अष्ट-गन्ध

‘यन्त्र’ लिखते समय अथवा पूजन में ‘अष्ट-गन्ध’ के सम्बन्ध में कुछ विशेष बातें इस प्रकार है-

देवताओं के लिए ‘अष्ट-गन्ध’ इस प्रकार है-

(क) १॰ अगर, २॰ तगर, ३॰ गोरोचन, ४॰ कस्तूरी, ५॰ श्वेत-चन्दन, ६॰ लाल-चन्दन, ७॰ सिन्दूर और ८॰ केशर। अथवा,

(ख) १॰ कपूर, २॰ कस्तूरी, ३॰ केशर, ४॰ गोरोचन, ५॰ संगरफ, ६॰ श्वेत-चन्दन, ७॰ अगर और ८॰ गेहूला। अथवा

(ग) १॰ केशर, २॰ कस्तूरी, ३॰ कपूर, ४॰ हिंगलू, ५॰ श्वेत-चन्दन, ६॰ लाल-चन्दन, ७॰ अगर और ८॰ तगर।

देवी के लिए ‘अष्ट-गन्ध’ इस प्रकार है-

(क) १॰ श्वेत-चन्दन, २॰ अगर, ३॰ हल्दी, ४॰ कुंकुंम, ५॰ गोरोचन, ६॰ शिलाजीत, ७॰ जटामांसी तथा ८॰ कपूर। अथवा

(ख) १॰ १॰ श्वेत-चन्दन, २॰ अगर,३॰ जटामांसी या बालछड़, ४॰ देवदारु, ५॰ कूट, ६॰ केशर, ७॰ ख़सरो-जड़ (नागर-मोथा की एक उपजाति की जड़) और ८॰ नेत्र-जड़ (नागर-मोथा की एक अन्य उपजाति की जड़)। अथवा

(ग) १॰ अगर, २॰ लाल-चन्दन, ३॰ हल्दी, ४॰ कुंकुंम, ५॰ गोरोचन, ६॰ जटामांसी, ७॰ शिलाजीत तथा ८॰ कपूर।

उपर्युक्त के अलावा ‘अष्ट-गन्ध’ के अन्य प्रकार भी हैं। सुविधानुसार किसी से कार्य किया जा सकता है-

(क) १॰ अगर, २॰ तगर, ३॰ लाल-चन्दन, ४॰ कुंकुंम, ५॰ गोरोचन, ६॰ जटामांसी, ७॰ शिलाजीत और ८॰ कपूर। अथवा

(ख) १॰ अगर, २॰ श्वेत-चन्दन, ३॰ लाल-चन्दन, ४॰ कुंकुंम, ५॰ गोरोचन, ६॰ जटामांसी, ७॰ शिलाजीत और ८॰ कपूर। अथवा

(ग) १॰ अगर, २॰ तगर,३॰ कस्तूरी, ४॰ कुंकुंम, ५॰ श्वेत-चन्दन, ६॰ गोरोचन, ७॰ केशर और ८॰ हाथी का मद।

इनमें से किसी भी ‘अष्ट-गन्ध’ का प्रयोग किया जा सकता है। देवी को रक्त-चन्दन, कुंकुंम आदि अधिक प्रिय है। अतः देवी के भक्तों को ऐसे अष्ट-गन्ध का प्रयोग करना चाहिए, जिनमें यह अवश्य हो।

कार्य अथवा कामना के अनुसार भिन्न-भिन्न अष्ट-गन्ध के उल्लेख भी देखने में मिलता है। यथा, पुत्र-प्राप्ति-सम्बन्धी प्रयोग हेतु निम्न-लिखित अष्ट-गन्ध का प्रयोग करना चाहिए- १॰ श्वेत-चन्दन, २॰ लाल-चन्दन, ३॰ केशर, ४॰ कस्तरी, ५॰ गोरोचन, ६॰ कपूर, ७॰ अम्बर तथा ८॰ अगर।

रोग आदि निवारण हेतु निम्न-लिखित अष्ट-गन्ध का प्रयोग करना चाहिए- १॰ कपूर, २॰ चन्दन, ३॰ कुंकुंम, ४॰ देवदार, ५॰ गोरोचन, ६॰ केशर, ७॰ नागरमोथा तथा ८॰ नागरमोथा की जड़।

श्रीदुर्गा अष्टोत्तर-शत-नाम-स्तोत्र में अष्ट-गन्ध का दूसरा क्रम इस प्रकारदिया गया है- १॰ गोरोचन, २॰ लाख, ३॰ कुंकुंम, ४॰ सिन्दूर, ५॰ के्पूर, ६॰ घृत, ७॰ दूध तथा ८॰ मधु।

अष्ट-गन्ध की स्याही बनाते समय एक-एक वस्तु को क्रम से एक-एक अंश बढ़ाकर नाप से लेना चाहिए और खरल करना चाहिए। स्याही हेतु गंगा-जल, गुलाब-जल या इत्र का प्रयोग करना चाहिए।


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    • 16 years ago

    hi

    • 16 years ago

    hi im ma jewellerys

    • 16 years ago

    pandit ji mujhe gorochan ke fayde bata dijiye…….maine usko pani me gholkar uska teeka lagana shuroo kar diya hai……maine padha tha ki ye bahut shubh hota hai ….kripya mujhe gorochan ke tilak ka fayda bata dijiye….main apka sada abhaari rahoonga

    • 16 years ago

    Aap ney bahut hi gyanvardhak batain batai hain jissey logon ka aur janney ka interest badhta hai vah bhi saral bhasha mein , Hum hindi mein kaidey type kar saktay hain?
    kya aap bata saktay hain ki graha ast aur uday kaisey hotein hain?

    • 17 years ago

    Bahut Bahut Dhanyawad Pundir ji..Asht Gandh ke bare main pata to tha kintu itni Gahrai main nahi…..

    aapki is post ne nishchit hi mera gyan vardhan kiya hai…

    aapko bahut bahut dhanyawad…

    Mata Sadaiv aap par apne anchal ki chhav banaye rakhain…

    Jai Bhawani.

    • 17 years ago

    लम्बा इन्तजाम है!

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