28 December 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -009 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ नौवाँ अध्याय योगसाधना के अन्तराय ( विघ्न), योग से प्राप्त होने वाली विघ्नरूप विभिन्न सिद्धियाँ तथा ऐश्वर्य, गुणवैतृष्ण्य तथा वैराग्य से पाशुपतयोग की प्राप्ति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नवमोऽध्यायः योगान्तरायकथनं सूतजी बोले — [ हे मुनीश्वरो ! ] योगसाधन के काल में पहले आलस्य तथा बाद में व्याधिपीड़ा उत्पन्न होती है, इसी प्रकार प्रमाद, संशय, चित्त की अनवस्थिति, अश्रद्धादर्शन, भ्रान्ति, त्रिविध दुःख, दौर्मनस्य (मन में असत्संकल्प-विकल्प का होना), निषिद्ध विषयों में मन का लगना —ये कुल दस प्रकार के विघ्न 1 साधक के योगाभ्यास में उत्पन्न होते हैं ॥ १-२१/२ ॥ शरीर तथा चित्त के भारीपन के कारण योग में प्रवृत्त न होना ही आलस्य है । धातुवैषम्य (न्यूनाधिक्य ) – के कारण क्रिया से होने वाले तथा वात-पित्त आदि दोषों से होने वाले विकार ही व्याधियाँ हैं । समाधि के साधनों का अनुष्ठान न करना प्रमाद है ॥ ३-४ ॥ यह करूँ अथवा वह करू- इन दोनों स्थितियों से मिश्रित अनिश्चिततापूर्ण विज्ञान को स्थानसंशय कहा गया है। समाधि-अवस्था को पाकर भी भवबन्धन के कारण योगी के चित्त का (लक्ष्य में) न ठहर पाना अनवस्थित-चित्तत्व है ॥ ५१/२ ॥ योग के साधन, साध्य, गुरु, ज्ञान, आचार तथा भगवान् शिव आदि में चित्त की सद्भावरहित वृत्ति का नाम अश्रद्धा है ॥ ६१/२ ॥ समाधि के समीप पहुँचकर अज्ञानता के कारण अनात्मपदार्थों में आत्मज्ञानरूप विपरीत ज्ञान रखना भ्रान्तिदर्शन कहा जाता है ॥ ७१/२ ॥ आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक — ये तीन प्रकार के सहज दुःख बताये गये हैं । इच्छा-विघात के कारण चित्त में उत्पन्न विक्षोभ ही दुःख कहा गया है ॥ ८-९ ॥ परम वैराग्य के द्वारा दौर्मनस्य को नियन्त्रित करना चाहिये। तमोगुण तथा रजोगुण से मिला हुआ यह मन दुर्मन कहा गया है । इसलिये ऐसे मन में उत्पन्न होने वाला दूषित भाव दौर्मनस्य कहा गया है ॥ १०१/२ ॥ योग्य तथा अयोग्य जानते हुए भी अयोग्य विषयों के प्रति हठपूर्वक आसक्ति रखना ही विषय-लोलता है। योगियों के योगसाधन में इन्हें विघ्नरूप कहा गया है। अत्यन्त उत्साह से युक्त होकर अभ्यास करने वाले साधक की ये बाधाएँ दूर हो जाती हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ११-१२१/२ ॥ द्विज ! इन विघ्नों के समाप्त हो जाने के उपरान्त योगी के योगसाधन में नानाविध उपसर्ग (उपद्रव) उत्पन्न होते हैं। वे सभी उपसर्ग भी असिद्धिसूचक हैं ॥ १३१/२ ॥ हे विप्रेन्द्रो! प्रतिभा पहली सिद्धि, श्रवणा दूसरी सिद्धि, वार्ता तीसरी सिद्धि, दर्शना चौथी सिद्धि, आस्वादा पाँचवीं सिद्धि तथा वेदना छठी सिद्धि कही गयी है ॥ १४-१५ ॥ इन प्रतिभा आदि स्वल्प षट् सिद्धियों के आकर्षण से मुक्त मुनि को अणिमादि सिद्धियाँ अभिलषित सिद्धि प्रदान करती हैं, प्रत्येक पदार्थविषयक अवबोधात्मक वृत्ति को प्रतिभा कहते हैं, विवेचनापूर्वक वेद्य वस्तु को जिससे जाना जाय, वह बुद्धि कही गयी है । अतीत (भूत), अनागत ( भविष्य), सूक्ष्म, अदृष्ट, दूरस्थ, अत्यन्त समीप (वर्तमान) पदार्थोंका सर्वदा एवं सर्वत्र ज्ञान प्रदान करने वाली प्रतिभासिका वृत्ति ही प्रतिभा है ॥ १६-१७१/२ ॥ सभी शब्दों, ह्रस्व-दीर्घ- प्लुत आदि स्वरों तथा गुह्य ध्वनियों का बिना किसी प्रयास के श्रवण होकर उनका यथार्थ ज्ञान हो जाना श्रवणासिद्धि है और स्पर्श की जो अनुभूति है, वह वेदनासिद्धि कही गयी है ॥ १८-१९ ॥ बिना किसी प्रयत्न के दिव्य रूपों का भी नेत्रेन्द्रिय से दिखायी पड़ना दर्शनासिद्धि है और दिव्य रसों का सहज रूप में बिना किसी प्रयत्न के ठीक-ठीक ज्ञान होना आस्वादासिद्धि है। इसी तरह बुद्धि के द्वारा दिव्य गन्धों का भी ठीक-ठीक गन्धतन्मात्रा के रूप में अनुभव कर लेना वार्तासिद्धि है ॥ २०१/२ ॥ द्विज ! इस योगजनित धर्मरूप संसर्ग से योगीलोग इस जगत् में ब्रह्मलोकपर्यन्त जो सब कुछ है, उसे अपने देह में स्थित देखते हैं । हे द्विजो ! आगे बताये जाने वाले आठ गुण वृद्धिक्रम से गुणित होकर संख्या में चौंसठ गुणों के बराबर हो जाते हैं ॥ २१-२२ ॥ हे द्विजो ! साधक को अपने इन औपसर्गिक अर्थात् विघ्नकारी गुणों का सर्वथा परित्याग कर देना चाहिये। पिशाचलोक में पार्थिव गुण, राक्षसलोक में जल- सम्बन्धी गुण, यक्षलोक में तेजसम्बन्धी गुण, गन्धर्वलोक में वायुसम्बन्धी गुण, इन्द्रलोक में व्योमात्मक अर्थात् आकाशसम्बन्धी गुण, सोमलोक में मनसम्बन्धी गुण, प्रजापतिलोक में अहंकारसम्बन्धी गुण तथा ब्रह्मलोक में सर्वोत्तम बोधगुण कहे गये हैं ॥ २३-२४१/२ ॥ पहले पार्थिव में आठ गुण, दूसरे जल में सोलह गुण, तीसरे तेज में चौबीस गुण, चौथे वायु में बत्तीस गुण तथा पाँचवें आकाश में चालीस गुणवाले ऐश्वर्य विद्यमान हैं। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द पूर्वोक्त पंचमहाभूतों की तन्मात्राएँ कही गयी हैं । इन्द्रसम्बन्धी व्योमात्मक गुणपर्यन्त इन पाँचों में प्रत्येक आठ-आठ के वृद्धिक्रम से बताये जा चुके हैं ॥ २५-२७ ॥ हे उत्तम द्विजो ! इसी प्रकार मनसम्बन्धी अड़तालीस गुण तथा अहंकारसम्बन्धी छप्पन गुण और अन्त में चौंसठ गुणात्मक ब्राह्म अर्थात् बुद्धिसम्बन्धी ब्रह्म के ऐश्वर्य को साधक प्राप्त कर लेता है ॥ २८ ॥ जो योगी ब्रह्मलोकपर्यन्त सभी लोकों में औपसर्गिक अर्थात् योगविघ्नों को विचारपूर्वक उनका परित्याग कर देता है, वह परम सुखी हो जाता है ॥ २९ ॥ शरीर की स्थूलता, ह्रस्वता, बालकपन, वृद्धता, यौवन, अनेकविध रूप धारण करना, बिना पार्थिव अंशके शेष चार तत्त्वों से देह धारण करना तथा नित्य सुगन्धि से युक्त रहना — ये आठ प्रकार के महान् पार्थिव गुण कहे गये हैं ॥ ३०-३१ ॥ पृथ्वी पर रहने की भाँति जल में निवास करना, उससे बाहर आने की सामर्थ्य रखना, इच्छा होने पर स्वयं सम्पूर्ण समुद्र का पान करने में समर्थ होना तथा उससे किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़ना, इस जगत् में जहाँ भी इच्छा करे, वहाँ जल का दर्शन कर लेना, जिस-जिस वस्तु का भक्षण किया जाय, उसे अपनी इच्छा के अनुसार रसयुक्त बना देना, तेज, वायु, आकाश — इन तीनों से देह धारण करना, बिना पात्र के हाथ से जलपिण्डका धारण करना तथा शरीरमें व्रण आदि का न होना — इन आठ तथा पूर्वोक्त पार्थिव गुणों को मिलाकर — ये सोलह गुणात्मक आप्य (जलसम्बन्धी) उत्तम ऐश्वर्य कहे गये हैं ॥ ३२-३५ ॥ श्रेष्ठ मुनियो ! देह से अग्नि का निर्माण, अग्नि के ताप का भय न होना, दग्धलोक को भी अपने योगविधान से अदग्धतुल्य अर्थात् पूर्ववत् कर देना, जल के भीतर अग्नि स्थापित करके उसे वैसे ही बनाये रखना, हाथ से आग पकड़ लेना, स्मरणमात्र से अग्नि प्रकट कर देना, भस्म हुए पदार्थ को इच्छापूर्वक पहले की भाँति कर देना तथा उन तीनों (पृथ्वी, जल, तेज) — के बिना दो तत्त्वों अर्थात् वायु और आकाश से अपनी देह धारण करना — ये चौबीस गुणवाले तैजस ऐश्वर्य हैं ॥ ३६-३८१/२ ॥ मन की गति प्राप्त कर लेना अर्थात् जहाँ मन की इच्छा हो वहाँ चले जाना, अन्य प्राणियों के अन्तर्मन में निवास करना, पर्वत आदि महाभार कंधे पर धारण करके चलना, हलका तथा भारी होने की सामर्थ्य रखना, हाथों से वायु पकड़ लेना, अंगुलि के अग्रभाग से आघात करके पृथ्वी में सर्वत्र कम्पन उत्पन्न कर देना, केवल आकाश तत्त्व से देह धारण करना — ये वात सम्बन्धी ऐश्वर्य विद्वानों के द्वारा कहे गये हैं ॥ ३९-४१ ॥ शरीर की छाया न होना, इन्द्रियों का प्रत्यक्ष दर्शन होना, आकाश में गमन करना, इन्द्रियों के अर्थ का ज्ञान, दूर से ही शब्दों को सुनने की क्षमता रखना, सभी शब्दों के ज्ञान में पारंगत होना, तन्मात्राओं के स्वरूप का ज्ञान तथा सभी प्राणियों को साक्षात् देखने में समर्थ होना —ये ऐन्द्र ऐश्वर्य अर्थात् आकाशसम्बन्धी ऐश्वर्य हैं। इन समस्त पाँच प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त साधक कायव्यूहसामर्थ्यवान् कहा जाता है ॥ ४२-४३१/२ ॥ किसी भी अभिलषित वस्तु की प्राप्ति, जहाँ भी जाने की इच्छा हो, वहाँ पहुँच जाना, सभी जगह अपना शक्तिप्राबल्य प्रदर्शित करना अर्थात् अपने प्रभाव से सभी को पराभूत कर देना, सभी गुप्त पदार्थों को देख लेना, अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण करना, सभी को अपने वश में कर लेना, सभी को प्रिय लगना, सम्पूर्ण जगत् को देखने की सामर्थ्य रखना — ये सब मानस गुणों के लक्षण हैं ॥ ४४-४५१/२ ॥ छेदन, ताड़न, बन्ध, संसारपरिवर्तन, सर्वभूतप्रसाद, मृत्यु तथा काल का जय — ये प्रजापतिसम्बन्धी श्रेष्ठ आहंकारिक ऐश्वर्य कहे गये हैं ॥ ४६-४७ ॥ बिना कारण जगत् की सृष्टि, अनुग्रह, प्रलय, अधिकार, लोकवृत्त का प्रवर्तन, असादृश्य, पृथक्-पृथक् व्यक्त निर्माण तथा संसार का कर्तृत्व — यह उत्तम ब्राह्म ऐश्वर्य है ॥ ४८-४९ ॥ ये ब्राह्म ऐश्वर्य के तत्त्व कहे गये हैं और ये ही प्रधानसम्बन्धी वैष्णव पद हैं। ब्रह्मा के बिना उस गुण को अन्य कोई नहीं जान सकता है ॥ ५० ॥ उस वैष्णवपद से भी परे शैवपद है, जिसे विष्णु भी नहीं जानते हैं। असंख्य गुणोंवाले शुद्ध शिवात्मक तत्त्व को कौन जान सकता है अर्थात् कोई नहीं जान सकता ॥ ५१ ॥ चौंसठ गुणात्मक ये ऐश्वर्य व्यवहारकाल में सिद्धि कहे जाते हैं, किंतु समाधिकाल में ये ही उपसर्ग अर्थात् विघ्न कहे गये हैं। इन्हें प्रयत्नपूर्वक परम वैराग्य से रोकना चाहिये ॥ ५२ ॥ भय उत्पन्न करने वाले विषय-भोगों की अवश्यम्भावी नश्वरता जानकर सबका अश्रद्धा से त्याग कर देना चाहिये। ऐसा करने वाला विरक्त कहा जाता है ॥ ५३ ॥ पुरुष में वितृष्णा नाम से प्रसिद्ध भाव को ही गुणवैतृष्ण्य कहा जाता है । औपसर्गिक अर्थात् विघ्नरूप सिद्धियों का वैराग्य के द्वारा परित्याग कर देना चाहिये ॥ ५४ ॥ चित्त को विषयभोगों से हटाकर भुवनों में समस्त विघ्नरूप ब्राह्म ऐश्वर्यों का परित्याग करने से महेश्वर प्रसन्न होते हैं और इस प्रकार साधक के परम वैराग्य से शिव के प्रसन्न होने पर उसे विमल मुक्ति प्राप्त होती है अथवा जो योगी सांसारिक प्राणियों के कल्याणार्थ या लीला के निमित्त इन सिद्धियों का त्याग नहीं करता, वह भी सुखी ही रहता है ॥ ५५-५६१/२ ॥ भूमि छोड़कर अपनी प्रबल शक्ति से आकाश में क्रीडा करता है और कभी सूक्ष्म अर्थात् सामान्य लोगों के लिये अबोधगम्य वेदार्थों को संक्षेप में उच्चारित करता है ॥ ५७१/२ ॥ वह कभी कोई प्रसंग सुनकर उसके अर्थ से श्लोक-रचना कर डालता है । कभी दण्डक छन्द में और इसी प्रकार हजारों प्रकार के छन्दों में काव्यरचना करता है ॥ ५८१/२ ॥ उसे मृग तथा पक्षिवर्ग की ध्वनियों का ज्ञान हो जाता है । यहाँतक कि ब्रह्मा से लेकर स्थावरपर्यन्त समग्र संसार उस योगी के लिये हस्तामलकतुल्य हो जाता है ॥ ५९१/२ ॥ हे श्रेष्ठ मुनियो ! अधिक क्या कहा जाय; उस महात्मा योगी में हजारों प्रकार के विज्ञान उत्पन्न हो जाते हैं। सतत अभ्यास के द्वारा ही यह विशुद्ध विज्ञान सदा स्थिर रहता है ॥ ६०-६१ ॥ योगी सभी तेजसम्पन्न देवताओं के बिम्ब तथा हजारों प्रकार के विमानों को देखने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है ॥ ६२ ॥ वह ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, यम, अग्नि, वरुण आदि देवताओं, ग्रहों, नक्षत्रों, तारों तथा हजारों भुवनों को देख लेता है ॥ ६३ ॥ वह पाताल के तल में स्थित पदार्थों को भी आत्मविद्यारूप स्वस्थ तथा अचल दीपक से समाधिस्थ होकर देखता है ॥ ६४ ॥ वह साधक प्रसादरूप अमृत से पूर्ण सत्त्वपात्र में स्थित उस आत्मविद्यारूप प्रदीप से अज्ञानान्धकार को नष्ट करके अपने भीतर साक्षात् ईश्वर का दर्शन करता है ॥ ६५ ॥ उसी परमेश्वर की कृपा से धर्म, ऐश्वर्य, ज्ञान, वैराग्य तथा मोक्ष सुलभ हो जाते हैं; इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं करना चाहिये ॥ ६६ ॥ हे मुनीश्वरो ! शिव की महिमा का विस्तृत वर्णन हजारों वर्षों में भी नहीं किया जा सकता है । अतएव पाशुपतयोग में निष्ठापूर्वक रहना चाहिये तथा उसी में सदा मन को स्थिर रखना चाहिये ॥ ६७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘योगान्तरायकथन’ नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥ 1. पातंजलयोगसूत्रमें योगके अन्तराय इस प्रकार बताये गये हैं- व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वा-नवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः । (पातंजलयोगप्रदीप समाधिपाद ३०) अर्थात् व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व, अनवस्थितत्व – ये चित्त के नौ विक्षेप (योग के विघ्न) हैं । Content is available only for registered users. 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