श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -063
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
तिरसठवाँ अध्याय
दक्ष प्रजापति द्वारा मैथुनी सृष्टि का प्रादुर्भाव, दक्षकन्याओं की वंश-परम्परा तथा ऋषि वंश वर्णन
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे त्रिषष्टितमोऽध्यायः
देवादिसृष्टिकथनं

ऋषिगण बोले —  हे सूतजी ! अब आप देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, उरगों और राक्षसों की उत्पत्ति का उत्तम विधि से यथाक्रम वर्णन कीजिये ॥ १ ॥

सूतजी बोले —  पूर्व पुरुषों की सृष्टि संकल्प से, दर्शन से तथा स्पर्श से कही जाती है । प्रचेतस के पुत्र दक्ष के बाद [स्त्री-पुरुष के] संयोग से सृष्टि प्रारम्भ हुई। जब देवताओं, ऋषियों और पन्नगों का सृजन करते हुए उन प्रजापति से लोक वृद्धि को प्राप्त नहीं हुआ, तब दक्ष ने मैथुनयोग से [अपनी भार्या] सूति से पाँच हजार पुत्र उत्पन्न किये । तत्पश्चात् उन महाभाग्य वालों को देखकर वे अनेक प्रकार की प्रजाओं की सृष्टि के इच्छुक हो गये ॥ २–४ ॥

तब नारदजी ने उत्पन्न हुए [ उन] हर्यश्व नाम वाले दक्ष-पुत्रों से कहा — ऊपर तथा नीचे पृथ्वी का प्रमाण जानकर आप लोग विशेष रूप से सृष्टि कीजिये। हे मुनिश्रेष्ठो ! उनका वचन सुनकर वे सभी दिशाओं में चले गये । वे आज तक नहीं लौटे, जैसे नदियाँ [समुद्र में मिलकर] समुद्र से वापस नहीं लौटतीं ॥ ५-६१/२

हर्यश्वसंज्ञक पुत्रों के नष्ट हो जाने पर प्रजापति प्रभु दक्ष ने सूति से पुन: एक हजार पुत्रों को उत्पन्न किया। हे विप्रो ! जब शबल नाम वाले वे पुत्र सृष्टि करने के लिये एकत्रित हुए, तब नारद ने सूर्य के समान तेज वाले उन आये हुए पुत्रों से पुन: कहा — ‘पृथ्वी का सम्पूर्ण विस्तार जानकर तथा अपने भाइयों का बार-बार पता लगाकर यहाँ आकर के आप लोग विशेषरूप से सृष्टि कीजिये।’ वे भी उसी मार्ग से [ अपने] भाइयों की गति को प्राप्त हुए ॥ ७–१० ॥

तदनन्तर उनके भी नष्ट हो जाने पर प्रचेतस के पुत्र प्रजापति दक्ष ने वैरिणी [ नामक भार्या ] से साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। उन्होंने दस [ कन्याएँ] धर्म को, तेरह [कन्याएँ] कश्यप को, सत्ताईस [ कन्याएँ] चन्द्रमा को, चार [कन्याएँ] अरिष्टनेमि को दो [ कन्याएँ] भृग-पुत्र को दो [कन्याएँ] बुद्धिमान् कृशाश्व को और दो [ कन्याएँ] आंगिरस को प्रदान कीं । [ हे विप्रो !] अब उन देवमाताओं के नाम तथा उनकी सन्तानों के विस्तार को आरम्भ से सुनिये ॥ ११–१३१/२

मरुत्वती, वसु, यामि, लम्बा, भानु, अरुन्धती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या और परम सुन्दरी विश्वा धर्म की पत्नियाँ कही गयी हैं। [हे ऋषियो !] अब मैं उनके पुत्रों को बताता हूँ — विश्वा से विश्वेदेव हुए। साध्या ने साध्यों को जन्म दिया। मरुत्वती से मरुत्वान् हुए और वसु से सभी वसु उत्पन्न हुए। भानु से भानुगण तथा मुहूर्ता से मुहूर्तगण [उत्पन्न] बताये गये हैं। लम्बा से घोष नाम वाले पुत्र हुए। यामि से नागवीथि उत्पन्न हुआ। संकल्पा से संकल्प [ नामक पुत्र ] हुआ। अब मैं आप लोगों को वसुओं की सृष्टि बताता हूँ ॥ १४–१७१/२

जो देवता ज्योतिष्मान् तथा सभी दिशाओं में व्यापक हैं, वे वसु कहे गये हैं; वे सभी प्राणियों के हितैषी हैं। आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष तथा प्रभास — ये आठ वसु कहे गये हैं । अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, भैरव, हर, बहुरूप, सुरेश्वर त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी तथा अपराजित — ये गणेश्वर ग्यारह रुद्र कहे गये हैं ॥ १८-२११/२

[हे ऋषियो!] अब मैं कश्यप की पत्नियों से उत्पन्न पुत्रों तथा पौत्रों को बताऊँगा । अदिति, दिति, अरिष्टा, सुरसा, मुनि, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इला, कद्रू, त्विषा एवं दनु — ये कश्यप की पत्नियाँ थीं । अब मैं आप लोगों को उनके पुत्रों को बताता हूँ। चाक्षुष मन्वन्तर में जो तुषित नाम वाले देवता थे, वे वैवस्वत मन्वन्तर में बारह आदित्य कहे गये हैं । इन्द्र, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, सविता, पूषा, अंशुमान् तथा विष्णु — ये हजार किरणों वाले बारह आदित्य कहे गये हैं ॥ २२-२६ ॥

दिति ने कश्यप से हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष — इन दो पुत्रों को प्राप्त किया था, ऐसा हमने सुना है। दनु ने कश्यप से बल के अभिमान वाले सौ पुत्र प्राप्त किये। हे श्रेष्ठ द्विजो ! उनमें विप्रचित्ति प्रधान था । हे श्रेष्ठ द्विजो ! ताम्रा ने शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवी, गृध्रका तथा शुचि — इन छः कन्याओं को जन्म दिया। शुकी ने धर्म से शुकों तथा उलूकों को उत्पन्न किया । श्येनी ने श्येनों (बाज) तथा भासी ने कुरंगों (हरिणों) को जन्म दिया । गृध्री ने गीधों को, कपोतों तथा पारावत पक्षियों को जन्म दिया। शुचि ने हंस, सारस तथा कारण्ड पक्षियों को जन्म दिया। सुग्रीवी ने अजों, अश्वों, मेषों, ऊँटों तथा गर्दभों को जन्म दिया ॥ २७-३११/२

शुभ विनता ने गरुड़ तथा अरुण को और सभी लोकों को भय प्रदान करने वाली सौदामिनी [नामक ] कन्या को उत्पन्न किया । सुरसा से हजारों सर्प उत्पन्न हुए। उत्तम व्रत वाली कद्रू ने हजार सिर वाले एक हजार नाग उत्पन्न किये। उनमें छब्बीस [नाग] उत्तम तथा प्रधान कहे गये हैं; वे शेष, वासुकि, कर्कोट, शंख, ऐरावत, कम्बल, धनंजय, महानील, पद्म, अश्वतर, तक्षक, एलापत्र, महापद्म, धृतराष्ट्र, बलाहक, शंखपाल, महाशंख, पुष्पदंष्ट्र, शुभानन, शंखलोमा, नहुष, वामन, फणित, कपिल, दुर्मुख तथा पतंजलि [नाम वाले] कहे गये हैं ॥ ३२-३७ ॥

क्रोधवशा ने महामायावी राक्षसों तथा रुद्रगणों को जन्म दिया और सुन्दर स्त्री सुरभि ने कश्यप से गायों तथा भैंसों को जन्म दिया; ऐसा हमने सुना है। मुनि [नामक कश्यपभार्या]-ने मुनियों एवं अप्सराओं को और अरिष्टा ने बहुत-से किन्नरों तथा गन्धर्वों को जन्म दिया। इला ने समस्त तृणों, वृक्षों, लताओं तथा गुल्मों को जन्म दिया । त्विषा ने करोड़ों यक्षों और राक्षसों को पैदा किया। मैंने कश्यप की इन सन्तानों का संक्षेप में वर्णन कर दिया। इन सबके बहुत से पुत्र-पौत्र आदि वंश कहे गये हैं ॥ ३८–४११/२

इस प्रकार महात्मा कश्यप के द्वारा प्रजाओं की सृष्टि कर लिये जाने पर तथा उन सभी चर-अचर प्रजाओं के प्रतिष्ठित हो जाने पर प्रजापति ने उनमें से मुख्यों को अधिपति के पद पर अभिषिक्त करके वैवस्वत मनु को मनुष्यों का अधिपति बनाया । स्वायम्भुव मन्वन्तर में पहले ब्रह्मा ने जिन्हें अभिषिक्त किया था, उन्हीं के द्वारा पर्वतों सहित सात द्वीपों वाली सम्पूर्ण पृथ्वी आज भी आदेश अनुसार धर्मपूर्वक पालित की जा रही है । ब्रह्मा ने पूर्व स्वायम्भुव मन्वन्तर में जिनका अभिषेक किया था, वे ही यहाँ अभिषिक्त किये जाते हैं और मनु होते हैं। इन मन्वन्तरों के बीत जाने पर राजा भी चले जाते हैं; इस प्रकार इनके बाद मन्वन्तर आने पर अन्य [राजा ] अभिषिक्त किये जाते हैं । अतीत तथा अनागत सभी राजा मन्वन्तर में कहे गये हैं ॥ ४२–४७१/२

प्रजा-संतान के कारण इन पुत्रों को उत्पन्न करके अपने वंश की कामना रखने वाले उन कश्यप ने ‘वंश को बढ़ाने वाला पुत्र मुझे उत्पन्न हो’ — ऐसा सोचते हुए पुनः तप करना आरम्भ किया। इस प्रकार ध्यान करते हुए उन महात्मा कश्यप के ब्रह्मयोग से पुनः महान् ओजस्वी दो पुत्र उत्पन्न हुए। वत्सर तथा असित [ नाम वाले] वे दोनों ब्रह्मवादी थे । वत्सर से महान् यश वाले नैध्रुव तथा रैभ्य उत्पन्न हुए। रैभ्य के पुत्रों को भी रैभ्य [नाम वाला] जानना चाहिये । [ हे ऋषियो ! ] अब मैं नैध्रुव के पुत्रों के विषय में बताता हूँ। च्यवन की कन्या सुमेधा उत्पन्न हुई। वह नैध्रुव की पत्नी तथा कुण्डपायियों की माता थी । असित की एकपर्णा से शाण्डिल्यों में श्रेष्ठ, ब्रह्मिष्ठ, श्रीमान् तथा महातपस्वी देवल उत्पन्न हुए । इस प्रकार शाण्डिल्य, नैध्रुव तथा रैभ्य — ये तीनों पक्ष काश्यप ( कश्यप से होने वाले ) हुए ॥ ४८-५४ ॥

अब मैं पुलस्त्य के नौ राक्षस वंशजों का वर्णन करता हूँ — प्रभु मनु के ग्यारहवें चतुर्युग के अतिक्रान्त होने पर उसका आधा अवशिष्ट रह जाने पर जब द्वापर का आरम्भ हुआ, तब मनु की पीढ़ी में नरिष्यन्त का दम नामक पुत्र हुआ। उस दम का उत्तराधिकारी तृणबिन्दु कहा गया है; वह त्रेतायुग के तीन-चौथाई भाग में राजा हुआ। उसकी कन्या इलविला रूप में अप्रतिम थी । उस राजर्षि ने वह कन्या पुलस्त्य को दे दी । उस इलविला से ऋषि विश्रवा उत्पन्न हुए। पौलस्त्य कुल की वृद्धि करने वाली उनकी चार पलियाँ थीं। पहली देववर्णिनी नाम वाली थी, जो बृहस्पति की सुन्दर कन्या थी। [अन्य दो] पुष्पोत्कटा तथा बलाका माल्यवान् की पुत्रियाँ कही गयी हैं। कैकसी माली की कन्या थी । [हे ऋषियो ! ] अब उनकी सन्तानों के विषय में सुनिये ॥ ५५-६०१/२

देववर्णिनी ने उन [विश्रवा ] से ज्येष्ठ [ पुत्र] वैश्रवण को उत्पन्न किया। कैकसी ने राक्षसों के राजा रावण, कुम्भकर्ण, शूर्पणखा तथा बुद्धिमान् विभीषण को जन्म दिया। हे द्विजश्रेष्ठो ! पुष्पोत्कटा ने उन [विश्रवा]- से महोदर, प्रहस्त, महापार्श्व तथा खर [नामक ] पुत्रों को तथा कुम्भीनसी [ नामक ] कन्या को जन्म दिया। अब बला की सन्तानों को सुनिये। त्रिशिरा, दूषण तथा विद्युज्जिह्व राक्षस और मालिका [नामक ] कन्या – ये सब बला से उत्पन्न कहे गये हैं । पुलस्त्य के ये नौ पौत्र क्रूर कर्म वाले राक्षस थे । विभीषण अत्यन्त शुद्ध आत्मा वाले तथा धर्मज्ञ कहे गये हैं। मृग, व्याघ्र आदि दाढ़ों वाले सभी पशु, भूत, पिशाच, सर्प, सूकर, हाथी, वानर, किन्नर तथा किम्पुरुष — ये सब पुलस्त्य के पुत्र हुए ॥ ६१-६७ ॥

उस वैवस्वत मन्वन्तर में क्रतु निःसन्तान कहा गया है। अत्रि की दस सुन्दर तथा पतिव्रता भार्याएँ थीं। घृताची अप्सरा से भद्राश्व की दस पुत्रियाँ हुईं। हे विप्रेन्द्रो ! वे भद्रा, अभद्रा, जलदा, मन्दा, नन्दा, बला, अबला, गोपाबला, तामरसा तथा वरक्रीड़ा — ये कही गयी हैं। ये सब आत्रेयवंश में उत्पन्न हुई; इनके पति प्रभाकर थे। जब राहु ने सूर्य को ढक लिया और यह सूर्य स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरने लगा; तब इस लोक के अन्धकार से व्याप्त हो जाने पर अत्रि ऋषि ने प्रभा फैलायी थी। ‘तुम्हारा कल्याण हो’ उनके ऐसा कहने पर महर्षि के वचन से उस समय गिरता हुआ विभु सूर्य स्वर्गलोक से [ पृथ्वी पर] नहीं गिरा । तब महर्षियों ने प्रभु अत्रि को ‘प्रभाकर’ – ऐसा कहा ॥ ६८-७३ ॥

उन्होंने भद्रा से यशस्वी पुत्र ‘सोम’ को उत्पन्न किया। उन तपोधन [ऋषि] ने उन पत्नियों से पुनः अन्य पुत्र भी उत्पन्न किये। वे सब स्वस्त्यात्रेय कहलाये और वेदों के पारंगत ऋषि हुए। उनमें दो प्रसिद्ध यश वाले, ब्रह्मिष्ठ तथा महान् ओजस्वी हुए; दत्त अत्रि के ज्येष्ठ पुत्र थे और दुर्वासा उनके छोटे भाई थे। उनकी छोटी बहन अमला थी; वह ब्रह्मवादिनी थी। उनके दो गोत्रों में श्याव, प्रत्वस, ववल्गु तथा गह्वर — ये चार उत्पन्न हुए, जो भूलोक में प्रसिद्ध हैं। महान् आत्मा वाले आत्रेयों के चार पक्ष कहे गये हैं — काश्यप, नारद, पर्वत और अनुद्धत। ये मानस पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए हैं। अब अरुन्धती की सन्तानों के विषय में सुनिये ॥ ७४–७८१/२

नारदजी ने वसिष्ठ के लिये अरुन्धती को प्रदान किया। महातेजस्वी नारद दक्ष के शाप से ब्रह्मचारी हो गये। पूर्वकाल में तारकासुर के कारण भयानक देवासुर-संग्राम में अनावृष्टि से हत लोक के उग्र हो जाने पर बुद्धिमान् वसिष्ठजी ने [ अपनी] तपस्या से अन्न, जल, मूल, फल तथा औषधियाँ उत्पन्न करते हुए लोकेश्वरों के साथ प्राणियों की रक्षा की थी और दयापूर्वक उन्होंने औषधि से उन सबको जीवित किया था । वसिष्ठ ने अरुन्धती से सौ पुत्र उत्पन्न किये। उनमें ज्येष्ठ पुत्र शक्ति से अदृश्यन्ती ने पराशर को जन्म दिया था ॥ ७९-८३ ॥

राक्षस रुधिर के द्वारा शक्ति का भक्षण कर लिये जाने पर काली ने पराशर से प्रभु कृष्णद्वैपायन (व्यासजी) – को जन्म दिया। तदनन्तर कृष्णद्वैपायन ने अरणी से शुक और उपमन्यु को पुत्ररूप में उत्पन्न किया और पीवरी से उत्पन्न शुकदेव के इन पुत्रों को जानिये — भूरिश्रवा, प्रभु, शम्भु, कृष्ण तथा पाँचवाँ गौर । उनकी कीर्तिमती [नामक ] कन्या भी हुई, जो योगमाता तथा व्रत धारण करने वाली थी। वह ब्रह्मदत्त की माता एवं अनुह की पत्नी थी। श्वेत, कृष्ण, गौर, श्याम, धूम्र, अरुण, नील तथा बादरिक — ये सब पराशर के वंशज थे। इस प्रकार महात्मा पराशरवंशजों के वे आठ पक्ष कहे गये हैं ॥ ८४-८८ ॥

[हे ऋषियो!] अब इसके आगे इन्द्रप्रमिति की उत्पत्ति के विषय में जानिये । वसिष्ठ का पुत्र कपिंजल्य घृताची से उत्पन्न हुआ था, जो त्रिमूर्ति नाम से भी विख्यात हुआ; उसे इन्द्रप्रमिति कहा जाता है। पृथु की पुत्री से भद्र उत्पन्न हुआ और उस [ भद्र ] – का पुत्र वसु हुआ। उसका पुत्र उपमन्यु और उपमन्यु के बहुत पुत्र हुए। कौण्डिन्य नाम से जो प्रसिद्ध हैं, वे मित्र तथा वरुण की सन्तानें हैं और जो अन्य एकार्षेय हैं, वे वासिष्ठ नाम से प्रसिद्ध हैं । महात्मा वसिष्ठवंशजों के ये दस पक्ष कहे गये हैं ॥ ८९-९२ ॥

ये सब ब्रह्मा के मानस पुत्र के रूप में पृथ्वी पर विख्यात हैं । ये महाभाग [ सबका ] भरण करने वाले हैं। [हे विप्रो !] मैंने इनके वंशों का वर्णन कर दिया । देवर्षिकुल में उत्पन्न होने वाले ये सब तीनों लोकों को धारण करने में समर्थ हैं। उनके पुत्र-पौत्र सैकड़ों तथा हजारों हैं, जिनके द्वारा सूर्य की किरणों की भाँति तीनों लोक व्याप्त हैं ॥ ९३-९५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘देवादिसृष्टिकथन’ नामक तिरसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६३ ॥

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