवताओं की सभा में [इस प्रकार ] कहा — ॥ १ ॥ पितामह बोले — लिङ्गमूर्ति देवदेवेश महेश्वर की उपेक्षा करके दिति से उत्पन्न महातेजस्वी तारकपौत्र और तारक का बलवान् पुत्र तारकाक्ष, पराक्रमी कमलाक्ष, दैत्यराज विद्युन्माली तथा अन्य राक्षस भी [अपने] बन्धुओं सहित मारे गये । [ इस प्रकार ] प्रभु श्रीहरि की माया से भगवान् महादेव का त्याग करके वे सब अपने पुरों तथा नागरिकों सहित विनष्ट तथा ध्वस्त हो गये ॥ २-४ ॥ अतः लिङ्गमूर्ति सदाशिव की सर्वदा पूजा करनी चाहिये। जबतक उनकी पूजा होगी, तभीतक देवताओं की स्थिति बनी रहेगी, अतः श्रेष्ठ देवताओं को नित्य श्रद्धापूर्वक शिव का पूजन करना चाहिये। समस्त जगत् लिङ्गमय है, सब कुछ लिङ्ग में प्रतिष्ठित है, अतः जो आत्मसिद्धि चाहता है, उसे [शिव] लिङ्ग की विधिवत् पूजा करनी चाहिये ॥ ५-६१/२ ॥ सभी देवता, दैत्य तथा दानव लिङ्गार्चन से ही प्रतिष्ठित हैं । यक्ष, विद्याधर, सिद्धगण, मांसभक्षी राक्षस, पितर, मुनि, पिशाच, किन्नर आदि लिङ्गमूर्ति का अर्चन करके सिद्धि को प्राप्त हुए हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७-८१/२ ॥ अतः हे देवताओ ! जिस किसी भी प्रकार से नित्य लिङ्ग की पूजा करनी चाहिये । हम लोग उन बुद्धिमान् देवाधिदेव के पशु हैं। अतः पाशुपत व्रत करके पशुत्व का त्याग करके लिङ्गमूर्ति सनातन महादेव की पूजा करनी चाहिये। हे श्रेष्ठ देवताओ ! पाँच प्रणवयुक्त पाँच प्राणायामों के द्वारा पंचभूतों का शोधन करके; हे देवताओ! चार प्रणवों के साथ चार प्राणायामों द्वारा, पुनः उसी प्रकार के तीन प्रणवों के साथ [ तीन ] प्राणायामों द्वारा, पुनः दो प्रणवों सहित [ दो ] प्राणायामों के द्वारा शोधन करके; प्राणायाम परायण होकर ओंकार का न्यास करके; तदनन्तर ओंकार का उच्चारण करके प्राण तथा अपान [वायु]-को नियन्त्रित कर ज्ञानामृतरूपी प्रणव से सभी अंगों को आप्लावित मानकर; हे सुव्रतो! तीनों गुणों, चौथा अहंकार, [पाँच] तन्मात्राओं, [पाँच] भूतों, [पाँच] ज्ञानेन्द्रियों, [पाँच] कर्मेन्द्रियों का शोधन करके, पुनः युगलपुरुष का शोधन करके [अपने] शरीर को चिदात्मस्वरूप मानकर अग्नि भस्म है, वायु भस्म है, व्योम [आकाश] भस्म है, जल भस्म है, पृथ्वी भस्म है — ऐसा कहकर भस्म का स्पर्श करना चाहिये। जो तीनों सन्ध्याओं में भस्मस्नान करता है, वह योगी तथा सभी तत्त्वों का ज्ञाता हो जाता है । हे श्रेष्ठ देवताओ ! [स्वयं ] भगवान् शिव ने पाश (बन्धन) – से मुक्ति के लिये इस पाशुपतव्रत को कहा है ॥ ९-१८ ॥ हे देवताओ ! इस प्रकार पाशुपतव्रत करके पूर्वकाल में मेरे तथा महात्मा विष्णु के द्वारा देखे गये एक वर्ष में पशुत्व से मुक्त हो जाते हैं। हम लोगों को लिङ्ग में परमेश्वर की विधिपूर्वक पूजा करके लोग सभी कर्मों के देव महेश्वर की पूजा यत्नपूर्वक बाह्य तथा आभ्यन्तर विधि से करनी चाहिए — ऐसा मैं मानता हूँ। हे श्रेष्ठ देवताओ ! मेरी, विष्णु की तथा मुनियों की यह दिव्य प्रतिज्ञा है; इसमें सन्देह नहीं है । अतः शिव का पूजन [अवश्य] करना चाहिये ॥ १९–२११/२ ॥ यदि कोई एक क्षण या एक मुहूर्त भी शिव का चिन्तन नहीं करता, तो वही [ उसकी] हानि है, वही दोष है, वही उसका अज्ञान है और वही उसकी मूकता है। जो लोग शिवभक्ति में संलग्न हैं, अन्तःकरण से शिव को प्रणाम करने वाले हैं तथा भगवान् शिव के स्मरण में लगे हुए हैं, वे दु:ख के पात्र नहीं होते हैं। सुन्दर भवन, दिव्य आभूषण, स्त्रियाँ तथा तुष्टिपर्यन्त धन — यह सब शिवपूजा विधि का फल है। जो लोग महाभोगों तथा स्वर्ग का राज्य चाहते हैं, वे सभी समयों में लिङ्गमूर्ति महेश्वर का अर्चन करें। सभी प्राणियों का वध तथा छेदन करके और इस सम्पूर्ण जगत् को जलाकर भी जो एकमात्र विरूपाक्ष [शिव] -की पूजा करता है, वह पापों से लिप्त नहीं होता है, मेरे द्वारा पूजित यह शिलामय लिङ्ग सभी देवताओं के द्वारा नमस्कृत है ॥ २२-२७ ॥ ऐसा कहकर पहले ब्रह्माजी ने तीनों लोकों के स्वामी, देवों के भी देव तथा तीन नेत्रों वाले रुद्र की पूजा करके प्रिय वचनों से [उनकी] स्तुति की। उसी समय से इन्द्रादि [ देवता] शरीर में भस्म पोतकर पाशुपतव्रत करके साक्षात् महेश्वर की पूजा करने लगे ॥ २८-२९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘ब्रह्मप्रोक्तलिङ्गार्चनविधि’ नामक तिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७३ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -006 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -007 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -014 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -022 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -030 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -038 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -046 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -054 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -062 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -070 Powered by YARPP.