30 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -087 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ अध्याय सत्तासीवाँ सनकादि मुनीश्वरों को शिवज्ञान का उपदेश श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सप्ताशीतितमोऽध्यायः मुनिमोहशमनं ऋषिगण बोले — यह सुनकर कुमार आदि उन महाबुद्धिमान् मुनियों ने भयभीत होकर प्रसन्न पिनाकधारी परमेश्वर को प्रणाम करके उनसे कहा — ‘हे महेश्वर ! यदि ऐसा है, तो आप इन देवी पार्वती के साथ अनेकविध भोगों के द्वारा क्रीड़ा क्यों करते हैं; कृपा करके यह बतायें’ ॥ १-२ ॥ सूतजी बोले — [ हे ऋषियो !] ऐसा कहे जाने पर पिनाकधारी नीललोहित ईश्वर ने हँसकर उन अम्बिका की ओर देखकर वहाँ स्थित द्विजों को प्रणाम करके उनसे कहा — ‘ अपनी इच्छा से शरीर धारण करने वाले मेरे लिये न बन्धन है, न मोक्ष है। मैं सर्वव्यापी, कर्तृत्वरहित तथा सर्वज्ञ हूँ; जबकि यह जीव अणुरूप, भोक्ता तथा अज्ञ है। जो मायी है, वह माया से सकाम कर्म द्वारा बँधा हुआ है और वह कर्मों से लिप्त है । हे द्विजो ! आत्मा के लिये ज्ञान, ध्यान, बन्धन तथा मोक्ष नहीं हैं। जो विद्वान् मुझमें ऐसा अनुभव कर लेता है, उसके लिये भी ये सब नहीं होते हैं। ये [पार्वती] विद्या हैं और मैं वेद्य हूँ। ये प्रज्ञा, श्रुति तथा स्मृति हैं। ये मेरे द्वारा प्रतिष्ठित धृति, निष्ठा, ज्ञानशक्ति, क्रिया, इच्छा तथा आज्ञा हैं। ये (परा-अपरा) दोनों विद्याएँ हैं; इसमें सन्देह नहीं है। ये जीवसम्बन्धी प्रकृति नहीं हैं । विचार किया जाय, तो ये विकृति भी नहीं हैं। विकार नहीं हैं; ये माया हैं, जो सत्-असत् से रहित अर्थात् अनिर्वचनीय हैं। पूर्वकाल में लोगों को अभय प्रदान करने वाली, महाभाग्यवती तथा पाँच मुख वाली मेरी यह सनातनी आज्ञा मेरे मुख से उत्पन्न हुई थी । तब जगत् के कल्याण का चिन्तन करता हुआ मैं शिव उस आज्ञा में प्रविष्ट होकर इनके साथ सत्ताईस तत्त्वों से सबको व्याप्त करके स्थित हुआ । हे श्रेष्ठ द्विजो ! तभी से मुक्ति प्रारम्भ हुई ‘ ॥ ३–१०१/२ ॥ सूतजी बोले — [ हे ऋषियो !] ऐसा कहकर परमेश्वर ने भवानी की ओर देखा और सनातनी भवानी ने उन [परमेश्वर]-को देखकर माया को हटा लिया; तब माया के मल से मुक्त हुए वे मुनिगण पार्वती को देखकर प्रसन्न होकर मुक्त हो गये । अतः ये [ पार्वती ] ही परागति हैं । वस्तुतः उमा तथा शंकर में भेद नहीं है; वे [शिव] दो रूप धारण करके स्थित हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ११–१३१/२ ॥ जब शिव की माया से विद्वान् अनासक्त हो जाता है, तब क्षणभर में [उसकी] मुक्ति हो जाती है; अन्यथा करोड़ों कर्मों से भी मुक्ति नहीं होती। ऋषियों के द्वारा बताया गया मुक्तिक्रम परमेष्ठी शिव के लिये विवक्षित नहीं है। परमेश्वर की कृपा से क्षणभर में मुक्ति हो जाती है, यह उनकी प्रतिज्ञा है; इसमें सन्देह नहीं है। परमेष्ठी शिव की कृपा से जीव मुक्त हो जाता है, चाहे वह गर्भ में स्थित हो, उत्पन्न हो रहा हो, बालक हो, तरुण हो अथवा वृद्ध हो। देवों के देव [महेश्वर ] – के अनुग्रह से अण्डज, उद्भिज्ज तथा स्वेदज [ प्राणी] भी मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १४-१७ १/२ ॥ ये जगत्पति शिव ही बन्धन तथा मोक्ष करने वाले हैं। भूः भुवः स्वः, मह:, जनः, तपः तथा सत्यम् — ये लोक और करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्ड तथा अण्डों के आठों आवरण — ये सब उन देवदेव [ महेश्वर ] -के विग्रह (शरीर) हैं। सातों द्वीपों में, सभी पर्वतों में, वनों में, समुद्रों, सभी वायु स्कन्धों में तथा अन्य लोकों में जो चराचर जीव निवास करते हैं — वे सब शिव के अंश से उत्पन्न हुए हैं; निश्चित रूप से इनकी गति वे ही हैं। सब कुछ रुद्र ही हैं। उन महात्मा पुरुष को नमस्कार है ॥ १८–२२ ॥ उन रुद्र ने ही सम्पूर्ण जगत् को तथा सभी जीवों को उत्पन्न किया है। ये देवी अम्बिका रुद्र की आज्ञा के रूप में विराजमान हैं; मुक्ति इन्हीं से प्राप्त होती है — ऐसा आकाशचारी सिद्धों ने प्रसन्नचित्त होकर कहा है। जब वे [शिव] इन आज्ञारूपी अम्बिका के साथ स्थित होकर उन सबको कृपापूर्वक देखते हैं, तब वे आकाशचारी सिद्धगण प्रभु का सायुज्य प्राप्त कर लेते हैं और सदा के लिये उसी में स्थित हो जाते हैं ॥ २३–२५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘मुनिमोहशमन’ नामक सत्तासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८७ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -006 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -014 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -022 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -030 श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -038 Powered by YARPP.