17 July 2009 | aspundir | 6 Comments अष्ट-गन्ध ‘यन्त्र’ लिखते समय अथवा पूजन में ‘अष्ट-गन्ध’ के सम्बन्ध में कुछ विशेष बातें इस प्रकार है- देवताओं के लिए ‘अष्ट-गन्ध’ इस प्रकार है- (क) १॰ अगर, २॰ तगर, ३॰ गोरोचन, ४॰ कस्तूरी, ५॰ श्वेत-चन्दन, ६॰ लाल-चन्दन, ७॰ सिन्दूर और ८॰ केशर। अथवा, (ख) १॰ कपूर, २॰ कस्तूरी, ३॰ केशर, ४॰ गोरोचन, ५॰ संगरफ, ६॰ श्वेत-चन्दन, ७॰ अगर और ८॰ गेहूला। अथवा (ग) १॰ केशर, २॰ कस्तूरी, ३॰ कपूर, ४॰ हिंगलू, ५॰ श्वेत-चन्दन, ६॰ लाल-चन्दन, ७॰ अगर और ८॰ तगर। देवी के लिए ‘अष्ट-गन्ध’ इस प्रकार है- (क) १॰ श्वेत-चन्दन, २॰ अगर, ३॰ हल्दी, ४॰ कुंकुंम, ५॰ गोरोचन, ६॰ शिलाजीत, ७॰ जटामांसी तथा ८॰ कपूर। अथवा (ख) १॰ १॰ श्वेत-चन्दन, २॰ अगर,३॰ जटामांसी या बालछड़, ४॰ देवदारु, ५॰ कूट, ६॰ केशर, ७॰ ख़सरो-जड़ (नागर-मोथा की एक उपजाति की जड़) और ८॰ नेत्र-जड़ (नागर-मोथा की एक अन्य उपजाति की जड़)। अथवा (ग) १॰ अगर, २॰ लाल-चन्दन, ३॰ हल्दी, ४॰ कुंकुंम, ५॰ गोरोचन, ६॰ जटामांसी, ७॰ शिलाजीत तथा ८॰ कपूर। उपर्युक्त के अलावा ‘अष्ट-गन्ध’ के अन्य प्रकार भी हैं। सुविधानुसार किसी से कार्य किया जा सकता है- (क) १॰ अगर, २॰ तगर, ३॰ लाल-चन्दन, ४॰ कुंकुंम, ५॰ गोरोचन, ६॰ जटामांसी, ७॰ शिलाजीत और ८॰ कपूर। अथवा (ख) १॰ अगर, २॰ श्वेत-चन्दन, ३॰ लाल-चन्दन, ४॰ कुंकुंम, ५॰ गोरोचन, ६॰ जटामांसी, ७॰ शिलाजीत और ८॰ कपूर। अथवा (ग) १॰ अगर, २॰ तगर,३॰ कस्तूरी, ४॰ कुंकुंम, ५॰ श्वेत-चन्दन, ६॰ गोरोचन, ७॰ केशर और ८॰ हाथी का मद। इनमें से किसी भी ‘अष्ट-गन्ध’ का प्रयोग किया जा सकता है। देवी को रक्त-चन्दन, कुंकुंम आदि अधिक प्रिय है। अतः देवी के भक्तों को ऐसे अष्ट-गन्ध का प्रयोग करना चाहिए, जिनमें यह अवश्य हो। कार्य अथवा कामना के अनुसार भिन्न-भिन्न अष्ट-गन्ध के उल्लेख भी देखने में मिलता है। यथा, पुत्र-प्राप्ति-सम्बन्धी प्रयोग हेतु निम्न-लिखित अष्ट-गन्ध का प्रयोग करना चाहिए- १॰ श्वेत-चन्दन, २॰ लाल-चन्दन, ३॰ केशर, ४॰ कस्तरी, ५॰ गोरोचन, ६॰ कपूर, ७॰ अम्बर तथा ८॰ अगर। रोग आदि निवारण हेतु निम्न-लिखित अष्ट-गन्ध का प्रयोग करना चाहिए- १॰ कपूर, २॰ चन्दन, ३॰ कुंकुंम, ४॰ देवदार, ५॰ गोरोचन, ६॰ केशर, ७॰ नागरमोथा तथा ८॰ नागरमोथा की जड़। श्रीदुर्गा अष्टोत्तर-शत-नाम-स्तोत्र में अष्ट-गन्ध का दूसरा क्रम इस प्रकारदिया गया है- १॰ गोरोचन, २॰ लाख, ३॰ कुंकुंम, ४॰ सिन्दूर, ५॰ के्पूर, ६॰ घृत, ७॰ दूध तथा ८॰ मधु। अष्ट-गन्ध की स्याही बनाते समय एक-एक वस्तु को क्रम से एक-एक अंश बढ़ाकर नाप से लेना चाहिए और खरल करना चाहिए। स्याही हेतु गंगा-जल, गुलाब-जल या इत्र का प्रयोग करना चाहिए। Share this: Print (Opens in new window) Print Post Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like this:Like Loading… Related Discover more from Vaidicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Related posts: Base of Dharm-हिन्दू-धर्म का आधार गजेन्द्रमोक्ष-आख्यान के पाठ का माहात्म्य महिमा तिलक की सर्वप्रथम गणेश का ही पूजन क्यों ? श्री गणेश अष्टोतर नामावलि ग्रह, आर्थिक, विवाह-बाधा-निवारण प्रयोग श्री हनुमद्ष्टोत्तर-शत-नामावली कवच के प्रयोग सर्वैश्वर्यप्रद-लक्ष्मी-कवच गोवर्धन पर्वत धारण करने पर नीचे की भुमि जलमग्न क्यों नहीं हुई? Powered by YARPP.