तिथि

अंग्रेजी पंचांग के अनुसार दिन का आरम्भ मध्य रात्रि से माना जाता है। इसका समय निर्धारण मध्याह्न सूर्य से ही होता है, किन्तु तिथि के आरम्भ का आधार एक मान्यता एवं अन्तर्राष्ट्रीय समझौते पर ही आधारित है। इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, जबकि भारतीय पंचांगों में तिथि का आधार पूर्ण वैज्ञानिक है जो चन्द्रमा की गति पर आधारित है। एक पूर्णिमा से दूसरी पूर्णिमा तक की अवधि को ‘मास’ कहते हैं। इसमें चन्द्रमा पृथ्वी का एक पूरा चक्कर कर लेता है। चूँकि एक पूरा चक्र 360 अंश का होता है, किन्तु एक माह में पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करने के कारण उस स्थान से 30 अंश आगे निकल जाती है, जिससे दूसरी पूर्णिमा तक चन्द्रमा को 30 अंश और चलना पड़ता है अर्थात् 390 अंश पार करने पर दूसरी पूर्णिमा होगी।

चान्द्रमास में दिनों को तिथि के रूप में गिनते हैं। एक मास में 30 तिथियाँ होती है – 15 कृष्ण पक्ष (Dark Fortnight) की तथा 15 शुक्ल पक्ष (Bright Fortnight) की। भचक्र (Diurnal rovolution) में 360 अंश होते हैं जिससे एक तिथि का मान 360 / 30 = 120 अंश होता है। अमावस्या (New Moon) के समय सूर्य व चन्द्रमा के राश्यंश (Logitude) समान रहते हैं। चन्द्रमा पृथ्वी की नाक्षत्र परिक्रमा (Sidereal Revolution or Sidereal Month) 27.3216615 दिन या 27 दिन 7 घंटे 43 मिनट 11.6 सैकण्ड में करता है। जिससे चन्द्रमा की दैनिक औसत (मध्यम) गति 360 / 27.3216615 अंश या 13 अंश 10 कला 34.89 विकला है। पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा (Revolution) के कारण सूर्य भी पृथ्वी के संदर्भ में 360 अंश / 365.256363 दिन = 59 कला 8.19 विकला औसत (मध्यम) गति से प्रतिदिन उसी दिशा में आगे बढ़ जाता है। जिससे चन्द्रमा की शुद्ध गति 13 अंश 10 कला 34.89 विकला (-) 59 कला 8.19 विकला = 12 अंश 11 कला 26.7 विकला प्रतिदिन रह जाती है।

जब सूर्य और चन्द्रमा दोनों के भोगांश (celestial Longitudes) समान हो तब अमावस्या का अन्त और शुक्ल पक्ष का आरम्भ होता है। अमावस्या के बाद प्रतिदिन चन्द्रमा सूर्य से लगभग 12 अंश दूर होता चला जाता है। पूर्णिमा (Full Moon) को जब यह सूर्य से 180 अंश दूर रहता है, उसी दिन से 12 अंश प्रतिदिन पुनः सूर्य की ओर चला जाता है। अगले 15 दिन में सूर्य के साथ हो जाता है। इस प्रकार चन्द्रमा की सूर्य से बढ़ती हुई दैनिक 12 अंश की दूरी को एक तिथि की संज्ञा दी गई है। इस तिथि को चान्द्र तिथि (Lunar Date) कहते हैं।

तिथियों की अवधि असमान होती है –

चन्द्रमा को अमावस्या से अमावस्या तक पृथ्वी की परिक्रमा करने में 29.530589 दिन या 29 दिन 12 घण्टे 44 मिनट 2.9 सैकण्ड़ लगते हैं। अतः एक तिथि का औसत मान 24.530589 / 30 = 23.6244712 घण्टे या 23 घण्टे 37 मिनट 28.09 सैकण्ड़ होता है। परन्तु सूर्य व चन्द्र की असमान गति के कारण दोनों के मध्य 12 अंश की दूरी होने में असमान समय लगता है। इसलिए प्रतिदिन तिथि का मान न्यूनाधिक होता है।

सूर्य की प्रतिदिन की कोणीय गति 57’ से 101’ तक की होती है और चन्द्रमा की प्रतिदिन की कोणीय गति कभी 15 अंश और कभी 12 अंश होती है। जब यह ग्रह शीघ्रोच्च (Perigee) पर होते हैं तब कोणीय गति अधिक होती है और जब मन्दोच्च (Apogee) पर होते हैं तब गति मन्द होती है। इस कारण 24 घंटों में चन्द्र सूर्य के भोगांश का अन्तर लगभग 14 अंश से 11 अंश तक हो जाता है। 12 अंश के अन्तर पर एक तिथि बदल जाती है। जब अन्तर 11 अंश होता है, तब तिथि 24 घंटे से अधिक की होती है और जब 14 अंश का अन्तर हो तब तिथि 24 घंटे से काफी छोटी हो जाती है।

यहाँ स्पष्ट कर देना उचित होगा की तिथि दिन के मध्य में (एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के मध्य) कभी भी बदल सकती है – क्यों कि चन्द्र सूर्य की असमान गति के कारण जब भी 12 अंश के गुणक में दोनों की अंशात्मक दूरी पूर्ण हो जाती है, उसी क्षण एक तिथि समाप्त होकर अगली तिथि प्रारम्भ हो जाती है।

व्यवहारिक तिथि – यद्यपि तिथि दिन.रात में कभी भी बदल सकती है तथापि किसी स्थान पर सूर्योदय के समय जो तिथि चल रही होती है उसी तिथि को उस स्थान पर उस दिन के लिए व्यवहारिक तिथि मान लिया जाता है। चाहे वह तिथि सूर्योदय के एक मिनट पहले से प्रारम्भ हुई हो अथवा सूर्योदय के एक मिनट बाद ही समाप्त हो जाए। इस प्रकार व्यवहारिक तिथि के निर्धारण में स्थान विशेष का सूर्योदय समय निर्णायक होता है।

तिथि क्षय (अवम) – सूर्योदय के समय रहने वाली तिथि ही व्यवहारिक तिथि मानी जाती है। अतः प्रत्येक तिथि का क्रमशः एक.एक सूर्योदय के समय रहना आवश्यक है। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं होता। कभी ऐसा भी होता है कि एक तिथि आज सूर्योदय के पश्चात् प्रारम्भ हुई और कल सूर्योदय के पहले ही समाप्त हो गई। ऐसी तिथि किसी भी सूर्योदय के समय न रहने से किसी भी दिन के लिए व्यवहारिक तिथि की शर्त को पूरा नहीं कर सकी। ऐसी तिथि का क्षय (या टूटी हुई) माना जाता है। तिथि का मान कभी भी 20 घण्टे से कम नहीं होता हैं। इस तिथि को पंचांग की पंक्ति में से कम कर दिया जाता है। इससे पक्ष में एक दिन कम हो जाता है।

तिथि वृद्धि (त्रिद्युस्पर्शा) – कभी ऐसा भी होता है कि कोई तिथि आज सूर्योदय से पूर्व प्रारम्भ तिथि क्षय हुई और अगले दिन भी सूर्योदय बाद तक रही। ऐसी स्थिति में दो दिन तक सूर्योदय समय पर वही तिथि रही अर्थात् एक ही तिथि को दो दिन तक व्यवहारिक तिथि मानना पड़ा। वृद्धि तिथि का कुल मान सदैव 24 घण्टे से अधिक होता है; किन्तु 26 घण्टे 45 मिनट से अधिक प्रायः नहीं होता है।
एक ही तिथि की उपरोक्त कारण से पुनरावृत्ति हो जाने से इसे तिथि वृद्धि (तिथि का बढ़ना) कहते हैं। इससे पक्ष में एक दिन अधिक हो जाता हैं।

महत्वपूर्ण – तिथि क्षय अथवा वृद्धि स्थान विशेष के सूर्योदय समय पर निर्भर करती है। यह भी सम्भव है कि एक तिथि किसी एक स्थान के सूर्योदय के अनूसार क्षय अथवा वृद्धि मानी जाए परन्तु वही तिथि दूसरे स्थान के सूर्योदय के अनुसार क्षय अथवा वृद्धि नहीं हो।

तिथि क्षय अथवा वृद्धि से वारों का क्षय या वृद्धि नहीं होती तथा सप्ताह में सात ही दिन होते हैं। जबकि तिथि रेखा (Date Line) पार करने पर वारों में भी क्षय और वृद्धि हो जाती है जिससे कोई सप्ताह 8 दिन का हो जाता है तथा कोई 6 दिन का ही रह जाता है। जैसे यदि कोई यात्री पूरब से यात्रा करता हुआ इस तिथि रेखा को सोमवार को पार करता है तो वह अपनी घड़ी 24 घंटे पीछे करता है जिससे उसको अगला दिन भी सोमवार ही मानना पड़ेगा। अर्थात् दो सोमवार होंगे व सप्ताह में आठ दिन होंगे। इसी प्रकार पश्चिम से यात्रा करने वाला यात्री जब इस तिथि रेखा को सोमवार को पार करता है तो उसकी घड़ी 24 घंटा आगे करने से अगला दिन बुधवार हो जाएगा तथा मंगलवार का क्षय हो जाएगा जिससे सप्ताह में उसके छः दिन ही होंगे। भारतीय पंचांगों में ऐसा नहीं होता। 

तिथि का ज्योतिषीय महत्त्व –
तिथियों के नाम तथा स्वामी:- अमावस्या से पूर्णिमा तक शुक्ल पक्ष (सुदी) तथा पूर्णिमा से अमावस्या तक कृष्ण पक्ष (बदी) होते हैं। 

    तिथि नाम            स्वामी   संज्ञा    मास शुन्य तिथियाँ     सिद्धा तिथियाँ   पक्ष
1 प्रतिपदा (पड़वा)   अग्नि     नन्दा   भाद्रपद                    शुक्रवार            शुक्ल पक्ष
2 द्वितीया (दूज)       ब्रह्मा     भद्रा    श्रावण, भाद्रपद        बुधवार               ’’
3 तृतीया (तीज)      गौरी      जया     श्रावण, फाल्गुन        मंगलवार            ’’
4 चतुर्थी (चौथ)      गणेश     रिक्ता  पौष                          शनिवार              ’’
5 पंचमी                शेषनाग   पूर्णा     पौष                         बृहस्पतिवार         ’’
6 षष्ठी (छट)         कार्तिकेय नन्दा    माघ                        शुक्रवार ’’
7 सप्तमी               सूर्य         भद्रा    आषाढ़, मार्गशीर्ष      बुधवार ’’
8 अष्टमी शिव जया चैत्र, मार्गशीर्ष मंगलवार ’’
9 नवमी दुर्गा रिक्ता चैत्र शनिवार ’’
10 दशमी काल पूर्णा आश्विनी बृहस्पतिवार ’’
11 एकादशी (ग्यारस) विश्वेदेव नन्दा आश्विनी शुक्रवार ’’
12 द्वादशी (बारस) विष्णु भद्रा वैशाख बुधवार ’’
13 त्रयोदशी (तेरस) काम जया ज्यैष्ठ मंगलवार ’’
14 चतुर्दशी (चौदस) शिव रिक्ता कार्तिक शनिवार ’’
15 पूर्णिमा चन्द्रमा पूर्णा बृहस्पतिवार ’’
16 प्रतिपदा (पड़वा) अग्नि नन्दा भाद्रपद शुक्रवार कृष्ण पक्ष
17 द्वितीया (दूज) ब्रह्मा भद्रा श्रावण, भाद्रपद बुधवार ’’
18 तृतीया (तीज) गौरी जया श्रावण मंगलवार ’’
19 चतुर्थी (चौथ) गणेश रिक्ता पौष, फाल्गुन शनिवार ’’
20 पंचमी शेषनाग पूर्णा कार्तिक,पौष, माघ बृहस्पतिवार ’’
21 षष्ठी (छट) कार्तिकेय नन्दा आषाढ़ शुक्रवार ’’
22 सप्तमी सूर्य भद्रा मार्गशीर्ष बुधवार ’’
23 अष्टमी शिव जया चैत्र, मार्गशीर्ष मंगलवार ’’
24 नवमी दुर्गा रिक्ता चैत्र शनिवार ’’
25 दशमी काल पूर्णा आश्विनी बृहस्पतिवार ’’
26 एकादशी (ग्यारस) विश्वेदेव नन्दा आश्विनी शुक्रवार ’’
27 द्वादशी (बारस) विष्णु भद्रा वैशाख बुधवार ’’
28 त्रयोदशी (तेरस) काम जया मंगलवार ’’
29 चतुर्दशी (चौदस) शिव रिक्ता ज्यैष्ठ शनिवार ’’
30 अमावस्या पितर पूर्णा बृहस्पतिवार कृष्ण 

भारतीय धर्म शास्त्र में तथा मुहूर्त्त शास्त्र में चान्द्र तिथि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। सौरमान की तिथियों का महत्त्व मुहूर्त्तशास्त्र व धर्मशास्त्र में नगण्य है। अतः तिथि की शुभता एवं अशुभता का विचार जनसाधारण में अद्यावधि प्रचलित हैं। पचांगं के पाँच अंगों में तिथि नाक की तरह महत्त्वपूर्ण है, जैसा कि वृहद्दैवज्ञरंजन में संहिताप्रदीप के उद्धरण में कहा गया है।
केनापि दोषेण तिथौ प्रदुष्टे दुष्यन्ति लग्नेन्दुबलर्क्षवाराः।
सौन्दर्यकान्त्यादिमुखा गुणाश्च नासाविहीनस्य भवन्त्यसारा।।
सर्वत्र कार्येषु शुभा शुभेषु पृच्छन्ति लोके तिथिमेव पूर्वम्।
न क्वापि योगं करणं ग्रहं वा तस्मात्तिथेर्मुख्यतरस्तदुक्तम्।।
ये तिथियाँ चन्द्रमा की सोलह कलायें होती है। कृष्ण पक्ष की तिथियों को जो देवता उस कला का अमृतपान कर स्वयं को पुष्ट करते हैं और शुक्ल पक्ष की उन्हीं तिथियों को अमृत को वापस चन्द्रमा लौटा देते हैं। इस प्रकार अमृत का आदान-प्रदान देवताओं एवं चन्द्र के मध्य चलता रहता है।

प्रतिपदा –
यह प्रथमा तिथि है। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से चन्द्रमा अपने कदम आगे बढ़ाता है, अतः इसे प्रतिपदा कहते हैं। शुक्ल पक्ष में सूर्य-चन्द्र अन्तर 00 अंश से 12 अंश तक होता है; तथा कृष्ण पक्ष में 181अंश से 192 अंश तक होता है, तब प्रतिपदा तिथि होती है। प्रतिपदा को प्राकृत (अर्धमागधी) में ‘पडिवदा’, अपभ्रंश में ‘पडिवआ’ या ‘पडिवा’ तथा हिन्दी में ‘परिवा’ या ‘एकम’ कहते हैं। कृष्ण प्रतिपदा को चन्द्रमा की प्रथम कला होती है। प्रतिपदा का अर्थ ‘मार्ग’ होता है। आरम्भ, प्रवेश तथा प्रयाण भी इससे द्योतित होता है। पालि भाषा में इसे ‘पटिपदा’ कहते हैं। शुक्ल पक्ष प्रतिपदा में चन्द्रमा अस्त रहता है, अतः इसे समस्त शुभ कार्यों में त्याज्य माना गया है। कृष्ण पक्ष प्रतिपदा स्थिति इसके विपरीत होती है। ‘प्रति’ का अर्थ है- सामने और ‘पदा’ का अर्थ है- पग बढ़ाना। कृष्ण प्रतिपदा में चन्द्र अपने ह्रास की ओर पग रखता है। प्रतिपदा के स्वामी अग्निदेव हैं। प्रतिपदा को नन्दा अर्थात् आनन्द देने वाली कहा गया हरविवार एवं मंगलवार के दिन प्रतिपदा होने पर मृत्युदा होती है, तब इसमें शुभ कार्य वर्जित कहे गये हैं, परन्तु शुक्रवार को प्रतिपदा सिद्धिदा हो जाती है। उसमें किये गये कार्य सफल होते हैं। भाद्रपद महीने की प्रतिपदा शुन्य होती है।
दिशा – पूर्व।
करणीय कृत्य – कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा में विवाह, यात्रा, देव प्रतिष्ठा, यज्ञोपवीत, मुण्डन, अखण्ड रामचरितमानसादि पाठ, गृहारम्भ, गृहप्रवेश, शान्ति कर्म, पौष्टिक कर्मों एवं धार्मिक कृत्यों के लिये शुभ है।
अकरणीय कृत्य – प्रतिपदा को कुष्माण्ड (कुम्हड़ा या पेठा) नहीं खाना चाहिये।
शिववास – शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा में शिवजी का वास श्मशान में होने से मृत्युदायक होता है; अतः इसमें महामृत्युंजय-जप का प्रारम्भ, रूद्राभिषेक, पार्थिव-पूजन आदि नहीं करना चाहिये; परन्तु कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा में शिवजी गौरी के सान्निध्य में रहते हैं; अतः उनका पूजनादि इसमें शुभ होता है।
अमृतपान – कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को श्री अग्निदेव प्रथम कला का अमृतपान कर स्वयं को पुष्ट करते हैं और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को वापस चन्द्रमा लौटा देते हैं।

द्वितीया –
यह चन्द्रमा की दूसरी तिथि तथा कला है। शुक्ल पक्ष में सूर्य-चन्द्र अन्तर 13अंश से 24 अंश तक होता है; तथा कृष्ण पक्ष में 193अंश से 2040 अंश तक होता है, तब द्वितीया तिथि होती है। इसे पालि में ‘दुतीया’, प्राकृत भाषा (अर्धमागधी) में ‘बीया’ या ‘दुइया’, अपभ्रंश में ‘बीजा’, हिन्दी में ‘बीज’, ‘दूज’, ‘दौज’ आदि कहते हैं। इसके स्वामी ‘ब्रह्मा’ हैं। इसका विशेष नाम ‘सुमंगला’ है। यह भद्रा संज्ञक तिथि है। भाद्रपद में यह मासशुन्य संज्ञक होती है। सोमवार और शुक्रवार को मृत्युदा होती है। बुधवार के दिन दोनों पक्षों की द्वितीया में विशेष सामथ्र्य आ जाती है। उस दिन यह सिद्धिदा हो जाती है, जिसमें किये गये समस्त शुभ कर्म सफल होते हैं।
दिशा – उत्तर।
करणीय कृत्य – द्वितीया में राजनीति सम्बन्धी कार्य, चुनाव का पर्चा दाखिल करना, प्रशासनिक कार्य, वास्तु, यात्रा तथा प्रतिष्ठादि का आरम्भ शुभ होता है।
अकरणीय कृत्य – इस तिथि में नीम्बू नहीं खाना चाहिये। बड़ी भटकटैया या छोटी भटकटैया (Solanum nigrum and Solanum xanthocarpum) भी नहीं खाना चाहिये।
शिववास – शुक्ल पक्ष की द्वितीया को शिवजी गौरी के समीप होते हैं, अतः शिवपूजन, रूद्रभिषेक, पार्थिव पूजन आदि में शुभ है; परन्तु कृष्ण पक्ष की द्वितीया को शिवजी सभा में अपने गणों, भूत-प्रेतों के मध्य विराजते हैं; अतः उसमें शिव-पूजन नहीं करना चाहिये।
अमृतपान – यह तिथि चन्द्रमा की दूसरी कला है। इस कला का अमृत कृष्ण पक्ष में स्वयं भगवान् भास्कर पान कर स्वयं को ऊर्जावान् रखते हैं और शुक्ल पक्ष में पुनः चन्द्रमा को लौटा देते हैं।
गर्गसंहिता के अनुसार द्वितीया के कृत्य इस प्रकार है।
‘‘भद्रेत्युक्ता द्वितीया तु शिल्पिव्यायामिनां हिता।
आरम्भे भेषजानां च प्रवासे च प्रवासिनाम्।।
आवाहांश्च विवाहाश्च वास्तुक्षेत्रगृहाणि च।
पुष्टिकर्मकरश्रेष्ठा देवता च बृहस्पतिः।।’’

तृतीया –
जब सूर्य एवं चन्द्र का अन्तर 25 अंश से 36 अंश तक रहता है, तब शुक्ल पक्ष की तृतीया तथा 205 अंश से 216 अंश तक अन्तरांश होने पर कृष्ण पक्ष की तृतीया का मान होता है। इसे ‘ततिया, तइया, तैजा, तीजा, तीज, त्रीज, त्रीजा’ आदि भी कहते हैं। इसका विशेष नाम ‘सबला’ है। यह बलवान तिथि है; अतः इसे ‘जया’ नाम से भी अभिहित किया जाता है। इसकी स्वामिनी गौरी है। यह तिथि बुधवार को मृत्युदा, परन्तु मंगलवार को सिद्धिदा होती है। बुधवार को तृतीया होने से दग्ध योग का निर्माण भी हो जाता है, जो शुभ कृत्यों में वर्जित है।
दिशा – आग्नेय।
करणीय कृत्य – जया तिथि होने से इस तिथि में फौजदारी तथा दीवानी के मुकदमे दायर करना शुभ होता है। इस तिथि में ‘संगीत- विद्याखिल- शिल्पकर्म- सीमन्त- चैलान्न- गृहप्रवेशम्’ ये कार्य तथा जो कार्य द्वितीया में विहित हैं उनका करना शुभ होता है।
संगीत के अन्तर्गत नृत्य, गान तथा वाद्य- ये तीन तौर्य (समवेत स्वर) होते हैं। यह कार्य सीखना, अभ्यास करना तथा इनका आयोजन तृतीया में शुभ होता है। शिल्प कर्म के अन्तर्गत सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, चित्रकला, छायांकन, काष्ठशिल्प, लौह श्ल्पि, प्रस्तर शिल्प, ताम्र शिल्प, मृत्तिका शिल्प, मूर्ति शिल्प, वास्तु शिल्प, स्वर्ण-रौप्यादिआभूषण शिल्प, तृण शिल्प (चटाई बनाना, खाट-कुर्सी आदि की बुनाई), पर्ण शिल्प (टोकरी, पंखा आदि बनाना) इत्यादि अनेक शिल्प हैं। प्रथम गर्भ का 5वें या 7वें मास में जो विष्णुपूजनादि संस्कार होता है, उसे ‘सीमन्त’ कहते हैं। चौल का अर्थ मुण्डन संस्कार होता है। ये सभी कार्य तथा अन्नप्राशन (बालक को प्रथम बार अन्न खिलाना) एवं नवान्नभक्षण (नया अन्न खाने की शुरूआत) के लिये यह तिथि उत्तम कही गई है।
अकरणीय कृत्य – इस तिथि में नमक तथा परवल का शाक नहीं खाना चाहिये।
शिववास – शुक्ल पक्ष तृतीया में शिववास सभा में तथा कृष्ण पक्ष की तृतीया को क्रीड़ा में होने से यह दोनों पक्ष की तृतीयायें शिवपूजनार्थ निषिद्ध हैं।
अमृतपान – यह चन्द्रमा की तीसरी कला है, जिसके अमृत को कृष्ण पक्ष में विश्वेदेवा (साक्षात् परमात्मा) पान करते हैं।
‘तृतीयाऽऽरोग्यदात्री च’ अर्थात् तृतीया आरोग्य देने वाली होती है।

चतुर्थी –
जब सूर्य एवं चन्द्र का अन्तर 37 अंश से 48अंश तक रहता है, तब शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तथा 117 अंश से 228अंश तक अन्तरांश होने पर कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का मान होता है। यह पालि भाषा में ‘चतुत्थी’, अर्धमागधी प्राकृत में ‘चउत्थी’ तथा अपभ्रंश होकर ‘चौथी’ कहलाती है। हिन्दी में इसका स्वरूप घिस कर केवल ‘चौथ’ या ‘चौइथ’ रह जाता है। इसके स्वामी गणेश हैं। यह तिथि रिक्ता संज्ञक है तथा इस तिथि का विशेष नाम ‘खला’ है; अतः इसमें शुभ कार्य वर्जित है। यह तिथि पौष मास में शुन्य होती है। यदि गुरूवार को चतुर्थी हो तो मृत्युदा होती है तथा शनिवार को हो तो सिद्धिदा अर्थात् सफलतादायक हो जाती है और उसके रिक्ता होने का दोष उस विशेष स्थिति में समाप्त हो जाता है।
दिशा – नैऋत्य।
करणीय कृत्य – इसमें दुष्टता के कर्म सफल होते हैं।
अकरणीय कृत्य – इस तिथि में मूली तथा बैंगन का खाना धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण से वर्जित हैं।
शिववास – शुक्ल पक्ष में शिवपूजन अशुभ; किन्तु कृष्ण पक्ष में शिवार्चन शुभ है।
अमृतपान – चन्द्रमा यह चौथी कला है, जिसका अमृत कृष्ण पक्ष में जल के देवता वरूण पीते हैं तथा शुक्ल पक्ष में वापस कर देते हैं।

पंचमी –
जब सूर्य एवं चन्द्र का अन्तर 49 अंश से 60अंश तक रहता है, तब शुक्ल पक्ष की पंचमी तथा 229अंश से 240अंश तक अन्तरांश होने पर कृष्ण पक्ष की पंचमी का मान होता है। इस तिथि का स्वामी सर्प या नाग होता है। यह पूर्णा संज्ञक तिथि है और इसकी विशेष संज्ञा ‘श्रीमती’ है। पौष मास के दोनों पक्षों में यह तिथि शून्य फल देती है। शनिवार के दिन पँचमी पड़ने पर मृत्युदा होती है; अतः इसकी शुभता में कमी आ जाती है; परन्तु गुरूवार के दिन यही पंचमी सिद्धिदा होकर विशेष शुभ फल देने वाली हो जाती है।
दिशा – दक्षिण।
करणीय कृत्य – इस तिथि में ऋण-ग्रहण (कर्ज लेना) छोड़कर समस्त शुभ कृत्य करना चाहिये। इसमें चर तथा स्थिर दोनों प्रकार के कार्य सिद्ध होते हैं। कल-कारखाने, मशीनरी, यात्रा- इस प्रकार के कार्य चरकार्य होते हैं तथा कृषि, कूपारम्भ, बाग लगाना, मकान बनाना आदि स्थिर कार्य होते हैं।
शुभकर्माणि सर्वाणि स्थिराणि चराणि च।
ऋणादानं विनायान्ति सुसिद्धिं पंचमीदिने।।
अकरणीय कृत्य – पंचमी में कटहल, बेल तथा खटाई नहीं खानी चाहिये।
शिववास – शुक्ल पंचमी में शिववास कैलास पर तथा कृष्ण पंचमी में वृषभ पर होने से क्रमशः सुख तथा श्री-प्राप्तिकारक होता है; अतः इसमें शिवार्चन के समस्त उपचार शुभ होते हैं।
अमृतपान – चन्द्रमा की इस पाँचवीं कला का पान वषट्कार करते हैं।

षष्टी –
सूर्य से चन्द्र का अन्तर जब तक 61 अंश से 72अंश तक होता है, तब तक शुक्ल पक्ष की षष्टी तथा 241अंश से 252 अंश की समाप्ति तक कृष्ण षष्टी रहती है। यह ‘छट्ठी, छठी तथा छट’ भी कहलाती है। इसके स्वामी स्कन्द (कार्तिकेय) हैं। इसका विशेष नाम ‘कीर्ति’ हैं। यह रविवार एवं मंगलवार के दिन मृत्युदा तथा शुक्रवार के दिन सिद्धिदा होती है। माघ कृष्ण पक्ष में यह तिथि शून्य होती है। षष्टी तिथि की सामान्य संज्ञा ‘नन्दा’ है।
दिशा – पश्चिम।
करणीय कृत्य – इसमें वस्त्रधारण, अलंकारधारण, उपाधि (ज्पजसम) धारण, अलंकरण धारण, आभूषण, वेशभूषा धारण, वास्तुकर्म (मकान बनाने से सम्बन्धित कार्य), विविध शिल्पकर्म, शान्तिक-पौष्टिक (अनुष्ठान) कार्य एवं मांगलिक कार्य शुभ होते हैं।
अकरणीय कृत्य – षष्टी तिथि में तेल की मालिश, श्राद्ध, वनस्पति की दातौन नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार तेल में पका भोजन एवं नीम तथा कमरख का सेवन भी वर्जित है। यदि षष्टी तिथि शनिवार के दिन पड़े तो तेलमालिश तथा तेल में पका भोजन का निषेध नहीं होता।
शिववास – कृष्ण पक्ष की षष्टी को शिवपूजनादि अशुभ तथा शुक्ल पक्ष षष्टी को शुभ होती है।
अमृतपान – यह चन्द्रमा की छठी कला है और इसका अमृत वासव (इन्द्र) पीते हैं।

सप्तमी –
सूर्य से चन्द्र का अन्तर जब तक 73 अंश से 84 अंश तक होता है, तब तक शुक्ल पक्ष की सप्तमी तथा 253 अंश से 264 अंश की समाप्ति तक कृष्ण सप्तमी रहती है। सप्तमी के स्वामी सूर्य हैं। इसका विशेष नाम ‘मित्रपदा’ है। शुक्रवार के दिन सप्तमी पड़ने पर ‘क्रकच’ नामक अशुभ योग होता है, जो कि शुभ कर्मों हेतु निषिद्ध है। सोमवार तथा शुक्रवार के दिन पड़ने वाली सप्तमी तिथि मृत्युदा होती है एवं बुधवार के दिन सिद्धिदा होती है। आषाढ़ कृष्ण सप्तमी को यह मास शुन्य होती है। इस दिन किये गये शुभ कार्य सफल नहीं होते हैं।
दिशा – वायव्य।
करणीय कृत्य – इस तिथि में हाथी, घोड़े, मोटर साइकिल, कार आदि की सवारी, विवाहादि शुभ कर्म, संगीत कार्य, वस्त्राभूषण धारण, गृहप्रवेश, दुकान का प्रारम्भ, व्यापार, वाणिज्य, वकालत, युद्ध तथा मुकदमा प्रारम्भ करना आदि कार्य शुभ होते हैं। चुनाव का पर्चा भरना तथा चुनाव-प्रचार आरम्भ करने के लिये यह तिथि शुभ होती है
गजकृत्यं विवाहादि संगीतं वस्त्रभूषणम्।
यात्राप्रवेशसंग्रामसिद्धेयुः सप्तमीतिथौ।।
अकरणीय कृत्य – सप्तमी तिथि में तेल का स्पर्श, नीले कपड़े पहनना, ताँबे के पात्र में भोजन करना तथा आमलों में स्नान करना वर्जित है।
सप्तम्यां न स्पृशेत्तैलं नीलवस्त्रं न धारयेत्।
न चाप्यामलकैः स्नानं न कुया्रत्कलहं नरः।
सप्तम्यां नैव कुर्वीत ताम्रपात्रेण भोजनम्।।
शिववास – शुक्ल पक्ष की सप्तमी में शिववास शुभ; परन्तु कृष्ण पक्ष सप्तमी में अशुभ होती है।
विशेष – सप्तमी तिथि सूर्य ग्रह की जन्म तिथि है। इसलिये शुभ कृत्यों में वर्जित करनी चाहिये।

अष्टमी –
सूर्य से चन्द्र का अन्तर जब तक 85 अंश से 96 अंश तक होता है, तब तक शुक्ल पक्ष की अष्टमी तथा 265 अंश से 276 अंश की समाप्ति तक कृष्ण अष्टमी रहती है। यह ‘अठमी, अट्ठमी तथा आठें’ भी कहलाती है। इस चान्द्र तिथि के स्वामी भगवान् शिव हैं। यह ‘जया’ संज्ञक तिथि है, जिसका अर्थ है- जीत कराने वाली। इसका विशेष नाम ‘कलावती’ है। मंगलवार को पड़ने वाली अष्टमी सिद्धिदा, परन्तु बुधवार को पड़ने वाली मृत्युदा होती है। चैत्रमास में अष्टमी तिथि शुन्य होती है।
दिशा – ईशान।
करणीय कृत्य – अष्टमी तिथि में अनेक प्रकार की विद्यायें-कलायें सीखना, उनका प्रदर्शन-प्रचार आदि करना, ग्रन्थ-लेखन, कविता-कहानी-नाटक आदि का लेखन-वाचन-प्रकाशन, किसी ग्रन्थ का विमोचन आदि कार्य विहित है। अभिनय या ललित कलाओं में शिक्षण देने वाली संस्थाओं में प्रवेश लेना एवं आभूषण-वेशभूषादि-निर्माण के कार्य इस तिथि में शुभ होते हैं। मनोरंजन सम्बन्धी व्यवसायों का आरम्भ, संगीत उपकरण, खेल-कूद का सामान, रेडियो, टी.वी., विडियो, वी.सी.आर., टेपरिकार्डर, आडियो सिस्टम, टेलीफोन, टेली प्रिंटर, कम्प्यूटर सम्बन्धी कार्य, वायरलेस सम्बन्धी कार्य, कूरियर जैसी सेवाओं का आरम्भ भी इसमें प्रशस्त है। ब्यूटी पार्लर, नर्सिंग होम, मनोवैज्ञानिक सलाह केन्द्र आदि खोलने के लिये यह तिथि उपयुक्त है।
संग्रामयोग्याखिलवास्तुकर्म नृत्यप्रमोदाखिललेखनानि।
स्त्रीरत्नकार्याखिलभूषणानि कार्याणि महेशतिथ्याम्।।
साफ्टवेयर सम्बन्धी कार्य हेतु अष्टमी तिथि प्रशस्त है।
अकरणीय कृत्य – अष्टमी को (महाष्टमी को छोड़कर) मांसाहारी व्यक्तियों को मांस सेवन नहीं करना चाहिये। इस तिथि में नारियल भक्षण भी वर्जित है।
शिववास – कृष्ण पक्ष की अष्टमी शिवार्चन में शुभ होती है; परन्तु शुक्ल पक्ष की अष्टमी में शिवार्चन निषिद्ध है।
अमृतपान – चन्द्रमा की इस आठवीं कला का पान अजैकपात् नामक देवता करते हैं।
विशेष – अष्टमी तिथि शनि ग्रह की जन्म तिथि है। इसलिये शुभ कृत्यों में वर्जित करनी चाहिये।

नवमी –
सूर्य से चन्द्र का अन्तर जब तक 97 अंश से 108 अंश तक होता है, तब तक शुक्ल पक्ष की नवमी तथा 277अंश से 288 अंश की समाप्ति तक कृष्ण नवमी रहती है। इस चान्द्र तिथि की स्वामिनी ‘दुर्गा देवी’ है। यह ‘रिक्ता’ संज्ञक है। इसका विशेष नाम ‘उग्रा’ है। इसमें समस्त शुभ कार्य वर्जित है। यह शनिवार को सिद्धिदा और गुरूवार को मृत्युदा होती है। चैत्र मास में यह शुन्यसंज्ञक होती है।
दिशा – पूर्व।
करणीय कृत्य – इस तिथि में पशुओं को बधिया करना, ऊँटों को नकेल डालना, बैल-भैसों को नाथना, सांप पकड़ना और उनके विषदन्तों को उखाड़ना, घोड़ों को लगाम देना, राष्ट्र के शत्रुओं एवं आतंकवादियों को कठोर दण्ड देना आदि कार्य विहित है।
अकरणीय कृत्य – इस तिथि में लौकी तथा कद्दू नहीं खाना चाहिये।
शिववास – शिवपूजन के लिये यह तिथि शुक्ल पक्षमें अशुभ; परन्तु कृष्ण पक्ष में शुभ होती है।
अमृतपान – चन्द्रमा की इस नौवीं कला के अमृत का पान यमराज करते हैं।
विशेष – नवमी तिथि शुक्र ग्रह की जन्म तिथि है। इसलिये शुभ कृत्यों में वर्जित करनी चाहिये।

दशमी –
सूर्य से चन्द्र का अन्तर जब तक 109अंश से 120 अंश तक होता है, तब तक शुक्ल पक्ष की दशमी तथा 289अंश से 300 अंश की समाप्ति तक कृष्ण दशमी रहती है। इस ‘पूर्णा’ संज्ञक तिथि के स्वामी यम हैं, जिसका विशेष नाम ‘धर्मिणी’ है। इस तिथि को सामान्य रूप से ‘द्रव्यदा’ भी कहते हैं। शनिवार को दशमी मृत्युदा तथा गुरूवार को सिद्धिदा होती है। आश्विन मास में दशमी मासशुन्य संज्ञक होने से शुभ कर्मों में वर्जित होती है।
दिशा – उत्तर।
करणीय कृत्य – दशमी तिथि को नया वाहन खरीदना, वाहन चलाना सीखना, कर्मचारियों, अधिकारियों तथा मन्त्रियों का पद ग्रहण कराना, शपथ ग्रहण करना, शिलान्यास, उद्घाटन, नये ग्रन्थ का विमोचन, भूमि पूजन, पत्र-पत्रिका या दैनिक कार्य का शुभारम्भ, स्मारिका प्रकाशन, अभिनन्दन ग्रन्थ का प्रकाशन, पुराने इंजिनों का बोर कराना आदि कार्य प्रशस्त कहे गये हैं।
भविष्य पुराण के अनुसार दशमी तिथि को यमराज (काल) की पूजा करने से आरोग्य तथा दीर्घायु की प्राप्ति होती है। इस तिथि को वाणिज्य, व्यापार, बैंक में खाता खोलना, बाण्ड खरीदना, बीमा कराना तथा नौकरी शुरू करना विशेष शुभ होता है।
अकरणीय कृत्य – दशमी को परवल (पटोल) का शाक नहीं खाना चाहिये।
शिववास – दशमी तिथि को शिवजी का वास अनुकूल न होने से शिवार्चन भी वर्जित है।
अमृतपान – चन्द्रमा की इस दसवीं कला का अमृत पान वायुदेव करते हैं।
विशेष – दशमी तिथि मंगल ग्रह की जन्म तिथि है। इसलिये शुभ कृत्यों में वर्जित करनी चाहिये।

एकादशी –
सूर्य से चन्द्र का अन्तर जब तक 121 से 132 अंश तक होता है, तब तक शुक्ल पक्ष की एकादशी तथा 301अंश से 312 अंश की समाप्ति तक कृष्ण एकादशी रहती है। इसको ‘ग्यारस या ग्यास’ भी कहते हैं। इसके स्वामी विश्वेदेवा हैं। इसका विशेष नाम ‘नन्दा’ है। यह सोमवार को होने से क्रकच योग तथा दग्ध योग का निर्माण करती है, जो शुभ कार्यों (व्रत उपवास को छोड़कर) में वर्जित है। रविवार तथा मंगलवार को एकादशी मृत्युदा तथा शुक्रवार को सिद्धिदा होती है।
दिशा – आग्नेय।
करणीय कृत्य – एकादशी को धर्मकार्य, पुराण-कथा प्रवचन, कीर्तन, भजन, अखण्डपाठ आदि का प्रारम्भ शुभ होता है। धर्मार्थ औषधालय, अन्नक्षेत्र, प्याऊ, देवप्रतिष्ठा, देवालय निर्माण का प्रारम्भ, प्रासाद-प्रतिष्ठा, कूपारम्भ, कूप प्रतिष्ठा, जलाशयारम्भ, जलाशय की प्रतिष्ठा, निःशुल्क पाठशाला का शुभारम्भ, यज्ञकार्य, सार्वजनिक निर्माण के कार्यों का लोकार्पण आदि कार्य इस तिथि में करणीय होता है।
भविष्यपुराण के अनुसार एकादशी को विश्वेदेवा की पूजा करने से धन-धान्य, सन्तति, वाहन, पशु तथा आवास आदि की प्राप्ति होती है।
एकादश्यां यथोद्दिष्टा विश्वेदेवाः प्रपूजिताः।
प्रजां पशुं धनं धान्यं प्रयच्छन्ति महीं तथा।।
-भविष्यपुराण, ब्राह्मपर्व, अध्याय 102
अकरणीय कृत्य – एकादशी को चावल और दलिया नहीं खाना चाहिये।
शिववास – शुक्ल पक्ष एकादशी शिवार्चन हेतु अशुभ तथा कृष्ण पक्ष की शुभ होती है।
अमृतपान – चन्द्रमा की इस ग्यारहवीं कला के अमृत का पान उमादेवी करती है।
विशेष – एकादशी तिथि बृहस्पति ग्रह की जन्म तिथि है। इसलिये शुभ कृत्यों में वर्जित करनी चाहिये।
व्रत – सभी व्रतों में एकादशी का व्रत सबसे प्राचीन माना गया है। एकादशी के स्वामी विश्वेदेवा होने से इसका व्रत एवं पूजन प्रत्येक देवता के उपासक को अभीष्ट फल देता है। यह पूजन प्रत्येक देवता को प्राप्त होता है; किन्तु पंचागों में कभी-कभी लगातार दो दिन एकादशी व्रत लिखा रहता है। ऐसी स्थिति में प्रथम दिन का व्रत स्मार्तों (सभी गृहस्थों- गणेश, सूर्य, शिव, विष्णु तथा दुर्गा की पूजा करने वालों) के लिये करना चाहिये तथा दूसरे दिन का व्रत वैष्णवों को अपने सम्प्रदाय के अनुसार करना चाहिये। वैष्णव वह होता है, जो केवल विष्णु का उपासक होता है तथा पंच संस्कारों से संस्कारित होकर जिसने वैष्णव गुरू से दीक्षा ली हो, तप्त मुद्रा धारण की हो।
जब पंचागं में ‘एकादशीव्रतं सर्वेषां’ लिखा हो तब यह व्रत सभी के लिये करणीय होता है।

द्वादशी –
सूर्य से चन्द्र का अन्तर जब तक 133 अंश से 144 अंश तक होता है, तब तक शुक्ल पक्ष की द्वादशी तथा 313 अंश से 324 अंश की समाप्ति तक कृष्ण द्वादशी रहती है। इस बारहवीं चान्द्र तिथि के स्वामी विष्णु हैं। इसका विशेष नाम ‘यशोबला’ है। इसकी साधारण संज्ञा ‘भद्रा’ है। यह सोमवार तथा शुक्रवार को मृत्युदा तथा बुधवार को सिद्धिदा होती है। रविवार को द्वादशी होने से क्रकच तथा दग्ध योगों का निर्माण होने से यह तिथि मध्यम फल देने वाली हो जाती है।
दिशा – नैऋत्य।
करणीय कृत्य – द्वादशी को सभी प्रकार के चर एवं स्थिर कार्य, यात्रा, यज्ञोपवीत, विवाह, दुकान, मकान सम्बन्धी कार्य शुभ होते हैं।
अकरणीय कृत्य – द्वादशी को तेल की मालिश तथा तेल से बने पदार्थों एवं मसूर का भक्षण नहीं करना चाहिये।
शिववास – दोनों पक्षों की द्वादशी को शिव का वास शुभ स्थिति में होने से इस तिथि में शिवार्चन शुभ होता है।
अमृतपान – इसकी अमृत कला पान पितृगण करते हैं।
विशेष – द्वादशी तिथि बुध ग्रह की जन्म तिथि है। इसलिये शुभ कृत्यों में वर्जित करनी चाहिये।

त्रयोदशी –
सूर्य से चन्द्र का अन्तर जब तक 145अंश से 156 अंश तक होता है, तब तक शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तथा 313 अंश से 336 अंश की समाप्ति तक कृष्ण त्रयोदशी रहती है। इसके स्वामी कामदेव हैं। इस तिथि का विशेषण ‘जयकरा’ है। यह बुधवार को मृत्युदा तथा मंगलवार को सिद्धिदा होती है।
दिशा – दक्षिण।
करणीय कृत्य – शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी में समस्त शुभ कार्य किये जाने चाहिये; परन्तु कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को चन्द्रमा के क्षीण हो मृतप्राय होने से समस्त शुभ कृत्यों में वर्जित है।
गर्गसंहिता के अनुसार त्रयोदशी को निम्न कार्य करना चाहिये-
जया त्रयोदशीमाह कर्तव्यं कर्म शोभनम्।
वस्त्रमाल्यमलंकारविप्राण्याभरणानि च।।
सौभाग्यकरणं स्त्रीणां कन्यावरणमेव च।
मुण्डनं युग्मवसनं कामं विन्द्याच्च देवताम्।।
अकरणीय कृत्य – त्रयोदशी को यज्ञोपवीत संस्कार नहीं करना चाहिये तथा भण्टा (बैंगन) नहीं खाना चाहिये।
शिववास – शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी शिवार्चन हेतु शुभ तथा कृष्ण पक्ष की अशुभ होती है।
अमृतपान – त्रयोदशी की अमृत कला का पान कुबेर करते हैं।
विशेष – दोनों पक्षों की त्रयोदशी को निरन्तरता के साथ कामदेव की पूजा करते रहने से अविवाहितों का विवाह हो जाता है तथा स्वयं रूपवान् एवं तेजस्वी होता है। भविष्यपुराण के अनुसार –
कामदेवं त्रयोदश्यां सुरूपो जायते ध्रुवम्।
इष्टां रूपवतीं भार्यां लभेत्कामांश्च पुष्कलान्।।

चतुर्दशी –
सूर्य से चन्द्र का अन्तर जब तक 157 अंश से 168 अंश तक होता है, तब तक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तथा 337 अंश से 348 अंश की समाप्ति तक कृष्ण चतृर्दशी रहती है। इसके स्वामी भगवान् शिव हैं। इस तिथि के रिक्ता संज्ञक होने से दोनों पक्षों की चतुर्दशी समस्त शुभ कर्मों में त्याज्य है। इसीलिये इसे ‘क्रूरा’ कहा गया है।
दिशा – पश्चिम।
करणीय कृत्य – इसमें केवल दुष्टता के कर्म ही सफल होते हैं।
अकरणीय कृत्य – इस तिथि को मधु नहीं खाना चाहिये तथा हजामत भी नहीं बनवाना चाहिये। लेकिन तीर्थस्थान में चतुर्दशी को मुण्डन कराया जा सकता है, उसका निषेध नहीं है। गर्ग के मत से-
उग्रा चतुर्दशी विन्द्याद्दारून्यत्र कारयेत्।
बन्धनं रोधनं चैव पातनं च विशेषतः।।
शिववास – इस तिथि को शिव का पूजन व व्रत उत्तम रहता है।
अमृतपान – इसकी अमृतकला को स्वयं भगवान् शिव ही पीते हैं।
विशेष – चतुर्दशी तिथि चन्द्रमा ग्रह की जन्म तिथि है। इसलिये शुभ कृत्यों में वर्जित करनी चाहिये।

पूर्णिमा –
सूर्य से चन्द्र का अन्तर जब तक 169 अंश से 180 अंश तक होता है, तब तक शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा रहती है। इसके स्वामी स्वयं चन्द्रदेव हैं। पूर्णिमान्त काल में सूर्य एवं चन्द्र एकदम आमने-सामने (समसप्तक) होते हैं। इसका विशेष नाम ‘सौम्या’ है। यह पूर्णा तिथि है। इसे राका तथा ‘अनुमिति’ भी कहते हैं। इसी तिथि को शुक्ल पक्ष का अन्त होता है।
दिशा – वायव्य।
करणीय कृत्य –
यज्ञक्रियापौष्टिकमंगलानि संग्रामयोग्याखिलवास्तुकर्म।
उद्वाहशिल्पाखिलभूषणाद्यं कार्यं प्रतिष्ठा खलु पौर्णमास्याम्।।
पूर्णिमा में यज्ञकार्य, पौष्टिक एवं मांगलिक कृत्य, संग्राम, योग्या (दिक्षान्त समारोह), सम्पूर्ण वास्तुकर्म, विवाह, शिल्पकर्म, आभूषणादि, देव-प्रतिष्ठा कर्म विहित है।
अकरणीय कृत्य – पूर्णिमा में जूआ, सट्टा, लाटरी आदि कर्मों से बचना चाहिये। मानसिक उत्तेजना से बचें।
शिववास – यह तिथि शिवार्चन सहित समस्त धर्मकृत्यों हेतु उपयुक्त होती है।
विशेष – पूर्णिमा तिथि राहु ग्रह की जन्म तिथि है। इसलिये शुभ कृत्यों में वर्जित करनी चाहिये।

अमावस्या –
इसे ‘सिनीवाली’ या ‘दर्श’ भी कहा जाता है। यह तीसवीं तिथि होती है। कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को कृष्ण पक्ष प्रारम्भ होता है तथा अमावस्या को समाप्त होता है। अमावस्या पर सूर्य चन्द्रमा का अन्तर शुन्य हो जाता है। इसके स्वामी पितर होते हैं।
इसमें चन्द्रमा की सोलहवीं कला जल में प्रविष्ट हो जाती है। चन्द्रमा का वास अमावस्या के दिन औषधियों में रहता है, अतः जल और औषधियों में प्रविष्ट उस अमृत का ग्रहण गाय-बैल-भैंस आदि पशु चारे एवं पानी के द्वारा करते हैं, जिससे वहीं अमृत हमें दूध, घी आदि के रूप में प्राप्त होता है और उसी घृत की आहुति ऋषिगण यज्ञ के माध्यम से पुनः चन्द्रादि देवताओं तक पहुँचाते हैं। वही अमृत फिर बढ़कर पूर्णिमा को चरम सीमा पर पहुँचता है; जैसा कि कथन है –
कला षोडशिका या तु अपः प्रविशते सदा।
अमायां तु सदा सोमः औषधिः प्रतिपद्यते।।
तमोषधिगतं गावः पिबन्त्यम्बुगतं च यत्।
तत्क्षीरममृतं भुत्वा मन्त्रपूतं द्विजातिभिः।
हुतमग्निषु यज्ञेशु पुनराप्यायते शशी।।
दिने दिने कला वृद्धिः पौर्णमास्यां तु पूर्यते।।
अमावस्या में वनस्पतियों में सोम का वास होने से उस दिन बैलों को हल में जोतने का पूर्णतः निषेध स्मृतियों में किया गया है। उस दिन बैलों को पूरे दिन चरने के लिये छोड़ देना चाहिये, जिससे चारे के द्वारा अमृतकला का पान कर वे अपने शरीर को पुष्ट कर कृषिकार्य में अधिक सहयोग कर सकें। अमावस्या को क्रय-विक्रय तथा समस्त शुभ कर्मों का निषेध है।
दिशा – ईशान।
शिववास – अमावस्या को शिववास गौरी के सान्निधय में होने से उस दिन शिवपूजन किया जा सकता है।
विशेष – अमावस्या तिथि केतु ग्रह की जन्म तिथि है। इसलिये शुभ कृत्यों में वर्जित करनी चाहिये।
विशेष – यदि अमावस्या में किसी बालक या बालिका का जन्म हो तो उसकी शान्ति मूल नक्षत्रों में जन्मे बालकों की भांति करानी चाहिये। अमावस्या में किसी बालक का जन्म उस परिवार में पितृदोष की सूचना देता है।
अमावस्या नामकरण में हेतु – मत्स्यपुराण के 14 वें अध्याय में एक रूपक कथा आती है, जिसके अनुसार प्राचीन काल में पितरों ने आच्छोद नामक एक सरोवर का निर्माण किया था। इन देवपितरों की एक मानसी कन्या थी, जिसका नाम था-अच्छोदा। अच्छोदा ने एक बार एक सहस्त्र दिव्य वर्षों तक कठिन तप किया; अतः उसे वर देने के लिये पितरगण पधारे। उनमें से एक अतिशय सुन्दर अमावसु नामक पितर को देखकर अच्छोदा उन पर अनुरक्त हो गई और अमावसु से प्रणय याचना करने लगी; परन्तु अमावसु इसके लिये तैयार नहीं हुये। अमावसु के धैर्य के कारण उस दिन की तिथि पितरों को अतिशय प्रिय हुई। उस दिन कृष्ण पक्ष की पंचदशी तिथि थी, जो कि तभी से अमावसु के नाम पर ‘अमावस्या’ कहलाने लगी।
तिथामवसुर्यस्यामिच्छां चक्रे न तां प्रति।
धैर्येण तस्य सा लोकैः अमावस्येति विश्रुता।
पितृणां वल्लभा मस्मात्तस्यामक्षयकारकम्।।
इस तिथि में पितरों के उद्देश्य से किया गया दानादि अक्षय फलदायक होता है।

तिथियों के सम्बन्ध में विशेष –
॰॰ विधि एवं निषेध के पालन में तात्कालिक तिथि मानी जाती है। जैसे – सप्तमी में नीले वस्त्र धारण करने का निषेध है; लेकिन यदि उसी दिन सांय 4 बजे के बाद अष्टमी तिथि आ गई हो तो चार बजे के बाद नीला वस्त्र धारण किया जा सकता है।
॰॰ देवकार्य में उदयव्यापिनी तिथि (जो सूर्योदय के समय हो) ग्रहण की जाती है। जैसे – कोई पूर्णिमा या अमावस्या को नियमित सत्यनारायण की पूजा या व्रत करता है, तो यह उदयव्यापिनी लेनी चाहिये।
॰॰ पितृकार्य- श्राद्ध, तर्पण आदि में मध्यान्ह्व्यापिनी तिथि लेनी चाहिये। जैसे- माघ कृष्ण पंचमी किसी के पिता का श्राद्धदिन है तो मध्यान्ह् में यदि चतुर्थी के दिन पंचमी आ जाये तथा अगले दिन के मध्यान्ह् में षष्ठी तिथि हो, तब चतुर्थी को श्राद्ध करना चाहिये। ऐसा ही नियम पितृपक्ष के लिये भी है।
॰॰ अलग-अलग व्रतों के लिये तिथियों के नियम भी अलग-अलग हैं। उन्हें तदनुसार ही करना चाहिये।

नन्दादि संज्ञा –
संज्ञा तिथि सिद्धातिथि
नन्दा 1 6 11 शुक्रवार
भद्रा 2 7 12 बुधवार
जया 3 8 13 मंगलवार
रिक्ता 4 9 14 शनिवार
पूर्णा 5 10 15 (30) बृहस्पतिवार
शुक्ल पक्ष में अशुभ (क्षीण चन्द्रमा) मध्यम शुभ (पूर्ण चन्द्र) सिद्धा तिथि सब दोषों का नाश करती है तथा सब कार्यों में सिद्धि को देती है।
कृष्ण पक्ष में शुभ (पूर्ण चन्द्र) मध्यम अशुभ (क्षीण चन्द्रमा) 

तिथि फल –
1 2 3 4 5 6 7 8
सिद्धि कार्य साधन आरोग्य हानिकारक शुभ फल अशुभ शुभ व्याधि नाश

9 10 11 12 13 14 15 30
मृत्यु द्रव्य दात्री शुभ सिद्धि सिद्धि उग्र पुष्टि अशुभ

नन्दादि तिथि कृत्य –
तिथि संज्ञा कृत्य
नन्दा (1, 6, 11) तस्वीर खींचना, उत्सव कर्म, मकान बनाना, तन्त्र शास्त्र के कार्य (जड़ी, बूंटी, ताबीज आदि), क्षेत्र तथा गीत-वाद्य नृत्य कर्म आदि करने चाहियें।
भद्रा (2, 7, 12) विवाह, आभूषण, गाड़ी की सवारी, यात्रा तथा पौष्टिक कर्म करने चाहिये।
जया (3, 8, 13) संग्राम तथा संग्राम सम्बन्धी कार्य करने चाहिये।
रिक्ता (4, 9, 14) पण्डितों की वाणी को शास्त्रार्थ में स्तम्भित करना, घातकर्म, विष प्रयोग, शस्त्र कर्म इत्यादि करने चाहिये।
पूर्णा (5, 10, 15, 30) मंगल कार्य, विावह, यात्रा, शान्तिक तथा पौष्टिक कर्म सिद्ध होते हैं।
अमावस्या केवल पितृ कार्य करने चाहिये।

पक्षरन्घ्र तिथि –
चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी तथा चतुर्दशी तिथियों को पक्षरन्घ्र तिथि कहते हैं। इन तिथियों में विवाह करने से स्त्री विधवा हो जाती है, उपनयन करने से वटु व्रात्य अर्थात् संस्कारहीन हो जाता है। सीमन्त करने से गर्भ का नाश हो जाता है, अन्नप्राशन कराने से मरण होता है, गृहारम्भ करने से घर में आग लग जाती है, मन्दिर की प्रतिष्ठा करने से राजा तथा प्रजा का नाश होता है। अर्थात् जो कुछ कार्य किया जाता है, उस का नाश होता है।

वर्ज्य घटियां –
आवश्यकता पड़ने पर चतुर्थी को 8, षष्टी को 9, अष्टमी को 14, नवमी को 25, द्वादशी को 10 तथा चतुर्दशी को आरम्भ की 5 घटि छोड़कर कार्य करना चाहिये।

दग्ध, विष और हुताशन योग संज्ञा बोधक चक्र
वार तथा तिथि के योग से उक्त योगों का निर्माण होता है- 

वार रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार
दग्धा संज्ञक 12 11 5 3 6 8 9
विष संज्ञक 4 6 7 2 8 9 7
हुताशन संज्ञक 12 6 7 8 9 10 11 

इन योगों का फल नाम सदृश है तथा शुभ कार्यों में ये योग वर्जित हैं।


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    • 17 years ago

    resp.sir, i want to know about do’s and don’t at raviwar saptmi. plz. give the importance of raviwar saptmi.

    • 18 years ago

    hi

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