4 February 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -001 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ पहला अध्याय भगवद्गुणगान की महिमा में कौशिक ब्राह्मण की कथा श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे प्रथमोऽध्यायः कौशिकवृत्तकथनं ऋषि बोले — हे सूतजी ! समस्त देवताओं और ईश्वरों के ईश्वर भगवान् कृष्ण इस लोक में किससे सन्तुष्ट होते हैं ? आप हम लोगों को बतायें; आप सम्पूर्ण तत्त्वों के ज्ञाता हैं ॥ १ ॥ सूतजी बोले — हे विप्रवरो ! पूर्वकाल में अम्बरीष ने भी महातेजस्वी महामुनि मार्कण्डेय से [ इस विषय में ] पूछा था; मैं उसे यथार्थरूप से बता रहा हूँ ॥ २ ॥ अम्बरीष बोले — हे मुने! हे महामते ! हे मार्कण्डेयजी ! आप समस्त धर्मो के पूर्ण ज्ञाता, अत्यन्त पुरातन तथा पुराणतत्त्वों के विद्वान् हैं ॥ ३ ॥ हे महाप्राज्ञ ! नारायण के द्वारा निर्मित दिव्य धर्मो में कौन-सा धर्म श्रेष्ठ तथा उत्तम है ? हे सुव्रत ! उसे आप यहाँ पर भक्तों के कल्याणार्थ बतायें ॥ ४ ॥ सूतजी बोले — उनका यह वचन सुनकर [मार्कण्डेयजी] उठ करके दोनों हाथ जोड़कर अविनाशी तथा अच्युत भगवान् नारायण कृष्ण का स्मरण करते हुए कहने लगे ॥ ५ ॥ मार्कण्डेयजी बोले — हे राजन् ! सम्यक् प्रकार से सुनिये भक्तिपूर्वक [ अनुष्ठित किये गये] भगवान् नारायण के स्मरण, पूजन और प्रणाम- इनमें से प्रत्येक को अश्वमेधयज्ञ के समान फल प्रदान करने वाला कहा जाता है; क्योंकि एकमात्र वे प्रभु जनार्दन ही परम पुरुष परमात्मा हैं, जिनसे आश्रय लेकर ब्रह्माजी जगत् के स्रष्टा कहे जाते हैं। मैंने जो देखा है तथा जाना है, उसी एकमात्र धर्म का वर्णन करूँगा ॥ ६-८ ॥ प्राचीनकाल में त्रेतायुग में एक कौशिक नाम वाले ब्राह्मण थे; वे नित्य-निरन्तर वासुदेव परायण रहते हुए सामगान में तल्लीन रहते थे ॥ ९ ॥ भगवान् विष्णु के उदार चरित्र का बार-बार गान करते हुए वे भोजन करने, बैठने तथा शयन में सदा उन्हीं में अपना चित्त लगाये रहते थे ॥ १० ॥ परम पवित्रक्षेत्रस्थ भगवान् विष्णु के मन्दिर में आकर वे ताल, स्वर और लय से युक्त, मूर्च्छना और स्वरयोग, बृहद्रथन्तर आदि श्रुतिभेद से अन्वित भगवान् श्रीहरि का गान करते थे । इस प्रकार भक्तियोग में सदा स्थित रहकर वे वहीं पर भिक्षामात्र ग्रहण करते हुए रहते थे ॥ ११-१२ ॥ उस समय उन्हें वहाँ गाते हुए देखकर ‘पद्माख्य’ (पद्माक्ष ) – इस नाम से विख्यात किसी द्विज ने उन्हें अन्न प्रदान किया। तब महातेजस्वी कौशिक अपने कुटुम्बसहित उष्ण अन्न को ग्रहण करके प्रसन्नतापूर्वक प्रभु श्रीहरि का गुणगान करते हुए वहीं पर स्थित हो गये ॥ १३-१४ ॥ वह पद्माख्य भी सदा उसे सुनता रहता था और समय-समय पर वहाँ से चला भी जाता था। किसी समय कालयोग से द्विज कौशिक के सात शिष्य वहाँ आये। वे ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यकुल में उत्पन्न; ज्ञान और विद्या से परिपूर्ण; विशुद्ध मन वाले तथा भगवान् वासुदेव के अनन्य भक्त थे ॥ १५-१६ ॥ स्वयं पद्माक्ष ने उन्हें भी अन्नादिसहित उपयोगी पदार्थ प्रदान किये। वे कौशिक प्रसन्नचित्त होकर अपने शिष्यों के साथ वहीं पर विष्णुमन्दिर में प्रभु श्रीहरि का सम्यक् रूप से सदा गुणगान करते रहते थे ॥ १७१/२ ॥ वहीं पर मालव नामक विष्णुपरायण वैश्य प्रसन्नचित्त होकर प्रतिदिन भगवान् श्रीहरि के लिये दीपमाला अर्पित किया करता था। उस वैश्य की मालवी नाम वाली पतिव्रता भार्या भी श्रीहरि के उस सम्पूर्ण स्थान को सम्यक् प्रकार से गोमय से नित्य लीपकर अत्यन्त प्रसन्न होकर उत्तम गान का श्रवण करती हुई अपने पति के साथ वहाँ रहती थी ॥ १८-२० ॥ उसी समय प्रशस्त व्रत वाले पचास श्रेष्ठ ब्राह्मण श्रीहरि का गान सुनने के निमित्त कुशस्थल से वहाँ पर आ गये। गान – विद्या के मूल रहस्य को जानने वाले वे ब्राह्मण महात्मा कौशिक के कार्यों को सम्पन्न करते हुए और [ श्रीहरि का गुणगान] सुनते हुए वहीं रहने लगे ॥ २१-२२ ॥ उस समय उन कौशिक का गान प्रसिद्ध हो गया था, अतः उस प्रसिद्धि को सुनकर राजा कलिङ्ग ने वहाँ आकर यह वचन कहा — हे कौशिक ! आज आप अपने गणों के साथ मेरे लिये गान कीजिये, जिसे आप सभी लोग तथा कुशस्थल के नागरिक भी सुनें ॥ २३-२४ ॥ उसे सुनकर कौशिक ने सान्त्वनाभरी वाणी में राजा से कहा — हे महाराज ! मेरी जिह्वा तथा वाणी भगवान् श्रीहरि के अतिरिक्त किसी अन्य की यहाँ तक कि इन्द्र की भी स्तुति नहीं करती; अतः यह जिह्वा नहीं बोलेगी ॥ २५१/२ ॥ उनके ऐसा कहने पर उनके वासिष्ठ, गौतम, हरि, सारस्वत, चित्र, चित्रमाल्य, शिशु आदि जो शिष्यगण थे; उन्होंने भी राजा से वैसा ही कहा, जैसा कौशिक ने कहा था। विष्णुपरायण उन श्रोताओं ने भी कहा — हे पार्थिव ! [हम लोगों के] ये कान श्रीहरि को छोड़कर किसी दूसरे का गुणगान नहीं सुनते। हम लोग उन्हीं का यशोगान सुनते हैं; कोई दूसरी स्तुति नहीं सुनते ॥ २६–२८१/२ ॥ उसे सुनकर राजा ने रुष्ट होकर अपने सेवकों से कहा — अब तुम लोग गाओ, जिससे ये ब्राह्मण मेरी कीर्ति सुनें। चारों ओर से गाये जाने वाले मेरे यश को ये कैसे नहीं सुनेंगे ? ॥ २९-३० ॥ तब उनके ऐसा कहने पर वे भृत्यगण राजा का उत्तम यशोगान करने लगे। गान के आरम्भ होने पर बलपूर्वक अवरुद्ध मार्ग वाले वे विप्र बहुत दुःखित हुए और उन्होंने काष्ठ की खूँटियों से एक-दूसरे के कानों को बन्द कर दिया ॥ ३११/२ ॥ यह राजा अपने यश के गान में प्रवृत्त [ लिप्त ] है और हमको बलपूर्वक गाने को कहेगा। कौशिकादि ब्राह्मणों ने उस राजा की इस मनोवृत्ति को जानकर अपनी जिह्वा के अग्रभाग को अपने हाथों से काट लिया ॥ ३२-३३ ॥ तदनन्तर राजा ने अत्यन्त कुपित होकर उन्हें अपने राज्य से निर्वासित कर दिया। तब अपना सारा धन लेकर वे विप्र चले गये और उत्तर दिशा में पहुँचकर यथासमय स्थूलशरीर के वियोग (मृत्यु) को प्राप्त हो गये। तब उन्हें आया हुआ देखकर ‘अब क्या किया जाय ‘—यह सोचकर यमराज व्याकुल हो उठे ॥ ३४-३५ ॥ हे राजन् ! यमराज की यह चेष्टा देखकर ब्रह्माजी ने देवाधिपों से उसी क्षण कहा — ‘ आप लोग कौशिक आदि द्विजों को अभी सुखमय निवास प्रदान कीजिये ।’ यदि आप लोग अपना देवत्व चाहते हैं, तो वे विप्र जो [ श्रीहरि के ] गान तथा चित्तवृत्ति के निरोध के द्वारा भगवान् जनार्दन की नित्य पूजा करते हैं, उन्हें ले आइये; इससे आप लोगों का कल्याण होगा ॥ ३६-३७ ॥ [ब्रह्माजी के द्वारा ] इस प्रकार कहे गये वे लोकपाल ‘हे कौशिक !’, कुछ देवता ‘हे मालव !’ तथा अन्य देवतागण ‘हे पद्माक्ष ! ‘ — ऐसा बार – बार पुकारते हुए उन विप्रों के पास पहुँचकर उन्हें साथ में लेकर आकाशमार्ग से शीघ्र ही क्षणभर में ब्रह्मलोक पहुँच गये ॥ ३८-३९ ॥ तत्पश्चात् कौशिक आदि को देखकर लोकपितामह ब्रह्मा ने आगे बढ़कर स्वागत के द्वारा समुचितरूप से उनका अत्यधिक सम्मान किया। हे नृपश्रेष्ठ ! ब्रह्माजी के द्वारा [उन विप्रों के प्रति] किये गये महान् सम्मान को देखकर देवताओं में परस्पर कोलाहल होने लगा ॥ ४०-४१ ॥ तदनन्तर वासुदेवपरायण भगवान् ब्रह्मा उन श्रेष्ठ देवताओं को ऐसा करने से रोककर कौशिक आदि मुनियों को लेकर देवताओं के साथ शीघ्र ही विष्णुलोक चले गये ॥ ४२१/२ ॥ वहाँ भगवान् नारायण श्वेतद्वीप में निवास करने वाले ज्ञानयोगेश्वर, विष्णुभक्त, एकनिष्ठ, सिद्ध, नारायण के समान विग्रह वाले, दिव्य, चार भुजाएँ धारण करने वाले, मनोहर, श्रीविष्णु के चिह्नों से युक्त, दीप्तिमान् तथा निर्विकार अट्ठासी हजार महापुरुषों के द्वारा एवं हम लोगों, नारद-सनक आदि मुनियों, अनेकविध निष्पाप प्राणियों तथा दिव्य स्त्रियों के द्वारा सभी ओर से सेवित हो रहे थे । वे माधव श्रीहरि मध्य भाग में स्थित हजार द्वारों वाले, हजार योजन विस्तार वाले, अलौकिक, मणिनिर्मित तथा मनोहर विमान में स्वच्छ एवं अद्भुत सिंहासन पर विराजमान होकर लोककार्य में तत्पर लोगों पर दृष्टि दिये हुए सुशोभित हो रहे थे ॥ ४३-४८ ॥ उसी समय कौशिक आदि मुनियों सहित भगवान् ब्रह्मा गरुड़ध्वज श्रीहरि के सम्मुख आकर प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे ॥ ४९ ॥ तत्पश्चात् ऐश्वर्यसम्पन्न नारायण भगवान् श्रीहरि ने उन सबको देखकर अत्यन्त प्रेम के साथ उन्हें क्रम से कौशिक आदि [नाम लेकर ] पुकारा। इस महान् आश्चर्य के घटित होने पर वहाँ जयकार की तीव्र ध्वनि होने लगी ॥ ५०१/२ ॥ विश्वात्मा विष्णु ने ब्रह्मा से कहा — हे ब्रह्मन् ! मेरा कथन सुनिये, साध्य-साधन में तत्पर रहने वाले ये ‘कुश-स्थल – निवासी विप्र कौशिक का हित करने के लिये प्रवृत्त हैं। ये ज्ञान के तत्त्वार्थ के पण्डित, मेरी कीर्ति के श्रवण में तत्पर रहने वाले तथा देवताओं के अनन्य भक्त हैं; ये साध्यदेव हों। इन्हें मेरे समीप तथा अन्यत्र भी सर्वदा प्रवेश दीजिये ॥ ५१–५३१/२ ॥ ऐसा कहकर प्रभु माधव ने कौशिक से कहा — हे महाप्राज्ञ ! आप अपने शिष्यों के साथ सदा मेरे समीप विराजमान रहें । मेरे गणाधिप बनकर अब आप वहीं स्थित रहें, जहाँ मैं रहूँ ॥ ५४-५५ ॥ इसी प्रकार दामोदर श्रीहरि ने मालव तथा मालवी से कहा — ‘हे मालव ! आप मेरे लोक में अपनी भार्या के साथ दिव्य रूप धारण करके ऐश्वर्यसम्पन्न होकर मेरा यशोगान सुनते हुए राजा के रूप में प्रतिष्ठित होकर यथेच्छया निवास कीजिये; जबतक लोक स्थित रहें. तबतक आप यहाँ यथेच्छ रहें ‘ ॥ ५६-५७ ॥ तदनन्तर भगवान् माधव ने पद्माक्ष से कहा — आप ‘धनद’ हो जाइये; धनों के स्वामी बनकर आप पुनः यथासमय मेरे पास आकर मेरा दर्शन करके सुखपूर्वक सदा राज्य कीजिये ॥ ५८१/२ ॥ ऐसा कहकर श्रीहरि विष्णु ने ब्रह्मा से यह कहा — इन कौशिक के गान से मेरी योगनिद्रा समाप्त हो गयी है। ये अपने शिष्यों के साथ विष्णुस्थल में सम्यक् रूप से मेरी स्तुति कर रहे थे । क्रूर तथा अत्यधिक शक्तिशाली राजा कलिङ्ग ने इन्हें [देश से] निकाल दिया है। इन्होंने अपनी जिह्वा काटकर ‘श्रीहरि के अतिरिक्त किसी अन्य की स्तुति मैं किसी भी प्रकार से नहीं करूँगा’ – ऐसा निश्चय कर लिया था, अतः ये मेरे लोक को प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार इन संयमी, मेरे भक्त तथा यशस्वी विप्रों ने काष्ठ की खूँटियाँ एक-दूसरे के कानों में ठोंककर यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि हम लोग श्रीहरि की कीर्ति को छोड़कर अन्य कुछ भी नहीं सुनेंगे। अतएव इन ‘विप्रों’ ने भी देवत्व तथा मेरा सान्निध्य प्राप्त किया है, ये मालव भी अपनी भार्या के साथ में मेरे मन्दिर को भलीभाँति स्वच्छ करके दीप, माला आदि [ उपचारों ]-से नित्य मेरी अर्चना करके सावधान होकर मेरी कीर्ति तथा चरित से युक्त गान का निरन्तर श्रवण किया करते थे; इसीलिये हे ब्रह्मन् ! इन्होंने मेरा सनातन लोक प्राप्त किया है। इन पद्माक्ष ने महात्मा कौशिक को भोजन प्रदान किया था, इसीलिये इन्हें धनेशत्व तथा मेरे सान्निध्य की प्राप्ति हुई है ॥ ५९–६६१/२ ॥ ऐसा कहकर भगवान् श्रीहरि वहाँ समाज में लोकपूजित हुए। उसी क्षण मधुर स्वरों के विशेषज्ञ, वीणा के गुणतत्त्वों के ज्ञाता तथा वाद्यविद्या के विशारद मनीषियों के साथ विचित्र आभूषणों से मण्डित विष्णुभार्या लक्ष्मीजी मन्द-मन्द मुसकान करती तथा गाती हुई वहाँ आयीं; वे हजारों, करोड़ों अंगनाओं से घिरी हुई थीं। तब उन्हें देखकर भुशुण्डी तथा परिघ नामक आयुध धारण किये सभी गणाधिप मुनियों, ब्रह्मा आदि देवताओं को सभी ओर से फटकारते हुए तथा वहाँ से हटाते हुए प्रसन्नचित्त होकर वहाँ स्थित हो गये । तत्पश्चात् ब्रह्मा तथा अन्य देवताओं के साथ हमसब वहाँ से निकल गये ॥ ६७–७११/२ ॥ उसी समय मुनिश्रेष्ठ तुम्बुरु बुलाये गये और उन्होंने भगवान् विष्णु तथा देवी लक्ष्मी के समीप प्रवेश किया। वहाँ आसीन होकर वे प्रसन्नतापूर्वक नानाविध मूर्च्छनाओं से युक्त मधुर पदों का सम्यक् प्रकारसे गान करने लगे तथा वीणा बजाने लगे। तत्पश्चात् अनेक प्रकार के रत्नजटित दिव्य तथा श्रेष्ठ आभूषणों एवं दिव्य तथा मनोहर हारों से पूजित होकर मुनिश्रेष्ठ तुम्बुरु प्रसन्नतापूर्वक वहाँ से निकल आये। हे शत्रुदमन ! उन्हें यथोचित रूप से पूजित होते हुए देखकर अन्य ऋषि एवं देवतागण उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ ७२–७५१/२ ॥ तब भगवान् श्रीहरि के द्वारा गन्धर्व तुम्बुरु के प्रति किये गये सत्कार को देखकर सन्तप्त हृदय तथा नेत्रों वाले एवं शोक तथा मूर्छा से व्याकुल चित्तवाले नारदमुनि चिन्तित हो उठे। वे शोकाविष्ट मन से सोचने लगे कि मैं किस प्रकार से श्रीहरि का सान्निध्य तथा देवी लक्ष्मी का सामीप्य प्राप्त करूँगा; अहो, तुम्बुरु ने इसे प्राप्त कर लिया है। मुझ मूर्ख तथा विवेकहीन को धिक्कार है! मैं गणाधिपों के द्वारा श्रीहरि के पास से क्यों निकाल दिया गया; अब मैं जीवन धारण करते हुए कहाँ जाऊँगा ? अहो, तुम्बुरु ने ही ऐसा कर डाला है ! ॥ ७६–७९ ॥ ऐसा सोचते हुए विप्र नारद तप में स्थित हो गये । विद्वान् मुनि नारद भगवान् विष्णु का ध्यान करते हुए, तुम्बुरु सत्का रका स्मरण करते हुए, बार-बार विलाप करते हुए और ‘मुझे धिक्कार है’ – ऐसा सोचते हुए [प्राणायाम के द्वारा ] श्वास रोककर एक हजार दिव्य वर्षों तक [तपस्या में] बैठे रहे ॥ ८०-८१ ॥ हे राजन् ! इसके बाद भगवान् विष्णु ने जो किया, उसे आप सुनें ॥ ८२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ‘कौशिकवृत्तकथन’ नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥ अथ श्रीसटीकलिङ्गमहापुराणोत्तरभागप्रारम्भः श्रीगणेशाय नमः Content is available only for registered users. 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