श्री हनुमद्ष्टोत्तर-शत-नामावली ॐ आंजनेयाय विद्महे महाबलाय धीमहि तन्नो हनुमान प्रचोदयात् ॐ आंजनेयाय नमः। ॐ महा-वीराय नमः। ॐ हनुमते नमः। ॐ मारूतात्मजाय नमः। ॐ तत्त्व-ज्ञान-प्रदाय नमः। ॐ सीता-देवी-मुद्रा-प्रदायकाय नमः। ॐ अशोक-वनिका-छेत्रे-नमः। ॐ सर्व-माया-विभंजनाय नमः। ॐ सर्व-बन्ध-विमोक्त्रे नमः। ॐ रक्षो-विध्वंस-कारकाय नमः। ॐ पर-विद्या-परीहाराय नमः। ॐ पर-शौर्य-विनाशनाय नमः। ॐ पर-मन्त्र-निराकत्र्रे नमः। ॐ पर-यन्त्र-प्रभेदकाय नमः। ॐ सर्व-ग्रह-विनाशाय नमः। ॐ… Read More


सर्वापत्ति-निवारक हनुमान-स्तुति ॐ सीता-राम जानत हों, सीता-राम मानत हों। सीता-राम पूजत, जपत सीता-राम हों। सीता-राम सों बसै प्राण, ध्यान धरत सीता-राम अभिराम हों। सीता-राम तेरे मन की कल्प-तरु, सीता-राम सों सनेह, सीता-राम को गुलाम हों। शिखा वज्र, नयन वज्र, तेरो मुख-दन्त वज्र, छाती-भुज पिंग-वज्र। लाल-लाल दन्त हैं, काया लाल, ग्रीवा लाल, वसन लंगुर लाल, असन-अधर… Read More


पितृस्तोत्र ।।रूचिरूवाच।। अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्। नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।। इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा। तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि।। नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा। द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलिः।। देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्। अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येऽहं कृतांजलिः।। प्रजापतं कश्यपाय सोमाय वरूणाय च। योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः।। नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु। स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।। सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।… Read More


दाम्पत्य सुख के उपाय १॰ यदि जन्म कुण्डली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, द्वादश स्थान स्थित मंगल होने से जातक को मंगली योग होता है इस योग के होने से जातक के विवाह में विलम्ब, विवाहोपरान्त पति-पत्नी में कलह, पति या पत्नी के स्वास्थ्य में क्षीणता, तलाक एवं क्रूर मंगली होने पर जीवन साथी की मृत्यु… Read More


।। श्री कनकधारा स्तोत्रम् ।।  अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम। अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।।1।।  मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि। माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:।।2।। विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि। ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:।।3।। आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्। आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:।।4।। बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै… Read More


गणेशजी को दूर्वा, शमीपत्र तथा मोदक चढ़ाने का रहस्य – गणेशजी को तुलसी छोड़कर सभी पत्र-पुष्प प्रिय हैं। अतः सभी अनिषिद्ध पत्र-पुष्प इन पर चढ़ाये जा सकते हैं। तुलसीं वर्जयित्वा सर्वाण्यपि पत्रपुष्पाणि गणपतिप्रियाणि। (आचारभूषण) गणपति को दूर्वा अधिक प्रिय है। अतः इन्हें सफेद या हरी दूर्वा अवश्य चढ़ानी चाहिये। दूर्वा की फुनगी में तीन या… Read More


सर्वप्रथम गणेश का ही पूजन क्यों ? हिन्दू धर्म में किसी भी शुभ कार्य का आरम्भ करने के पूर्व गणेश जी की पूजा करना आवश्यक माना गया है, क्योंकि उन्हें विघ्नहर्ता व ऋद्धि-सिद्धि का स्वामी कहा जाता है। इनके स्मरण, ध्यान, जप, आराधना से कामनाओं की पूर्ति होती है व विघ्नों का विनाश होता है।… Read More


महिमा तिलक की स्नान एवं धौत वस्त्र धारण करने के उपरान्त वैष्णव ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र, शैव त्रिपुण्ड, गाणपत्य रोली या सिन्दूर का तिलक शाक्त एवं जैन क्रमशः लाल और केसरिया बिन्दु लगाते हैं। दिगम्बर जैन सम्प्रदाय में केसरिया तिलक तथा बौद्धों में श्वेताम्बर मतावलम्बियों के समान ही बिन्दु मस्तक पर धारण करते हैं। नारद पुराण… Read More


वेदों का विभाजन आधुनिक विचारधारा के अनुसार चारों वेदों की शब्द-राशि के विस्तार में तीन दृष्टियाँ पायी जाती है- (१) याज्ञिक, (२) प्रायोगिक और (३) साहित्यिक दृष्टि। याज्ञिक दृष्टिः– इसके अनुसार वेदोक्त यज्ञों का अनुष्ठान ही वेद के शब्दों का मुख्य उपयोग माना गया है। सृष्टि के आरम्भ से ही यज्ञ करने में साधारणतया मन्त्रोच्चारण… Read More


वैदिक वाङ्मय का शास्त्रीय स्वरुप वर्तमान काल में वेद चार माने जाते हैं। उनके नाम हैं- (१) ऋग्वेद, (२) यजुर्वेद, (३) सामवेद तथा (४) अथर्ववेद।  द्वापरयुग की समाप्ति के पूर्व वेदों के उक्त चार विभाग अलग-अलग नहीं थे। उस समय तो ऋक्, यजुः और साम – इन तीन शब्द-शैलियों की संग्रहात्मक एक विशिष्ट अध्ययनीय शब्द-राशि… Read More