15 January 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -027 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ सत्ताईसवाँ अध्याय लिङ्गार्चनविधि के अन्तर्गत महेश्वरस्वरूप होकर विविध उपचारों द्वारा लिङ्गपूजा का विधान, लिङ्गाभिषेक की महिमा तथा अभिषेक के मन्त्र श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सप्तविंशोऽध्यायः लिङ्गार्चनविधिः शैलादि बोले — [ हे सनत्कुमार!] सुनिये, अब मैं संक्षेप में ही क्रम से लिङ्गार्चन – विधि का वर्णन करूँगा; क्योंकि विस्तार के साथ इसका वर्णन तो सौ वर्षों में भी नहीं किया जा सकता है ॥ १ ॥ इस विधि से नियमपूर्वक (त्रिविध जल, भस्म एवं मन्त्रसे) स्नानकर पूजाके स्थानपर प्रवेश करके तीन प्राणायामकर त्रिनेत्र, पंचमुख, दश भुजाओं वाले, शुद्ध स्फटिकतुल्य वर्ण वाले सभी आभूषणों से अलंकृत तथा विचित्र वस्त्र से विभूषित शिव का ध्यान करना चाहिये ॥ २-३ ॥ उनके इस रूप का ध्यानकर दाहन तथा प्लावन आदि भूतशुद्धि की क्रिया से युक्त शैवी देह को हृदय में स्थापित करके परमेश्वर शिव का पूजन करना चाहिये ॥ ४ ॥ इस प्रकार देहशुद्धि करके क्रमशः मूलमन्त्र, प्रणवयुक्त [अघोरादि पंच] ब्रह्ममन्त्रों से देह के सभी अंगों में न्यास करे ॥ ५ ॥ परम कल्याणप्रद इस ‘नमः शिवाय’ सूत्र में समस्त वेद तथा मन्त्र सूक्ष्मरूप में विद्यमान रहते हैं । जिस प्रकार वट के बीज में विशाल वटवृक्ष का भाव उपस्थित रहता है, उसी प्रकार इस पवित्र एवं महत् युक्त सूत्र में महान् ब्रह्म सूक्ष्मरूप से साक्षात् विराजमान है ॥ ६-७ ॥ पूजा के स्थान को गन्ध तथा चन्दन से युक्त जल के द्वारा सेचित करना चाहिये; पुनः सभी पूजनद्रव्यों को क्षालन, प्रोक्षण आदि से शोधित कर लेना चाहिये । क्षालन तथा प्रोक्षण प्रणव से ही किया जाता है ॥ ८११/२ ॥ विवेकी पुरुष को चाहिये कि वह प्रोक्षणीपात्र, अर्घ्यपात्र, पाद्यपात्र तथा आचमनपात्र को भलीभाँति अनुक्रम से स्थापित करे और फिर विधिपूर्वक अवगुंठन करे । पुनः उन सभी पात्रों में शुद्ध एवं शीतल जल डालकर उन्हें कुशों से ढककर उन पर शुद्ध जल का प्रोक्षण करना चाहिये ॥ ९-११ ॥ तत्पश्चात् बुद्धिमान् पुरुष को उन पात्रों में भलीभाँति देखकर विभिन्न द्रव्य प्रणवपूर्वक डालने चाहिये। पाद्यपात्र में उशीर तथा चन्दन डाले और जाति, कंकोल, कंपूर, शतावरी एवं तमाल का चूर्ण बनाकर इन्हें उचित मात्रा में आचमनीय पात्र में डाले। चंदन, कपूर तथा विविध प्रकार के पुष्प सभी पात्रों में डालने चाहिये ॥ १२–१४ ॥ कुश का अग्रभाग, अक्षत, यव, धान, तिल, घी, सफेद सरसों, पुष्प तथा भस्म — इन्हें अर्घ्यपात्र में डालना चाहिये। कुश, पुष्प, यव, धान, शतावरी, तमाल एवं भस्म — इन द्रव्यों को प्रणव से प्रोक्षणीपात्र में डालना चाहिये ॥ १५-१६ ॥ तत्पश्चात् पञ्चाक्षर मन्त्र, रुद्रगायत्री अथवा केवल वेदसाररूप सर्वोत्तम प्रणव से इन पात्रों को अभिमन्त्रित करना चाहिये ॥ १७ ॥ इसके अनन्तर प्रणवयुक्त ईशान ( ॐ ईशानः सर्वविद्यानाम्० ) आदि पाँच याजुष मन्त्रों से प्रोक्षणीपात्र में स्थित जल के द्वारा सभी पूजनद्रव्यों का प्रोक्षण करे ॥ १८ ॥ पुनः देवदेव शिवजी के दाहिनी ओर स्थित हजारों देदीप्यमान अग्नि के सदृश वर्ण वाले, बालचन्द्रमा को मुकुटरूप में सिर पर धारण करने वाले, वानर के तुल्य मुख वाले, चार भुजाओं वाले, पुष्प की माला धारण करने वाले,सौम्य स्वरूप वाले तथा सभी अलंकारों से सुशोभित मुझ त्रिनेत्र नन्दी का विधिवत् पूजन करना चाहिये। पुनः उत्तरभाग में विराजमान पुण्यमयी, स्वर्ण-सदृश आभा वाली, सुन्दर, कीर्तिशालिनी, पतिव्रता एवं माता पार्वती के चरणों के मण्डन में सतत तत्पर रहने वाली देवीरूपिणी मेरी भार्या की पूजा करनी चाहिये ॥ १९–२१ ॥ इस प्रकार हम दोनों की पूजा करके परमेष्ठी शिव के मन्दिर में प्रवेशकर शिवजी के पाँचों मस्तकों पर सद्योजात आदि पाँच मन्त्रों से भक्तिपूर्वक पुष्पाञ्जलि अर्पित करनी चाहिये । पुनः गन्ध, पुष्प, धूप तथा विविध उपचारों से शंकर, कार्तिकेय, गणेशजी एवं पार्वती की पूजा करके शिवलिङ्ग का निर्माल्य (अर्पित चढ़ावे का अवशेष) दूरकर लिङ्ग की शुद्धि करनी चाहिये ॥ २२-२३ ॥ पुनः सभी मन्त्रों के आदि में प्रणव (ॐ) तथा अन्त में ‘नमः’ लगाकर जप करने के पश्चात् परमेश्वर को प्रणवमन्त्र के द्वारा अष्टदल कमलरूप आसन निवेदित करना चाहिये ॥ २४ ॥ उस आसन का पूर्वदल अविनाशी तथा साक्षात् अणिमा सिद्धि स्वरूप है। उसका दक्षिणदल लघिमा, पश्चिमदल महिमा, उत्तरदल प्राप्ति, अग्निकोण का दल प्राकाम्य, नैर्ऋत्यकोण का दल ईशित्व, वायव्यकोण का दल वशित्व एवं ईशानकोण का दल सर्वज्ञत्वसिद्धिरूप है। उस पद्मासन की कर्णिका ( मध्यभाग) सोममण्डल कही जाती है । सोममण्डल के नीचे सूर्यमण्डल तथा उसके भी नीचे साक्षात् अग्निमण्डल है ॥ २५-२७ ॥ चारों उपदिशाओं (आग्नेय, नैर्ऋत्य, वायव्य तथा ईशान)-में धर्म आदि (धर्म, ज्ञान, वैराग्य एवं ऐश्वर्य), पूर्वादि चारों दिशाओं (पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर)-में अव्यक्तादि (अव्यक्त, महत्तत्त्व, अहंकार एवं चित्त), सोममण्डल के ऊपर तीन गुण (सत्त्व, रज, तम), इनके ऊपर तीन आत्माएँ (विश्व, तैजस तथा प्राज्ञ) और उसके ऊपर शिवपीठिका विराजमान है; ऐसे अनन्त-स्वरूप आसन की कल्पना करनी चाहिये ॥ २८११/२ ॥ पुनः ‘सद्योजातं प्रपद्यामि०’ इस मन्त्र से परमेश्वर शिव का आवाहन करके वामदेवमन्त्र से आसन के ऊपर उन्हें स्थापित करे। फिर रुद्रगायत्री मन्त्र से सान्निध्य, अघोर मन्त्र से निरोधन तथा ‘ईशानः सर्वविद्यानाम्० ‘ इस मन्त्र से शिव की पूजा करे। पाद्य, अर्घ्य एवं आचमन परमेश्वर को अर्पित करे । पुनः गन्ध तथा चन्दनयुक्त जल से उन्हें विधिपूर्वक स्नान कराये ॥ २९-३१११/२ ॥ इसके बाद पात्र में विधि-विधान से पंचगव्य बनाकर उसे प्रणव से अभिमन्त्रित करके पुनः प्रणवमन्त्र से उस पंचगव्य से शिव को विधिवत् स्नान कराये। इसके अनन्तर प्रणव तथा वेदमन्त्रों का पाठ करते हुए गोघृत से, मधु से, इक्षुरस से एवं अन्य पवित्र द्रव्यों से महादेव का अभिषेक करना चाहिये। इसके बाद पवित्र जलपात्रों से जल छोड़कर साधक को भलीभाँति शिवलिङ्ग का प्रक्षालन (शुद्ध स्नान) कर लेना चाहिये ॥ ३२-३४ ॥ इसके बाद साधक को श्वेत वस्त्रों से यथाविधि जल का शोधन करके स्वर्ण, चाँदी या ताम्रपात्र अथवा कमलपत्र, पलाशपत्र, शंख अथवा शोधित सुन्दर मृत्तिकापात्र लेकर उसे पूर्वोक्त शुद्ध जल से पूर्ण कर लेना चाहिये । पुनः उसमें कुश, अपामार्ग, कर्पूर, जातिपुष्प, चम्पा, श्वेत करवीर, मल्लिका, कमल, उत्पल आदि सुन्दर पुष्प, चन्दन आदि डालकर उस जल को सद्योजात आदि मन्त्रों से अभिमन्त्रित करके मन्त्रोच्चार के साथ उस जलकुम्भ से शिवजी का अभिषेक करना चाहिये ॥ ३५–३८११/२ ॥ [नन्दीश्वर कहते हैं — हे सनत्कुमारजी!] अब मैं सभी मनोरथों की सिद्धि करने वाले उन मन्त्रों को आपको बताऊँगा; जिनका पाठ करके एक बार भी शिवलिङ्ग का अभिषेक करने से मनुष्य भवबन्धन से छूट जाता है ॥ ३९११/२ ॥ [सूतजी बोले—] हे मन्त्रवेत्ता ऋषिगण! पवमान (ऋग्वेदीय पावमानी ऋचाएँ), वामसूक्त (ऋक् ० १ | १६४), रुद्राध्याय (शुक्लयजुर्वेद अ० १६ ), अथर्ववेदीय नीलरुद्र (११ । २), पवित्र श्रीसूक्त (ऋग्वेद), रात्रिसूक्त (ऋग्वेद), कल्याणप्रद चमक (यजुर्वेद अ० १८), होतार, मंगलमय अथर्वशिर, शान्ति, भारुण्ड, अरुण, वारुण, ज्येष्ठ, वेदव्रत, आन्तर, पुण्यप्रद पुरुषसूक्त (यजुर्वेद), त्वरितरुद्र, कपि, कपर्दी, सामवेदीय आ वो राज० (मन्त्र-संख्या ६९), बृहच्चन्द्र, विष्णु, विरूपाक्ष, स्कन्द, शिव की सौ ऋचा, पंचब्रह्म (सद्योजातादि पाँच मन्त्र), नमः शिवाय तथा केवल प्रणवमन्त्र से ही सभी पापों के शमन हेतु देवदेवेश शिव का अभिषेक करना चाहिये ॥ ४०–४५१/२ ॥ तत्पश्चात् भगवान् शंकर को वस्त्र, यज्ञोपवीत, आचमनीय, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, सुगन्धित जल, पुनः आचमन, [रत्नजटित ] मुकुट, सुन्दर छत्र, आभूषण तथा मुखवास (ताम्बूल) आदि उपचार प्रणव- मन्त्र क्रम से अर्पित करना चाहिये ॥ ४६–४८ ॥ इसके बाद स्फटिक के सदृश वर्ण वाले, कलारहित, अविनाशी, समस्त देवताओं के भी कारण, सभी लोकों में व्याप्त, परात्पर, ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र- रुद्र आदि देवताओं तथा देवर्षियों से अगम्य, श्रुतियों के अनुसार वेदों एवं उपनिषदों के ज्ञाताओं से भी अगोचर, आदि-मध्य-अन्त से रहित, भवरोग से संतप्त प्राणियों के लिये औषधरूप प्रसिद्ध शिवतत्त्व शिवलिङ्ग में प्रतिष्ठित है — इस प्रकार से शिवलिङ्ग में महादेव का ध्यान करना चाहिये ॥ ४९–५१ ॥ पुनः लिङ्ग के शीर्ष पर प्रणव मन्त्र से पूजा करनी चाहिये और विधिपूर्वक स्तोत्रपाठ करके नमस्कार तथा प्रदक्षिणा करनी चाहिये। इसके बाद अर्घ्य प्रदान करके महादेव के चरणों में पुष्प अर्पितकर उन्हें साष्टांग प्रणाम करे एवं देवाधिदेव शिव मुझमें समाहित हैं — ऐसी भावना करे ॥ ५२-५३ ॥ [हे सनत्कुमारजी!] इस प्रकार मैंने शिवलिङ्ग के उत्तम पूजन-विधान का वर्णन संक्षेप में कर दिया और अब आपको आभ्यन्तर लिङ्गार्चन विधि बताऊँगा ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘लिङ्गार्चनविधि’ नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥ Content is available only for registered users. 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