श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -007
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
सातवाँ अध्याय
भगवान् विष्णु के अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्र जप की महिमा में ऐतरेय ब्राह्मण की कथा
श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे सप्तमोऽध्यायः
द्वादशाक्षरप्रशंसा

ऋषिगण बोले — किस [ मन्त्र] – के जप से प्राणी सम्पूर्ण सांसारिक भय आदि से मुक्त हो जाता है और समस्त पापों से छूटकर परम गति प्राप्त करता है ? किस जप के द्वारा मनुष्य अलक्ष्मी का त्याग करके लक्ष्मीयुक्त हो जाता है; हे सूतजी ! यह सब आप बतायें ॥ १-२ ॥

सूतजी बोले — पूर्वकाल में पितामह ने महात्मा वसिष्ठ से इस विषय में जो बताया था, वह सब मैं सभी प्राणियों के कल्याण के लिये संक्षेप में बताऊँगा । आप सभी लोग जनार्दन, देवाधिदेव, अजन्मा, कृष्ण, अच्युत, अव्यय, समस्त पापों को दूर करने वाले, विशुद्ध, मोक्ष प्रदान करने वाले तथा ब्रह्मवादी विष्णु को प्रणाम करके [मेरा] वचन सुनें ॥ ३-४१/२

जो पुण्य कर्म करने वाला विद्वान् मन-वचन-कर्म से पुरुषोत्तम को प्रणाम करके ‘नमो नारायणाय’ – इस मन्त्र का जप करता है; सोते जागते, चलते, बैठते, भोजन करते, आँखें खोलते तथा मूँदते नारायण का स्मरण करता है; भोज्य, पेय तथा लेह्य पदार्थ का स्पर्श करते हुए ‘नमो नारायणाय’ – इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करके उसे ग्रहण करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है और सभी पापों से मुक्त होकर सद्गति प्राप्त करता है ॥ ५–८१/२

मुनि दुःसह की पत्नी जो मेरे द्वारा अलक्ष्मी कही गयी है, वह ‘नारायण’ नाम को सुनते ही वहाँ से भाग जाती है; इसमें संशय नहीं है और हे सुव्रतो! देवों के भी देव भगवान् श्रीकृष्ण की प्रिया जो लक्ष्मी हैं, वे [ उस मनुष्य के] घर, क्षेत्र, आवास तथा शरीर में वास करती हैं ॥ ९-१०१/२

सभी शास्त्रों का सम्यक् अनुशीलन करके और बार-बार विचार करके यही एक निश्चय किया गया है कि सदा नारायण का ही ध्यान करना चाहिये । अनेक मन्त्रों तथा व्रतों से उस मनुष्य को क्या प्रयोजन; क्योंकि यह ‘नमो नारायणाय’ मन्त्र सभी कामनाओं को सिद्ध करने वाला है । अतः हे विप्रेन्द्रो ! जो सभी समय ‘नमो नारायणाय’ इस मन्त्र को जपता है, वह बन्धु बान्धवोंसहित विष्णु लोक को प्राप्त होता है ॥ ११–१३१/२

हे मुनिश्रेष्ठो ! अब आप लोग देवदेव भगवान् विष्णु के अन्य मन्त्रों के माहात्म्य का श्रवण करें। मैंने पूर्वकाल में समस्त वेदार्थों को सिद्ध करने वाले, बारह वर्णों से युक्त, द्वादश आदित्यस्वरूप तथा सनातन मन्त्र का अभ्यास किया था; उसी मन्त्र का माहात्म्य मैं आप लोगों को संक्षेप में बता रहा हूँ ॥ १४-१५१/२

किसी महामनीषी ब्राह्मण ने तपस्या करके किसी तरह एक पुत्र को उत्पन्नकर क्रमानुसार उसके सभी संस्कार सम्पन्न किये; यथासमय उसके उपनयन के पश्चात् उस द्विज ने उसे अध्ययन कराया, किन्तु वह कुछ भी नहीं बोल पाता था। उसकी जिह्वा किसी भी शब्द का उच्चारण नहीं करती थी, वह ऐतरेय नामक बालक केवल ‘वासुदेवाय’ – इस मन्त्र को निरन्तर बोलता था। इससे वह द्विजश्रेष्ठ बहुत दुःखित हुआ ॥ १६-१८१/२

तब उसके पिता ने दूसरी स्त्री से विधान के साथ विवाह करके उससे विधिपूर्वक पुत्र उत्पन्न किये। वे पुत्र वेदों का अध्ययन करके सबके मान्य तथा सम्पत्तियुक्त हो गये ॥ १९-२० ॥ ऐतरेय की वह माता इससे अत्यन्त दुःखित तथा शोकाकुल होकर [उससे] बोली — ‘मेरी सौत के पुत्र सम्पन्न हैं तथा पूजित वेदवेदांग में पारंगत हैं; वे ब्राह्मणों से होते हुए अपनी माता को आनन्दित करते हैं। एक तुम हो जो मुझ अभागिन को उद्यमहीन पुत्र उत्पन्न हुए। अब तो मेरा मर जाना ही श्रेयस्कर है; जीवित रहना किसी भी तरह ठीक नहीं’ ॥ २१-२२१/२

[ माता के द्वारा ] ऐसा कहा गया वह ऐतरेय वहाँ से निकलकर यज्ञमण्डप में गया। उसके पहुँचते ही [ वहाँ उपस्थित] ऋत्विजों को मन्त्र अवगत नहीं हुए। उस ऐतरेय के वहाँ स्थित रहने पर सभी ब्राह्मण मोहित हो गये। तब वासुदेव इस नाम-मन्त्र के कीर्तन से उसके मुख से मन्त्रमयी वाणी निकलने लगी । [ यह देखकर ] उन विप्रों ने प्रणाम करके यथाविधि ऐतरेय का पूजन किया। तत्पश्चात् वहाँ पर यज्ञदेव स्वयं ही उपस्थित हुए। तब उस यज्ञ को पूर्ण करके उन विप्रों के द्वारा वह ऐतरेय धन आदि से सम्मानित किया गया। उसने एकनिष्ठ होकर छः अंगों सहित सभी वेदों का उस विप्रसभा में कथन किया । [ तब हर्षित होकर ] सभी ऋत्विज ब्राह्मण आदि तथा द्विजगण उसकी स्तुति करने लगे और सभी खेचर, सिद्ध एवं चारण उसके ऊपर पुष्प वृष्टि करने लगे ॥ २३–२७१/२

हे द्विजश्रेष्ठो ! इस प्रकार यज्ञ सम्पन्न करके वह ऐतरेय अपनी माता की पूजा करके विष्णुलोक चला गया। मैंने यह द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) – का महत्त्व आप लोगों को बतला दिया। इसे पढ़ने तथा सुनने वालों के महापाप का नाश हो जाता है। जो मनुष्य इस अविनाशी द्वादशाक्षर मन्त्र का नित्य जप करता है, वह भगवान् विष्णु के अनुपम, दिव्य तथा परमपद को प्राप्त होता है । पाप करने वाला भी यदि इस द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) – के जप में तत्पर रहता है, तो वह परम पद प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये, तो फिर हे सुव्रतो ! जो लोग अपने धर्म में स्थित रहते हुए वासुदेवपरायण हैं, उनकी बात ही क्या; वे महात्मा तो दिव्य स्थान (विष्णुलोक ) अवश्य प्राप्त करते हैं ॥ २८-३३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत उत्तरभाग में ‘द्वादशाक्षरप्रशंसा’ नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥

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